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23/02/2025

एक जननायक सम्भावना का अवसान


सुभाष बोस, गांधी, भगत सिंह, राममनोहर लोहिया, जेपी, लेनिन, चे ग्वारा, मंडेला जैसे लोग जननायक थे। जननायक के प्रति जनता में भावनात्मक लगाव होता है, यह सैलाब, कभी जनावेग में बदल जाता है।

राजनीति, सामाजिक दुष्टचरित्रों से जनता वैसे ही परेशान रहती है। जब कोई नेतृत्व उसे भावनात्मक रूप से उनकी तकलीफों को दूर करने की राह दिखाता है तो जनता सामूहिक मनोवैज्ञानिक अंदाज में उसकी दीवानी हो जाती है, उसके लिए मर-मिटने बिछ जाने को तैयार रहती है। उसमे जननायक के नेतृत्व, मूल्यों के प्रति सजगता,जनता की धार्मिक श्रद्धा होती है।

भारत में जब अन्ना हजारे आंदोलन चला तो हल्द्वानी में एक युवा सुभाष कांडपाल ने पहली बार मुझे भी सोशल मीडिया की ताकत दिखाते हुए उस आंदोलन में शामिल होने का आमंत्रण दिया। उस आंदोलन की तीव्रता इतनी बढ़ी कि मुझे आभास हुआ कि भारत में आजादी के आंदोलन में भी यही जोश-ओ-खरोश हुआ होगा। गांव-गांव से मीलों दूर सौ साल के बूढे, महिलाएं, बच्चे आंदोलन में आते। क्या जोश, आत्मबलिदान का जज्बा। एक बार भयंकर बारिश में हम ‘कदम कदम बढ़ाये जा’ गीत गाते हल्द्वानी की गलियों में मार्च कर रहे थे। मुझे जननायक सुभाष बोष की याद आयी। जिंदाबाद, भारत माता की जय, बंदेमातरम... सारे राजनैतिक दलों के नारे एकाकार हो गये थे।

फिर अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल का दल जब हल्द्वानी आया तो मैं केजरीवाल से रूबरू हुआ। उनकी प्रशासनिक कुशलता, तेज दिमाग, सहजता, सरलता, स्पष्टता ने मुझे प्रभावित किया। उनमें एक जनजानयक की छवि मुझे दिखी। मैं रामलीला मैदान में उनको सुनने अपार जनसभा में एंकरिंग कर रहा था। पूरा मंच रिटायर्ड फौजी कमांडोज ने घेरा था। मैं नाम लेकर भाषण के लिए केजरीवाल जी के साथियों को बुला रहा था। तभी मैंने कुमार विश्वास (जो अब संत हो गये हैं ) को इशारा कर कहा, आप का नाम क्या है? इस पर वह गुस्से में आ गये। जनता की ओर मुखातिब हो कर बोले, मेरा नाम! मेरा नाम ये नहीं जानते? तब अरविंद केजरीवाल ने कहा, कोई बात नहीं। जरूरी नहीं वो आपका नाम जानें।

इस आंदोलन ने भाजपा को आगे बढ़ने का मौका तो दिया ही, कांग्रेस अपने अहं, इलिट करैक्टर से जनता की नजर में गिर गयी। फिर केजरीवाल जी को जनता ने दिल्ली की सत्ता दी। केजरीवाल ने बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बेसिक जरूरतों में कुछ सुधार किया, तो जनता ने उनमें एक नये अल्टरनेटिव दल की छवि दिखी। उस समय मैंने थ्री वीलर, मजदूरों और मध्यवर्ग से अनायास साक्षात्कार लिया तो पाया उनकी नजर में केजरीवाल की जननायक की छवि है।

‘आप’ का प्रभाव भाजपा के लिए आंख की किरकिरी हो गया। वह केजरीवाल को मुकदमे जेल, एलजी के सहारे, छापे मार कर कांग्रेस की तरह नेस्तनाबूद करने के लिए आमादा हुई। इधर, केजरीवाल जी के बड़बोल बढ़ते रहे। वह हाई फाई हो गये। सत्ता छिनने का डर इतना रहा कि जेल जाने पर भी डर से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न दिया। इस्तीफा देते तो खुद तो शायद न हारते। विचारधारा के बगैर वह वैसे ही थे जैसे अन्य दल। उनकी जननेता की छवि हट गई। उन्होंने भी भाजपा, कांग्रेस की तरह धर्म का सहारा लिया। जनता ने उन्हें भ्रष्टचारी लांछन के कारण नहीं हराया, उनके अहं ने ही उन्हें हराया।

जब सत्ताधारी का अहं हाई फाई हो जाता है तो वह जननायक के बदले सत्ताधारी, राजनेता हो जाता है। यही केजरीवाल के साथ हुआ। इतने दिमाग वाले वो जल्द ही भोग के मनोवैज्ञानिक प्रेशर में आ गये। राजनीति के भावनात्मक माहौल को राजनैतिक सौदेबाजी में बदल देता है।

