23/02/2025
एक जननायक सम्भावना का अवसान
सुभाष बोस, गांधी, भगत सिंह, राममनोहर लोहिया, जेपी, लेनिन, चे ग्वारा, मंडेला जैसे लोग जननायक थे। जननायक के प्रति जनता में भावनात्मक लगाव होता है, यह सैलाब, कभी जनावेग में बदल जाता है।
राजनीति, सामाजिक दुष्टचरित्रों से जनता वैसे ही परेशान रहती है। जब कोई नेतृत्व उसे भावनात्मक रूप से उनकी तकलीफों को दूर करने की राह दिखाता है तो जनता सामूहिक मनोवैज्ञानिक अंदाज में उसकी दीवानी हो जाती है, उसके लिए मर-मिटने बिछ जाने को तैयार रहती है। उसमे जननायक के नेतृत्व, मूल्यों के प्रति सजगता,जनता की धार्मिक श्रद्धा होती है।
भारत में जब अन्ना हजारे आंदोलन चला तो हल्द्वानी में एक युवा सुभाष कांडपाल ने पहली बार मुझे भी सोशल मीडिया की ताकत दिखाते हुए उस आंदोलन में शामिल होने का आमंत्रण दिया। उस आंदोलन की तीव्रता इतनी बढ़ी कि मुझे आभास हुआ कि भारत में आजादी के आंदोलन में भी यही जोश-ओ-खरोश हुआ होगा। गांव-गांव से मीलों दूर सौ साल के बूढे, महिलाएं, बच्चे आंदोलन में आते। क्या जोश, आत्मबलिदान का जज्बा। एक बार भयंकर बारिश में हम ‘कदम कदम बढ़ाये जा’ गीत गाते हल्द्वानी की गलियों में मार्च कर रहे थे। मुझे जननायक सुभाष बोष की याद आयी। जिंदाबाद, भारत माता की जय, बंदेमातरम... सारे राजनैतिक दलों के नारे एकाकार हो गये थे।
फिर अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल का दल जब हल्द्वानी आया तो मैं केजरीवाल से रूबरू हुआ। उनकी प्रशासनिक कुशलता, तेज दिमाग, सहजता, सरलता, स्पष्टता ने मुझे प्रभावित किया। उनमें एक जनजानयक की छवि मुझे दिखी। मैं रामलीला मैदान में उनको सुनने अपार जनसभा में एंकरिंग कर रहा था। पूरा मंच रिटायर्ड फौजी कमांडोज ने घेरा था। मैं नाम लेकर भाषण के लिए केजरीवाल जी के साथियों को बुला रहा था। तभी मैंने कुमार विश्वास (जो अब संत हो गये हैं ) को इशारा कर कहा, आप का नाम क्या है? इस पर वह गुस्से में आ गये। जनता की ओर मुखातिब हो कर बोले, मेरा नाम! मेरा नाम ये नहीं जानते? तब अरविंद केजरीवाल ने कहा, कोई बात नहीं। जरूरी नहीं वो आपका नाम जानें।
इस आंदोलन ने भाजपा को आगे बढ़ने का मौका तो दिया ही, कांग्रेस अपने अहं, इलिट करैक्टर से जनता की नजर में गिर गयी। फिर केजरीवाल जी को जनता ने दिल्ली की सत्ता दी। केजरीवाल ने बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बेसिक जरूरतों में कुछ सुधार किया, तो जनता ने उनमें एक नये अल्टरनेटिव दल की छवि दिखी। उस समय मैंने थ्री वीलर, मजदूरों और मध्यवर्ग से अनायास साक्षात्कार लिया तो पाया उनकी नजर में केजरीवाल की जननायक की छवि है।
‘आप’ का प्रभाव भाजपा के लिए आंख की किरकिरी हो गया। वह केजरीवाल को मुकदमे जेल, एलजी के सहारे, छापे मार कर कांग्रेस की तरह नेस्तनाबूद करने के लिए आमादा हुई। इधर, केजरीवाल जी के बड़बोल बढ़ते रहे। वह हाई फाई हो गये। सत्ता छिनने का डर इतना रहा कि जेल जाने पर भी डर से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न दिया। इस्तीफा देते तो खुद तो शायद न हारते। विचारधारा के बगैर वह वैसे ही थे जैसे अन्य दल। उनकी जननेता की छवि हट गई। उन्होंने भी भाजपा, कांग्रेस की तरह धर्म का सहारा लिया। जनता ने उन्हें भ्रष्टचारी लांछन के कारण नहीं हराया, उनके अहं ने ही उन्हें हराया।
