17/11/2025
VIJAY Dinanath BAROT - BAPU
Public Figure
ૐ सर्व मंगलाय नम:
Son Of Sharda,
Brahmbhatt Barot
17/11/2025
13/11/2025
इंदौर की बेटी पलक मुच्छल का कमाल
पैसा सभी के पास है पर वो कितनो को
जीवनदान दे रहा यह बहुत मायने देता हे
3800 बच्चों को दी नई जिंदगी
गिनीज बुक में दर्ज हुआ नाम
इस बहन हो हृदय के अंतःकरण से नमन 👏
जय जगदंबा
✒️🗡️♉
*राजस्थान का एक भी जिला मुगलों के नाम पर नहीं हैं और शेष भारत में ढेरों जिले हैं जो मुगलों के नाम पर हैं....कारण सिर्फ ये है कि राजपूताने पर मुगलों का कभी वर्चस्व हुआ ही नहीं,,,,और ये बात इतिहास में कभी पढाई ही नहीं गई!!*
_*राजस्थान के 33 जिले हैं जिनके नाम हैं...*_
01) गंगानगर
02) बीकानेर
03) जैसलमेर
04) बाडमेर
05) जालोर
06) सिरोही
07) उदयपुर
08) डूंगरपुर
09) बांसवाड़ा
10) प्रतापगढ़
11) चित्तौड़गढ़
12) झालावाड़
13) कोटा
14) बारां
15) सवाईमाधोपुर
16) करौली
17) धौलपुर
18) भरतपुर
19) अलवर
20) जयपुर
21) सीकर
22) झुंझुनू
23) चूरु
24) भीलवाड़ा
25) हनुमानगढ़
26) नागौर
27) जोधपुर
28) पाली
29) अजमेर
30) बूंदी
31) राजसमंद
32) टोंक
33) दौसा.!!
कृपया इन नामों पर ध्यान दीजिए, नाम से ही पता चलता है कि राजपूतों ने क्या और कैसे किया.....
*अब जिलों का परिचय:-*
*अजमेर* :- अजमेर
27 मार्च 1112 में चौहान राजपूत वंश के तेइसवें शासक अजयराज चौहान ने बसाया...!!
*बीकानेर* :- बीकानेर का पुराना नाम जांगल देश
राव बीका जी राठौड़ के नाम से बीकानेर पड़ा.!!
*गंगानगर* :- महाराजा गंगा सिंह जी से गंगानगर पड़ा.!!
*जैसलमेर* :- जैसलमेर
महारावल जैसलजी भाटी ने बसाया.!!
*उदयपुर* :- महाराणा उदय सिंह सिसोदिया जी ने बसाया उनके नाम से उदयपुर पड़ा..!!
*बाड़मेर* :- बाड़मेर को राव बहाड़ जी ने बसाया.!!
*जालौर* :- जालौर की नींव 10वी शताब्दी में परमार राजपूतों के द्वारा रखी गई! बाद में चौहान राठौड़, सोलंकी आदि राजवंशो ने शासन किया..!!
*सिरोही* :- राव सोभा जी के
पुत्र शेशथमल ने सिरानवा हिल्स की पश्चिमी ढलान पर वर्तमान शहर सिरोही की स्थापना की थी
उन्होंने वर्ष 1425 ईसवी में वैशाख के दूसरे दिन द्वितिया पर सिरोही किले की नींव रखी..!!
*डूंगरपुर* :- वागड़ के राजा डूंगरसिंह ने ई.1358 में डूंगरपुर नगर की स्थापना की! बाबर के समय में उदयसिंह वागड़ का राजा था जिसने मेवाड़ के महाराणा के संग्रामसिंह के साथ मिलकर खानुआ के मैदान में बाबर का मार्ग रोका था..!!
*प्रतापगढ़* :- प्रताप सिंह महारावत ने बसाया..!!
*चित्तौड़*:- स्वाभिमान शौर्य त्याग वीरता राजपुताना की शान!
