Mukesh Bhardwaj Friends

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सनातन भारत की आत्मा है

08/05/2026

केरलम में भाजपा के तीन विधायक जीते हैं,राजीव चंद्रशेखर, वी.मुरलीधरन एवं बी.बी.गोपकुमार। दक्षिण के छोर के राज्य केरलम की यह जीत वहाँ के हिन्दुओं का जागरण मानिये और आने वाले समय में केरलम में भी बंगाल की भाँति भाजपा सरकार बनने का मार्ग बन गया है,बहुत बहुत बधाई...

07/05/2026

तीन बार के मुख्यमंत्री और केन्द्र में मंत्री रहकर भी गांधीवाद का आवरण ओढ़कर रहने वाले अशोक गहलोत जी,क्या आप बताऐंगे केरल में चुनाव कराने नासा के वैज्ञानिक आऐ थे और बंगाल में भारत के?
आप जैसे वरिष्ठ नेता भी लोकतंत्र को नहीं मानेंगे तो फिर आप राजनीति में हो ही क्यों? हमें शर्म आती है कि आप राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे।
आप जैसे नेताओं की मानसिक विकृति को देखकर भारतीय जनता आपसे दूर होती जा रही है,जैस कम्युनिस्टों का समापन हो गया वैसे ही भारत की स्वतंत्रता के समय से चली आ रही कांग्रेस भी आने वाले कुछ ही समय में समापन को देखेगी और उसके लिए जिम्मेदार गांधी परिवार और आप जैसे वरिष्ठ चाटुकार और दोगले नेता ही होंगे।
जो लोग सच के साथ होते हैं उन्हें कांग्रेस नेतृत्व आगे बढने नहीं देता और आप जैसे लोकतंत्र विरोधी इस कांग्रेस को आक्सीजन के स्थान पर कार्बन डाई आक्साईड दिये जा रहे हो तो फिर कांग्रेस का अंत होना तय है...

23/04/2026

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर बहुत से कार्यक्रम किये जाते हैं,उनके नाम पर बहुत से विचारमंच बने हैं और प्रशिक्षण भी दिये जाते हैं लेकिन क्या वास्तव में उनके विचारों को कभी कोई राजनेता या कार्यकर्ता गंभीरतापूर्वक एक क्षण के लिए भी अपने जीवन में उतारने का सोचता है,उन्होंने कहा था कि जब हमारे संगठन मे भी स्वार्थ और अवसरवाद आने लगेगा तो में इसे समाप्त कर पुनः विचारवान लोगों का एक संगठन खडा करूँगा,हे ईश्वर आपने दीनदयालजी को बहुत कम आयु में हमसे छीन लिया अन्यथा संगठन का स्वरूप वास्तव में उनके विचारों से आत्मसात होता...
पं.दीनदयाल उपाध्याय जी के ये दस महान विचार रहे, जिन्हें राष्ट्वादियों को अवश्य मन में लाना चाहिए:-

1. धर्म एक बहुत ही व्यापक और विस्तृत विचार है, जो समाज को बनाए रखने के सभी पहलुओं से संबंधित है।
2. बिना राष्ट्रीय पहचान के स्वतंत्रता की कल्पना व्यर्थ है।
3. हमें सही व्यक्ति को वोट देना चाहिए न की उसके बटुए को, पार्टी को वोट दे किसी व्यक्ति को भी नहीं, किसी पार्टी को वोट न दे बल्कि उसके सिद्धांतों को वोट देना चाहिए।
4. एक अच्छे व्यक्ति को शिक्षित करना वास्तव में समाज के हित में है।
5. अनेकता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की सोच रही है।
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6. स्वार्थ सिद्धी,जातिवादी और अवसरवादियों से राजनीति के प्रति लोगों का विश्वास खत्म होता जा रहा है,इन दूषित विचारों से मुक्त होना होगा।
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7. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की लालसा हर मनुष्य में जन्मजात होती है और समग्र रूप में इनकी संतुष्टि भारतीय संस्कृति का सार है।
8. अंग्रेजी शब्द रिलीजन धर्म के लिए सही शब्द नहीं है।
9. मानवीय ज्ञान सभी की अपनी संपत्ति है।
10. शिक्षा एक निवेश है, जो आगे चलकर शिक्षित व्यक्ति समाज की सेवा करेगा।

23/04/2026

जिसके जल एक बूंद से जीवन पवित्र हो जाता है ऐसी गंगा मैया के अवतरण दिवस गंगा सप्तमी की बहुत-बहुत मंगल एवं शुभकामनाऐं।
हर हर गंगे...

