उत्तरायण सूर्य आशा की किरण बनकर आए,
हर अंधकार को दूर भगाए,
नए सपनों को पंख लगाए,
मकर संक्रांति की शुभकामनाएं 🚩🙏
#शायरी
Arjun Krishna
Social worker, Legal awareness
13/01/2026
Arjun Krishna
Radhe Radhe🙏
25/08/2025
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विवाह के पश्चात पुरूषों की ऐसी मनोस्थितियाँ जो स्त्रियां कभी समझ नहीं पाती ।
1- जिस माता पिता ने जन्म देकर पाला पोसा जब उसे छोड़ने के लिए पत्नी दबाव डालती है तो पुरुष के हृदय की पीड़ा स्त्री नहीं समझती।
2- जब ऑफिस से एक पुरुष आता है और माँ व पत्नी लड़ते हुए एक दूसरे पर आरोप लगाती हैं, तब सैंडविच पुरुष का बनता है तब उसकी मानसिक पीड़ा का अंदाज़ा दोनो स्त्रियां नहीं लगाती।
3- जब लड़का किसी लड़की से प्रेम कर विवाह करता है, व माता को असुरक्षा महसूस होती है कि बेटा मेरे हाथ से गया। कुछ न कुछ बेटों को जब बोलती है तो बेटे का हृदय दुखता है तो यह अंदाजा माँ को नहीं हो पाता।
4- अच्छे पुरुष जो अपनी पत्नी से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं, जब पत्नी उनकी आय की लिमिट न समझते हुए डिमांड करती है, तब पति की मनःस्थिति नहीं समझती।
5- अच्छे लड़के जिन्हें लड़कियां प्रेम के नाम पर उनसे अपना कार्य करवाती हैं, वो सब जानते हुए प्रेम में बेवकूफ़ बनते हैं तो उनकी मनःस्थिति लड़की नहीं समझती।
6- बुरे लड़के जब किसी लड़की को फंसाने के लिए मकड़ी की तरह प्रेमजाल बुनते हैं, तब लड़की उनके धोखे को नहीं समझ पाती।
7- व्यभिचारी लड़के जब अच्छी पत्नी के प्रेम व सेवा की उपेक्षा कर बाहर सम्बन्ध बनाते हैं। तो उनकी इस मनःस्थिति को पत्नी नहीं समझ पाती।
8- सीधे शर्मीले लड़कों को जब ऑफिस या कॉलेज में लड़कियों के समूह द्वारा तंज कसा जाता है, तब उसकी मनःस्थिति व पीड़ा का अंदाजा लड़कियों को नहीं होता।
9- जब एक लड़का पुत्री का पिता बनता है, बेटी की बड़ी डिमांड को पूरी नहीं कर पाता, बेटी झल्लाती है तब पिता के दर्द को बेटी नहीं समझ पाती।
10- विवाह के बाद अपनी जान के टुकड़े बेटी को विदा करते हुए असीम पीड़ा पिता के हृदय को होती है वह बेटी नहीं समझ पाती।
11- अच्छा भाई जब बहन को किसी बात के लिए समझाता है व बहन उसे उल्टा सीधा बोलकर निकल जाती है। तब भाई के हृदय की पीड़ा को वह नहीं समझ पाती।
12- अच्छा भाई जब रक्षाबंधन पर अपनी बहन का इंतज़ार करता है, और रंग में भंग जब भाई बहन के बीच जब उसकी पत्नी डालती है, तब वह खून के घूंट पीकर रह जाता है। तब उसके हृदय की पीड़ा पत्नी नहीं समझती।
31/03/2024
आजकल के अधिकांश लड़के नौकरी लगने के तुरंत बाद शादी करके दुलहन को सीधे नौकरी पर ले जाते हैं तथा सारा पढ़ाई का कर्ज , खेती का काम सब झंझट उन माता पिता के पास छोड़ जाते हैं जो अपनी मजदूरी का पैसा इन बच्चों पर बिना किसी प्रतिफल की उम्मीद में अपनी सामाजिक जिम्मेदारी, भावनात्मक एवं बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए लगाया होता है कई बार तो उच्च शिक्षा के लिए माता-पिता ने कर्ज़ भी लिया होता है। अब कमाई करने वाले ए अधिकांश बच्चे सबसे पहले शहर में प्लाट लेने की सोचते हैं तथा माता पिता की ओर कम ध्यान देते हैं जो बहुत दुखदाई है ।
फेसबुक पर माता पिता को भगवान ज्यादा वो ही लोग लिखते हैं जिनके माता-पिता दयनीय स्थिति मे होने के बाद भी उनसे आशा नही करते ।कभी वो लोग गाँव आते हैं तो अपनी जेब पैसा नही देने हेतु माता पिता से खेती , भैंस आदि की कमाई का हिसाब अपनी पत्नी के सामने लेते हैं तथा उन्हें बहुत सुनाते हैं । पत्नी भी उनमें कमी निकालकर अपना धर्म पूरा करती है और उन पर नगदी फसल उगाने और उससे पैसा कमाने का सलाह थोपती है।
यह माजरा करीब 90% लोगों का है जो शहर मे लोगों को जन्मदिन की पार्टी देकर अपनी झूठी शान का बखान करते हैं । वो अपने पत्नी बच्चों के अलावा किसी पर एक पैसा खर्च नही करते ।
क्या इस हालत मे समाज सुधार की ओर अग्रसर माना जा सकता है।गाँव के अधिकांश लोग इसी तरह दुःखी हैं क्योंकि उनको बच्चे की नौकरी के कारण वृद्धा पेंशन भी नही मिलती।
मां-बाप कितने सपने सजोकर उन्हें पेट काटकर पढ़ाते हैं फिर नौकरी या तो लगती नही या लगने के बाद बेगाने होना दुःखद है।आजकल लड़को की नौकरी लगे या ना लगे घर का काम तो मरते दम बुढों को ही करना पडता है।बच्चों को पढ़ाने का मां -बाप को यही पुरस्कार है ।
जो लोग शोसल मीडिया पर बड़ी बडी बातें करते हैं तथा लोगों का आदर्श बने हुए हैं तथा बड़े पदों पर आशीन हैं उनमें से अनेक भी अपने रिशतेदारों , माता पिता के प्रति निष्ठुर भाव रखते हैं ।
खुली हवा में चरित्र के भ्रष्ट होने की उससे कम संभावना है, जितना बन्द कमरे में।
- मुंशी प्रेमचंद
[ स्रोत : 'निर्मला' उपन्यास से ]
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