राजन्य क्रोनिकल्स - The Current Rajputana Updates

राजन्य क्रोनिकल्स - The Current Rajputana Updates

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जय क्षात्र धर्म !! जय भवानी !! जय वीर भोग्य वसुंधरा

14/08/2023

*श्री क्षत्रिय जन संसद के तत्वधान में केसरिया तिरंगा वाहन रैली निकाली।*

अलवर - क्षत्रिय जन संसद (रजि.) अलवर के तत्वधान में क्षत्रिय राजपूत समाज की ओर से सामाजिक समरसता, एकजुटता, एक जाज़म, एक ध्वज, एक समाज एवं भाईचारे का संदेश देते हुए देश के प्रति प्यार, वीर जवानों के प्रति अपने भाव प्रकट करने के साथ ही विरांगनाओ के सम्मान में मोती डूंगरी स्थित राजीव गाँधी पार्क से केसरिया तिरंगा वाहन रैली अलवर शहर के विभिन्न मार्ग नया बास, गायत्री मंदिर रोड, अशोका टॉकीज, त्रिपोलिया, होपसर्कस, घंटाघर, भगतसिंह, होते हुए शिवाजी पार्क तक निकाली गई, जहाँ शिवाजी पार्क सामुदायिक भवन स्थित महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर माला एवं पुष्प अर्पित कर श्रध्दांजलि दी गई ततपश्चात रैली का कंपनी बाग स्थित शहीद स्मारक पर समापन किया गया। शहीद स्मारक पर शहीद हुए अमर वीर जवानों को पुष्प अर्पित कर एवं मोमबत्ती जलाकर याद किया एवं शहीद की विरांगनाओ एवं सेवानिवृत्त जवानों शहीद देश सेवा में लगे हुए सभी महानुभावों को तिरंगे का अंगवस्त्र पहनाकर सम्मान किया गया।
इस रैली में क्षत्रिय राजपूत समाज के भारी संख्या में क्षत्रिय सरदारों एवं युवाओं ने केसरिया साफा बांध कर भाग लिया जिसमें हर चौराहे पर नवयुवकों द्वारा तलवारबाजी, लाठी चलाना सहित विभिन्न प्रकार के करतब दिखाते हुए लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

22/12/2021
03/10/2021

श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के मुख्य अतिथि के रुप में पधारे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री योगेंद्र सिंह कटार साहब एवं प्रदेश अध्यक्ष घोड़ी वाला साहब की उपस्थिति में अपनी बातों से संबोधित करते हुए सिंह राजपूत संगठनों से जुड़े हुए एवं प्रखर प्रवक्ता डॉक्टर जी एस नरूका जी के द्वारा दिया गया संबोधन

03/10/2021

दादा योगेंद्र सिंह कटार राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना का अलवर में स्नेह मिलन समारोह के दौरान राजपूत सभा को संबोधित करते हुए!

15/04/2021

भारत के प्रथम हिंदू सम्राट तथा 400 टुकड़ों में बटे माँ भारती भूमि को एक राष्ट्र में सुत्र बंध कर अखंड भारत के निर्माण करने वाले #सुर्यवंशी " #कुशवंशी" #महान_क्षत्रिय_सम्राट__चन्द्रगुप्त_मौर्य के 2365 वें #जन्मोत्सव पर उनके चरणों में भावभीनी श्रद्धांजलि।कोटि कोटि नमन।
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आप भारत के गौरव है।

#पिप्पलिवन_के_मोरिय(मौर्य) राजपूत
बौद्ध साहित्य पूर्वांचल _नेपाल के इस क्षत्रिय गणतन्त्र की पर्याप्त जानकारी देते हैं, ये #कपिलवस्तु के #शाक्य जो की इक्ष्वाकु के कुल के थे और श्रावस्ती के इक्ष्वाकु कुल के नजदीक थे उनके ही सहोदर थे.
जिस तरह गौतम बुद्ध के कारण शाक्य आज तक प्रसिद्ध हैं,वैसे ही पिप्पलिवन के मोरिय #मौर्य_राजवंश के संस्थापक #चन्द्रगुप्त के कारण प्रसिद्ध हैं.
भगवान बुद्ध के देहावसान के बाद पिप्पलवन के इन #मोरिय_क्षत्रियों की कथा आती है की किस प्रकार इन्होंने बुद्ध के अस्थि कलश प्राप्त करने के लिए अपने क्षत्रिय वंश का उल्लेख किया.
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद मोरियों का जो अंतिम महत्वपूर्ण राज्य था वो #चित्तौड़ था,जिसका संस्थापक चित्रागंद मोरी था,आज भी #मोरी_राजपूत ,राजपूतों का एक प्रतिष्ठित कुल है.ठीक इसी तरह चच नामक कश्मीरी ब्राह्मण ने सिंध के जिस #राय_वंश को खत्म किया वो भी इन्ही से सम्बंधित था,क्योंकि चच(दाहिर का पिता) द्वारा धोखे से अपने राजा की विष देकर हत्या के बाद चितौड़ के राजा ,जो राय साहसी का चचेरा भाई था,ने चच से बदला लेने के लिए उसके ऊपर हमला किया था,तमाम जगह इसका उल्लेख है.
अब राजस्थान में बौद्ध कालीन अवशेष मिलने से ये और स्पष्ट हो गया है की मोरिय राजवंशी लोग साम्राज्य के पतन के बाद भी सैकड़ों वर्षों तक भगवान बुद्ध के अवशेषों को वो जहां भी स्थापित रह गए स्तूपों में संरक्षित करते रहे,टौंक में मिले बौद्ध कालीन अवशेष हमें यही बताते हैं.

