parul yadav

parul yadav

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अंतर्मन , निष्पक्षता , बेबाकी......समंदर की तरह......

07/05/2025

मैंने बहुत धैर्य से सब देखा-पढ़ा-सुना। मेरे लिये सबसे भावुक करने वाला क्षण प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। भारतीय सेना, भारत की सरकार ने एकदम स्पष्ट सन्देश देकर उन लोगों के मुँह पर भी करारा तमाचा जड़ा है, जो इतने दिन से गन्द मचाए हुए थे। जो पूछ रहे थे बीस करोड़ पा kis तानियों को 48 घण्टे में कैसे निकालेंगे।
यह सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग ही चाहिये बस। यही विश्वास। यह देश हमारा है और हम इस देश के। हमारे पुरखे इसी देश में पैदा हुए, हमारे बच्चे भी। इसका नुक़सान, हमारा नुक़सान है। इसकी तरक़्क़ी, हमारी तरक़्क़ी। इसकी सुरक्षा पर ख़तरा, हम पर संकट है।
ज़ाहिर है कुछ समय बाद मीडिया और जिनकी रोज़ी-रोटी अल गाव वाद से ही चल रही, फिर पुराने ढर्रे पर आ जाएंगे। पर इस समय, इस शानदार रणनीति, एकदम सोच-समझकर, शांत-संयमित होकर ली गई हर एक्शन के लिये सरकार साधुवाद की पात्र है। शुक्रिया तो बनता है। और हिन्द की सेना तो जय है, जय थी, जय रहेगी ही।

बाक़ी तो Aseem ने लिखा ही है। यही हमारे मन की बात समझी जाए। यही है असली इंडिया।

"कभी ध्यान से देखिए भारत को ये कोई देश नहीं, ये एक विशाल परिवार है,यहाँ 140 करोड़ लोग एक छत के नीचे रहते हैं,कोई मंदिर जाता है, कोई मस्ज़िद,कोई तेलुगू में बोलता है, कोई मैथिली में,
कोई बंगाल की माछ खाता है, कोई पंजाब के पराठे

और हाँ, परिवारों में झगड़े भी होते हैं,हम लड़ते हैं आरक्षण पर, धर्म पर, भाषा पर, जात पर,
कभी संसद में, कभी सोशल मीडिया पर, कभी चाय की टपरी पर

पर यही भारत है

यहाँ बहस होती है, बिखराव नहीं,यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, पर एकता की नींव नहीं हिलती

और यह बात दुनिया को तब समझ में आई,
जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद दो वर्दीधारी महिलाएँ

एक हिंदू, एक मुस्लिम—साथ खड़ी हुईं
ना नारा लगाया, ना घूंसा ताना,बस ठहराव, गरिमा और विश्वास के साथ प्रेस को संबोधित किया

इस पल ने बंदूक से ज़्यादा असर डाला,यह एक सैन्य जवाब नहीं था,यह एक सांस्कृतिक संदेश था
कि भारत को आप भीतर से नहीं तोड़ सकते,हम लड़ते हैं, पर अपने ही घर के भीतर और जब कोई बाहर से हमला करता है,तो हम सब एक साथ उठते हैं भाई बनकर, बहन बनकर, भारत बनकर

इन दो अफसरों का सामने आना सिर्फ सेना का बयान नहीं था,ये सरकार और फौज का वह मास्टरस्ट्रोक था (हाँ पहली बार मैं मानता हूँ यह है जिसे कहा जाए मास्टरस्ट्रोक,जिसका भी आइडिया था उसे सलाम),जिसने सिर्फ दुश्मन के बंकर नहीं तोड़े दुनिया भर के दिलों और दिमागों की सोच बदल दी

किसी ने मिसाइलें देखीं, किसी ने लाशें गिनी,
पर हमने देखा एक तस्वीर दो औरतें, दो वर्दियाँ, एक देश,इस तस्वीर ने बताया कि हमारे पास शक्ति भी है, और संतुलन भी,हमारे पास शौर्य भी है, और समझ भी,हमारे पास रॉकेट भी हैं, और रिश्ते भी

