27/05/2023
पढ़े लिखे नौजावान जो गरीबो के साथ हैं गरीबो की गरीबो की बात करता हैं , को लम्बे समय तक जेल में रखना , कानून व्यवास्था में doctrine 'बेल इस रूल' का मखौल हैं
जबकी ये बॉलीवुड का माधवन नहीं है, ये आईआईटी बॉम्बे का " #शरजील_इमाम" है. आज एक परिचय कराता हूं :-
Name :
City : Jahanabad State : Bihar Country : India
10th : St.Xavier,Patna
12th : DPS,Vasanthkunj,Delhi
Grad : B.Tech(Computer Sc.) ,IIT Mumbai
Master : M.Tech (Computer Sc.) , IIT Mumbai
Job :
1). Copenhagen Univ. - Software Programmer
2). IIT Powai,Mumbai - Assistant Professor
3). Jupitor Networks - Software Engineer
- Master in Moder History from JNU,Delhi
- Master of Philosophy from JNU,Delhi
- Doctorate of Philosophy from JNU,Delhi.
पागल थे तुम जो IIT से B.Tech,M.Tech करने के बाद Europe के सबसे सम्पन्न देश Denmark से 10,650 USD(अमेरिका डॉलर) प्रति माह यानी तकरीबन 8,00,000 INR (भारतीय रुपए) प्रति माह की Software Engineer & Programmer की नौकरी छोड़ कर ना जाने क्यों क्रांति का बीड़ा उठाने वापस आ गये?
क्या मिला बदलाव की बात कर के जिस देश के बड़े लोग विदेश के वीजा के लिए लोग चन्द सेकंड में कपड़े उतार के नंगे हो जाए, तुम उसे ठुकरा कर भारत देश के JNU से Phd करने लगे.
आखिर क्या मिला ?
ये न्या समाज है, मेरे दोस्त !!!
यहाँ गरीबो की हक़ की बात करोगे तो मीडिया द्वारा राष्ट्रविरोधी रोहिंगया और न जाने क्या क्या बताए जाओगे,
प्रोटेस्ट करोगे तो राजद्रोह का मुकदमा लग जायेगा . बातो को इतना तोड़ा मरोड़ा जाएगा कि बेगुनाह होते हुए भी गुनाहगार बना दिये जाओगे...
और अगर भ्रष्टाचारी बनकर , अफसरो को लड़कियां और पैसे देकर, netao aur afsaro ke saath सेल्फी लेकर धलाली करोगे तो वो अना मे हैं नहीं ,
सभी ऐसे केस फास्ट, ट्रेक पर चलना चाहिए
04/05/2023
देश अदालत और संविधान से चलेगा,,
जंतर मंतर पर धरना देने से नही।
17/04/2023
आपके बच्चे आपसे पूछे या ना पूछे, आप उन्हें ज़रूर ये बताया कीजिए कि हम "फलस्तीन" से इसलिए मोहब्बत करते हैं कि!.....