चित्तौड़ सिसोदिया गहलोत वंश ने बहुत शासन किया ! बप्पा रावल महाराणा प्रताप सिंह जी यहाँ षासन किया..!!
*हनुमानगढ़* :- भटनेर दुर्ग 285 ईसा में भाटी वंश के राजा भूपत सिंह भाटी ने बनवाया इस लिए इसे भटनेर कहाँ जाता हैं! मंगलवार को दुर्ग की स्थापना होने कारण हनुमान जी के नाम पर हनुमानगढ़ कहाँ जाता हैं..!!
*जोधपुर* :- राव जोधा ने 12 मई 1459 ई. में आधुनिक जोधपुर शहर की स्थापना की.!!
*राजसमंद* :- शहर और जिले का नाम मेवाड़ के राणा राज सिंह द्वारा 17 वीं सदी में निर्मित एक कृत्रिम झील! राजसमन्द झील के नाम से लिया गया हैं..!!
*बूंदी* :- इतिहास के जानकारों के अनुसार 24 जून 1242 में हाड़ा वंश के राव देवा ने इसे मीणा सरदारों से जीता और बूंदी राज्य की स्थापना की
कहा जाता हैं कि बून्दा मीणा ने बूंदी की स्थापना की थी तभी से इसका नाम बूंदी हो गया..!!
*सीकर* :- सीकर जिले को वीरभान ने बसाया ओर वीरभान का बास सीकर का पुराना नाम दिया.!!
*पाली* :- महाराणा प्रताप की जन्मस्थली एवं महाराणा उदयसिंह का ससुराल हैं पाली मूलतया पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा बसाया गया हैं.!!
*भीलवाड़ा* :- किवदंती हैं कि इस शहर का नाम यहां की स्थानीय जनजाति भील के नाम पर पड़ता हैं! जिन्होंने 16वीं शताब्दी में अकबर के खिलाफ मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप की मदद की थी! तभी से इस जगह का नाम भीलवाड़ा पड़ गया..!!
*करौली* :- इसकी स्थापना 955 ई. के आसपास राजा विजय पाल ने की थी जिनके बारे में कहाँ जाता हैं कि वे भगवान कृष्ण के वंशज थे.!!
*सवाई माधोपुर* :- राजा माधोसिंह ने ही शहर बसाया और इसका नाम सवाई माधोपुर दिया..!!
*जयपुर* :-जयपुर शहर की स्थापना सवाई जयसिंह ने 1727 में की सवाई प्रताप सिंह से लेकर सवाई मान सिंह द्वितीय तक कई राजाओं ने शहर को बसाया..!!
*नागौर* :- नागौर दुर्ग भारत के प्राचीन क्षत्रियों द्वारा बनाये गये दुर्गों में से एक हैं! माना जाता हैं कि इस दुर्ग के मूल निर्माता नाग क्षत्रिय थे! नाग जाति महाभारत काल से भी कई हजार साल पुरानी थी! यह आर्यों की ही एक शाखा थी तथा ईक्ष्वाकु वंश से किसी समय अलग हुई..!!
*अलवर* :- कछवाहा राजपूत राजवंश द्वारा शासित एक रियासत थी। जिसकी राजधानी अलवर नगर में थी
रियासत की स्थापना 1770 में प्रभात सिंह प्रभाकर ने की थी..!!
*धौलपुर* :- मूल रूप से यह नगर ग्याहरवीं शताब्दी में राजा धोलन देव ने बसाया था! पहले इसका नाम धवलपुर था
अपभ्रंश होकर इसका नाम धौलपुर में बदल गया..!!
*झालावाड़* :- झालावाड़ गढ़ भवन का निर्माण राज्य के प्रथम नरेश महाराजराणा मदन सिंह झाला ने सन 1840 में करवाया था..!!
*दौसा* :- बड़गूजरों द्वारा करवाया गया था! बाद में कछवाहा शासकों ने इसका निर्माण करवाया..!!