चुनावी महाकुम्भ में दिल्ली में ‘आप’ की हार चिंतनीय है। यह स्थिति एक दलीय व्यवस्था को जन्म देती है जो तानाशाही की गुंजाइश रखती है। इसके अतीत के प्रबुद्ध सदस्य, योगेन्द्र यादव,आशुतोष, कुमार विश्वास, शशिभूषण सब ने ‘आप’ की हार का कारण अरविंद केजरीवाल का अहंवादी, भोगवादी होना ही अपने साक्षात्कार में बतलाया। पर उनकी हार से वे और बौद्धिक लोग खुश न थे। सब ने साक्षात्कार में कहा कि केजरीवाल का अवसान लोकतंत्र के लिए उत्साहजनक नहीं है। उनका नैतिक पतन, सत्ता के लिए मोह उन्हें वही बनाता है जो और सत्ताधारी हैं।

सत्ता के प्रति केजरीवाल का भाजपा की तरह ही बन जाना, राम के बदले हनुमान जी को ले आना, ‘मोदी सरकार’ के बदले ‘केजरीवाल सरकार’ लाना, इस सब तमाशे ने ‘आप’ को ‘मैं’ बना दिया।

आज सभी ‘मुफ्त’ की बात कह कर टेंडर टाइप का खोलते हैं। तुम इतना मुफ्त तो हम इतना। यह तो एक तरह का उत्कोच है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस ओर इंगित किया। मुफ्त देने का मतलब है कि आज़ादी के बाद सभी दल मौलिक अधिकार देने में सक्षम साबित नहीं हो पाये।

जनता की याददाश्त कम होती है। एक समय में भाजपा से किसान नाराज थे, अग्निवीर की योजना से नौजवान गुस्से में थे। मगर भाजपा अपनी सोशल इंजीनियरिंग से जीती। कांग्रेस अपनी आपसी फूट, नेतृत्वहीनता से उत्तराखंड में, जहां वह एक बार वह जीतती एक बार हारती थी, क्षेत्रीय चुनावों में भी हार गयी। सारे आक्रोश के बीच भाजपा सारे देश में जीती। वर्तमान में दिल्ली चुनाव में अंतिम दस दिन में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक कर जीत हासिल की। वोटर्स में भाजपा के प्रति आक्रोश तो कहीं दुबका हुआ है पर उसके पास कोई अल्टरनेटिव भी नहीं है। बाकी धन, मद की माया तो है ही।

सारी भाजपा की जीतों में मोदी जी का औरा उतना नहीं है, जितना मजबूत विकल्प का अभाव है। पब्लिक भले ही लोकतांत्रिक मूल्यों से बहुत ज्यादा सरोकार में नहीं फिर भी वह विकल्प तो वह भी चाहती है। पर विरोध, विकल्प नहीं दे रहा।

पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों को जनता ने कितने मौके सरकार बना के मौके दिये पर वह असफल रही। जन नेतृत्व में भावनात्मक अभाव उसे फिर गेम पॉलिटिक्स में बदल देत है। केजरीवाल का जननेता से राजनैतिक नेता की यात्रा का पतन हुआ। यह उनकी नैतिक हार है।

31/10/2024

आतिशबाज धुंध

ये जो दूर धुंध सी दिखाई दे रही है
ये मेरे पहाड़ हैं।
धुंध कुछ उदास थकी थकी सी है
बिछी पड़ी है बर्फ की तरह वीराने में
हादसा हुआ है क्या !
या कोई और बात !

बादलों के साथ हुआ है कुछ!
या पथरीले पथ पर मलुवा गिरा है!
एक दरार सी बारूदों ने कर दी है
धड़धड़ाती पहाड़ी भी कुछ कहे जा रही है
शोर भयंकर या शोर के बाद की शांति !
कुछ समझ नहीं आ रहा है!
ना कुछ समझने की कोशिश की जा रही है

पता नहीं क्यों इतनी गम्भीर हैं पहाडि़यां!
उन्हें देख कर न जाने क्यों दुःख होने लगा है!
बचपन से साथ था इनका
यही पढ़े लिखे- खेले!
आतिशबाजी,इश्कबाजी की है
ओह यह धुंध!

कौन है यह आतिशबाज, इश्कबाज !
जो फैला गया है अपना राज़
प्राचीन और वर्तमान की
इस स्तब्ध करती बर्फबारी में
अदृश्य खुशी भी धुंध की तरह उदास
होती है क्या !
ये क्यों हो गये हैं धुंधले पहाड़!

29/09/2024

ठोक के

वही देंगे निर्णय जिन्हें सवाल करने, जबाब देने आते हैं।
वही रहेंगे जंगे मैदान में जिनके सीने में शबाब होते हैं

दबाव की इन रेखाओं में
कितने ही वृत्त आकार हैं

हार कर भी जीतने वालों के रंग हैं
चुनौतियां देने वालों का हर वक्त एग्जाम है (सेमेस्टर नहीं)

धूंआ नहीं, उनमें धधकती आग है
निरंतर चलना, नहीं विश्राम है

खुली सड़क में मैदान है
कहां का डर !
कहां! की तनहाई !

बस
सुबह निकले थे कि शाम हो गयी
(हो गयी तो हो गयी)

बड़े जतन से तन मिला है
इसके लिए क्या क्या न झेला है!
इसे ऐसे ही थोड़े जाने देंगे...!