मगध ही नही बल्कि अखंड भारत सहित अफगानिस्तान तक के सबसे बड़े सम्राटों में से एक क्षत्रिय चन्द्रगुप्त मौर्य के 2365 वें जन्मोत्सव पर उनके चरणों में भावभीनी श्रद्धांजलि।कोटि कोटि नमन।आप भारत के गौरव है।

पूरा बौद्ध साहित्य चन्द्रगुप्त मौर्य को क्षत्रिय कहता है और तत्कालीन इतिहास को समझने के लिए बौद्ध साहित्य से बड़ा कोई स्रोत नही है।जो भी चन्द्रगुप्त मौर्य को अपना पूर्वज मानता है उसे पूरे क्षत्रिय समाज को कोसने का कोई हक नही है।

यह नही होना चाहिए कि चन्द्रगुप्त मौर्य को अपना पूर्वज मानिए और आरक्षण,राजनैतिक शक्ति पाने के लिए शोषित,पीड़ित,वंचित बन जाइए व क्षत्रियों को कथित सवर्ण, शोषक, मनुवादी कहिए।

14/04/2021

#वो_सीहड़दे_सांखलो, #भिड़_गियो_खिलजी_सूं

"धरा रूण भल दीपियो, दाता सिहड़देव।
जंवना सामे जूझयो, सारण कुळ री सेव।।"

(वीरभूमि "रूण" जिला नागौर तहसील मारवाड़ मुंडवा)

राजस्थान की इस पवित्र धरा पर एक से बढ़कर एक शूरमां व साहसी पुरुष जन्में है इसलिए तो कहा जाता है- पुरस पटाधर नीपजै, अईयो मुरधर देश। इस सिंह उत्पन्न करने वाली धरा के नर- नाहरों की वीर गाथाएं आज भी अजर अमर है जिन्हे सुनकर हमें गौरव की अनुभूति होती है। ऐसी ही एक शोर्य गाथा है रूण के शासक सीहड़देव सांखले की।
गढ़ रूण के शासक चाचक के पुत्र सीहड़देव हुए जिनके शोर्य व पराक्रम की कहानियां हर किसी के जुबां पर है। विक्रम संवत् 1400 के पूर्वार्द्ध में रूण पर सांखलो का राज था। उस समय रूण शासक सीहड़देव वीरता और स्वाभिमान का साक्षात् प्रतिमूर्ति था। राजपूतों के राज में चारणो के योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता, रूण कोट के पोळपात कर्तव्यनिष्ठ कवि मेहाजल दधवाड़िया थे।
उस समय दिल्ली पर अलाउद्दीन खिलजी का शासन था। जब खिलजी की सेना मारवाड़ में कई राजाओं को घात व धोखे से हराकर रूण के पास से गुजर रही थी उसी समय किसी चुगलखोर ने खिलजी के सामने सीहड़देव की बेटी की सुंदरता को प्रशंसा की और कहा, तुम्हारे को उससे कन्या से शादी करनी चाहिए। खिलजी ने तुरंत हामी भर ली और अपने दूत के साथ सीहड़देव के पास संदेश भिजवाया की अपनी बेटी की शादी मेरे साथ करे या मौत से मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाओ। खिलजी के खबरी का संदेश सुनकर स्वाभिमानी सीहड़देव के तन में आग को लपटें उठने लगी। लेकिन सीहड़देव को यह भलीभांति ज्ञात था कि मेरे पास मुठ्ठी भर आदमी और खिलजी के पास विशाल सेना। उसी क्षण सीहड़देव ने सलाह मशविरा हेतु पोलपात मेहाजल दधवाड़िया को बुलाया और खिलजी से मुकाबले के लिए राय पूछी। तब स्वामिभक्त मेहाजल दधवाड़िया ने कहा कि आण पर बन आए तो सब लड़ते है, हुक्म आप तो रूण के राजा हो, इसमें पूछने की क्या बात।
"धर जातां धर्म पलटता, त्रिया पड़तां तांव।
तीन दिहाड़ा मरण रां, कहां रंक कहां राव।।"
हम सभी केसरिया करके इस रजपूती आन को कायम रखेंगे। आप युद्ध की तैयारी करो, और में दो दिन तक खिलजी की सेना को रोकने की कोशिश करूंगा।
इम सजजै आसेर,
कर तोपां हर कांगरै।
फेरा हुवै न फेर,
बाई रा बीजी बगत।।
दूजा धर दीजैह,
असुभ रंग सह आंतरै।
केसरिया कीजैह,
सजजै मांडो सांखला।।(सीहड़दे चरित)
मेहाजल सीधा खिलजी के पड़ाव में पहुंचा और कहा कि सीहड़देव का पोतपाल मेहाजल हाजिर है। खिलजी ने उसे अन्दर बुलाया और पूछा क्या संदेश लाए हो, तब मेहाजल ने कहा कि इतने कम समय में व्यस्था हो नहीं सकती है इसलिए चार दिन का वक्त चाहिए तब तक आप मेरे मेहमान हो, कल मेरी बेटी का विवाह कवि हुन्फाजी जी से होगा।
ईधर सीहड़देव अपने भाईयो और सगे संबंधियों को इकट्ठा कर केसरिया करने की तैयारी कर रहा था। जब खिलजी को पता चला सांखले विवाह की नहीं, मरने की तैयारी कर रहे हैं और मेहाजल ने उसे धोखे में रखा। उसी वक्त खिलजी की सेना ने रूण पर आक्रमण कर दिया। प्रभात वेला में राजपूतों ने बिजली सी चमकती तलवारों से ऐसा भीषण प्रहार किया, खिलजी की सेना में कोहराम मच गया, और एक बार तो उनके पैर डगमगा गए लेकिन कहा जाता है कि घण जीते अर जोधार हारे वाली बात सही होई और सीहड़देव के कोट में जौहर कि ज्वाला धधक उठी। सीहड़देव आपनी आन बान हेतु वीरगति प्राप्त की। इसी प्रसंग में गिरधर दान जी रतनू कहते है:-
"सीहड़देव लड़ियो खिलजी सूं, अवनी पर राखण जस झंडी।
प्राणा रै बदलै पणधारी, मरजाद सांखले धर मंडी।"
और वीरगति पाने से पहले सीहड़देव ने सांखलो को भळावण दी कि जे असली हो! तो दधवाड़ियां सूं मत बदल़जो अर जिको सांखलो आंसूं बदल़ेला बो असली सांखलो नीं होवैला-
सीहड़ राणै अक्खियो,
आ धारा री धीज।
जो पलटै दधवाड़ियां,
जो सांखलां न बीज!!

