Narendra Upadhyay

Narendra Upadhyay

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।।कर्म ही पूजा है।।
"सत्यमेव जयते"
Love U all
उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

23/05/2026
12/05/2026

#परेड
मलसीसर में 16 वर्षीय रजत के साथ मार पीट करने वाले आरोपियों का पुलिस ने किया कुछ ऐसा हाल...
भविष्य में कभी कोई एसे कार्य नहीं करें....
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07/05/2026

मेरे जन्मदिवस पर बधाई एवं शुभकामनाएं देने के लिए
आप सभी को हृदयतल से 'बहुत बहुत "धन्यवाद"
आप सभी पर ईश्वर का आशीर्वाद बना रहे🙏

06/05/2026

#जन्मदिन पर आप सब की #शुभकामनाओं का #अभिलाषी हूँ।। आप सभी के इस #प्रेम और #स्नेह से मुझे अपार #खुशी और #बल मिलता है।


#उपाध्याय_फार्म_हाउस #जामडोली #जयपुर।

्री_राम

15/02/2026

महाशिवरात्रि का महापर्व है आज।
शिव मंदिरों के बाहर लंबी कतारें बताती हैं कि शिव करोड़ों लोगों की अटूट आस्था का केंद्र हैं और मेरे लिए शिव आस्था और प्रेरणा, दोनों हैं!

एक entrepreneur और spirituality seeker के तौर पर मैं महादेव से जो सीख, समझ पाया हूँ, वह साझा करता हूँ—

1. महादेव का Minimalism: आज दुनिया जहाँ “more” की ओर दौड़ रही है, शिव सिखाते हैं कि कम में संतुष्टि और बड़े लक्ष्य के लिए जीवन समर्पण ही Spiritual Calmness देता है।

2. निडरता में “Leader-taa” है: शिव सिखाते हैं कि Lead वही कर सकता है, जिसमें कठिनाइयों का विष पीने का साहस हो।

3. Gender Equality: महाशिवरात्रि सिर्फ़ माँ पार्वती और शिव शंभू के विवाह का उत्सव नहीं। यह उत्सव नर–नारी की बराबरी का है, हर कदम पर साथ निभाने, साथ चलने का है।

4. Inclusivity: शिव नर और नारी की समानता के प्रतीक ही नहीं बल्कि पशु, देव, गण, भूत, पहाड़, जंगल, हरियाली, सबके बीच रहकर, सबको साथ ले चलने वाले महायोगी हैं।

मुझे इस बात में कोई हैरत नहीं होती जब पता चलता है कि देशभर के ज्योतिर्लिंगों में दर्शनार्थियों की भीड़ बढ़ती जा रही है।

इस विशेष दिन पर भोले बाबा से प्रार्थना है कि, हमारे युवाओं को रोज़गार का बल मिले, महिला शक्ति को आत्मनिर्भरता की ऊर्जा मिले, और देश सुख, शांति और समृद्धि के कैलाश शिखर को छूता रहे।

ॐ नमः शिवाय।
C/p

19/01/2026

बचपन की उन यादों की खुशबू ही ऐसी है कि एक सिरा पकड़ो तो पूरी किताब खुल जाती है। चलिए, उसी दौर की एक और कहानी की गलियों में चलते हैं:
​"वो इतवार, इमली के पेड़ और फटी हुई निकर"
​आज की तरह तब 'वीकेंड' (Weekend) का चलन नहीं था, हमारे लिए तो बस 'इतवार' था। शनिवार की शाम से ही मन में एक अलग उमंग होती थी क्योंकि अगले दिन सुबह 'रंगोली' और फिर 'शक्तिमान' या 'रामायण' आने वाला होता था।
​एंटीना और वह सामूहिक श्रम: जैसे ही टीवी पर झिलमिलाहट आती, घर का एक सदस्य छत पर जाकर एंटीना घुमाता और नीचे से हम चिल्लाते— "आया... आया... गया! थोड़ा और बाएँ घुमाओ!" वो एंटीना सेट करना किसी वैज्ञानिक प्रोजेक्ट से कम नहीं था।
​दोपहर की वो चोरी-छिपे वाली मस्ती: दोपहर को जब घर के बड़े 'सोए' होने का नाटक करते थे, हम दबे पाँव घर से बाहर निकल जाते। दोपहर की उस तपती धूप में नंगे पैर दौड़ना और किसी के बगीचे से कच्ची अमिया (आम) या इमली चुराना हमारा सबसे बड़ा साहसिक अभियान था। अगर माली देख लेता, तो जो दौड़ लगती थी, वो आज के 'मैराथन' से कहीं तेज़ होती थी।
​कागज की कश्ती और मिट्टी के घर: बारिश के दिनों में नाली के बहते पानी में कागज की नाव चलाना और उसे दूर तक जाते देखना ऐसा था जैसे हमने अपना कोई जहाज समंदर में उतारा हो। स्कूल की सफेद कमीज पर कीचड़ के दाग इस बात का सबूत होते थे कि आज का दिन 'सफल' रहा, भले ही घर जाकर मम्मी से दो-चार हाथ 'प्रसाद' (पिटाई) ही क्यों न मिले।
​वो छोटे-छोटे सुख: * संतरे वाली वो 50 पैसे की गोली, जिसे हम तब तक चूसते थे जब तक वो धागे जैसी पतली न हो जाए।
​नया रबर (Eraser) जिसकी खुशबू इतनी अच्छी होती थी कि मन करता था उसे खा जाएँ।
​पुरानी चप्पल के टायर बनाकर उन्हें डंडे से चलाते हुए मीलों तक दौड़ जाना।
​आज की हकीकत: आज हम 'एसी' कमरों में बैठे हैं, हाथ में महंगे फोन हैं, पर वो दोपहर की धूप और दोस्तों के साथ बिना किसी मतलब के ठहाके लगाना कहीं पीछे छूट गया है। अब हम 'स्टेटस' अपडेट करते हैं, तब हम 'यादें' बनाया करते थे।
​सच तो यह है कि उस समय हमारे पास 'सुविधाएं' कम थीं, पर 'बचपन' भरपूर था।
​क्या आपको याद है आपकी वो पहली साइकिल जिसे आपने गिरते-संभलते सीखा था? या वो खास दोस्त जिसके साथ आप अपनी आधी पेंसिल भी बांट लिया करते थे?

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