Photos from Mukesh Bhardwaj Friends's post 21/04/2026

आज आवश्यकता इस बात की है की हमारी ऐजेंसी प्राइवेट सेक्टर में हो रहे धर्मांतरण के इस षडयंत्र पर गहराई से कार्य करे,"आल इज वैल" के इस यूफोरिया से बाहर निकले और इसके लिए अपने सर्वश्रेष्ठ को लगाये जिससे सनातन के इस ढांचे पर कुदृष्टि लगाये बैठे रंगे सियार जो "गंगा जमुनी तहजीब" के रंग में रंगकर सामने हैं उन पर सख्ती कर इस मकड़जाल को तोडे।
पहले अनपढ लोग इस प्रकार के कृत्य करते थे अब पढे लिखे लोगों के माध्यम से इसे कराया जा रहा जो कभी कलावा पहनकर आपके बीच घुलमिल कर आपके बच्चों को बहलाकर धर्मांतरण के खेल को अंजाम तक पहुँचाने में लगे हैं।हमारी सरकारों(देश और प्रदेशों) को बहुत चिंतन के साथ इस पर काम करने की आवश्यकता है।
सनातन में भी स्वर्ण और दलित के भेद को बढाने में कुछ लोग षड्यंत्र के अंतर्गत लगे हैं,सवर्णों के धुरविरोधी लोग जिनमें मायावती और समाजवादी हैं वो अब भगवान परशुरामजी के कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर भाग ले रहे हैं और जो स्वर्ण समाज के कारण सत्ता में हैं क्योंकि वो वोट के लालची हैं और जो स्वर्ण के वोटों से सरकार चला रहे हैं वो अब स्वर्ण को तो "अपना बच्चा है तू" वाला डायलॉग मतलब तू तो अपना है ही समझते हुए दलित ओबीसी पर केन्द्रित होता दिख रहा है।
दुख इस बात का होता है कि केवल एक पक्ष को दंड देकर दूसरे को सहजता से रखा जा रहा है,अभी हाल ही में अनामिका उपाध्याय नाम की लडकी ने अंबेडकर जी के विषय में एक वीडियो बनाकर अपना मत रखा था हो सकता है वो गलत हो लेकिन बहुत से चंद्रशेखर रावण के अनुयायी आज भी खुलेआम देवी देवताओं और सवर्णों के विरूद्ध वीडियो बनाकर डाल रहे हैं लेकिन पुलिस की कार्रवाई उन पर नहीं हो रही ऐसा क्यों।
सरकार के लिए जितना महत्वपूर्ण दलित ओबीसी है उतना ही स्वर्ण भी है कम से कम सरकारों को तो समान दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
आज संघ भी दलित ओबीसी को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम करता है उनको स्वर्ण के समानांतर लाना चाहता है और सबको इस विषय में सहयोग करना चाहिए लेकिन ये ध्यान अवश्य रखना चाहिए की स्वर्ण समाज के लोग ही थे जिन्होंने वंचित वर्ग को समानता के साथ बढने की पहल की थी अब उनकी इस पहल को उनके लिए कष्टदायक नहीं बनाना चाहिए।
जब हम सबके विकास,सबके विश्वास की बात करते हैं तो सब का अर्थ सब ही होना चाहिए और सबके लिए समान अधिकार प्रदान करने चाहिए,भारत अब इक्कीसवीं सदी में है दुनियाभर में हमारी नीतियों को सराहा जाता है तो हमारी सरकारों को भी अपनों में भेद नहीं दिखाना चाहिए...