*( पेज :- राजपूताना इतिहास और रजवाड़े )*
*ऐसे ही सम्पूर्ण भारतवर्ष में राजपूतों का त्याग, समर्पण, यौगदान रहा था जिसका वामपंथी विचारधारा वाले इतिहासकारों ने 5% भी नहीं बताया और उल्टा मुगलों को महान बताया है* *अब भारतीय जनता को असलियत समझ आ रही हैं*
जय जगदंबा
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घोड़खिंड की लड़ाई! ✍️✍️✍️
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अधिकांश लोगों ने संभवतः यह नाम ही नहीं सुना होगा! कक्षा दसवीं तक पढ़ाए जाने वाले इतिहास में इस लड़ाई को स्थान नहीं दिया गया है। परन्तु, ३५० वर्षों से भी पूर्व लड़ी गई इस लड़ाई ने एक तरह से भारत का भविष्य बदल कर रख दिया। फिर भी इसे बच्चों को पढ़ाया नहीं जाता क्योंकि शायद भारतीय विजयगाथाओ को पढ़ने लायक इतिहास माना ही नहीं गया।
शिवाजी महाराज द्वारा अफ़ज़ल ख़ान को मौत के घाट उतार देना एक अकल्पनीय घटना थी। अफ़ज़ल के सुल्तान बीजापुर के आदिलशाह के लिए यह एक गहरा आघात था। शिवाजी महाराज भी इस विजय के प्रभाव को समझते थे। उन्होंने अफ़ज़ल के वध से उत्पन्न परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बीजापुर की सीमाओं में अपने हमले तेज कर दिए। मात्र अठारह दिनों के अन्दर ही महाराज ने कोल्हापुर के नजदीक पन्हाला के किले को अपने अधिपत्य में ले लिया। पन्हाला एक प्रमुख किला था और शिवाजी का उसे जीत लेना आदिलशाह के लिए एक और आघात था। परेशान आदिलशाह ने अफ़ज़ल के पुत्र फ़ज़ल और रुस्तम जुमा के नेतृत्व में एक बड़ी सेना शिवाजी के बंदोबस्त के लिए भेजी परन्तु शिवाजी महाराज ने उन्हे कोल्हापुर के नजदीक बुरी तरह पराजित कर दिया।
अब आदिलशाह क्रोधित नहीं बल्कि डरा हुआ था। शिवाजी महाराज का पराक्रम बढ़ता जा रहा था। अंततः आदिलशाह की ओर से सिद्धि जौहर 60000 की विशाल सेना लेकर पन्हाला पहुंचा। शिवाजी महाराज पन्हाला गढ़ पर ही थे। सिद्धि ने नीचे तलहटी में गढ़ को चारों ओर से घेर लिया। सिद्धि कुशल सेना नायक था। उसने गढ़ के चारों ओर घेरा इतना सुदृढ़ बनाया था कि उसे भेद कर निकलना असंभव था। शिवाजी महाराज करीब चार महीनों तक पन्हाला पर ही अटके हुए थे। इसी बीच बारिश का मौसम भी शुरू हो चुका था।
गढ़ के ऊपर शिवाजी महाराज के पास बहुत सीमित सेना थी। धीरे धीरे रसद और असलहा भी समाप्त हो रहा था। स्थिति प्रत्येक गुजरते दिन के साथ गंभीर होती जा रही थी। सिद्धि का घेरा कमजोर पड़ ही नहीं रहा था। स्पष्ट था कि यदि कुछ दिन और ऐसा ही चलता रहा तो शिवाजी महाराज को या तो समर्पण करना होगा या युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो जाना होगा।