🙏🚩
सुमेर सिंह (शिवदानसिंह नगर, बैंगटी)

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3805180329602226&id=100003308889185

13/04/2021

सृष्टि के प्रारंभ, सम्राट युधिष्ठिर के राज्यारोहण एवं सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन के प्रतीक, प्रकृति के अणु परमाणु में नवचेतना के प्रसार आदि श्रेष्ठताओं के संकेतक एवं मां शक्ति की आराधना के प्रथम दिन चैत्र शुक्ला प्रतिपदा पर आदर्श कालगणना को संजोये नवसंवत्सर युगाब्ध 5123
नवरात्रस्थापना

विक्रम संवत 2078 भारतीय नववर्ष की शुभकामनाएं । इसी संवत के आधार पर सनातन संस्कृति के सभी धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव आधारित होते है,कृषि,व्यापार,दस्तकार इत्यादि वर्ग अपने अपने उत्सव तय करते है,वाकई वैज्ञानिक खगोलीय गणना की है हमारे पूर्वजों ने नव वर्ष आपके लिए प्रसन्नता और समृद्धि देने वाला हो , ऐसी मंगलकामना करता हूँ ।
चैत्र नवरात्रा स्थापना की बधाई
जय माता जी की सा

11/04/2021

आर्यव्रत के क्षत्रिय महान सम्राट विग्रहराज चौहान के शौर्य/गौरव दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|
सम्पूर्ण भारतवर्ष के उद्धारक भारतीय कला-संस्कृति,स्त्री-गौ,देश-धर्म संरक्षक. दिल्ली विजेता,दिल्ली के मान(दमाद)सम्राट पृथ्‍वीराज चौहान के बाबोसा(ताऊ जी)सम्पूर्ण आर्यव्रत(भारतवर्ष) भूमि को हुण-मलेच्छो,मुस्लिम आक्रांताओ से मुक्त करा सनातन धर्म की पुनः स्थापना करने वाले,भारतवर्ष की एकता के प्रतिक, आजादी के असली मतवाले, सम्पूर्ण राजपूताना काल का स्वर्णिम शासनकाल, आर्यव्रत के महान क्षत्रिय सम्राट विग्रहराज चौहान के गौरवदिवस/शौर्यदिवस 11 अप्रैल की हार्दिक शुभकामनाएं

#सम्राट_विग्रहराज( #विसलदेव) #चौहान_महत्वपूर्ण_रोचक_जानकारी:-

१.सम्राट अर्णोराज चौहान के पुत्र थे अंखड भारत के सम्राट विग्रहराज चौहान, जो बहुत बलशाली,महावीर,न्यायप्रिय,प्रजापालक,धर्मरक्षक,थे

२.सम्राट विग्रहराज चौहान का कार्यकाल 1150ईं से 1164 ईं तक था ये एक महान विद्वान कवि भी थे, कलिहार्न ने विग्रहराज चौहान को विद्वानो में कालीदास और भवभूति बताया है

३.विग्रहराज चौहान ने अजमेर में शिक्षा के लिए सरस्वती विधापीठ विधालय बनवाया जिसे बाद में तुर्को ने ढाई दिन झोपडा नाम रख दिया| और भी बहुत से धार्मिक स्थल और विसल झील का निर्माण कराया|

४.विग्रहराज चौहान क्षत्रिय(राजपूताना)धर्म का पालन करते हुए माता-पिता का भी बहुत सम्मान करते थे अपने पिता की हार का बदला चालुक्यो को बहुत बुरी तरह हराकर लिया|

५.विग्रहराज चौहान ने सम्पूर्ण भारतवर्ष को हुणो,मलेच्छो और तुर्को(मुसलमानो) से मुक्त कर दिया और आर्यवत की भूमि को फिर से पवित्र कर दिया|

६.विग्रहराज चौहान ने दिल्ली को भी जीतकर अपने अधीन कर लिया और पूरे भारतवर्ष कि रक्षा का भार चौहानो पर आ गया इस कर्तव्य को निभाने के लिए चौहान तैयार भी थे|