* ये फलस्तीन नबियों का मसकन और सरजमीं रही है।
* हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फ़लस्तीन की तरफ हिजरत फ़रमाई।
* अल्लाह ने हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को उस अज़ाब से निजात दी जो उनकी क़ौम पर इस जगह नाज़िल हुआ था।
*हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने इस सरजमीं पर सकूनत रखी और यहां अपना एक मेहराब भी तामीर फ़रमाया।
* हज़रत सुलेमान (अलै०हिस०) इस मुल्क में बैठ कर सारी दुनिया पर हूकूमत करते थे।
* कुरआन में चींटी का वह मशहूर किस्सा जिसमें एक चींटी ने बाकी साथियों से कहा था " ऐ चींटियों! अपने बिलों में घुस जाओ" ये किस्सा यहिं फलस्तीन के "असक़लान" शहर की वादी में पेश आया था।
* हज़रत ज़करिया अलै०हिस० का मेहराब भी इसी शहर में है।
* हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इस मुल्क के बारे में अपने साथियों से कहा था, इस मुकद्दस शहर में दाखिल हो जाओ! उन्होंने इस शहर को मुकद्दस इसलिए कहा था कि ये शिर्क से पाक और नबियों की सरजमीं है।
* इस शहर में कई मोअज़्ज़े हुए है जिनमें एक कुंवारी बीबी हज़रत मरयम के बुतन से ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश हुई।
* हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को जब उनकी क़ौम ने क़त्ल करना चाहा तो अल्लाह ने उन्हें इसी शहर से आसमां पर उठा लिया था।
* क़यामत की अलामत में से एक हज़रत ईसा की वापसी इस शहर के मुकाम सफेद मीनार के पास होगा।
* इस शहर के मुकाम " बाब ए लुद" पर ईसा अलैहिस्सलाम दज्जाल को क़त्ल करेंगे।
* फलस्तीन ही अरज़े महशर है।
* इसी शहर से ही याजूज माजूज का क़िताल और फसाद शुरू होगा।
* फलस्तीन को नमाज़ के फ़र्ज़ होने के बाद "क़िब्ला ए अव्वल" होने का एजाज़ भी हासिल है। हिजरत के बाद जिबरील अलैहि० अल्लाह के हुक्म से नमाज के दौरान ही मुहम्मद स०अ० को मस्जिद ए अक्सा से बैतुल्लाह (काबा) की तरफ़ रुख़ करा गए थे, जिस मस्जिद में ये वाकिया पेश आया था वह मस्जिद आज भी मस्जिद ए क़िब्लातैन कहलाती है।
* हुजूर अकरम (स०अ०) मे'अराज की रात आसमान पर ले जाने से पहले मक्का मुकर्रमा से बैतुल मुकद्दस (फलस्तीन) लाए गए।
* अल्लाह के रसूल स०अ० की इक़्तेदा में सारे नबियों ने यहां नमाज़ अदा फरमाई।
* इस्लाम का सुनहरी दौर फारूकी में दुनिया भर के फतह को छोड़ कर महज़ फ़लस्तीन की फ़तह के लिए खूद उमर (रजि०अ०) जाना और यहां पर जाकर नमाज़ अदा करना, इस शहर की अज़मत को बताता है।
* दुसरी बार यानि 27 रजब 583 हिजरी जुमा के दिन को सलाउद्दीन अय्युबी के हाथों इस शहर का दोबारा फ़तह होना।
* बैतूल मुकद्दस का नाम "कुदुस" कूरान से पहले तक हुआ करता था, कूरान नाजिल हुआ तो इसका नाम " मस्जिद ए अक्सा" रखा गया, इस शहर के हुसूल और रूमियो के जबर वह सितम से बचाने के लिए 5000 से ज्यादा सहाबा किराम रजि०अ० ने जामे शहादत नोश किया, और शहादत का बाब आज तक बंद नही हुआ, सिलसिला अभी तक चल रहा है, ये शहर इस तरह शहीदों का शहर है।
* मस्जिद ए अक्सा और शाम की की अहमियत हरमैन की तरह है, जब कूरान पाक की ये आयत
* उम्मत ए मोहम्मदी हकीकत में इस मुकद्दस सरजमीं की वारिस है।
* फलस्तीन की अज़मत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यहां पर पढ़ी जाने वाली हर नमाज़ का अज्र 500 गुना बढ़ा कर दिया जाता है।
" निगाहें मुन्तज़िर है बैतूल मुकद्दस की फ़तह के लिए या रब,
फिर किसी सलाउद्दीन अय्युबी को भेज दे"......