इस करो या मरो की स्थिति में शिवाजी महाराज और उनके विश्वासपात्र सैनिकों ने एक योजना बनाई। तय हुआ कि शिवाजी का हमशक्ल, उनका नाई, शिवा काशिद, को शिवाजी महाराज के कपड़े इत्यादि पहना कर राजसी पालकी में बैठा कर ऐसे रास्ते से किले के बाहर ले जाया जाएगा जहां उसका पकड़ में आना तय था। ऐसा होते ही सिद्धि की छावनी में यह ख़बर फैल जाएगी कि शिवा पकड़ा गया! शिवा काशिद जब तक हो सके यह भ्रम बनाए रखेगा कि वह ही असली शिवाजी है। उधर दूसरी ओर असली शिवाजी महाराज साढ़े कपड़ों में एक अन्य पालकी में ऐसे स्थान से पन्हाला के बाहर निकलेंगे जहां सिद्धि का घेरा थोड़ा कमजोर था। घेरे से बाहर निकल कर शिवाजी विशाल गढ़ चले जायेंगे जो पन्हाला से बीस कोस याने लगभग 70 किमी दूर था।
सन 1660 में गुरुपूर्णिमा की रात्रि में शिवा काशिद शिवाजी महाराज बनकर एक पालकी में बैठकर पन्हाला से निकल पड़ा। उसे यह अच्छी तरह पता था कि असलियत खुलते ही उसकी मौत निश्चित थी। परन्तु महाराज की प्राण रक्षा के लिए उसने यह बलिदान सहर्ष स्वीकार किया था। जो होना था वही हुआ। शिवा शीघ्र ही पकड़ा गया। पूरी छावनी में खबर आग की तरह फैल गई, “शिवा पकड़ा गया”। परन्तु कुछ ही देर में शत्रु समझ गया कि यह नकली शिवाजी है। उधर महाराज जिस जगह से घेरा तोड़ने में सफल हुए वहां से भी खबर आ गई कि शिवा भाग चुका है। तुरन्त ही शत्रु के करीब 2000 से अधिक घुड़सवार सैनिक असली शिवाजी और उनके 600 सैनिकों के पीछे दौड़ पड़े। शिवाजी महाराज पालकी में थे। अन्य सैनिक और अधिकारी पैदल ही चल रहे थे। पूर्णमासी की उस रात धुआंधार वर्षा भी हो रही थी। घटाटोप अंधेरा, घना जंगल और कीचड़। कहार तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। शिवाजी के साथ बाजीप्रभु देशपांडे नामक सेनानायक अपने 600 वीरों के साथ चल रहा था। सुबह होते होते मराठे घोड़खिंड़ के नजदीक पहुंचे। घोढ़खिंड दो चट्टानी दीवारों के मध्य एक संकरा गलियारा था। दिन के उजाले में अब पीछा करता शत्रु नजर आने लगा था।
बाजीप्रभू ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए शिवाजी महाराज को निवेदन किया कि बेहतर होगा कि महाराज आधे सैनिकों के साथ पैदल विशालगढ़ की और बढ़ जाए। वहां भी शत्रु का घेरा था परन्तु सिद्धि के घेरे जितना सुदृढ़ नहीं था। शिवाजी महाराज और उनके सैनिक उस घेरे को तोड़ विशाल गढ़ पहुंच जायेंगे। इधर बाजीप्रभु देशपांडे अपने सैनिकों के साथ सिद्धि के सैनिकों को घोढ़खिंड की भौगोलिक स्थिति का लाभ ले कर रोक कर रखेंगे। जब महाराज विशालगढ़ पहुंच जाएं तब गढ़ की तोप से इशारे का एक प्रहार कराएं जिससे बाजीप्रभु समझ जायेंगे कि महाराज सकुशल विशालगढ़ पहुंच चुके है। यह प्रसंग शिवाजी महाराज के लिए अत्यन्त कठिन और असहनीय था। बाजीप्रभू और
उनके सैनिकों को छोड़ कर जाने का सीधा मतलब था उन्हे मौत के हवाले कर जाना। 2000 सैनिकों के सामने आखिर 300 सैनिक कहां तक टिकते? परन्तु बाजीप्रभु अड़ गए। उन्होंने शिवाजी महाराज को मजबूर किया कि वें 300 सैनिकों के साथ पैदल ही विशालगढ़ की ओर बढ़ जाएं। ऐसा ही हुआ।