और याद रखना भारत को हराना मुश्किल नहीं है इसलिए कि हमारे पास हथियार हैं,बल्कि इसलिए कि हमारे पास दिल हैं जो अपनों के लिए भी धड़कते हैं,और दिमाग हैं जो दुश्मनों को भी चौंका देते हैं

हम कोई मशीन नहीं, हम मनुष्य हैं,हमें दर्द होता है, पर हम रोते नहीं जवाब देते हैं

यह है भारत,बिखरा हुआ नहीं,बोलता बहुत है, पर एक स्वर में,लड़ता बहुत है, पर अपनों से,
और जब कोई बाहर से आता है, तो हम सब एक हो जाते हैं..घर के लिए, अपनों के लिए, भारत के लिए

और एक और संदेश..लाउड और क्लियर..
हर उस नफरती चिंटू के लिए जो आज भी भारत के मुसलमानों की वफ़ादारी पर शक करते हैं:

"मोहम्मद ज़ुबैर"..एक नाम, एक पत्रकार, एक भारतीय,आज जब पाकिस्तान से फर्जी आईडीज़ और अफवाहों की बाढ़ आई,तो पूरा आईटी सेल कुछ नहीं कर पाया,पर मोहम्मद ज़ुबैर ने अकेले उस झूठ की चीर-फाड़ कर दी

उसे ‘भारत माता की जय’ चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ी,उसने देशभक्ति अपने काम से की, अपने हौसले से की

असल देशभक्त प्रूव नहीं करते,वो बस करते हैं दिल से, ज़मीर से, बिना शोर के

नाम याद रखिएगा..मोहम्मद ज़ुबैर..भारतीय!"
khan

01/05/2025

Until death, all the defats are just psychological

मृत्यु तक, कोई भी हार सिर्फ मानसिक (काल्पनिक ) हैं

28/04/2025

रिश्ते — थोड़ी सी मेहनत, रोज़ाना

हर दिन थोड़ी सी बातें,
हर दिन थोड़ी सी फुर्सत,
हर दिन थोड़ा सा हँसना,
और हर दिन थोड़ा सा समझना।

रिश्ते कोई फास्ट-फॉरवर्ड वीडियो नहीं,
ये तो स्लो मोशन में खिलने वाले फूल हैं,
जहाँ छोटी-छोटी बातें,
गहरी जड़ों में बदल जाती हैं।

ना बड़े वादे, ना भारी कसमें,
बस छोटी-छोटी consistency —
सुबह की गुड मॉर्निंग,
शाम की छोटी सी मीठी बात,
एक "तुम ठीक हो ना?"
और एक "मैं हूं तुम्हारे साथ।"

रिश्ते एप नहीं हैं जिसे अपडेट करना पड़े,
ये तो दिल की ऐप हैं,
जिसे हर दिन थोड़ा चार्ज करना पड़ता है...
थोड़ा धैर्य, थोड़ा भरोसा, और ढेर सारा प्यार।

15/04/2025

सबसे बेबस और अंदर तक तोड़ देने वाला एहसास तब होता है,
जब आप बड़ी हिम्मत करके कहते हैं,
"ये बात मुझे चोट पहुँचा गई,"
या "इससे मुझे कुछ महसूस हुआ,"
और जवाब में समझदारी, अपनापन या सिर्फ़ एक "माफ़ करना" मिलने के बजाय
आप पर उल्टा इल्ज़ाम, बात घुमाना या एक पूरा गिल्ट-ट्रिप फेंक दिया जाता है।

अचानक आप ही खलनायक बन जाते हैं।
"तुम ज़्यादा सोचते हो,"
"तुम बहुत ज़्यादा भावुक हो,"
"तुम छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देते हो।"
आपकी ईमानदारी को हमला बना दिया जाता है,
आपकी भावनाओं को कमज़ोरी बना दिया जाता है,
और बात के अंत तक आप ही माफ़ी माँगते हैं—
उस बात के लिए, जो आपने महसूस की।

आप वहाँ से उलझे हुए, बोझिल और शर्मिंदा होकर निकलते हैं—
इस बात का अफ़सोस करते हुए कि आपने कुछ कहा ही क्यों।
सबसे बुरा हिस्सा बहस नहीं होता,
बल्कि वो अंदरूनी जंग होती है
जहाँ आप खुद पर शक करने लगते हैं:
"शायद मैं ही ज़्यादा रिएक्ट कर गया?"
"शायद मुझे चुप ही रहना चाहिए था?"

