मध्य पूर्व संकट केवल एक मानवीय और भू-राजनीतिक त्रासदी नहीं है—यह एक पर्यावरणीय आपातकाल भी है, जो जवाबदेही की मांग करता है।
आधुनिक युद्ध केवल जमीन पर विनाश नहीं छोड़ते, बल्कि भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन भी करते हैं। फ्यूल-इंटेंसिव सैन्य ऑपरेशन, जलती हुई इंफ्रास्ट्रक्चर और लंबे समय तक चलने वाला पुनर्निर्माण—ये सब मिलकर पर्यावरण पर गहरा प्रभाव डालते हैं। फिर भी, और जैसे वैश्विक ढांचे के तहत एक बड़ी कमी बनी हुई है: सैन्य उत्सर्जन अक्सर कम रिपोर्ट किए जाते हैं या पूरी तरह शामिल ही नहीं होते।
यह एक गंभीर जिम्मेदारी का सवाल उठाता है।
अगर किसी संघर्ष में शामिल देश या पक्ष पर्यावरण को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचाते हैं, तो क्या उन्हें केवल मानव और आर्थिक नुकसान के लिए ही नहीं, बल्कि जलवायु पर पड़े प्रभाव के लिए भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?
अब समय आ गया है कि वैश्विक समुदाय इन बातों पर विचार करे:
• युद्ध के दौरान सैन्य उत्सर्जन की अनिवार्य रिपोर्टिंग
• अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत स्वतंत्र मॉनिटरिंग
• युद्ध से हुए पर्यावरणीय नुकसान के लिए जलवायु-आधारित जवाबदेही
• राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं में युद्ध-संबंधित उत्सर्जन को शामिल करना
बिना जवाबदेही के, जलवायु प्रतिबद्धताएं सार्वभौमिक होने के बजाय चयनात्मक बन जाती हैं।
शांति, पारदर्शिता और जिम्मेदारी—ये तीनों साथ-साथ चलने चाहिए, क्योंकि संघर्ष की कीमत केवल सीमाओं तक सीमित नहीं होती, बल्कि पूरी पृथ्वी को प्रभावित करती है।
ARay-एक किरण
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20/10/2025
✨ Whatever you give to life, it always finds its way back to you.
Give love ❤️, spread positivity 🌈, share kindness 🤝 — and watch the magic return multiplied.
20/10/2025
When life knocks you down, sometimes it’s not strength that lifts you — it’s kindness.
A teacher paying your lunch bill.
A friend showing up when the world didn’t.
A stranger smiling when your eyes couldn’t.You didn’t rise alone — someone gave you hope.
Today, pass it forward.
Be someone’s ray of hope. 🌤️
अगर क्रिकेट का यही हाल रहा, तो आने वाले समय में कोई भी मौजूदा कप्तान किसी नए खिलाड़ी को सपोर्ट नहीं करेगा। हर कोई सिर्फ अपने लिए खेलेगा, क्योंकि वही नए खिलाड़ी जिन्हें आज ग्रूम किया जा रहा है, वही आगे चलकर मौजूदा खिलाड़ियों और कप्तानों के लिए खतरा बन जाएंगे।
BCCI को इस मामले में थोड़ा संतुलन बनाकर चलना चाहिए था — पहले विराट को हटाकर रोहित को कप्तान बनाया गया, अब रोहित को हटाकर गिल को… आगे भी शायद यही ट्रेंड चलता रहेगा।
कहीं ऐसा न हो कि टीम इंडिया की एकता और जज़्बा इसी राजनीति की भेंट चढ़ जाए।
Set an example if you are a Leader!!
28/09/2025
Happy Navratri
31/08/2025
कभी-कभी खुद की जब याद आ जाती है,
तब पता चलता है,
हम कितने बदल गए हैं,
कितनी मुस्कानें किताबों में दब गई हैं,
कितने अरमान रास्तों में बिखर गए हैं।
आईने में चेहरा तो वही है,
पर आँखों का उजाला कुछ कम-सा लगता है,
सपनों का रंग अब हल्का-हल्का धुंधला-सा लगता है।
बीते हुए दिनों की सरगम सुनाई देती है,
जहाँ बेफिक्री थी, जहाँ मासूमियत थी,
जहाँ बस जीने का ही जश्न हुआ करता था।
आज जब ठहर कर खुद को देखता हूँ,
तो लगता है—
हमने बहुत कुछ पाया भी है,
पर कहीं-न-कहीं खुद को खोया भी है।
कभी-कभी खुद की जब याद आ जाती है,
तब पता चलता है,
हम कितने बदल गए हैं,
कितनी मुस्कानें किताबों में दब गई हैं,
कितने अरमान रास्तों में बिखर गए हैं।
आईने में चेहरा तो वही है,
पर आँखों का उजाला कुछ कम-सा लगता है,
सपनों का रंग अब हल्का-हल्का धुंधला-सा लगता है।
बीते हुए दिनों की सरगम सुनाई देती है,
जहाँ बेफिक्री थी, जहाँ मासूमियत थी,
जहाँ बस जीने का ही जश्न हुआ करता था।
पर अब ठहर कर जब खुद को देखता हूँ,
तो एहसास होता है—
खुद को खोया नहीं,
बस नया रूप पाया है।
हर ठोकर ने सबक दिया,
हर हार ने साहस सिखाया,
और आज यही जज़्बा कहता है—
"अभी कहानी बाकी है,
अभी सफ़र जारी है।"
गाँव की खुशबू
पीपल की छाँव तले सुस्ताती दोपहर,
पगडंडी से जुड़ा हर मोड़ एक सफ़र।
आमों के बग़ीचे में किलकारियाँ बिखरीं,
महुआ की महक से भीगी ठंडी ठंडी रातें।
कुएँ पर जुटी औरतों की हँसी,
ढोलक की थाप पर झूमती सगाई।
धूल भरी गलियों में खेलते बच्चे,
मिट्टी में ही छुपा था सारा सुख-स्वर्ग।
सरसों के खेतों की पीली सुनहरी चादर,
साँझ की लालिमा में ढलता सूरज,
चूल्हे की आँच में पकता सादा सा खाना,
पर दिल को तृप्त कर जाता हर कौर।
शहर ने दिया शोर, भीड़ और दौड़,
पर गाँव ने दिया चैन, अपनापन और जोड़।
आज भी आँखें मूँदूँ तो सबसे पहले वही आता—
पीपल की छाँव, पगडंडी, वो गाँव।
गाँव की यादें
पीपल की छाँव, पगडंडी वो गाँव,
आमों का बग़ीचा, महुआ की महक,
मिट्टी की खुशबू, सरगम से भरी,
हर कोने में छिपी है अपनापन की झलक।
नदी किनारे मचलते हुए मासूम सपने,
चरवाहों की बंसी और ढलते सूरज के रंग,
अंगनाई में खिचड़ी की खुशबू मिल जाती,
गली-गली गूँजते थे त्योहारों के ढंग।
वो टूटी चप्पलें, वो मिट्टी भरे पाँव,
फिर भी दिल को लगते थे सबसे ख़ास गाँव,
शहर की चकाचौंध में खो गया सब कुछ,
पर यादों में अब भी जिंदा है वो गाँव।
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