अब बाजीप्रभु और उनके कुछ बहादुर सैनिक घोढ़खिंड के गलियारे के छोर पर शत्रु के सैनिकों से भिड़ गए। 2000 के सामने 300! गलियारे का लाभ उठाते हुए मराठों ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया और सिद्दी के सैनिकों को रोक लिया। कत्लेआम मचा हुआ था। आमने सामने की लड़ाई चल रही थी। बाजीप्रभू ने पराक्रम की पराकाष्ठा दिखा दी। दोनों हाथों में तलवारें लिए यह भीमकाय योद्धा शत्रु सैनिकों को गाजर मूली की तरह काट रहा था। बाजी और उनके सैनिक सिद्दी के सैनिकों पर यमदूत की भांति टूट पड़े थे। मात्र १५० कदम के घोडखिंड गलियारे को सिद्दी के सैनिक पार नहीं कर पा रहे थे। मराठे सैनिक बगैर विश्राम या अन्न भोजन के रात भर से दौड़ रहे थे। लेकिन अब सुबह से वे घोड़खिंड के मुहाने पर चट्टान की भांति अड़े हुए थे।
उधर शिवाजी महाराज पैदल अपने सैनिकों के साथ विशालगढ़ की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में आदिलशाह के सरदार सुर्वे का घेरा था। शिवाजी और उनके सैनिक भी रात भर से बिना अन्न भोजन के चल दौड़ रहे थे। परन्तु विशालगढ़ नजर आने लगा था। सभी के शरीर में नई ऊर्जा का संचार हो कर वे शत्रु सैनिकों पर टूट पड़े। कुछ ही देर में उन्होंने घेरे को तोड़ विशालगढ़ चढ़ना शुरू कर दिया था।
इधर घोड़खिंड़ में खून को होली चल रही थी। बंदूक की एक गोली सीने पर आ लगने से बाजीप्रभु मूर्छित हो कर गिर गए। तुरन्त ही होश में आए। होश में आते ही पूछा कि महाराज के पहुंचने की तोप की आवाज आई क्या? साथ के सैनिकों के कहा कि अभी तक नही आई है! कहते हैं, कि बुरी तरह घायल बाजी यह सुनते ही पुनः उठ खड़े हुए और यह कहते हुए शत्रु सैनिकों पर टूट पड़े कि यदि महाराज पहुंचे नहीं तो बाजी मरेगा कैसे? कुछ ही देर बाद, महाराज दौड़ते हुए विशालगढ़ पहुंचे। उन्होंने गढ़ की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते ही आदेश दिया कि तोप से धमाका किया जाय। आदेश का तुरन्त पालन हुआ। नीचे लड़ते हुए बाजीप्रभु देशपांडे ने तोप के धमाके की आवाज सुनी और उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान छा गई। शिवाजी महाराज सकुशल विशालगढ़ पहुंच चुके थे। सिद्धि का हमला असफल सिद्ध हो चुका था। बीजापुर के आदिलशाह को एक और जबरदस्त आघात पहुंचा था। अब बाजीप्रभु मर सकता था।
३०० मराठा वीर खेत रहे। परन्तु उन्होंने कुछ बेशकीमती घण्टों तक सिद्धि जौहर की सेना को घोड़खिंड तक रोक रखा था। शिवाजी महाराज जीवित सिद्दी के घेरे से निकल गए थे। अगले बीस वर्षों में शिवाजी महाराज ने हिंदवी साम्राज्य की नींव तो रखी ही, योद्धाओं की एक ऐसी संस्कृति विकसित की जिसने आने वाले दशकों में छत्रपति संभाजी, ताराबाई, संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव और बाजीराव पेशवा जैसे अनमोल रणवीर उत्पन्न किए, जिन्होंने अगले १२० से भी अधिक वर्षों तक भारत के विशाल भाग पर राज्य किया और सनातन के क्षरण को रोक हिन्दू संस्कृति का ध्वज लहराया।
