#पर्ची_राजस्थान_ले_डुबी
राम चौधरी
परवाह ना कर तमाशे होते रहेंगे ताउम्र, बस यह खयाल रख की किरदार बेदाग रहें।
बीकानेर हैं प्रधान हट....
कहां की शेरनी है यह ज़रूर बताना
इस विडियो को पुष्टि हम नहीं करते हैं। आप करिए
कौन है यह कमेंट में जरूर बताना???...
* #सुनारी #डंपिंग यार्ड * * * #सुनारी का भविष्य खतरे में है कैसे? खबर को पुरा अवश्य पढ़ें-*
✅ग्राम पंचायत सुनारी व पास के सभी आमजन को आगाह किया जाता है कि लाडनूं से सुनारी रोड़ पर नगरपालिका लाडनूं द्वारा अस्थाई डंपिंग यार्ड और बिना स्वीकृति के ही बनाया गया है जहां लाडनूं शहर का गंदा कूड़ा-कचरा गाडियां भर भर के डाला जा रहा है, जो दिनों दिन लगातार अपना विस्तृत और खतरनाक रूप ले रहा है, डंपिंग यार्ड का प्रभाव सुनारी व आसपास के गांवों के लोगों में डेंगू, मलेरिया जैसे घातक रोग/बीमारियां, कृषि की उपज में कमी, प्लास्टिक और अन्य घातक मेटेरियल खाने से दुधारू पशुओं में नपुंसकता एव मृत्यु, तथा दूषित और बदबू वाली हवा से प्रभावित वातावरण में रहना भी मुश्किल हो सकता है, एक बार डंपिंग यार्ड बन जाने के बाद उसको हटाना बहुत बड़ा चैलेंज रहता है और डंपिंग यार्ड से प्रभावित कई गांवों के लोगों द्वारा CM तक पहुंच होने के बाद भी स्थाई डंपिंग यार्ड को हटा पाना संभव नहीं है, लाडनूं से सुनारी रोड़ पर नगरपालिका लाडनूं द्वारा बनाया गया डंपिंग यार्ड पूर्णतया अस्थाई और बिना किसी प्रशासनिक स्वीकृति के बनाया गया है, लेकिन ये जल्द ही स्थाई रूप ले सकता है जिसे समय रहते समझदारी से अगर नहीं हटवाया गया तो ग्राम पंचायत सुनारी और आसपास के गांवों का भविष्य प्रभावित होगा, अगर इसे रोका नहीं गया तो इसका खतरनाक असर हमें आगामी वर्ष में ही देखने को मिल जायेगा, गांव के सभी जागरूक/आमजन से निवेदन है कि अपने सुनारी गांव के सुनहरे भविष्य के लिए वर्तमान में समय रहते उचित कार्यवाही करें वरना इसका भुगतान आजीवन करना पड़ेगा और उसके बाद भी हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे
👉🏻सभी जागरूक नागरिकों सुनारी को बचा लीजिए, आज जो ये मसला हमें छोटा सा नजर आ रहा होगा लेकिन यही मसला हमारे लिए घातक सिद्ध हो सकता है
19/07/2024
आप किसी को उसका दुःख सुनकर पैसे उधार तो दे सकते हो, लेकिन अपने लाख दुःख सुनाकर भी उन पैसों को वापिस नहीं ले सकते।
#उधार
18/07/2024
लड़कियों के एक विद्यालय में नई अध्यापिका बहुत खूबसूरत थी, बस उम्र थोड़ी अधिक हो रही थी, लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी। सभी छात्राएं उसे देखकर तरह-तरह के अनुमान लगाया करती थीं। एक दिन किसी कार्यक्रम के दौरान जब छात्राएं उसके इर्द-गिर्द खड़ी थीं, तो एक छात्रा ने बातों-बातों में ही उससे पूछ लिया, "मैडम, आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की?"