७.विग्रहराज चौहान का काल राजपूत चौहानो,राजपूताना और सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए स्वर्णिम काल था इनके जैसा वीर कोई नही हुआ था,ना हुआ है और ना कोई होगा|

८.जब गजनवी के वंशज अमीर(हमीर)शाह ने विग्रहराज से अधीनता स्वीकार करने के लिए बोला तो इसे विग्रहराज ने अपना व्यक्तिगत अपमान समझा और उस तुर्क को युद्ध में ही मृत्यु की कोख में भेज दिया|

९.विग्रहराज चौहान ने भीष्म प्रतिज्ञा ली की वह भारतवर्ष को अखंड आर्यावर्त में परिवर्तित कर देगा,मेरे रहते एक भी ब्राह्मण किसी हुण,मलेच्छ और तुर्क(मुसलमानो)के अत्याचार का शिकार नही होगा,मेरे रहते भारतवर्ष का एक भी मंदिर(धार्मिक स्थल)खंडित नहीं होगा,किसी नारी के मान-सम्मान पर कोई आँच नही आने दुगा|अगर ऐसा हुआ तो सिंहासन का त्याग कर अग्नि समाधि ले लूँगा|

१०.विग्रहराज चौहान ने अपनी भीष्म प्रतिज्ञा पूरी की किसी को कोई समस्या नहीं हुई सब खुश थे|
११.विग्रहराज चौहान के शासन में प्रजा खुश थी सम्राज्य भी फल-फूल रहा था और इन्होने भीष्म प्रतिज्ञा(वचन)पूरा किया जिस कारण सभी विद्वानो और प्रजा ने भगवान विष्णु का अवतार कहा और बोला (शिवालिक स्तम्भ)|
१२.विग्रहराज चौहान ने ललित विग्रहराज नाटक कि रचना की ये महान कवि थे तो इन्हे कविबाँधव भी कहा जाता हैं|

:->विग्रहराज चौहान स्वतंत्रता का वो दिवाना था जिसके आगे गुलामी रुक नही पाई विजय श्री इनसे ब्याने को बहुत उतावली थी ये भारतवर्ष कि अखंडता का वो सूरज था जिसने भारतवर्ष को एक ही प्रकाश में रंग दिया एक अखंड आर्यावर्त बना दिया|
*इस क्षत्रिय(राजपूत)क बारे जीतना लिखा जाये उतना ही कम है एक बार फिर ये राजपूत चौहान,राजपूताना और अखंड आर्यावर्त के लिए इनका कार्यालय स्वर्णिम काल था|

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3797787380341521&id=100003308889185

07/04/2021

" राजा अजयलपालदेवजी बड़गूजर की 931वी पुण्यतिथि पर नमन "

" राजा अजयपालदेव बड़गूजर (1035 -- 90 ई.) "

" राजौरगढ़ की राजनैतिक स्थिति "

राजा अजयपालदेव जब 1035ई. में राजौरगढ़ सिंहासन पर आरूढ़ हुए उस समय बड़गूजर राज्य श्रीहत अवस्था में था | दौसा का किला जा चुका था , भांडारेज का किला भी कछवाहों द्वारा जीत लिया गया था |

राजौरगढ़ का सीमावर्ती किला देवती - किला बड़गूजरों से और खोह का किला मीणाओं से कछवाहों ने जीत लिया था |

राजा जतनदेव बड़गूजर के कई युद्धों के बाद भी बड़गूजर कछवाहों से अपने इलाके वापस नहीं ले सके थे | दोनों राजवंशों के राज्य की सीमाएं भी अभी तक निश्चित नहीं थी | कछवाहों से सीमावर्ती इलाकों में झड़पें होती रहती थी |

अपने शासनकाल के 1 वर्ष तक राजा अजयलपालदेवजी ने कोई विशेष बढ़त हासिल नहीं की ,1036 ई.में राजा दुल्हराय कछवाह की मृत्यु हुई और कोकिलदेव अगले शासक बने | राजा कोकिलदेव ने खोह को अपनी राजधानी बनाया और देवती का किला अपने पुत्र हुणदेव को सौंपकर राजौरगढ़ राज्य पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगे |

खोह का किला मीणाओं के हाथ से निकलकर कछवाहों के पास जाना बड़गूजरों के लिए एक संकट की तरह था क्योंकि इससे राजौरगढ़ पर कछवाहों के आक्रमण का खतरा पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ गया था | इसलिए राजा अजयलपालदेव बड़गूजर ने सर्वप्रथम खोह का किला लेने के लिए संघर्ष किया |

" खोह की लड़ाई "

राजा कोकिलदेव कछवाह (1036 -- 39 ई.) के समय मीणाओं ने खोह का इलाका वापस लेने के लिए कई प्रयास किए लेकिन जब सफल न हो सके तो मीणाओं ने
राजौरगढ़ शासक राजा अजयपालदेव बड़गूजर (1035 -- 90 ई.) से सहायता मांगी |

खोह का इलाका पहले से ही बड़गूजर राज्य का हिस्सा था और मीणाओं द्वारा रक्षित था इसलिए राजा अजयपालदेव बड़गूजर ने मीणाओं की सहायता के लिए अपने चौथे पुत्र कुंवर बाघराज -- प्रथम को भेजा |

