05/08/2026
भारतीय ऋषि परम्परा में महर्षि श्रृंगी का नाम नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, पवित्रता और वेद-ज्ञान की पराकाष्ठा के रूप में लिया जाता है, इन्हीं के वंशज सिखवाल / शृंगवाल / सुखवाल, श्रृंगी ब्राह्मण कहलाते हैं, यह समाज मुख्यतः राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार-बंगाल क्षेत्र में बसा हुआ है...!
1. महर्षि श्रृंगी का जन्म पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि श्रृंगी, महर्षि विभाण्डक और शापित देवकन्या मृगी / उर्वशी के पुत्र थे...!
एक कथा यह भी है कि उनके सिर पर सींग जैसा उभार था, इसलिए उनका नाम ऋष्यशृंग पड़ा, जिसका अर्थ है "हिरण के सींग वाला" कुछ विद्वानों का मत है कि वे ज्ञान में शिखर / श्रृंगवत थे, इसलिए श्रृंगी कहलाए...!
इनका जन्म त्रेता युग में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में माना जाता है...!
2. अंगदेश आगमन और विवाह: एक समय अंगदेश (वर्तमान बिहार के कोसी तट) में भयंकर अकाल पड़ा, नारद जी के परामर्श पर राजा रोमपाद ने ऋष्यशृंग को वर्षा यज्ञ के लिए बुलवाया, उनके अंगदेश में प्रवेश करते ही मूसलाधार वर्षा हुई और फिर विधिवत वृष्टि यज्ञ से अकाल समाप्त हुआ...!
प्रसन्न होकर राजा रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह महर्षि श्रृंगी से कर दिया, शाँता वास्तव में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या की पुत्री थीं, जिन्हें निःसंतान मित्र रोमपाद को दत्तक रूप में दिया गया था...!
3. पुत्रेष्टि यज्ञ और श्रीराम जन्म में भूमिका: जब राजा दशरथ पुत्रहीनता से दु:खी थे, तब गुरु वशिष्ठ के कहने पर महर्षि श्रृंगी को अयोध्या बुलाया गया, उन्होंने अथर्ववेद के मंत्रों से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया...!
यज्ञ के अग्निकुंड से दिव्य खीर प्रकट हुई, जिसे दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को दिया और उसी से राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न का जन्म हुआ, इस प्रकार श्रृंगी ऋषि रिश्ते में भगवान राम के जीजा और गुरु दोनों हुए...!
4. सिखवाल ब्राह्मणों की उत्पत्ति: यज्ञ के बाद महर्षि श्रृंगी अंगदेश लौट आए, माता शाँता के गर्भ से उनके पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम शाँत-सारंग/शाँत-सारंग्य रखा गया...!
ऋषि श्रृंगी ने स्वयं पुत्र को वेदाध्ययन कराया, जिससे वे सारंग्य ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुए, उन्हीं से श्रृंग वंश अर्थात सिखवाल जाति का आविर्भाव हुआ...!
सारंग्य ऋषि के सात पुत्र हुए: ज्ञानेश्वर, वाराधीश/धाराशीश, भीमेश्वर, गोविंद, दुग्धेश्वर, अनिलेश्वर/अनिहेश्वर और जयेश्वर...!
इन सातों के 24 पुत्र हुए और इन 24 ऋषियों से सिखवाल समाज के 54-57 गोत्र प्रादुर्भूत हुए हैं...!
पिता विभाण्डक के आदेशानुसार: "एक पुत्र होने के पश्चात वन में लौट आना" महर्षि श्रृंगी अंत में वानप्रस्थ लेकर गंगा तट पर श्रृंगरामपुर में तप करने लगे, जहाँ आज भी उनका आश्रम और प्रतिवर्ष मेला लगता है...!
5. सिखवाल ब्राह्मण समाज की विशेषताएं: कुल: सारस्वत ब्राह्मणों की शाखा में गिने जाते हैं, एक प्राचीन उल्लेख में सिखवाल ब्राह्मणों के 4 गोत्र और 49 जातियां बताई गई हैं...!
संस्कृति: वेदपाठ, पंचमहायज्ञ, संध्या-अग्निहोत्र को आज भी गृहस्थ में रहते हुए भी निभाने की परम्परा इनमें है...!
स्वभाव: अपने मूल स्थान से रोजगार के लिए बाहर जाने पर भी अपनी परम्परा और संस्कारों को नहीं छोड़ने वाले समाज के रूप में इनकी पहचान है...!
निष्कर्ष:
महर्षि श्रृंगी केवल एक पौराणिक ऋषि नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन हैं, वन की पवित्रता में पले, राजमहल के भोग में भी सात्विक रहे और फिर आत्मचिंतन से पुनः तप की ओर लौट गए, उनके वंशज सिखवाल ब्राह्मण आज भी उसी ज्ञान, त्याग और पवित्रता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं...!
साभार: सोशल मीडिया
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सुरेश कुमार व्यास "जानम"
सिखवाल समाचार®
सत्य का "दर्पण" - समाज को "अर्पण"