मराठों का अगले १२० वर्षों का गौरवशाली इतिहास शायद लिखा ही नहीं जाता यदि १३जुलाई १६६० की उस गुरुपूर्णिमा को शिवा काशिद, बाजीप्रभु देशपांडे और उनके सैनिक अपने प्राण न्योछावर कर शिवाजी महाराज के प्राण नहीं बचाते! महाराज ने मराठों के रक्त से पावन हुए इस गलियारे का नाम बदल कर पावनखिंड कर दिया।
आज १३ जुलाई को आज के ही दिन सन १६६० में सर्वोच्च बलिदान देने वाले शिवा काशिद, अतुलनीय पराक्रमी बाजीप्रभु देशपांडे और उनके ३०० जांबाज सैनिकों और कहारों को सादर प्रणाम। उन्होंने सिर्फ शिवाजी को ही नहीं अपितु समस्त सनातन समाज को ही नवजीवन प्रदान किया यह असंदिग्ध है।
हर हर महाकाल
जय जगदंबा
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सुक़रात जब बच्चा था, तो रोज़ाना एक रास्ते पर टहलने के लिए जाया करता था।
उस रास्ते में एक कुम्हार का घर था, जो मिट्टी के बर्तन बनाया करता था। वह कुम्हार के पास जा कर बैठ जाता और उसे ध्यान से देखता रहता। उसे बर्तन बनने की प्रक्रिया देखना बहुत अच्छा लगता था।
एक दिन कुम्हार ने उसकी तल्लीनता देख कर अपने पास बुलाया और पूछा।
"बेटा! तुम यहाँ से रोज़ गुज़रते हो और मेरे पास बैठ कर देखते रहते हो... तुम क्या देखते हो?"
"मैं आपको बर्तन बनाते देखता हूँ और यह प्रक्रिया देखना मुझे बहुत अच्छी लगती है ... मगर इससे मेरे मन में कुछ सवाल पैदा हुए हैं... जो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ।"
सुक़रात की बात सुन कर कुम्हार बोला।
"यह तो बहुत अच्छी बात है... पूछो, जो पूछना चाहते हो?"
"आप जो बर्तन बनाते हैं... उसका नक्शा कहाँ बनता है?"
"उसका नक्शा सबसे पहले मेरे मन में बनता है..."
यह सुन कर सुक़रात उत्साह से बोला।
"मैं समझ गया..."
कुम्हार ने हैरत से पूछा।
"क्या समझे?"
"यही कि हर चीज़ सृजन से पहले विचार में बनती है। इसका मतलब यह है कि (खालिक़) सृजनकर्ता के विचार में हम पहले बन चुके थे, सृजन बाद में हुआ... अब मेरा अगला सवाल यह है कि जब आप बर्तन बना रहे हैं, तो ऐसा क्या करते हैं कि यह इतना सुंदर बनता है?"
"मैं इसे मोहब्बत से बनाता हूँ। मैं जो भी चीज़ बनाता हूँ, उसे खालिस दिल से बनाता हूँ और इसे बनाते हुए अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल करता हूँ ताकि कोई कमी-कमज़ोरी न रह जाए।"
सुकरात ने सिर हिलाते हुए कहा।
"इसकी भी समझ आ गई, क्योंकि बनाने वाला हमसे बहुत मोहब्बत करता है, इसलिए ही उसने हमें बनाया है ...
अगला सवाल यह है कि आप इतने अरसे से बर्तन बना रहे हैं, कोई ऐसी ख्वाहिश है, जो आप चाहते हैं कि पूरी हो।"
"हाँ! है... मैं चाहता हूँ कि ऐसा बर्तन बनाऊँ कि दुनिया वाह-वाह कर उठे और यह बर्तन पिछले बर्तनों से कुछ न कुछ अलग और खास भी हो ..." कुम्हार ने हसरत से कहा।
यह सुनते ही सुक़रात उछल पड़ा।
"वाह! खालिक हर बार ऐसी सृजन करने की कोशिश करता है कि दुनिया बे-इख्तियार वाह-वाह कर उठे, क्योंकि खालिक को पता है कि मैं जो यह इंसान इस दुनिया में भेज रहा हूँ, उस जैसा कोई और दोबारा नहीं आएगा..."