रोते पैदा हुए थे
हँसा के जाएंगे
अपना दावा जीने का भरी महफिल मेें
ठोक कर लगाएंगे

जीने वालों के लिए
हर प्याला
एक शाम
छलकता जाम है।

बस प्यार ही
इसका दाम है

Photos from Prabhat Upreti's post 04/09/2024

भगवान का बाॅक्सर

आज कल दो चीजों पर फोकस है। एक तो बुढापे में चौपाया बन गया हूँ मैं। अन्न पचता नहीं, इसलिए घास, पीपल, पपीते पत्ते, तरह तरह की घास, पिसा अन्न खा रहा हूं चारपाई से उतर चार पावों से चल रहा हूं।उसे खा दिन भर जुगाली-आदर्श की, प्रवचन की कर रहा हूं।

दूसरा इस तकनिकी युग में जो लड़कियों ने फास्ट मूवमेंट,रिकवरी, क्रिएटिविटी दिखाई है,उसे देख खुशी है। अब मेरा अस्पातलों में मरीज बन कर आना जाना बना रहता है, मेरी पत्नी, बेटी अस्पताल के दुरूह पथ पर जिस तरह ले जाती है या फिर वहां सिस्टर लड़कियां जिस तरह पूरे कानफीडेंश से करती हैं, वह कमाल है। वह उसके अतरिक्त डयूटी ऑफ में हायर डिग्री के लिए पढ़ती पूरा परिवार भी सम्भालती हैं। लगता है ’सर उठा के जीना’क्या नूर चेहरे पर लाता है, हालांकी ज्यादे सर उठाने से गिरने का, अंदेशा आजादी के नकारापना, नकारात्मक परिणाम भी लाता है। फिर भी हजारा सलाम बनता है, इन जीवन से लबालब देख कर इन लड़कियों को महिलाओं को।

मेरे मित्र नवीन बिष्ट जो विदेश जाते रहते हैं, कहते हैं कि महिलाओं, बच्चों, जानवरों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित हमारा देश है।

महिलाओं में शौर्य रिजर्व मेें रहता है कि वह इस बत्तमीजी को कवर करें।एक किसान ने कहा, बाबू जी असल चावल का दाना उबलने पर उसका सीना फटता है तब उस पके की सुगंध मीलों तक फेलती है। हाल ही में एक अकेली ़छोरी ने जिस तरह तीन शोहदों की धुनाई की वह वही सीने से फटा चावल है।

गुनाहों के इस देश में बेगुनाह जो पिट रहा है उसका इलाज महिलाओं का सशक्तीकरण है। वरना सत्ता, सरकार, संबंध कोई इस लाइलाज देश को सुधार नहीं सकता। दुष्कर्म का सूचनांक बहुत बढ़ा है। कानून, पुलिस सभी मिल कर सौ मेें से सात को ही सजा दिला पाती है।

सामूहिक बलात्कार में फांसी की सजा होनी ही चाहिए। समूह मनोविज्ञान का प्रदूषित मामला है। अरब देश में दंड विधान नकारात्मक है पर उस विधान ने महिलाओं की सुरक्षा को एक तय माहौल तो दिया है।

हमारे वहां कानून सख्त तो हुए हैं पर लचर कानून, पुलिस का इलिट होना, बाधक है।

हालिया उत्तराखंड में ऋषिकेष में आवला चैनल पत्रकार डिमरी जी की खुल्लम खुला घर बुला कर पिटाई बतलाती है कि देव भूमि में देवता हैं तो राक्षस तो होंगे हीं।

पर राक्षस भोले हांकू, मोसम बलवंता का डायलाग मार तत्काल वारदात अंजाम देकर फंस जाते हैं। इसी लिए असल दोषी सुनील गंजा ने घर बुला कर पिटाई की। मोसम देवता घाघ नंेता तो सामने कहेगा, हैं हैं मैं आपका सेवक हूं पर अप्रत्यक्ष आपको मरवा कर अस्पताल में आपको देख कर कहेगा, जिसने भी किया है उसे छोड़ा नहीं जाएगा।

भईया! हमें ऐसी देवभूमि न चाहिए। ऋषिकेश जैसी पीस सिटी मेें टिंचरी का यह हंगाम पौड़ी की मुन्ना दाई की परम्परा का नया संस्करण है।
न जनता को टिंचरी पीने पिये जीना नहीं, न पुलिस प्रंशासन को यह समस्या है। सबको नोट चाहिए भाई!

'देवभूमि' कह कर इतना मक्खन, ग्लोरोफाइड इसे न करो। हमें मानवभूमी का निवासी ही बने रहने दो।

बच सको तो बच लो प्यारो! कोई अस्पताल इस देंश में इस मानसिक सैक्स, एसिड एक्ट जैसा दुष्कर्म लूट बीमारी के लिए उपलब्ध नहीं।

जब सभी धर्मोें ने मानवता की बैंड बजा दी है, आस्तिक कुछ ज्यादा ही आस्तिक हो गये हैं, नास्तिक पूरे तनख्या हो गये हैं, बुद्ध का मध्यममार्ग तेल लेने गया है तब भगवान ने अपनी रक्षा का भार मुझे सोंपा है। देखें कितना बाॅक्सर बन उनकी रक्षा कर सकता हूँ। सुनील गंजा की तरह गंजा बीमारी से हो कर डेंजर मैन तो दिख रहा हूं पर मुसीबत तो यही है कि भगवान भी आदमी को अपनी जरूरत केनुसार चाहिए।