राजा कोकिलदेव कछवाह और कुंवर बाघराज के बीच लड़ाई हुई , जिसमें एक पहर की तीख़ी लड़ाई के बाद राजा कोकिलदेव कछवाह को किला छोड़ना पड़ा |

खोह का किला एक बार फिर बड़गूजर राज्य का हिस्सा बना और ये इलाका मीणाओं को सौंप दिया गया |

( खोह का किला आमेर शासक मलैसी कछवाह के समय वापस कछवाहों ने मीणाओं से जीता था | उसके बाद यह किला आमेर के अधीन रहा | )

राजा कोकिलदेव कछवाह सेना आमेर की तरह निकल गए |

" तालाब की दूसरी लड़ाई "

राजा दुल्हराय कछवाह द्वारा ने तालाब की पहली लड़ाई में मीणाओं को परास्त करके यहां एक सैनिक छावनी बनाई थी |

खोह की लड़ाई जीतने के तुरंत बाद बाघराज ने तालाब नामक स्थान पर हमला किया | अचानक हुए हमले के कारण कछवाह सैनिकों को सम्भलने का मौका नहीं मिला |

कुंवर बाघराज ने सैनिक छावनी को तहस नहस कर दिया और इस क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया |

" माचेड़ी - राजगढ़ के मीणाओं के विरुद्ध कार्यवाही "

रामगढ़ के युद्ध में इस इलाके जो मीणा सरदार आमेर के मीणाओं के कहने पर युद्ध में सम्मिलित नहीं हुए थे उन्हें दंडित करने के लिए कुंवर बाघराज ने इन मीणाओं पर सैन्य कार्यवाही की और इस इलाके से मीणाओं को खदेड़ कर इसे अपने नियंत्रण में ले लिया |

" देवती का किला वापस लेना "

राजा दुल्हराय कछवाह (1006 -- 36 ई.) के समय देवती का किला बड़गूजरों से कछवाहों ने जीत लिया था
राजा दुलहराय कछवाह के बाद देवती किले पर राजा कोकिलदेव ने अधिकार जमाया और यहां अपने पुत्र हुणदेव कछवाह को तैनात क़ियां |

राजा कोकिलदेव कछवाह को अपने पुत्र बाघराज के साथ लड़ाई में उलझा जानकर , इस समय को राजा अजयपालदेव ने एक सही अवसर के तौर पर देखा |

राजा अजयपालदेव बड़गूजर ने फौज जमा करके देवती किले को घेर लिया | दोनों सेनाओं के बीच लड़ाई हुई |
हुणदेव कछवाह को हारकर किला छोड़ भागना पड़ा |

इस लड़ाई के बाद देवती किले पर बड़गूजरों ने वापस अधिकार कर लिया | राजा अजयलपालदेव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार जयंतपालदेव बड़गूजर को देवती किले का किलेदार नियुक्त किया |

( इस घटना के बाद से 16वी सदी तक ये किला बड़गूजरों के अधिकार में रहा | 13वी शताब्दी में देवती का किला बड़गूजरों की संकटकालीन राजधानी रहा | 1222 ई. के बाद से राजा मालगंधजी बड़गूजर ने अपना पूरा जीवन दिल्ली सुल्तानों के विरुद्ध देवती में रहकर छापामार युद्ध करके बिताया |

राजा देवब्रह्मजी बड़गूजर ने भी दिल्ली सुल्तानों से संघर्ष किया | 1259ई . के आसपास औपचारिक तौर पर देवती को राजधानी बनाया |

देवती के ही शासक कुम्भाजी बड़गूजर ( 1502 ई. -- 27 ई. ) ने खानवा के प्रसिद्ध युद्ध में मेवाड़ महाराणा सांगा की सहायता करते हुए वीरगति प्राप्त की |

देवती के अंतिम शासक राजा ईसरदासजी बड़गूजर मुग़ल बादशाह अकबर से युद्ध करते समय वीरगति प्राप्त की | )

" गेटोर लेने का असफल प्रयास "

खोह और तालाब का इलाका कछवाहों से वापस लेने के बाद कुंवर बाघराज ने गेटोर लेने के लिए कछवाहों पर आक्रमण किया | इस लड़ाई में खोह का आलणसी मीणा भी बड़गूजर सेना के साथ था |

राजा हूणदेव कछवाह भी सेना लेकर गेटोर आए | दोनों सेनाओं के बीच लड़ाई हुई |

इस युद्ध में कुंवर बाघराज - प्रथम गम्भीर रूप से घायल हुए जिनके कारण कुछ दिनों बाद 21 जून 1040 ई. को कुंवर बाघराजजी का देहांत हो गया |

" काकंवाड़ी का किले का निर्माण "

सीमा सुरक्षा की दृष्टि से आमेर और राजौरगढ़ सीमा के बीच राजा अजयपालदेव बड़गूजर ने 1042 ई. से 1044 ई. के बीच कांकवाड़ी किले का निर्माण कराया | इस किले की तलहटी से एक पथरीला रास्ता नीलकंठ महादेव मंदिर तक जाता है |

यह किला मुख्य तौर पर सीमा सुरक्षा के लिए बनाया था जिसमें सेना की एक छोटी सी टुकड़ी रखी जा सके और आमेर के कछवाहों को इस इलाके में आने से रोका जाए |

राजा अजयपालदेव के बाद यह किला राजा जयंतपालदेव बड़गूजर के अधिकार में रहा | राजा जयंतपालदेव बड़गूजर से यह किला बड़गूजर सामंतों को प्राप्त हुआ |