जय जगदंबा
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व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त होते ही शरीर उससे नहीं छूट जाएगा। यह शरीर आगे भी रहेगा और संसार भी रहेगा। लेकिन हम रहते हुए भी नहीं रहेंगे। संसार और शरीर दोनों हमारे लिए स्वप्नवत हो जाएंगे। हमको सारा संसार सपने जैसा लगेगा। हम एक लम्बा सपना देख रहे होते हैं। शरीर किस स्थिति में है, वह स्थिति भी हमारे लिए स्वप्नवत हो जाएगी। योगिगण इसी अवस्था को सन्यास की अवस्था' कहते हैं। हम सन्यास को उपलब्ध हो जाएंगे।
सन्यास का अर्थ है संसार और शरीर में रहते हुए भी दोनों से मुक्त। जो सन्यास को उपलब्ध हो जाता है, उसे परमज्ञान और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करने में देर नहीं लगती। जहाँ ये दोनों ज्ञान प्राप्त हुए, फिर संसार में आने का कोई प्रयोजन ही नहीं रह जाता है, जीवन-मरण से सदैव के लिए मुक्त। आवागमन से हमेशा-हमेशा के लिये मुक्त।
यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि उक्त दोनों ज्ञान को उपलब्ध होने पर भी हम संसार और शरीर में बने रहेंगे। इसलिए कि ज्ञान चाहे कोई भी हो उससे कर्म का क्षय नहीं होता। पिछले जन्मों के कर्मों को तो भोगना ही पड़ेगा, जब तक उनका पूर्णरूप से क्षय नहीं हो जाता, संसार में रहना ही पड़ेगा। कर्मफल-भोग से ही कर्म-क्षय हो सकता है। ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो जाने पर भी हम तबतक संसार और शरीर में बने रहेंगे जबतक पूर्वकृत कर्म का क्षय पूर्णरूप से नहीं हो जाता, भले ही इसके लिए हमें सैकड़ों वर्ष जीना पड़े।
जहां पर जाकर वेद, पुराण जैसे पुस्तक बंद होती है संन्यास वहाँ से शुरू होता है। पुस्तक खुलने का अर्थ है गृहस्थाश्रम की शुरुआत। संन्यासी कभी भी भगवत गीता, या अन्य किसी भी ग्रंथ को दिमाग में रख ही नहीं सकता है। बहुत से मिल जाएंगे हम गीता के एक-एक श्लोक का कितना चिंतन करते हैं। ये सब ना समझ लोग हैं। सांसारिक के लिए जो धर्म ग्रंथ है, वही संन्यासी के लिए रद्दी का ढेर है। पूजा पाठ संन्यासी करता नहीं है, क्यों कि उसका पूजा प्रसाद कोई देवी देवता ग्रहण करेगा ही नहीं। संन्यासी तो मृत शरीर है, वो अपना पिंडदान कर चुका है, तो उससे न देवी देवता और न ही सांसारिक लोग कुछ भी नहीं ले सकता है। संन्यासी किसी शादी विवाह का हिस्सा भी नहीं हो सकता है। लोग कह देते है नव वर वधू को आशीर्वाद दे दो, ये अशुभ है। मृत शरीर की उपस्थिति किसी शुभ कार्य में कैसी ?