पर सच्चाई यही है:
आपने झगड़ा नहीं माँगा था।
आपने सिर्फ़ इज़्ज़त माँगी थी।
आप समाधान चाहते थे,
ना कि सज़ा।
आप जुड़ाव ढूंढ रहे थे,
ना कि नियंत्रण।

ये बहुत तकलीफ़देह होता है
जब कोई इंसान ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकता,
तो वो पूरी कहानी ही पलट देता है—
और आपको ही पागल बना देता है,
सिर्फ़ इसलिए कि आपने प्यार और समझदारी माँगी।

इसीलिए बहुत से लोग चुप रहना सीख जाते हैं।
क्योंकि उन्हें महसूस नहीं होता—
बल्कि अनुभव सिखा देता है
कि कुछ कहना,
अक्सर और ज़्यादा दर्द दे जाता है।

और यही सबसे दुखद हिस्सा है।

इसलिए अगर कभी आपने
सच बोलने के बाद खुद को और ज़्यादा टूटा हुआ महसूस किया है,
तो ये याद रखिए:

आप ज़्यादा संवेदनशील नहीं हैं।
आपकी भावनाएँ बोझ नहीं हैं।
और आप गलत नहीं हैं
अगर आप स्पष्टता, समापन और करुणा चाहते हैं।

आपको बस उन लोगों की ज़रूरत है
जो एक रिश्ते की सच्चाई को सह सके—
जहाँ असली भावनाएँ हों,
असली ज़िम्मेदारी हो,
और असली परिपक्वता हो।
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13/04/2025

कभी कभी कुछ बातें
जो हम यूं ही तैश में या ,
भावनाओं के वशीभूत होकर
अचानक ही किसी से कह जाते हैं,
चाहे वो गुस्सा पलभर का ही हो,
चाहे हमारे मन में दूसरे के प्रति कोई भी
बैर भाव न हो ,
या हमारे कहने का तात्पर्य वो न रहा हो
जो उस वक्त समझा गया था,
और उनकी वजह से रिश्तों में ,
रत्ती भर भी कोई खटास आई थी,
सच में बहुत चुभते हैं शूल की तरह सीने मे,
बहुत तकलीफ देते हैं,
रुलाते हैं मायूस कर देते हैं ,
अचानक ही मुस्कुराते चेहरे को
कर देते हैं गमगीन,
और भर आती है आंखों में नमी ,
इस एहसास से कि हमने ये शब्द कहे कैसे..?
हमने क्यों क्रोध में ये वाक्य कहे ,
जिन्हें हम चाहकर भी वापिस नहीं ले सकते ?
जिनकी माफी फिर कभी संभव न हो पाई,
जिन शब्दों का भुगतान करने में,
तमाम उम्र बीत गई ,
वो कल भी चुभते थे ,
वो आज भी चुभते हैं किसी शूल की भांति हृदय को चीरते हुए...!
ख़ैर....
दीपिका....©®

11/04/2025

सांवली लड़कियाँ
धूप की उस नस्ल से आती हैं
जो खेतों में झुकी औरतों की पीठ पर
पसीने के संग आई थी।

शरमाने पे
उनके गाल गुलाबी नहीं होते,
ना वे काजल से आँखें धारदार बनाती हैं।
उनकी बोली में कोई राग नहीं,
एकदम से कच्चे आम की खटास होती है।

वे जल्दी लड़कों की “क्रश” नहीं बनतीं,
क्योंकि ये देश “रूप” को सिर्फ़ गोरेपन में मापता है।

और सांवली लड़कियाँ के शून्य दशमलव पाँच एनएम की त्वचा के भीतर,
फ़ेयर एंड लवली क्रीम दाखिल कहाँ हो पाती है।

लेकिन एक दिन
ये लड़कियाँ अपने पैरों से धूल झाड़ते हुए कहेंगी—
“हम गोरी क्यों हों?
हम तो धूप की बेटियाँ हैं।
हम तो लाल जलती हुई लकड़ी पे सिंकी रोटियाँ हैं।
हम अपने रंग में
अपने पुरखों की धूप , दुख, और आत्मा लिए जन्मी हैं!”