राजा रामराय बड़गूजर तक यह किला बड़गूजर सामंतों के पास रहा | यहीं के सामन्त संग्राम सिंह बड़गूजर ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के साथ कई सैन्य अभियानों में भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए |

( 12वी -- 13वी शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों ने इस किले को काफी नुकसान पहुंचाया | किले के भग्नावेशों पर बाद में सवाई जयसिंह आमेर ने किले का पुनर्निर्माण करवाया और आमेर राज्य में मिला लिया | )

मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा किला तहस नहस करने के बाद यहां के बड़गूजर कई छोटी बड़ी शाखाओं में बंट गए | कोलासर , तितरवाड़ा , कांकवाड़ी से निकली इन शाखाओं से वर्तमान समय में जौपाड़ा , अजयराजपूरा , उदयपुरा , घेरोली , प्रेमपुरा , बाढ़ और जटवाड़ी आदि कई बड़े ठिकानों में बड़गूजर राजपूत आबाद हैं |

" राजौरगढ़ की लड़ाई "

राजा अधलराय कछवाह ने निकुम्भों और मीणाओं की सहायता लेकर राजौरगढ़ पर आक्रमण क़ियां |
राजा अजयलपालदेजी ने शत्रु संघ को बुरी तरह पराजित किया | इस लड़ाई में राजा अधलराय वीरगति को प्राप्त हुए | यह घटना 1049 ई. से 1052 ई. के बीच की है |

" पड़ोसी राजाओं से सम्बन्ध सुधारना "

भारत में मुस्लिम सुल्तानों के बढ़ते प्रभाव के कारण राष्ट्रीय एकता को देखते हुए राजा अजयपालदेव ने अपने पड़ोसी राजाओं के साथ सम्बन्ध सुधारे |

इस नीति के चलते राजा अजयपालदेव ने आमेर के कछवाहों , शाकम्भरी के चौहानों और बयाना के यदुवंशी शासकों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए |

राजा अजयपालदेवजी ने अपनी पौत्री ( राजकुमार जयंतपालदेव की पुत्री ) का विवाह राजा जान्हणदेव कछवाह ( 1053 ई. -- 70 ई. ) के साथ क़ियां |

इसी नीति के तहत राजा अजयपालदेव ने शाकम्भरी के चौहान राजाओं ( राजा दुर्लभराज तृतीय और राजा विग्रहराज तृतीय ) की कई बार युद्ध में सहायता की |

राजा दुर्लभराज तृतीय के समय सुल्तान इब्राहीम के साथ युद्ध में राजा अजयपालदेव ने फौजी मदद की लेकिन इस युद्ध में राजा दुर्लभराज तृतीय वीरगति को प्राप्त हुए |

सुलतान साहबदीन के विरुद्ध युद्ध में राजा अजयपालदेव ने राजा विग्रहराज तृतीय की सहायता करी |

55 वर्षों के एक लंबे शासनकाल के बाद राजा अजयपालदेवजी बड़गूजर का देहांत 7 अप्रैल 1090 ई. को हुआ |

" राजा अजयपालदेवजी का मूल्यांकन "

राज्यारोहण के बाद श्रीहत होते बड़गूजर राज्य को राजा अजयपालदेवजी ने नई मजबूती दी | राजा जतनदेवजी कि मृत्यु के बाद बड़गूजर राज्य एक जर्जर अवस्था में पहुँच चुका था | राजा जतनदेव बड़गूजर के समय जो इलाके कछवाहों ने जीते थे राजा अजयपालदेव ने उनमें से बहुत सा क्षेत्र कछवाहों से वापस जीत लिया |
दौसा किले और भांडारेज को छोड़कर अधिकांश इलाके कछवाहों से जीते गए | क्षेत्रफल की दृष्टि से दौसा और भांडारेज से भी बड़ा भूभाग राजा अजयपालदेव के समय माचेड़ी के रूप में बड़गूजर राज्य में मिलाया गया | ये राजा अजयलपालदेवजी के अदम्य साहस और राजनैतिक दूरदृष्टि का ही परिणाम था |

धार्मिक तौर पर शैव होते हुए भी राजा अजयलपालदेव ने जैनमुनियों को जैन धर्म के प्रचार प्रसार की अनुमति दी | राजा अजयलपालदेवजी के समय राजौरगढ़ को छोटी काशी की संज्ञा दी जाती थी | राजा ने 80 से भी ज्यादा छोटे बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया , जिसमें से 60 के आसपास मंदिर मुग़ल बादशाह औरंगजेब के समय नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में तोड़े गए |

वि. स. 1101 (1044 ई.) की एक भगवान गणेशजी की नृत्य अवस्था में मूर्ति मिली है , जिसके पद -- पटल पर 3 लाइन का लेख लिखा है | नृत्य अवस्था में मिली भगवान गणेशजी की मूर्ति जहां एक ओर बड़गूजर राज्य में कला और संगीत के विकास को दर्शाती है वहीं दूसरी तरफ़ राज्य की समृद्ध और ऐश्वर्य के साथ प्रजा के खुशहाल जीवन की ओर भी संकेत करती है |

लछुकेश्वर महादेव मंदिर में ही नीलम रत्न के शिवलिंग की स्थापना के साथ ही यह मंदिर 'नीलकंठ महादेव मंदिर' नाम से प्रसिद्ध हुआ |

" राजा अजयलपालदेवजी बड़गूजर की जय "