संन्यासी गृहस्थाश्रम की चौखट के बाहर तक ही जगह बनती है, ‘मां भिक्षाम देही” । चौखट के भीतर यदि जाता है तो धूर्त और पापी है।
संन्यासी कभी शास्त्र पर प्रवचन नही देंगे। संन्यासी शास्त्रों को जानते है लेकिन वो उसे त्याग चुके है। शास्त्रों पर बोलने का अर्थ है, स्त्री पर बोलना, धन, जमीन, संतान आदि पर बोलना। सामाजिक अनुशासन तो सब इन्हीं शब्दों के अंदर है।
इसीलिए संन्यासी मौन होते हैं |
जय जगदंबा
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मुश्किलें जरुर है, मगर ठहरा नही हूँ मैं. मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंचा
नही हूँ मैं.
कदमो को बाँध न पाएंगी, मुसीबत कि जंजीरें, रास्तों से जरा कह दो, अभी भटका नही हूँ मैं.
सब्र का बाँध टूटेगा, तो फ़ना कर के रख दूंगा, दुश्मन से जरा कह दो, अभी गरजा नही हूँ मैं.
" साथ चलता है, दुआओ का काफिला, किस्मत से जरा कह दो, अभी तनहा नही हूँ मैं.
जय जगदंबा
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28/10/2025
लड़की – मुझे लगता है बिहार में शराबबंदी हटा देना चाहिए, क्योंकि ब्लैक में खरीदने में एक्स्ट्रा पे करना पड़ता है !!
पत्रकार – क्या रेट चल रहा है
लड़की – डिपेंड की बोदका खरीदना है या बियर
पत्रकार – फिर भी कितना महंगा, रम, बियर का क्या रेट है
एक लड़की – 1500 , दूसरी लड़की कहां इतने में मिलता है और मिल भी गया तो एकदम चीप क्वालिटी का मिलता है, मजा नहीं आता है
पत्रकार – I'm sorry for your loss
मतलब बिहार चुनाव में लड़कियों को न महिला सुरक्षा पे बात करनी है, न ही शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार चाहिए उन्हें दारू फ्री करवाओ इतने में ही खुश हैं, माता पिता का नाम रौशन कर रही है। वीडियो 👇👇👇
जय जगदंबा
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पार्टी का झंडा पकड़े नेता ने #कॉमरेडों से कहा:
अगर तुम्हारे पास #बीस-बीघा खेत है तो क्या तुम उसका आधा मतलब की दस #बीघा गरीबों को दे दोगे?
सारे #कामरेड एक साथ बोले: हाँ दे देंगे!
नेता ने फिर सवाल किया: अगर तुम्हारे पास दो घर हैं तो क्या तुम उसमे से एक घर गरीबों को दे दोगे?
सारे #कामरेड एक साथ बोले: हाँ दे देंगे!
नेता ने फिर सवाल किया: अगर तुम्हारे पास दो #कार हैं तो क्या तुम उसमे से एक कार ग़रीबों को दे दोगे?
सारे #कामरेड एक साथ बोले: हाँ दे देंगे!
नेता ने फिर सवाल किया: अगर तुम्हारे पास #बीड़ी का एक #बंडल हैं तो क्या उनमें से दो बीड़ी तुम अपने किसी साथी को दे दोगे?
सारे कामरेड एक साथ बोले: नहीं, बीड़ी तो बिल्कुल नहीं देंगे!
नेता बहुत चकित हुए और उन्होंने पूछा: तुम अपना #खेत दे दोगे,
#घर दे दोगे, #कार दे दोगे मगर अपनी #बीड़ी क्यों नहीं दोगे?
इतना बड़ा-बड़ा बलिदान कर सकते हो और एक बीड़ी पर अटक गए आख़िर ऐसा क्यों?
सारे #कॉमरेड बोले: ऐसा है कि हमारे पास न तो खेत हैं, न घर है और ना ही कार है !
हमारे पास सिर्फ #बीड़ी का #बंडल हैं!
और यही #कम्युनिज्म का मूलत: स्वभाव होता है ! #कम्युनिस्ट आपको हर वो चीज देने का वादा करता है जो उसके पास नही होता,
लाल सलाम...
काम तमाम...
जय जगदंबा
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