29/07/2024

अशोक पांडे

वह जो भी हैं उसकी सानी नहीं। क्या लिखते हैं, जीते हैं! एक कलाकार, प्रतिभा छलकती हुई, गहन अध्ययन, ज्ञान बिंदासों के बिंदास! मैं उसे जज़्ब करने का ताव नहीं रखता पर उनके अंदर जो आदमी के लिए प्यार है , उसे याद कर लेना मेरे लिए एक इबादत है ।

उनसे पहली मुलाकात उनकी पेंटिंग, कविता के माध्यम से ही हुई ही थी। उनकी कविताओं को मैने अपनी किताब में सहेजा था ,उनसे साक्षातकार, हल्द्वानी में रिटायर हो कर आने पर न जाने कब हुआ! पर इस मुलाकात ने उन्होंने मुझे सहज ही अपना बना लिया था। उनके अंदर गहरा समंदर जो है ।

कल वह आये थे। साथ में विजय भट्ट थे, एक बेहतरीन इंसान, मेरे खैरख्वाह।
वह उन्हीं के साथ अक्सर मेरे पास आते हैं ।
जब भी आते हैं उपहार लाते हैं। उन में वेराइटी होती है।

इस बार मेरे लिए वह अपने लेखन की सारी किताब ले आये। जब मैंने अपनी तबियत खराब होने की करी तो उन्होंने जो ’ओहो’ कहा वह ’ओहो’ उनकी आंख में तैर रहा था।

जब भी वह आते हैं तो वह हमारे दिल दिमाग पर छा जाते हैं। किस्से, उनका हास्य इतना होता है, हम हंसते हंसते सोफे में लुढ़क जाते हैं। क्या किस्सागोई ! क्या उल्लास! आदमी के चरित्र को पकड़ने की ताकत। उनके लेखन, ज्ञान, प्रतिभा, कला की समझ उन्हें एक खासमखासआदमी बनाती है।

पर मुझे उससे उपर,उनके अंदर जो प्यार का स्पर्श है, वह दिव्य लगता है। अपने पाप, बीमारी, उनकी उपस्थिति में तर जाते हैं। उनका प्यार आंखों को नम कर देता है।

जमाने के दस्तूर केनुसार जब करीब के लोगों के मोबाइल में मेरा नंबर धूधला पड़ गया है, तब वह चंदअजीजों में हैं की याद रखते हैं, एक सख्श कही आधा अधूरा अभी भी पड़ा है ।

अशोक में प्यार की अदायगी लबालब है। बहुत फिक्रमंद ख्याल रखते हैं,
बहुत कम लोगों में वो हैं जो मिलते हैं, मिलते हैं तो ऐसे कि संबंध अमृत पान करने लगते हैं।

क्या कहूं ! एक नूर एक सम्मोहित आकर्षण से लबालब अशोक पांडे को!
मैं कायनात के इस दिये गिफ्ट के लिए कितनी बार सर झुकाऊं!

प्यार का एहसास, उसका एतबार, सारी बकवास प्रतियोगिताओं, प्रतिभाओं से बहुत ऊपर जो है।

21/06/2024

निढाल हो गया हूं इतना
कि पांव जमीं पर नहीं पड़ते
और हाथ कुछ भी न पकड़ पाने को बेजार
लुंज- पुंज
आंखें बेहोश
पर दिल वहीं है ऐ दोस्त! मेरे
जहां धड़कनों की खुराक है
और बेवजह का प्यार है

19/05/2024

बूढ़ा हो गया है चांद
मेरी तरह
चलता है उदास उदास
अकेला अकेला
इत्ते बड़े आसमान में
उदासी उसका ख्वाब है
अधलेटा सा दिखता है
ड्रिप लेता सा
किसी सरकारी अस्पताल में
कब तक

अकेलापन बोते बोते
मारा मारा फिरेगा
कोई नहीं
मुलाकात करता उससे
न काॅल लगाता
हां कभी कभी महिलाएं
आशीर्वाद लेने के लिए
मनुहार करती दिखती हैं

उसका अकेलापन
उसके कथित दाग की तरह
फसल बन गया है
उसके लुनाई प्रेम का भ्रम
और भी बेरोजगार हो गया है
फिर भी
नई खोज कहती है
वह मरे हाथी की तरह है
मरा भी तो सवा लाख का
मरे की भी कीमत लगा देते हैं
आज कल लोग
फिर भी अब भी उसमें चुम्बक है
रूहानी कसक है
पुराने किये प्यार के जानिब
जो उसने भूरे आसमान से किया था
इसीलिए वह खेंच लेता है समुद्र को भी
खेलता रहता है उसके साथ
घड़ी घड़ी...

बूढ़ा हो गया है चांद
मेरी तरह
फिर भी...

01/05/2024

ओह! मैंने भी
गंगा नहा लिया
याद कर लिया आज
उन मजदूरों को
जिनकी बिछाई पटरियों पर
वायसराय का खास डब्बा लिए
और आज
सुखद एसी स्लीपर पर
वैभवों की अट्टालिकाओं के
स्टेशनों से गुजरते हुए
हम वैभवशालियों को लोरी सुनाती
ट्रेन चलती रही हैं
धड़ धड़ धड़
सदियों से
देश विदेश परदेश
विदेशिया गाते हुए
अपने को समझाते हुए
गाती रहीं जिनकी पत्नियां
बैरनिया रेल को