:- PAGE -- बड़गूजर राजवंश

30/03/2021

ाजपुताना
दिल्ली के #तंवर( #तोमर) शासक (736-1193 ई)

1. #अनगपाल_तोमर (736-754 ई)-दिल्ली के संस्थापक राजा थे जिनके अनेक नाम मिलते हैं जैसे बीलनदेव, जाऊल इत्यादि।
2.राजा वासुदेव (754-773)
3.राजा गंगदेव (773-794)
4.राजा पृथ्वीमल (794-814)-बंगाल के राजा धर्म पाल के साथ युद्ध
5.जयदेव (814-834)
6.राजा नरपाल (834-849)
7.राजा उदयपाल (849-875)
8.राजा आपृच्छदेव (875-897)
9.राजा पीपलराजदेव (897-919)
10.राज रघुपाल (919-940)
11.राजा तिल्हणपाल (940-961)
12.राजा गोपाल देव (961-979)-इनके समय साम्भर के राजा सिहराज और लवणखेडा के तोमर सामंत सलवण के मध्य युद्ध हुआ जिसमें सलवण मारा गया तथा उसके पश्चात दिल्ली के राजा गोपाल देव ने सिंहराज पर आक्रमण करके उन्हें युद्ध में मारा
12.सुलक्षणपाल तोमर (979-1005)-महमूद के साथ युद्ध किया
13.जयपालदेव (1005-1021)-महमूद के साथ युद्ध किया, महमूद ने थानेश्वसर ओर मथुरा को लूटा
14.कुमारपाल (1021-1051)-मसऊद के साथ युद्ध किया और 1038 में हाँसी के गढ का पतन हुआ, पाच वर्ष बाद कुमारपाल ने हासी, थानेश्वसर के साथ साथ कांगडा भी जीत लिया
16.अनगपाल द्वितीय (1051-1081)-लालकोट का निर्माण करवाया और लोह स्तंभ की स्थापना की, अनंगपाल द्वितीय ने 27 महल और मन्दिर बनवाये थे।दिल्ली सम्राट अनगपाल द्वितीय ने तुर्क इबराहीम को पराजित किया
17.तेजपाल प्रथम(1081-1105)
18.महिपाल(1105-1130)-महिलापुर बसाया और शिव मंदिर का निर्माण करवाया
19.विजयपाल (1130-1151)-मथुरा में केशवदेव का मंदिर
20.मदनपाल(1151-1167)-मदनपाल ने विग्रहराज के साथ मिलकर मल्लेच्छो की बाढ को रोका, मदलपाल विग्रहराज के शोर्य से प्रभावित होकर अपनी पुत्री देसलदेवी का विवाह किया (नाकि कीसी काल्पनिक अनगपाल तृतीय ने सोमेश्वर से)
21.पृथ्वीराज तोमर(1167-1189)-अजमेर के राजा सोमेश्वर और पृथ्वीराज चव्हाण इनके समकालीन थे
22.चाहाडपाल/गोविंदराज (1189-1192)-पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर गोरी के साथ युद्ध किया,तराईन दुसरे युद्ध मे मारा गया
23.तेजपाल द्वितीय (1192-1193 ई)-दिल्ली का अन्तिम तोमर राजा , जिन्होंने स्वतन्त्र 15 दिन तक शासन किया, और कुतुबुद्दीन ने दिल्ली पर आक्रमण कर हमेसा के लिए दिल्ली पर कब्जा कर लिया।

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3758880010898925&id=100003308889185

29/03/2021

आमेर नरेश पंजवन देव जी कच्छावा : एक महान धनुर्धर एवम पराक्रमी योद्धा ☀️

पंजवन देव जी सम्राट पृथ्वीराज के अहम सहयोगी थे। इनका विवाह पृथ्वीराज चौहान के काका कान्ह की पुत्री पदारथ दे के साथ हुआ।

( यहां प्रश्न उठता है कि लोग किस आधार पर पृथ्वीराज को गुर्जर बता रहे है जबकि इनके वैवाहिक संबंध आमेर के कच्छवाहा राजपूतों के साथ रहा )

पजवन देव जी ने स्वयं के नेतृत्व में कुल 64 युद्ध जीते थे ।

प्रारंभिक रूप से भोले राव पर विजय प्राप्त की , (राजा भीम सोलंकी गुजरात का राजा था इसे भोला भीम का जाता था) ।

पृथ्वीराज चौहान ने इन्हें बाद में नागौर भेजा।

पृथ्वीराज और गोरी के बीच लड़े गए अधिकतर युद्धों में नेतृत्व इन्होंने ही किया।

जब गोरी से प्रथम बार सामना हुए तब मुस्लिम सेना की संख्या 3 लाख के करीब थी।

परंतु पजवन जी के पास केवल 5000 सैनिकों की फौज थी। इसलिए पंजवन जी के लोगो ने अरज किया कि-

"अपने पास सेना बहुत कम है और गौरी के पास बहुत अधिक है इसलिए युद्ध मत करो, वापिस चलो।"

तब पंजवन जी कछवाहा ने कहा कि-

" पृथ्वीराज को जाकर क्या कहेंगे। फिर भी जिसको घर प्यारा है वो युद्धक्षेत्र से जाओ अर्थात जिसे अपने प्राण प्यारे है वो अपने घर चले जाओ मैं तो युद्ध करूंगा।