जब सत्ताधारी का अहं हाई फाई हो जाता है तो वह जननायक के बदले सत्ताधारी, राजनेता हो जाता है। यही केजरीवाल के साथ हुआ। इतने दिमाग वाले वो जल्द ही भोग के मनोवैज्ञानिक प्रेशर में आ गये। राजनीति के भावनात्मक माहौल को राजनैतिक सौदेबाजी में बदल देता है।
चुनावी महाकुम्भ में दिल्ली में ‘आप’ की हार चिंतनीय है। यह स्थिति एक दलीय व्यवस्था को जन्म देती है जो तानाशाही की गुंजाइश रखती है। इसके अतीत के प्रबुद्ध सदस्य, योगेन्द्र यादव,आशुतोष, कुमार विश्वास, शशिभूषण सब ने ‘आप’ की हार का कारण अरविंद केजरीवाल का अहंवादी, भोगवादी होना ही अपने साक्षात्कार में बतलाया। पर उनकी हार से वे और बौद्धिक लोग खुश न थे। सब ने साक्षात्कार में कहा कि केजरीवाल का अवसान लोकतंत्र के लिए उत्साहजनक नहीं है। उनका नैतिक पतन, सत्ता के लिए मोह उन्हें वही बनाता है जो और सत्ताधारी हैं।
सत्ता के प्रति केजरीवाल का भाजपा की तरह ही बन जाना, राम के बदले हनुमान जी को ले आना, ‘मोदी सरकार’ के बदले ‘केजरीवाल सरकार’ लाना, इस सब तमाशे ने ‘आप’ को ‘मैं’ बना दिया।
आज सभी ‘मुफ्त’ की बात कह कर टेंडर टाइप का खोलते हैं। तुम इतना मुफ्त तो हम इतना। यह तो एक तरह का उत्कोच है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस ओर इंगित किया। मुफ्त देने का मतलब है कि आज़ादी के बाद सभी दल मौलिक अधिकार देने में सक्षम साबित नहीं हो पाये।
जनता की याददाश्त कम होती है। एक समय में भाजपा से किसान नाराज थे, अग्निवीर की योजना से नौजवान गुस्से में थे। मगर भाजपा अपनी सोशल इंजीनियरिंग से जीती। कांग्रेस अपनी आपसी फूट, नेतृत्वहीनता से उत्तराखंड में, जहां वह एक बार वह जीतती एक बार हारती थी, क्षेत्रीय चुनावों में भी हार गयी। सारे आक्रोश के बीच भाजपा सारे देश में जीती। वर्तमान में दिल्ली चुनाव में अंतिम दस दिन में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक कर जीत हासिल की। वोटर्स में भाजपा के प्रति आक्रोश तो कहीं दुबका हुआ है पर उसके पास कोई अल्टरनेटिव भी नहीं है। बाकी धन, मद की माया तो है ही।
सारी भाजपा की जीतों में मोदी जी का औरा उतना नहीं है, जितना मजबूत विकल्प का अभाव है। पब्लिक भले ही लोकतांत्रिक मूल्यों से बहुत ज्यादा सरोकार में नहीं फिर भी वह विकल्प तो वह भी चाहती है। पर विरोध, विकल्प नहीं दे रहा।
पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों को जनता ने कितने मौके सरकार बना के मौके दिये पर वह असफल रही। जन नेतृत्व में भावनात्मक अभाव उसे फिर गेम पॉलिटिक्स में बदल देत है। केजरीवाल का जननेता से राजनैतिक नेता की यात्रा का पतन हुआ। यह उनकी नैतिक हार है।