15/04/2026

दिशा हीन कांग्रेस
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किसी भी देश के लोकतंत्र में पक्ष के साथ विपक्ष की भी महति भूमिका होती है,जब बात राष्ट्र की अस्मितता की आती है तब विपक्षी दल पक्ष के साथ खडे होकर देश के दुश्मनों के विरूद्ध एकजुट हो जाते हैं।
सामान्यतया तो ऐसा ही होता है लेकिन कांग्रेस जिसने कई दशकों तक देश में सत्ता संभाली है, जबसे वही कांग्रेस जब विपक्ष में रहने लगी तो वो अपने नेताओं पर अंकुश लगाने लग गई,अंकुश भी इस बात के लिए कि कोई हिन्दूवादी से घनिष्ठता नहीं दिखा सकता,जब बात राष्ट्रीयता की हो तो वहाँ किसी नेता को उपस्थित नहीं होना चाहिए,कोई भी राष्ट्रवादी संघटन के कार्यक्रमों में नहीं जाना चाहिए।
जो कट्टरपंथी हों,राष्ट्रद्रोही हों,हिन्दुत्व विरोधी हो,उनके पास यदि कोई उनका नेता जाऐ तो पार्टी उसके साथ खडी दिखती है। यही नीति भारत के सामान्य नागरिक से कांग्रेस को दूर करती जा रही है।
स्वतंत्रता के समय कांग्रेस के साथ अधिकतर राष्ट्रवादी नेता थे लेकिन, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जी,नरसिंह्मा रावजी और प्रणव मुखर्जी जी जैसे नेताओं के उपरान्त कांग्रेस में राष्ट्रवादी सोच लुप्तप्राय हो गई है,जबसे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पार्टी के केन्द्र में आये तबसे पार्टी दिशा विहीन होती ही जा रही है। बहुत से राष्ट्रवादी नेता या तो पार्टी छोड़कर चले गये,कुछ ने अपनी आवाज धीमी कर दी और कुछ दिशाहीन होकर कभी साथ दिखते हैं और कभी अलग।
कई राज्यों में जो पार्टी कांग्रेस के विरोध में बनी वो उनकी ही घटक बन गई। शरद पंवार की राकपा,ममता बनर्जी की टीएमसी और कई क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर अपने अस्तित्व को ही चुनौती दे दी,आज अधिकतर राज्यों में कांग्रेस का ग्राफ गिर चुका है और अब विपक्ष के नाम पर कोई सशक्त आवाज नहीं रह गई है।
दूसरी ओर भाजपा जैसे जैसे अपना ग्राफ बढा रही है,अपने मूल स्वभाव से समझौता करते हुए कांग्रेस या अन्य दलों से निकले नेताओं को जल्दीबाजी में अपने साथ मिला रही है जो आने वाले समय में चुनौती के रूप में सामने आ सकता है,जिसकी विचारधारा ही आपसे मेल नहीं खाती उसे साथ लेने से आपका कैसा लाभ,या तो वो तात्कालिक लाभ लेकर अपने आचरण के अनुरूप गडबड करेगे या वो फिर से अपने विचार में जा मिलेंगे।आपके पास पहले से ही राष्ट्रवादी और विचारवान कार्यकर्ताओं की विराट सेना है,ऐसे में संभव है कि आपका चरित्रवान नेता/कार्यकर्ता भी बाहरी के चरित्र से प्रभावित हो सकता है और बहक सकता है। इसलिए जल्दीबाजी नहीं दिखाते हुए कुछ महीने परीक्षण का समय दिया जाऐ जिससे बाहरी को रीति-नीति समझकर अपना चरित्र ठीक करने का अवसर मिले।
विपक्ष का इस प्रकार राष्ट्र के विकास और सामरिक विषयों में सकारात्मक ना रहना,देश के दुश्मनों को सहयोग देना और हर बात में अनर्गल बात कर संसद का समय व्यर्थ करते ही रहना पूर्ण रूप से देश के विकास में बाधक है,जो दुर्भाग्य पूर्ण है। कांग्रेस को अभी भी अपना नेतृत्व किसी गाँधी परिवार के बाहर के योग्य नेता के हाथ में दे देना चाहिए जिससे वहाँ परिवारवाद से निकलकर राष्टीयता के साथ देश के विकास में सत्ताधारी दल के साथ संवाद रखते हुए अपने दल के विचार को सकारात्मक होकर देश की जनता के मन की बात को समझ में रखते हुए आगे बढा जा सके और यदि अभी भी कांग्रेस नहीं चेती तो देश में क्षेत्रीय दल ही विपक्ष की भूमिका में रहेंगे जो उचित नहीं होगा,उनकी अपनी स्वार्थ की क्षेत्रीय राजनीति होती है,समग्र देश के लिए वो नहीं सोचते। ऐसे में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ और अनुभवी लोगों को प्रयास तो अवश्य ही करना चाहिए...
"मुकेश आर. बी"
[email protected]
स्वतंत्र लेखक

