31/05/2026
#वैश्विक_अभिभावक_दिवस (1 जून)
“सुपर पेरेंट” बनने की दौड़ में खोता अभिभावकत्व, अधिकार भी छीने और सम्मान भी”
✍🏻 Abhishek Jain Bittu
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता एवं मीडिया प्रभारी
Sanyukt Abhibhavak Sangh, Rajasthan- SAS, जयपुर
हर वर्ष 1 जून को विश्वभर में वैश्विक अभिभावक दिवस मनाया जाता है। इस दिन माता-पिता और अभिभावकों के योगदान को सम्मान देने की बातें होती हैं, उन्हें बच्चों का प्रथम गुरु, मार्गदर्शक और भविष्य निर्माता बताया जाता है। लेकिन इस अवसर पर एक ऐसा प्रश्न भी है, जिससे समाज, सरकार और शिक्षा व्यवस्था लगातार बचती रही है—क्या आज के अभिभावक वास्तव में सम्मानित हैं, या केवल जिम्मेदारियों का बोझ ढोने वाले एक मौन वर्ग बनकर रह गए हैं?
सच्चाई यह है कि आज का अभिभावक पहले से कहीं अधिक परेशान, असुरक्षित और दबावग्रस्त है। उसे बच्चों के भविष्य का निर्माता तो कहा जाता है, लेकिन उस भविष्य को तय करने वाली व्यवस्थाओं में उसकी कोई निर्णायक भागीदारी नहीं है। उसे जिम्मेदारियां दी गईं, लेकिन अधिकार नहीं;
1) अपेक्षाएं दी गईं, लेकिन सम्मान नहीं।
2) अभिभावक नहीं, व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार
आज का अभिभावक चारों ओर से घिरा हुआ है। सरकारी नीतियां उसे सुनने की बजाय उस पर निर्णय थोपती हैं। निजी स्कूल उसे अभिभावक नहीं, ग्राहक मानते हैं। कोचिंग संस्थान बच्चों के भविष्य का भय दिखाकर परिवारों की आर्थिक क्षमता का दोहन करते हैं। समाज उसे लगातार तुलना, प्रतिस्पर्धा और दिखावे की संस्कृति में धकेलता है।
बच्चे के जन्म से लेकर उच्च शिक्षा तक हर कदम पर अभिभावक को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक दबावों का सामना करना पड़ता है। फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन, कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाएं, डिजिटल उपकरण और अतिरिक्त गतिविधियों का खर्च एक सामान्य परिवार की कमर तोड़ देता है। इसके बावजूद यदि बच्चा अपेक्षित परिणाम नहीं ला पाता, तो सबसे पहले सवाल अभिभावक पर ही उठते हैं।
विडंबना यह है कि जो व्यक्ति अपने परिवार के लिए सबसे अधिक संघर्ष कर रहा है, वही व्यवस्था में सबसे कम सुना जा रहा है।
-- “सुपर पेरेंट” का भ्रम और टूटते परिवार
-- पिछले कुछ वर्षों में समाज ने एक नई अवधारणा गढ़ी है—“सुपर पेरेंट”। ऐसा अभिभावक जो अपने बच्चे को हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनाने की क्षमता रखता हो। यह धारणा सुनने में आकर्षक लगती है, लेकिन इसके परिणाम बेहद खतरनाक हैं।
अभिभावकों को यह विश्वास दिलाया गया कि यदि वे हर कीमत पर अपने बच्चे को आगे नहीं बढ़ा पाए, तो वे असफल माता-पिता हैं। इसी सोच ने हजारों परिवारों को कर्ज, तनाव और मानसिक दबाव की स्थिति में पहुंचा दिया।
आज लाखों अभिभावक अपनी आय से अधिक खर्च कर रहे हैं। बच्चों के लिए महंगी शिक्षा और कोचिंग की व्यवस्था करने हेतु ऋण ले रहे हैं। अपनी जरूरतों को त्यागकर बच्चों के भविष्य के नाम पर आर्थिक संकट झेल रहे हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में परिवारों का भावनात्मक संतुलन कमजोर होता जा रहा है।
बच्चों से संवाद कम हो रहा है और अपेक्षाओं का दबाव बढ़ रहा है। अंक, रैंक और पैकेज की चर्चा ने संस्कार, संवेदनशीलता और मानसिक स्वास्थ्य को पीछे धकेल दिया है।
#शिक्षा_व्यवस्था में अभिभावकों की भूमिका केवल भुगतान तक सीमित
यदि अभिभावक शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण भागीदार है, तो फिर उसे निर्णय प्रक्रिया से बाहर क्यों रखा जाता है?