Photos from Prabhat Upreti's post 28/04/2024

सफेद बाल और मेहंदी

कवि बाबा के केशवदास के सफेद बाल क्या हुए कि मृगनयनियों उन्हें बाबा-बाबा कहने लगी तो फस्ट्रेड हो गये। आज भी सफेद बालों की मैलिनन की यह सफेद करवट बहुतों को सालती है। लोग, डाई लगा के अपने को, दूसरे को धोखा देते हैं तो बाजार कहता है, नो टेंशन मैं हूं न! पर उनकी वारंटी अच्छे दिन नहीं ला पाती तो उनका शिकार इस धोखाधड़ी बेचारा सफेदी का मारा, न्यायपालिका की शरण भी नहीं जा पाता।

आदमी की बहुतों सी चाहतों में यह चाहत जबर है कि वह अंदर से कुछ भी हो बाहर से जवान दिखे, घोषणा करता रहे, अभी तो मैं जवान हूं। तस्सली भी बड़ी चीज है। सूफी मुल्ला नसरूद्दीन ने एक बूढ़ी को अपने बालों में मेंहदी लगाते देखा तो बोले, ऐ! बुढ़िया अपने बाल तो रंग लेगी पर कमर दर्द का क्या करेगी! एक फिल्म में महान कलाकार कादर खान अपनी अधेड़ बहन को ताना मारते कहते हैं, झगड़ालू न होती तो हाथों में मेहंदी लगाती, बालों में नहीं। पर ययाति ने सीधे ही अपने बुढ़ापे के लिए अपने बेटे पुरू से उसकी जवानी ही मांग कर डील ही कर ली। आज की तकनीक में यह सम्भव भी हो तो आज बेटा जवानी छोड़ अपना एक काला बाल भी देने से रहा।

सफेद बाल कभी महाकाल का पहले का पहली चिट्ठी होती थी कि उपर के लिए तैयार रहो पर आज तो जवानी में ही यह काली जुल्फों से यह जब झांकते हैं तो इतना खौफ हो जाती कि उसे निकालने के लिए बंदा कैंची लेकर पिल पड़ता है। पर बुढ़ापा तो एक बार आया तो लौट के नहीं जाता।

कभी नजले से मारे किसी नौजवान के पूरे बाल सफेद हो जाते हैं तो वह लोगों को समझाते समझाते थक जाता है कि भाई मैं जवान हूं, मेरे बाल दगाबाज है। मेरा दमकता चेहरा तो देखो।

सफेद बालों को काला करने की मुहिम में मेहंदी डाई अग्रणी है। मुझे भी राय दी गयी कि बालों में मेहंदी लगा लो। मैंने सोचा जवानी मेें कोई मेरी काली उड़ती महकती आवार जुल्फों पर नहीं मरा तो आज बाल काले भी कर लूं तो किसने मरना!

फिर सफेद बालों की एक गरिमा है। इस कारण इतने ढेर सारे प्रणाम, सफर में स्थान ,मिल जाते हैं। गर्व से कहने को होता है, ये बाल धूप में सफेद नहीं, अनुभवों से हुए हैं। हमारे पास बेहतरीन यादें, अनुभव हैं।

किशोरावस्था में जब मेंहदी रचती तो होता, हम भी रचते तो क्या पता कोई रंग भूला-भटका आ ही जाए पर अपने साथी द्वारा लड़की होने की तोहमत लगने की डर से नहीं लगाते थे।

मेहंदी जैसी और भी वनस्पतियों का अर्क सारे विश्व में श्रंगार के लिए, आकर्षक दिखने के लिए प्रयोग होता है। पहाड़ में इस झाड़ीनुमा पौंधे को मजेठी कहते हैं। इसको जितना पीसोगे, उतना रंग गहरा आऐगा। नींबू का रस टपका दो तो और चटक हो जाता है। गांवों में आठों में शिवजी पार्वती विवाह के पर्व में महिलाएं इसे अपने हाथ-पांव में रचती हैं।

आज मेहंदी ने वह मुकाम बना लिया है कि शादियों में एक पूरा दिन पूरे इसके नाम हैं इस पर लाखों वारे हो जाते हैं, मेंहदी लगाने वाले विशेषज्ञ दूर दूर से आते हैं।

पांच हजार साल पुराना इसका इतिहास है। मिस्त्र बेबीलोनिया संस्कृति में अफ्रीका, भारत, ईरान, पाकिस्तान और पुरानी सभ्यताओं की खुदाई में भी यह रंग में है। इसका रंग इसमें शामिल रसायन लासनिया से है जो बहुत शीतल एहसास देने वाला होता है। संस्कृत में इसे मेंढिका कहा जाता है।

हम किशोरावस्था में मुसलमान भाईयों के रंगे बालों को हसरत से देखते। मैं महाविद्यालय में प्रवक्ता था तब मौज में एक दिन अपने रसायन विभाग के कलीग के कहने पर हाइड्रोजन परऑक्साइड बालों में लगाया कि वह भूरे हो गये और सारे काॅलेज में तहलका तो मचा ही, मेरे शिष्यों ने भी राज पूछ कर अपने बाल भूरे कर लिए थे।

इसके दाग भी शुभ इतने प्यारे हैं कि कोई डिटरजेंट से न धुले। आज भी मेहंदी रसायनिक भी हो गयी है पर असल मेहंदी की बात ही बिंदास है।