🇵🇸 🇵🇸
08/01/2023
Ye azmat e batil dhoka hay, Ye satwat e kafir kuch bhi nhe
Mitti k khiloney hain sarey, Ye kufr k lashkar kuch bhi nhe
Allah se darne walon ko batil se darana mushkil hay
Gar khof e khuda ho dil me to kisra o qaisar kuch bhi nhe
Dastoor bhi hay, tanzeem bhi hay, tehzeeb bhi hay, taleem bhi hay
Qur'aan me pinhaa sab kuch hay Qur'aan se bahr kuch bhi nhe
Islam se koson door hain ye, millat k liye nasoor hain ye
Allah se baghi hain sare, mulkon k ye sarwar kuch bhi nhe
Afkar ghalat, kirdaar ghalat, bunyad ghalat, taameer ghalat
Mashriq k muqallid kaj roo hain maghrib k shinawar kuch bhi nhe
Islam agar manzoor nhe, Qur'aan agar dastoor nhe
Phir khak hay aesi aazadi par, ye mulk ye lashkar kuch bhi nhe
Islam se tujh ko quwwat hay, islam ko tujh se quwwat hay
Millat ka madawa is k siwa, aey jaan e mahshar kuch bhi nhe
Ye azmat e batil dhoka hay, Ye satwat e kafir kuch bhi nhe
Mitti k khiloney hain sarey, Ye kufr k lashkar kuch bhi nhe
20/12/2022
बहादुर शाह ज़फ़र के यौमे वफ़ात पर....
... बहादुर शाह ज़फ़र की ये तस्वीर देखता हूँ, तो मुझे एक खूबसूरत शख्सियत नज़र आती है जिसने ग़रीब किसान भूमिहार जनता की मांग पर 1857 की क्रांति का नेता बनने का फ़ैसला किया जबकि कई राजे महाराजे तब तक अंग्रेजों की गोद मे जा बैठे थे
.. मैं देखता हूँ कुछ नफरत में अंधे हो चुके लोग, बहादुर शाह और उनके बेटों की तस्वीर में उनकी "बदसूरती" का मज़ाक़ उड़ाते हैं, ज़ाहिर है नफ़रत ने उनकी आंखों की रौशनी छीन ली है तो वो कहां देख पाएंगे इन कुम्हलाये चेहरों के पीछे वतन के लिए मर मिटने की खूबसूरती को ?
लेकिन ये याद रखने की बात है कि अंग्रेजो का साथ देने के सुरक्षित मार्ग के खुले होने के बावजूद बहादुर शाह ने गरीब और कमजोर जनता का साथ दिया ....
बहादुर शाह ज़फर से जो उनकी जनता ने मांगा वो बहादुर शाह ने दे दिया ... यानी बहादुर शाह को नेता बनाकर उनके नाम पर क्रांति युद्ध चलाया गया और इसका परिणाम ये हुआ कि क्रांति को दबा देने के बाद बहादुर शाह को युद्ध का समर्थन करने के जुर्म मे उनका राज पाट छीन कर उन्हें आजीवन देश निकाला दे दिया गया ....
.. अगर बहादुर शाह क्रांति के युद्ध का समर्थन न करते और ग्वालियर के सिंधिया की तरह क्रांतिकारियो पर अंग्रेजो के साथ मिल कर गोलियां चलवाई होती तो शायद आज बहादुर शाह के वंशज भी राजा महाराजा कहलाते और राजनीति मे ऊंची पहुंच वाले होते ... पर जनता का साथ देने का बहादुर शाह को ये सिला मिला कि उनके वंशज आज कोलकाता मे चाय बेचकर पेट पाल रहे हैं....
बूढ़े बहादुर शाह को तो अंग्रेजों ने नही मारा लेकिन उनके तमाम शहज़ादों को चुन चुनकर अंग्रेजों ने मार डाला था, शहज़ादों को गिरफ्तार करके अंग्रज़ों ने गन्दे कपड़े पहनाये, वो तस्वीरें जिनका आज नफ़रत के बन्दे मज़ाक उड़ाते हैं, वो भी उसी वक्त खींची गई थीं
.. ज़ालिम अंग्रेज़ो ने बहादुर शाह ज़फ़र के दो शहज़ादों के सर काटकर बहादुर शाह के आगे नाश्ते के वक्त पेश किए थे .... तब इसी 'कुरूप' बूढ़े ने कहा था कि "हिंदुस्तान के बेटों के सर मुल्क के लिए क़ुर्बान होकर इसी शान से लाये जाते हैं"
बहादुर शाह ज़फर की इतनी अज़ीम कुरबानी को आज यूं हलके मे लिया जाता देखकर तकलीफ होती है..