आज भी अधिकांश राज्यों में फीस निर्धारण, शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम संबंधी निर्णय, परीक्षा प्रणाली और स्कूल प्रशासन के महत्वपूर्ण मामलों में अभिभावकों की प्रभावी भागीदारी नहीं है। निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि, अनिवार्य खरीदारी और विभिन्न प्रकार के आर्थिक दबावों के खिलाफ अभिभावकों की आवाज को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की अव्यवस्था, पेपर लीक, परीक्षा स्थगन, परिणाम विवाद और मूल्यांकन संबंधी त्रुटियों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव भी परिवारों पर पड़ता है। नीट, जेईई, भर्ती परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने बार-बार यह साबित किया है कि शिक्षा व्यवस्था की कमियों की कीमत विद्यार्थी और अभिभावक दोनों चुकाते हैं।
फिर भी जब नीतियां बनती हैं, तो अभिभावकों को केवल दर्शक बनाकर रखा जाता है। बाजारवाद ने शिक्षा को सेवा से व्यापार बना दिया, शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण था। लेकिन आज शिक्षा का बड़ा हिस्सा बाजार के प्रभाव में आ चुका है। स्कूल ब्रांड बन गए हैं, कोचिंग उद्योग अरबों रुपये का कारोबार बन चुका है और सोशल मीडिया ने सफलता की एक कृत्रिम परिभाषा स्थापित कर दी है।
अभिभावकों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि महंगी शिक्षा ही बेहतर भविष्य की गारंटी है। इसी सोच ने शिक्षा को अधिकार से अधिक उत्पाद बना दिया है।
परिणामस्वरूप परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं, जबकि बच्चों पर प्रदर्शन का दबाव बढ़ रहा है। मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी घटनाएं लगातार चिंता का विषय बन रही हैं। दुखद यह है कि इन परिस्थितियों में अभिभावकों की मानसिक स्थिति पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा होती है।
#अभिभावक_अधिकार_आंदोलन की आवश्यकता
वैश्विक अभिभावक दिवस केवल शुभकामनाओं और औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि वास्तव में अभिभावकों का सम्मान करना है, तो उन्हें शिक्षा व्यवस्था में वैधानिक और प्रभावी भागीदारी देनी होगी।
समय की मांग है कि—शिक्षा नीति निर्माण में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए।
फीस निर्धारण प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए।
निजी स्कूलों की मनमानी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो।
विद्यार्थियों के साथ-साथ अभिभावकों के मानसिक स्वास्थ्य को भी नीति का हिस्सा बनाया जाए।
परिवारों को प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ से निकालकर संवाद, संस्कार और संतुलन की दिशा में प्रेरित किया जाए।
शिक्षा को व्यापार नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में स्थापित किया जाए।
परिवार बचेंगे तो समाज बचेगा
आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावकों को केवल भुगतान करने वाला माध्यम या बच्चों की सफलता का जिम्मेदार व्यक्ति मानने की सोच बदली जाए। उन्हें समाज और शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक साझेदार स्वीकार किया जाए।
क्योंकि जब अभिभावक स्वयं तनाव, असुरक्षा और अधिकारहीनता में जी रहा होगा, तब वह बच्चों को सुरक्षित और संतुलित वातावरण कैसे दे पाएगा?
वैश्विक अभिभावक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि मजबूत राष्ट्र की नींव मजबूत परिवारों पर टिकी होती है, और मजबूत परिवारों की आधारशिला सशक्त अभिभावक होते हैं।
यदि हम सचमुच बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं, तो सबसे पहले अभिभावकों को उनका सम्मान, अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान देना होगा।
क्योंकि अभिभावक केवल बच्चों का पालन-पोषण नहीं करते, वे समाज का भविष्य गढ़ते हैं। और जिस समाज में अभिभावक कमजोर होंगे, वहां भविष्य भी कमजोर होगा।
Government of Rajasthan

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