शादी में यह शुभ सोलह श्रंगार का एक अंग है। पहले पूरी रात शादी में महिलाएं मेहंदी लगा कर सोती थीं। रंग बहुत बाद में आता था। प्यार में रंग बहुत बाद में ही आते हैं। पर अब जल्द ही रंग आ जाता है, जल्द ही उतर जाता है।

यह औषधि मानसिक ठंडक देती है। यह भी मान्यता है कि जिस वधू की मेहंदी जितनी गहरी लगेगी उसके प्यार और गहराएगा। सास बहू में प्रेम को दर्शाते शगुन के रूप में वर को इसका टीका दिया जाता है।

आज मिलावटी खाने, प्रदूषण से युवक युवतियों के बाल जल्दी ही सफेद होने लग गये हैं। लगभग हर घर में आप यह दृश्य यदा कदा पाएंगे कि छोटी कढ़ाई में रात गये यह भिगोई है। पति सिर में शहीदी अंदाज में पॉलिथीन का साफा पहने है, पत्नी उसे उसके बालों में पेस्ट लगा रही है। क्या पति भी ऐसे पत्नी के लिए करता है, यह तो महिला मोर्चा वाले ही जानें।

सफेद बालों के इस जुल्म को आज नील से भी छुपाया जाता है। वही बदनाम नील जिसकी खेती के खिलाफ महात्मा गंाधी ने अपनी पहली आजादी की जंग की शुरूवात की थी। पर साहब! इस बिंदास शीतलकारी रंगवान के सामने नील क्या बेचता है!

पर इस सफेद शांति के प्रतीक, गरिमामय इस सफेद रंग के खिलाफ मुहिम क्यों! शांति सकून रास आता नहीं आदम को!

इस बार अपने निखालिस सफेद गरिमामय बालों को लिए मैं अपने भाई के बेटे हनी, दिव्यांशु द ग्रेट... मेरे प्यारे भतीजे की शादी में यह पोस्ट समर्पित करता हूं। आशीर्वाद हनी को देता हूं कि वह हमेशा हर्षित रहे, हर्षित करे, उसके बाल हमेशा काले रहें, उसका विवाहित जीवन मेहंदी की तरह चटक रंग, शुभ, महक से भरा रहे।

मुगलों की बेगमों ने इसे मेंहदी को प्रोत्साहन दिया था। जब मां दुर्गा द्वारा राक्षस नाश के बाद उनकी उग्रता बनी रही तो शिव जी उनके रक्तरंजित हाथ मेें मेहंदी लगा उन्हें शांत किया। तभी कहते हैं कि इसका रंग हाथों की रेखाएं भी बदल देता है। जिस बहू का मेहंदी का रंग जितना चटक होगा वह उतना अपने पति, सास को प्यार करने वाली होगी। इसका शगुन भी वर को दिया जाता है। पर आजकल रसायनिक मेहंदी वैसे ही रंग ला देते है, असली रंग तो शादी के बाद ही आता है।

इसका एक प्यारा नाम हिना भी है जो जितना पिसती है, उतनी सुर्खरू हो कहती है।

अबे! संघर्ष में पिस भी गया है तो इतना बुक्का फाड़ के काहे रो रहा है! जितना पिसेगा उतना सुर्खरू हो के आएगा। हस्ती मिट भी गयी तो फना हो जाएगा! सिम्पल बात।
रंग लाती है हिना पत्थर में घिसने के बाद
इंसा रूह होता है ठोकर खाने के बाद।

25/04/2024

फर्ज के कर्ज में जिंदगी

मतदान कर के आया तो एक ज्ञानी बुजुर्ग महोदय से मैंने पूछ लिया किस का स्कोर कितना होगा! वह बोले, यह तो नहीं बतला सकता पर आज मुझ पर, आप पर, हर एक पर 1.46 लाख रूपया कर्ज है।

हर जन्मा बच्चा इस बेरहम समाज का कर्जदार हो कर आता है। आज हम पर 20.5 लाख करोड़ का कर्ज हो गया है। खरबपति, खगपति बढ़ते जा रहे हैं। कंगाली बढ़ रही है और माॅल है कि कह रहे हैं, लूट लो। कर्ज तो देश के विकास के लिए है पर खरबपति आगे बढ़ रहे हैं।

यानी कि पर्दा हमारे नाम से उट्ठा ईद मनायी लोगों ने!
आमदनी अठन्नी खर्चा रूपया के हिसाब में जब रोजगार नहीं है, मतदाता को रिझाने में सब मुफ्त होईगा तो यही होएगा।

मानव संसाधन का प्रयोग नहीं है, 23 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे हो गये हैं।पंचतत्च आदमी के भोगी प्रवृत्ति के कारण असंतुलन में हैं।

याद आयी एक किताब लैरी इलियट और डाॅन एटकिंसन कीे द गाॅड्स दैट फेल्ड। कारण एक खास के लिए करोड़ों को समर्पित किये जाने का जलुवा।
आर्थिक असंतुलन इस विश्व का कृतिम नेचर बन गया है।
विश्व बाजार सूदखोर है। ब्रिटेन ने तो बैंक, सूदखोरी अर्थशास्त्र के सहारे दुनिया में राज किया।
यह अर्थ, अनर्थ है।

हम भारतीय तो अपनी संस्कृति के द्वारा ही कर्जदार कर दिये जाते हैं। मातृऋण, पितृ ऋण, देव ऋण... जिंदगी न हुई सूदखोरी हो गयी। सारी जिंदगी ऋण उतारने में चली जाती है, जियेंगे कब!