सांवली लड़कियाँ
नीम की छाँव जैसी होती हैं,
झीनी ,कड़वी, मगर ठंडी।
जिनकी छाया में
इंकलाब उगता हैं।

09/04/2025

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Rajkumar Daksh, Chitra Ravi Sharma, Abhishek Yadav, Mahak Rajani, Parul Yadav, Suneeti Garg

06/04/2025

अगर आप अपनी फ़ुरसत को खो रहे हैं
तो ख़बरदार
हो सकता है कि आप अपनी
आत्मा को खो रहे हों।
- वर्जीनिया वुल्फ़
(अनुवाद- सरिता शर्मा)

05/04/2025

जूलिया रॉबर्ट्स ने एक बार कहा था, "जब लोग आपको छोड़कर चले जाएं, तो उन्हें जाने दीजिए। आपकी तक़दीर कभी भी उन लोगों से जुड़ी नहीं होती जो आपको छोड़ते हैं, और इसका मतलब यह नहीं है कि वे बुरे लोग हैं। इसका मतलब है कि उनका आपके जीवन में एक भूमिका थी जो अब समाप्त हो गई है।"

ये शब्द हमें एक #सच्चाई याद दिलाते हैं, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं - कि हर व्यक्ति जो हमारे जीवन में आता है, वह हमेशा के लिए नहीं रहता। लोग हमारे जीवन में विभिन्न कारणों से आते हैं, हमें कुछ सिखाने, अनुभव साझा करने या किसी खास दौर में हमारा साथ देने के लिए। लेकिन जब वे जाते हैं, तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि उनकी भूमिका हमारे सफर में पूरी हो गई है, और अब हमारे रास्ते अलग हो गए हैं। जिन लोगों को हमें जाने देना होता है, उनके साथ जुड़ा रहना हमारी वृद्धि में रुकावट डालता है और हमें अपनी पूरी तक़दीर में आगे बढ़ने से रोकता है।

यह किसी को नकारने या दोष देने का सवाल नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि हमारी कहानी उनके बिना भी आगे बढ़ सकती है। कभी-कभी उनका जाना नए अवसरों, गहरे रिश्तों और खुद के नए पहलुओं की खोज का रास्ता खोलता है। #छोड़ना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन यह आपके जीवन के अगले चरण में जाने के लिए जरूरी है।

यह उस #रिश्ते के महत्व को कम नहीं करता जो आपने कभी साझा किया, क्योंकि हर मुठभेड़ का मूल्य है, जो आपको आकार देती है और आपकी वृद्धि में मदद करती है। लेकिन जब कोई चला जाता है, तो इसका मतलब है कि अब उनका और आपका रास्ता एक साथ नहीं मिल रहा। उनका जाना आपको आपके जीवन की कहानी में एक खलनायक नहीं बनाता, बल्कि यह सिर्फ यह दर्शाता है कि उनकी भूमिका अब स्वाभाविक रूप से समाप्त हो गई है।

जब आप छोड़ने का बोझ हटाते हैं, तो आप उन लोगों के लिए जगह बनाते हैं जो आपके जीवन में बने रहेंगे और उसे सार्थक तरीके से समृद्ध करेंगे। हार मानना छोड़ने का नहीं, बल्कि स्वीकृति का एक कृत्य है - जीवन के प्रवाह को अपनाना, यह समझना कि हर कोई हमारे साथ हर मंजिल तक नहीं पहुंचने के लिए नहीं होता। याद रखें, आपकी #तक़दीर आपकी है।

कोई भी इसे आपसे नहीं छीन सकता, और कोई भी उस रास्ते पर नहीं चल सकता जो आपके लिए निर्धारित किया गया है। इसलिए, जब कोई व्यक्ति जाता है, तो विश्वास रखें कि यह आपके सर्वोत्तम भले के लिए है। वे आपकी कहानी का हिस्सा थे, लेकिन अब बाकी का लेखन आपके लिए है, और इसमें और भी बड़ी संभावनाएँ हैं।
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