तुम सब मुह पर मूंछ रखते हो या घास बढ़ा रखी है। तुम सब हिम्मत हार गए हो इसलिए अपने घर जाओ।"

इतना सुनते ही सभी सरदार बोले-

" महाराज आपके बिना हम कहा जाए हम आपके साथ ही रहकर युद्ध करेंगे।

तभी गौरी से युद्ध प्रारम्भ हुए और मात्र 5000 की फौज के साथ उसकी 300000 की सेना को परास्त किया।

गौरी को कैद कर के नागौर के किले में ले गए उसके बाद उसे दिल्ली ले जाकर दंडित कर के छोड़ दिया।

गहैत गौरी शाह कै, भाजी सेना ओर।
आयो वाह लिया तब, फिर कुरम नागौर ।।

अर्थात :- आमेर नरेश पंजवन जी कछवाहा द्वारा गौरी को कैद करने पर मुस्लिम सेना युद्ध क्षेत्र से भाग गई। युद्ध मे विजय होकर कुरम ( पंजवन जी कछवाहा ) नागौर आये तब उनकी चारो और वाह वाह हो रही थी।


गौरी को कैद करके पंजवन देव जी कछवाहा जब दिल्ली गए तो पृथ्वीराज चौहान स्वयं सामने से आकर उनको सम्मान के साथ दरबार मे लेकर गए और वहां उनका बहुत बड़ा सम्मान किया।

बाद में काबुल की तरफ पठानो ने माथा उठाया अर्थात पृथ्वीराज चौहान के सीमांत क्षेत्र में उपद्रव करने लगे तब आमेर नरेश पंजवन देव जी कछवाहा को काबुल भेजा। वहां पठानो ने खैबर घाटी रोक दी।
आमेर नरेश पंजवन देव जी कच्छावा ने पठानो पर हमला किया और वहां अधिकार जमाया। वही गौरी से दूसरा युद्ध हुवा एवं उसमें विजय प्राप्त की।



आई समर सकेत मैं, पीड़ करि पज्जोन।
गोरी सम-गोरी अनी, गई लजत भजि भोन ।।



अर्थात :- सेनाएं समर भूमि में आकर आमने सामने हुई। तब पंजवन राय जी ऐसा पराक्रम दिखाया कि गोरी शाह को सेना का नाश कर दिया। गोरी स्त्री के समान लज्जित हुवा एवं उसकी सेना भी भाग गई।



बाद में पृथ्वीराज चौहान ने बुलाया और कन्नौज ओर चढ़ाई की। सयोंगीता ने पृथ्वीराज चौहान का वरण किया था एवं पृथ्वीराज चौहान ने फिर कन्नौज की ओर चढ़ाई कर के उसका अपहरण किया। तब आमेर नरेश पंजवन देव जी कच्छावा भी पृथ्वीराज चौहान के साथ थे।



कन्नौज में जयचंद के साथ युद्ध हुआ। जयचंद की तरफ से अजमत खा पठान युद्ध करने आया था।

उसके पास 60000 अश्वरोही सेना थी। पठान अजमत ख़ाँ हाथी पर सवार था , आमेर नरेश पंजवन देव जी कच्छावा ने हाथी को पकड़ उसके दांत उखाड़ डाले।



उसकी सारी फ़ौज को रणखेत किया। लेकिन आमेर नरेश पंजवन देव जी कच्छावा भी कन्नौज के पास इस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए।



जब इनकी वीरगति की खबर दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंची तो पृथ्वीराज चौहान ने इनके सम्मान में कुछ यूं कहा :-



आजे भिधाता ढिलडी आज ढूँढाड़ अनथ ।
आज अदिन प्रथिराज आज सावंत बिन मथ।।


आज पुहप बिन वास आज मरजाद अलंघिय।
आज असुर दल परक आज निज दल तजि संघिय।।

हिंदवाण ढाल भाग्यो भरम, अपछरा आय उचकियो।
पंजवन सुरग जीतै थकां, चंग चंग घरत कियो।



अर्थात :- पंजवन राव की मृत्यु पर आज दिल्ली विधवा की सी उदासी धारण किये हुए दिखने लगी है। मानो वह विधवा हो गई है। ढूंढाड़ प्रदेश उनकी मृत्यु से अनाथ हो गया है। सम्राट पृथ्वीराज के आज बुरे दिन का उदय हुआ है। सामन्तों का मस्तक शिरोमणि पंजवन आज नही रहा। पंजवन की मृत्यु से दूसरे सामन्त अपने आपको मस्तक विहीन मानने लगे है। आज पुष्प बिना सुगन्ध का हो गया है। आज मर्यादा ( न्याय -व्यवस्था ) भंग हो चुकी है। आज से शत्रु सेना में उत्साह और निज सेना में निराशा व्याप्त हो गयी है। तुर्को के दल के प्रवाह को रोकने वाला अब कोई नही रहा। हिन्दू धर्म की ढाल अब समाप्त हो गयी है। अब दुश्मनों का भृम दूर हो गया है। अप्सराएं युद्ध भूमि में उचक उचक कर देख रही है। वे पंजवन देव का वरण करना चाहती है। पंजवन के जीते जी मैने जगह जगह कितनी ही लड़ाइयां लड़ी है जीती है।


©Rajkul

पोस्ट लेखक : जितेंद्र सिंह भगवतपुरा

संदर्भ :- १.पृथ्वीराज रासो
१. राजपूतों की वंशावली
३. कछ्वाहों का इतिहास ।

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