माता-पिता के लिए बच्चे कर्जदार क्यों! आज के बाजार में तो बच्चे हो लिए पैकेजेज। कैसा अर्थशास्त्र! एहसान तले दाब दो जन्म जन्मान्तर तक, उसका सूद खाते रहो।

माता-पिता बच्चे का संबंध हो या प्यार कभी कर्ज नहीं होता, सहज जीने का एहसास है। ऋण तो भाषाई तिलिस्म है।

बच्चों को पालने में माता-पिता का आनंद है तो मां-बाप को पालने में बच्चों को भी आनंद ही आना चाहिए। दोस्ती है असल संबंध। चाहे बच्चों माता-पिता के बीच हो, पति-पत्नी के बीच।

सारे संबंध कृत्रिम । और अब कृत्रिम बुद्धि।

प्रेमचंद तो गोदान लिख कर सूदखोरी जिंदगी का सबब दिखा गये। हम डूबे हैं, देश विदेश, गांव-गली सब कर्ज में।

मैंने तो अपने माता-पिता से संबंध मुक्त रखे। ऋण विण का फंडा नहीं। नौकरी के बाद घर में, मनी ऑर्डर भेजता तो आनंद आता था और अब बुढ़ापे में मैंने ऋण जैसा अवसाद बच्चों के साथ नहीं पाला। वह साथ रहना चाहें तो बढ़िया, न रहना चाहें तो भी बढ़िया।

रक्त संबंध, रक्त का पानी से भी पतला होने वाले मुहावरे में मैं नहीं पालता। नो सूदखोरी। बच्चों के नाम यही वसीयत मेरी, जो भी जीना है उसमें अपनी सबकी खुशी देखो। जमीन-जायदाद जो भी हमारी, अपने अंदाज से उसे जियो।

बुढ़ापे में सुबह हवाओं से, दिन में अपनी सात महिना ओल्गा पोती से गुफ्तगू करता हूं, दिन अकेलेपन से बतियाता अंग प्रत्यंग पीड़ा से जूझता, रात दर्द जागरण की लोरी गाता, मैं किसी का ऋणी नहीं हूं, न कोई मेरा।
जन्मजात लदा यह कर्ज वाहियात लगता है।

फरेब से घिरे इस समाज ने होश में आते मुझे भी गिरफ्त में लेना चाहा पर मैं फिसल गया उसके जालिम शिकंजे से। क्यों लूं मैं, फर्ज कर्ज!

’देश के लिए मरो, उसके लिए जियो।’ बाजार, चिंतन है, सूदखोरी का। ये युद्ध फसाद, धर्म! लम्पटों ने मिलावटी खाना खिलाते, नकली दवा देते, बर्बाद कर दिया बुढ़ापे में।

क्या चिंतन है! बाजारू। ’पिछली शादी में उन्होंने एक हजार हमारी लड़की को शादी में दिये थे, तीन साल बाद गर महगाई बढ़ भी गयी तो ज्यादे से ज्यादे हम एक हजार तीन सौ ही देंगे, हां फिर!’

हमारे बच्चों के सूदखोरहीन संबंध है। अपने से मुक्ति ही मुक्ति है। बेटी बाजार से नहीं, अपने हाथ से बनी नारियल की मिठाई लाती है, कि तबियत पापा की खराब न हो। बेटा ले जाता है रिलायंस, कहता सा, जितना लूटोगे, उतना होगा माई प्लेजर पापा! दोनों माई प्लेजर हैं।

दंश तो देते हैं यह रजिस्टर्ड कर्ज।

18/04/2024

वो हमसफर था मगर....

नेहरू ने लोकतंत्र को मुकम्मल किया तो उस पर बाहुबलियों, सामंतों की रेड पड़ी। उन्होंने समाजिक व्यवस्था, अपराधीकरण, अपराधीकरण का राजनीतिकरण किया। लोकतंत्र सकते में था तब टी एन शेषन ने उनके कस को ढीला किया। सभी राजनैतिक दलों ने वैचारिक ईमानदारी को नहीं उसका बस उपयोग किया। कांग्रेस ने अपीजमेंट का गेम खेला तो कम्युनिस्टों ने टोलियां बना कर माइनॉरिटीज का पक्ष ऐसे लिया जैैसे मेजोरिटी में होना पाप है।

लोहिया के बाद समाजवादी बाहुबली बने। बसपा जातीय निंदा के बाद ब्राह्मणों वाला ट्रम्प बना के चला। पर यूपी में जनता ने किसी दल को पांच साल तक टिकने न दिया। योगी ने बुल्डोजर बिम्ब से दक्षिण भारतीय हीरोइजम का एहसास दिलाया।

नयी सम्भावना ’आप’ ने भ्रष्टाचार की निंदा कर अन्ना हजारे आंदोलन से सत्ता का मजा लिया। अपना आपा खोया तो कांग्रेस के कुशासन को पटकनी दे भाजपा को मजबूत बनाया। अन्ना हजारे आंदोलन की कशिश में मैंने महसूस किया कि अभावग्रस्त जनता लोकतंत्र की प्यासी है पर ठगवा इस मेहनत को भी उड़ा ले गया। आडवाणी, बाजपेयी के बाद अपने चातुर्य, दबंग व्यक्तित्व, मेहनत से मोदी जी ने कांग्रेस की कमजोरी, फूट, अपीजमेंट पॉलिसी को अपनी मजबूती बनाया, सनातन का कार्ड चलाया, भाजपा को आज की भक्तिमय स्थिति में लाया। जनता की नब्ज को समझने वाले इस नवोदय चतुर ने जनता को सम्मोहित किया। आजाद मीडिया ने लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही के खटके की बात, सनातन धर्म, कब्जाए गये मीडिया, चमकीले रैपर में बम और ईडी के माध्यम से पीएमएलए एक्ट, चुनाव आयोग को अपने कब्जे में लेने की कोशिश करते बेच-खरीद आदि की बात की।