अध्यापिका ने कहा, "पहले एक कहानी सुनाती हूं।" उसने कहा, "एक महिला को बेटे की लालसा में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसे धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छानुसार बेटा पैदा कर दे। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो-रोकर दुआ करती रही।"
अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझकर शांत हो गया। फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनियां से चली जाती।"
अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आंसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनियां से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए।"
अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं। जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"
वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं, 'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना।'"
अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सबकुछ कर सकती है, सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके।
एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौंसला बढ़ाने के लिए वह जान-बूझ कर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली, "पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं।"
इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है। वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए।
15/07/2024
और कौन-सा कौन-सा रिकोर्ड है? आप कमेंट में जरूर बताएं
27/06/2024
तस्वीर में आप एक टमाटर के पौधे को देख रहे होंगे, शायद किसी यात्री ने टमाटर खाकर उसके बीज को ट्रेन से फेंक दिया होगा... ये पौधा मिट्टी की छाती फाड़कर नही बल्कि पत्थरों को चीरकर बाहर आया है।
जब ये और भी नन्हा सा होगा, तब शताब्दी ओर राजधानी जैसे तूफान से भी तेज दौड़ती ट्रेनों के बिल्कुल पास से गुजरते हुए भी इसने सिर्फ बढ़ना सीखा ओर बढ़ते बढ़ते आखिर कार इसने एक टमाटर को जन्म दे ही दिया।
न हाथ है, न पांव है, न ही दिमाग है, और तो और इसको जीवित रहने के लिए कम से कम मिट्टी और पानी तो मिलना चाहिए ही था, जो इसका हक भी था लेकिन इस पौधे ने बिना जल, बिना मिट्टी के, बिना सुविधा के अपने आपको बड़ा किया... फला फूला और जीवन का उद्देश्य इसने पूरा किया।
जिन लोगो को लगता है कि जीवन मे हम तो असफल हो गए हम तो जीवन मे कुछ कर ही नही सकते, हम तो बस अब बरबाद हो ही चुके है, तो उन्हें इस टमाटर के पौधे से कुछ सीख लेनी चाहिए।
असली जीवन का नाम ही लगातार संघर्षों की कहानी है ।
17/06/2024
#डालडा
90 के दशक तक वनस्पति घी रिफाइंड की जगह यूज होता था खासकर बिहार में। डालडा उसका ब्रांड था लेकिन वनस्पति घी डालडा के नाम से हैं लोगों के बीच में मशहूर हो गया था। बुआ पकवान मिठाइयां समोसे जलेबी से लेकर घर में पराठा तक इसी में बनाया जाता था जमाना ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से रंगीन टीवी की तरफ बढ़ रहा था। धारावाहिक रामायण के दौर से निकलकर हम सभी महाभारत में प्रवेश कर रहे थे। उसे जमाने में टेलीविजन पर खूब विज्ञापन आते थे उसमें खाने पीने वाले प्रसाद एंड प्रेशर कुकर अगरबत्ती और डालडा विज्ञापन सबसे ज्यादा होता था। वनस्पति घी के कई सारे ब्रांड बाजार में थे जो कई सारी वनस्पतियों से बनाए जाते थे उसे जमाने में हमने कहानी सुनी थी महुआ के पेड़ पर फूल के बाद फल लगता है जिसे कोईन बोलते है। इससे तेल निकलता है जो काफी मीठा होता है जमने के बाद वह भी डालडा जैसा हो जाता है। मीठा होने के कारण उसमें पूरा पकवान ही बनाए जाते थे नमकीन चीज नहीं पर डालडा में सब कुछ बनाया जाता था।भारत में कुछ साल पहले तक वनस्पति घी को सिर्फ डालडा के नाम से जाना जाता था क्योंकि उस समय इसके अलावा देश में दूसरा कोई वनस्पति घी इस्तेमाल नहीं किया जाता था. डालडा का इतिहास कम से कम 90 साल पुराना है. डालडा भारत में इस्तेमाल किया जाने वाला सबसे मशहूर वनस्पति घी का ब्रांड है. 90 सालों तक हिंदुस्तान यूनिलीवर का एक प्रसिद्ध ब्रांड रहने के बाद साल 2003 में कंपनी ने डालडा को BUNGE LIMITED कंपनी को बेच दिया था.डालडा की शुरुआत साल 1937 में हिंदुस्तान युनिलीवर ने की थी. भारत में डालडा का इतिहास आजादी से पहले का है. पिछले 90 साल से भारत में डालडा ब्रांड ने बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बनाई हुई है. साल 1930 में नीदरलैंड की एक कंपनी वनस्पति घी का कारोबार करने के उद्देश्य से भारत आई थी जिसने यहां डाडा नाम से वनस्पति घी के ब्रांड की शुरुआत की.90 के दशक तक ‘डालडा’ भारत का नंबर वन ब्रांड बन चुका था. मार्किट में इसकी अपनी एक अलग पहचान थी. लेकिन 90 के दशक के अंत तक इसका व्यवसाय सिकुड़ने लगा. क्योंकि अन्य भारतीय कंपनियां भी ‘वनस्पति घी’ का विकल्प लेकर मार्केट में आ चुकी थीं. इस दौरान कुछ कंपनियों ने अफ़वाह फैलाई की ‘डालडा’ द्वारा ‘वनस्पति घी’ में चर्बी मिलाई जाती है. हालंकि, ये अफ़वाह मात्र ही रही.21वीं सदी की शुरुआत के साथ ही कई कंपनियों ने ‘वनस्पति घी’ के विकल्प के तौर पर ‘रिफ़ाइंड ऑइल’ की शुरुआत कर दी. इस दौरान मार्केट में भारी मात्रा में मूंगफली, सूरजमुखी, तिल, सोयाबीन आदि के ‘रिफ़ाइंड ऑइल’ आ गए जो उस वक़्त ‘डालडा’ की तुलना में सस्ते थे. इस दौरान ‘डालडा’ की विरोधी कंपनियों ने ऐसे विज्ञापन बनवाये जिसमें दिखाया गया कि ‘रिफ़ाइंड ऑइल’ की तुलना में ‘डालडा’ सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह है.