Photos from Mukesh Bhardwaj Friends's post 09/04/2026

भाजपा कार्यकर्ता मानसिक रूप से बहुत सशक्त होता है उसको संगठन की ओर से थोडा समय समय पर बुलाकर कार्यक्रमों कुछ भूमिका देकर उपयोग लिया जाए तो वह मन से कार्य करता रहता है। यह तो स्वाभाविक है कि बीस तीस वर्ष सक्रियता से अपना समय पार्टी के लिए देते रहने के उपरान्त भी उन्हें अपेक्षाकृत कम महत्व मिले तो हृदय में वेदना होती है।
दायित्व तो कभी मिले ना मिले ये संगठन पर निर्भर करता है लेकिन नियमित रूप से चल रहे अभियानों में भी कुछ चिन्हित महिला एवं पुरूष कार्यकर्ताओं को ही लगा दिया जाता है,हर कमेटी में वोही प्रमुख भूमिका निभाते हैं तो मन में वेदना स्वाभाविक है,मेरे सक्रियता के सतत पच्चीस वर्ष के समर्पण को यदि चार पांच वर्ष पूर्व जुडे कार्यकर्ता के समझ दूसरे दर्जे का समझा जाए तो वेदना स्वाभाविक है।
चूँकि में मीडिया एवं लेखन से जुडा रहा हूँ इसलिए स्पष्टता के साथ लिखना और विषय रखना मेरी पद्धति है,मेरे से वरिष्ठ और मेरे समकक्ष कार्यकर्ताओं का अनुरोध यही है कि संगठन कार्यकर्ताओं के अनुभव को पार्टी हित में काम लेवे जिससे उनका भी सम्मान बना रहे।

08/04/2026

भाषा की मर्यादा
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गाली गलोंच की भाषा का उपयोग आजकल राष्ट्रीय दलों के मुखियाओं के मुख से कितने सहज भाव से हो रहा है यह देखकर बडा ही अचरज होता है।
क्या आप शीर्ष पदों पर बैठकर भी मर्यादा नहीं समझते,क्यों देश की जनता आपको सुनें,क्यों आप देश के भविष्य को ऐसे संस्कार दे रहे हो,क्या आपको सुनना जनता की कोई मजबूरी है?
शर्म करो,स्थिति भयानक होती जा रही है,सबसे दयनीय स्थिति उनकी है जो किसी एक पक्ष के कुछ भी बोलने पर बवाल खडा कर देते हैं,वो रायचंद बनकर दूसरे के पक्ष के साथ खडे हो जाते हैं और इतना जहर उगलने वालों की बात पर चुप्पी साध लेते हैं,वो तथाकथित विद्वान जो हर बात पर रायचंद बन जाते हैं कहाँ पाताललोक में जाकर बैठ गये भाई,कुछ तो मुख से जुगाली करो।
एक समय था,जब विचार की भिन्नता के उपरान्त भी शब्दों में मिठास होती थी,विरोधी को मधुर शब्दों के साथ भी बहुत बडा संदेश दे दिया जाता था,
मित्रों अटल जी को सुनने का तो अवसर हम सबको अवश्य मिला ही है,सच कहूँ तो मै अटलजी के भाषणों के कारण ही राजनीति में आया था ,जब विद्यालय से महाविद्यालय की यात्रा करते हुए युवा हो रहे थे तो इंदिरा जी,जय प्रकाश जी एवं अटल जी जैसे बडे नाम थे जो अपने भाषण शैली के लिए जाने जाते थे,मुझे याद है कुछ विरोधी विचार के लोग भी अटलजी के भाषण सुनने के लिए जाया करते थे या रेडियो पर सुनते थे।
आज हम किस स्तर तक आ चुके हैं,हमारा सोचने का दृष्टिकोण अलग हो सकता है,हमारे कार्य करने का प्रकार अलग हो सकता है और हमारे दल की रीति-नीति अलग हो सकती है इस सबके उपरान्त भी हम सबमें एक बात समान है कि हम सब भारतवासी हैं,इस देश की संतान हैं तो ये घृणा किसलिए सबका अपना अपना मत है,अपने अपने मत के अनुसार अपनी बात रखो जनता को जो अच्छा लगेगा उसके साथ चल देगी।
देश में एक विधान बनना चाहिए जिससे इस गंदगी पर रोक लगे,यदि आप इस बात से सहमत हैं तो आपके विचार अवश्य रखें...
"मुकेश आर.बी"

25/01/2026
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