प्रीतम यादव

प्रीतम यादव

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छात्र,
हिन्दी साहित्य।

29/01/2026

जाति ज़रूरी है।

25/01/2026

फिर भी UGC के नये नियमों का विरोध ।
बहुजनों सीखो कुछ।

24/01/2026

अधिकार चाहो तो लड़ना सीखो
पग पग पर अड़ना सीखो
जीना है तो मरना सीखो।

कर्पूरी ठाकुर को नमन .।

09/11/2025

आज से 50 साल बाद अगर देश का इतिहास लिखा जाएगा तो वर्तमान मीडिया के भूमिका पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगेगा।।

06/11/2025

सामंत वाद के छाती पर जेएनयू का लाल सलाम।
चारों सीट पर लहराया लाल झंडा।

05/11/2025

तीन व्यक्ति, तीन उम्र, एक विचारधारा।
✊✊✊✊✊✊✊✊✊✊✊
लाल सलाम

05/11/2025

इटली के फिलॉस्फर मैकियावेली ने कहा है कि राजनीति में लगातार सत्ता में बने रहने के लिए नैतिक मूल में नीच बनना पड़ता है ।
शायद उनका यह कथन को बिहार चुनाव पूरा प्रसांगिक बना रहा है।
इस चुनाव में सत्ता पक्ष के द्वारा जिस तरह नीचता की न्यूनतम स्तर को छुआ जा रहा है , मैकियावेली सोच रहे होंगे कि मेरा यह सिद्धांत बिहार विधानसभा चुनाव के बिना अधूरा था।।
चुनाव प्रचार के दौरान हत्या होती है चुनाव आयोग का कार्रवाई सबके आंखों के सामने दिख रहा है।
सो कॉल्ड बाहुबली नेता अपने रैली में 50 प्लस गाड़ी लेकर घूम रहे हैं।
विपक्ष के नेता चुनाव आयोग को शिकायत कर रहे हैं कि चुनाव के द्रव्यमान 10000 महिला के खाते में दिया जा रहा है।
केंद्र सरकार के मंत्री का ऐसा बयान आता है जिससे लोकतंत्र स्वयं डर जाता है
और भी कई उदाहरण है जो कि मैं आपको बता सकता हूं पर मैक्यावली के सिद्धांत को समझने के लिए इतना एग्जांपल और यह चुनाव काफी है।

03/11/2025

जीवन में शांति चाहते हैं तो दुसरों की शिकायतें करने से बेहतर है खुद को बदल लें। ...
Nature love.❤️

28/10/2025

पूरा गैर यादव ओबीसी दलित समाज यादवो से कुछ सीखे न सीखे पर उनको एक गुण तो सीखना चाहिए।

"वो है स्वाभिमान"

यादव आज से नही 100 साल से सामंतवादियों से लड़ रहा है उसको न सत्ता की फिक्र है न सरकार की।

बस उसको ये दिखाना है कि सामंतवादियों की चरणबंदना न करके भी समाज में जिया जा सकता है।

वो बागी है फिर भी युद्ध के एक पक्ष वो है और आप सामंतवादियों के साथी होकर भी गुम है।

अगर इतना ही बाकी जातियां सीख जाएं और उनके पाले में आ जाएं तो इतिहास में उनका संघर्ष स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होगा।

और सिर्फ यादवों का नही ओबीसी दलितों का राज होगा।✌️

27/10/2025

सोशल मीडिया पर जितने भी चुनावी विश्लेषण कर रहे हैं या फिर सामाजिक विश्लेषण या फिर सरकार द्वारा किए गए कार्य का विश्लेषण या फिर सरकार के किसी योजना का विश्लेषण करते हैं।
अगर वह ध्यान से सभी चीजों देखें तो जैसे कि नेता का बयान उनके द्वारा लिया गया स्टैंड उनका कुछ योजना पत्रकारों के द्वारा चलाया गया कोई हैडलाइन को गौर से देखें खास करके सामाजिक रूढ़िवाद की के चश्मे से तो आप अभी भी हमेशा पाएंगे की आजादी के लगभग 75 साल बाद उसके पीछे सामंती सोच जातिवादी गिरना रहता है ।
इसका पूरा का पूरा उदाहरण बिहार चुनाव में आप देख सकते हैं जिस तरह अगली पंक्ति का एक महिला पत्रिका सिर्फ बिहार में सत्ता परिवर्तन ना हो जाए इसलिए बीजेपी के लिए खुलकर बैटिंग कर रही है बिना यह सोचे कि हम पत्रकार है हमारा काम निष्पक्ष रहना है आखिर इतना बड़ा रिक्स किस चीज को बचाने के लिए ले रही है।
आप हमारे बात से सहमत हो सकते हैं और असहमत हो सकते हैं वह अलग बात है पर यह सच है जब पिछले 20 साल सरकार के रहते हुए किसी के शासन को मीडिया के द्वारा सिर्फ बदनाम करने के साजिश के साथ जंगल राज करार देना उसे अभी तक प्रचारित करना यह कहीं ना कहीं पिछड़ा के प्रति गिरना को दिखाता है।
इस चुनाव मैं पटना यूनिवर्सिटी से साहित्य का छात्र होने के नाते जितना समाज को समझ पा रहा हूं वर्तमान राजनीति को समझ पा रहा हूं उसे हिसाब से कह सकता हूं अभी भी बहुजन को एक होकर अपने हक की लड़ाई के लिए मजबूती के साथ खड़ा होना पड़ेगा क्योंकि हमारी पहचान जाती बाद में है और बहुजन हम लोग पहले है।
क्योंकि अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री पद से हटना उसके बाद कार्यालय को गंगाजल से धुलवाना ये जातिवादी सोच का उपज है।
जीतन राम मांझी के मंदिर जाने पर मंदिर को धुलना यह जातिवादी सोच का प्रतीक है।
इटावा में कथावाचक पिछला समाज का था उसका सर बनवाया गया यह जातिवादी रूढ़िवाद का प्रतीक है।
इसलिए मजबूती से पूरे पिछड़ा समाज बहुजन वर्ग बाबू जगदेव कुशवाहा के आदर्श पर चलते हुए एक होकर सामंती सोच जातिवादी रूढ़िवाद के खिलाफ मजबूती से सामाजिक न्याय आर्थिक न्याय को अपना वोट देकर बहुजन के हक की लड़ाई को मजबूत कीजिए।
धन्यवाद।
आपका प्रीतम।।

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