ये बहादुर शाह ज़फ़र की आख़री तस्वीर है, ज़फ़र की आख़री तमन्ना थी कि मौत के बाद उनको हिंदुस्तान की मिट्टी में दफ़्न किया जाए... लेकिन अंग्रेजों ने उनकी इस मांग को भी पूरा न किया और ज़फ़र तड़प कर कहते रह गए....
"कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू ए यार में"
... आज सोचता हूँ कि अच्छा हुआ कि ज़फ़र का जब 7 नवम्बर 1862 को रंगून में इंतकाल हुआ तो उन्हें वहीं दफ़्न कर दिया गया था... अगर ज़फ़र का कहा मानकर अंग्रेज उन्हें दिल्ली में दफ़्न कर देते तो आज की फ़ज़ा देखकर बहादुर शाह ज़फ़र को बहुत तक़लीफ़ होती, शायद अपने शहज़ादों के शहीद होने की तकलीफ़ से भी ज़्यादा तक़लीफ़ उन्हें आज अपने और अपने ख़ानदान की शहादत का मज़ाक उड़ते देखकर होती...!!!
~ Zia Imtiyaz भाई
04/12/2022
इतिहास मे लिखा जाएगा की एक शख्श वतन क़े वक्ति फिरौन से लड़ रहा था और उसकी कौम उसको एजेंट कहती थी!उसका मज़ाक उड़ाती थी।
उसपर तोहमतें लगा रही थी।
ANEES PRATAPGARH
04/12/2022
जब संजीव सर्राफ़ ने रेख़्ता वेबसाइट शुरू की
तो एक इंजीनियर होने के नाते उनका सपना था
कि यह वेबसाइट उर्दू न पढ़ सकने वालों की समझ में भी आये।
शेर फ़ारसी से बदल देवनागरी
और रोमन लिपि में लिखना तो ज़्यादा मुश्किल न था
लेकिन वह चाहते थे कि एक डिक्शनरी भी
वेबसाइट से संलग्न हो
जिससे हर शब्द का अर्थ पढ़ने वाला समझ पाए।
यह एक चुनौतीपूर्ण काम था।
भला ऐसा इंसान कहाँ मिलेगा
जिसे कंप्यूटर की कोडिंग इस दर्जा आती हो
कि रेख़्ता जैसी शानदार वेबसाइट संभाल सके
और साथ ही वह हिंदी, उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी की
इतनी समझ रखता हो
कि डिक्शनरी तैयार करा सके?
ऐसे में संजीव सर्राफ़ की
मुलाक़ात हुई एक IIT Bombay से फारिग कंप्यूटर इंजीनियर
और JNU में PhD रहे एक इंसान से।
इस लड़के को न सिर्फ़ आला दर्जे की कोडिंग आती थी
बल्कि यह उर्दू, फ़ारसी, अरबी, हिंदी,
अंग्रेज़ी जैसी कई ज़बान जानता था।
बात हुई।
उर्दू की ख़िदमत की बात थी
तो लड़के ने एक मामूली से मेहनताने पर यह ज़िम्मेदारी सर ले ली।
और देखते ही देखते रेख़्ता में जान फूँक दी।
इस बार फिर जश्ने रेख़्ता हो रहा है।
हज़ारों की भीड़ जुटेगी।
तमाशा होगा।
लेकिन वह लड़का किसी को याद नहीं।
न वेबसाइट ने कभी उसका नाम लिया।
वह लड़का है: शरजील ईमाम…