#अनूप
17/05/2024
कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली
यह कहावत क्यों बनी ?
बचपन से लेकर आज तक हजारों बार इस कहावत को सुना था कि "कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली" आमतौर पर यह ही पढ़ाया और बताया जाता था कि इस कहावत का अर्थ अमीर और गरीब के बीच तुलना करने के लिए है पर भोपाल जाकर पता चला कि कहावत का दूर-दूर तक अमीरी- गरीबी से कोई संबंध नहीं है और ना ही कोई गंगू तेली से संबंध है।
आज तक तो सोचते थे कि किसी गंगू नाम के तेली की तुलना राजा भोज से की जा रही है, यह तो सिरे ही गलत है, बल्कि गंगू तेली नामक शख्स तो खुद राजा थे।
जब इस बात का पता चला तो आश्चर्य की सीमा न रही साथ ही यह भी समझ आया यदि घुमक्कड़ी ध्यान से करो तो आपके ज्ञान में सिर्फ वृद्धि ही नहीं होती बल्कि आपको ऐसी बातें पता चलती है जिस तरफ किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होता और यह सोचकर हंसी भी आती है यह कहावत हम सब उनके लिए सबक है जो आज तक इसका इस्तेमाल अमीरी गरीबी की तुलना के लिए करते आए हैं।
इस कहावत का संबंध मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके जिला धार से है। भोपाल का पुराना नाम भोजपाल हुआ करता था, भोजपाल, नाम धार के राजा भोजपाल से मिला।
समय के साथ इस नाम में से "ज" शब्द गायब हो गया और नाम भोपाल बन गया।
अब बात करते हैं कहावत की! कहते हैं, कलचुरी के राजा गांगेय (अर्थात गंगू) और चालुक्य राजा तेलंग (अर्थात तेली) ने एक बार राजा भोज के राज्य पर हमला कर दिया, इस युद्ध में राजा भोज ने इन दोनों राजाओं को हरा दिया।
उसी के बाद व्यंग्य के तौर पर यह कहावत प्रसिद्ध हुई "कहां राजा भोज-कहां गंगू तेली"।
चित्र - राजा भोज की विशाल प्रतिमा भोपाल के वीआईपी रोड के पास झील में लगी हुई है।
12/05/2024
तस्वीर देख कर हैरान मत होईए। ये बात सच है कि कभी दिल्ली से लंदन आप बस से भी जा सकते थे क्योंकि तब दुनिया का सबसे लम्बा सड़क मार्ग कलकत्ता से लंदन हुआ करता था और इस मार्ग पर बस भी चलती थी।
कोई हिंदुस्तानी या अंग्रेज ने नहीं बल्कि सिडनी की अल्बर्ट टूर एंड ट्रेवल्स कंपनी ने शुरु की रहे ये सेवा। 1950 के दशक के शुरू में होने के बाद लगभग 25 साल तक चली पर बाद में इसे किन्ही कारणों से बंद करना पड़ा। किराया था महज 85 पाउंड्स से लेकर 145 पाउंड्स।
कलकत्ता से शुरू होकर बनारस, इलाहाबाद, आगरा, दिल्ली से होते हुए लाहोर, रावलपिंडी,काबुल कंधार, तेहरान,इस्तांबुल से बुलगेरिया, युगोसलाविया,वीएना से वेस्ट जर्मनी और बेलजियम से होते हुए ये बस लंदन पहुंचती थी। इस दौरान ये करीब 20300 KM चलती थी और 11 मुल्कों को क्रॉस करती थी।
#इतिहास
04/05/2024
Chelenge
29/04/2024
दो नहीं चार अंतर बताने वाला जिनियस माना जाएगा
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