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने लोकतंत्र के लिए निर्वाचन आयोग की आजादी की बात की। स्वतंत्र निर्वाचन आयोग लोकतंत्र का पहरु संविधान से पहले है। पर भारत में लोकतंत्र अभी इतना ठस्स नहीं है। उत्सव प्रिय भारतीयों ने इसे भी उत्सव बनाया है।

चुनाव में आज की जैसी खामोशी मैंने नहीं देखी। आक्रोश है तो पर वह छुपा लिया गया है। चुनाव अब मनोवैज्ञानिक भाषा में कहें, घुन्ना हो गया है।
दिल्ली के एक युवा संवाद में युवा आक्रोश इन बेरोजगारी महंगाई पर आया। नियुक्तियों में संघी नियुक्ति, भगवाकरण की बात हुई। यह पॉइंट पहले भी चुनाव में होते थे पर इस बार अग्निवीर योजना ने भी युवकों को बहुत नाराज किया। राजस्थान के एक युवक ने कहा कि सुबह तीन बजे उठकर आपको यूथ सड़कों पर दौड़ता दिखता है पर इतनी भागदौड़ के बाद भी बनता असहज अग्निवीर है। हरियाणा के एक युवक कहते हैं, ना सिस्टम, ना नौकरी, तो विकसित भारत का सपना कहां? दिल्ली की ही स्टूडेंट कहती हैं, कोटा ही क्या आईआईटी में भी सुसाइड हो रहे हैं।

भाजपा का काउंटर कांग्रेस अभी नहीं कर पायी जो लोकतंत्र के लिए एकदलीय बहुलता का खतरा है।
आज 400 का पार का नारा अतिशयोक्ति लगता है। यूपी, बिहार, दक्षिण में चुनौती है। फिर भी मोदी का जादू सर पर नहीं तो, उंगली पर तो है।

मैं जब वोट देने जाता हूं तो घर से पोलिंग बूथ तक कन्फ्यूजन में रहता हूं। मुझे खुद पता नहीं रहता कि किस बटन को दबा दूं। सब एक से ही व्यापारी लगते हैं। एक वोटर कहते हैं, मैं तो अपने गनेल को ही दूंगा। पूरे पांच साल घर से ऑफिस तक ही आ पाया। पर ईमानदार है, उसने अपने को मिले पैसे भी खर्च नहीें किये। लोकतंत्र में, वोट देन धर्म है। वरना यह अधिकार भी धारमधार होगा। यह त्वदीयं वस्तु त्वदीयं सर्मपयामी है।

चुनाव अधिकारी के रूप में मैंने देखा एक बार वृद्धा अंदर वोट देने गयी तो सब उम्मीदवारों के सर तू भी ले तू भी ले, मार कर कृपा करा गयी।

मैंने अपने बौद्धिक साथियों से पूछा, अबके कौन! उन्होंने कहा, मोदी जी में राजनीति का विजन है। ईमानदार नीतीश को खेंच लिया, पब्लिक को बतलाया, भाजपा चुनाव नहीं लड़ रही, मैं लड़ रहा हूं, राम जी लड़ रहे हैं। राम के साथ मोदी जी की प्राणप्रतिष्ठा हुई है। अरूण गोविल को बुला लिया है तो एक्टिंग के लिए कंगना कोे। बाकी राम जाने।

लोकतंत्र में जीतना भी एक अय्यारी का हुनर है। चतुर उम्मीदवार कोई वादी (जातिवादी,धर्मवादी) नहीं होते। वह इसका यूज करते हैं। वह खिलाड़ी होते हैं।खिलंदड़ापन उनकी नस नस में होता है। समाज की दरार से अपने को अंकुरित करता है।

एक बार एक नेता जी ने चुनाव में मेरे हाथ जोड़ कर कहा, गुरूजी आशीर्वाद दें। मैंने अपने को बहुत होशियार समझ कहा, जी! मैं तो आपको ही देता। पर क्या करूं मैं अपशकुनी हूं जिसे भी वोट देता हूं, वह हार जाता है। नेता जी मुस्कुराकर बोले, गुरूजी आपकी हार भी हमें स्वीकार। बस आशीर्वाद बना रहे। वह चल दिये। कार्यकर्ताओं के हंसते चेहरों में था, गुरूजी राजनीति शास्त्र पढ़ाइये, राजनीति हमारे नेता जी से पढ़िये।

भारत का यह महाकुम्भ, महान जनता इस तंत्र की सम्भावना को खत्म नहीं होेने देगी। इस देश का लोकतंत्र आबिदा परवीन की ग़ज़ल सा मुझे लगता है...
वह हमसफर था मगर उससे हमनवाई न थी
धूप छांव का आलम था जुदाई न थी।

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