Dr. Satya Chaudhary

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22/01/2026

⚔️ कुरुक्षेत्र का वो 'अंतिम सच' जिसने दुर्योधन को अंदर से तोड़ दिया! ⚔️

कल्पना कीजिए उस मंज़र की...

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, शमशान बन चुका था। जहाँ कल तक शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां केवल मृत्यु का सन्नाटा गूंज रहा था।
टूटे हुए रथ, हाथियों के शव और रक्त से सनी मिट्टी के बीच, कुरु वंश का अभिमानी युवराज दुर्योधन अपनी टूटी जंघाओं के साथ पड़ा था।

उसकी सांसें उखड़ रही थीं, लेकिन आँखों में पराजय की आग और ह्रदय में 'छल' का आक्रोश अब भी धधक रहा था।
तभी वहां श्री कृष्ण का आगमन हुआ।

दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही अपना सारा विष उगल दिया— "तुमने छल से मुझे हराया है कृष्ण! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते!"

त्रिलोकीनाथ कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में व्यंग्य नहीं, करुणा और सत्य था। उन्होंने कहा:

"दुर्योधन! तुम पांडवों के 'छल' को देख रहे हो, लेकिन अपने 'चयन' की भूल को नहीं। तुम्हारी हार भीम की गदा से नहीं, तुम्हारे एक गलत निर्णय से हुई है।"

🛑 वो एक निर्णय, जो इतिहास बदल सकता था

कृष्ण ने उस राज से पर्दा उठाया, जिसने मरते हुए दुर्योधन की रूह
को कंपा दिया।

कृष्ण बोले: "तुम्हारी सेना में एक योद्धा ऐसा था, जो साक्षात 'काल' था। जिसे यदि तुम सही समय पर कमान सौंपते, तो यह युद्ध 18 दिन नहीं... केवल एक प्रहर में समाप्त हो जाता। लेकिन तुमने 'हीरे' को छोड़कर 'कंकड़' पर दांव लगाया।"

वह योद्धा कोई और नहीं— गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा थे।

🌪️ अश्वत्थामा: जिसे दुर्योधन ने कभी 'समझा' ही नहीं

दुर्योधन अपनी मित्रता और भावनाओं में इतना अंधा था कि उसने कर्ण पर तो भरोसा किया, लेकिन अश्वत्थामा (जो शिव के अंशावतार थे) को अनदेखा कर दिया।

कृष्ण ने दुर्योधन को उसकी रणनीतिक भूलों का आईना दिखाया:

➡️ आरंभ (दिन 1-10): तुमने भीष्म को सेनापति बनाया, जो पांडवों से प्रेम करते थे। वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे।

➡️मध्य (दिन 11-15): तुमने द्रोणाचार्य को चुना, जो शिष्य-मोह में बंधे थे।

➡️अंत (दिन 16 - महाभूल): जब द्रोण गिरे, तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था। उसका क्रोध पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था। वह 'रुद्र' बन चुका था।

किन्तु, तुमने क्या किया? तुमने भावुकता में आकर कर्ण को चुना। कर्ण वीर थे, दानवीर थे, लेकिन वे मरणशील (Mortal) थे। जबकि अश्वत्थामा अमर थे।

🔥 क्यों अश्वत्थामा थे 'विजय की कुंजी'?

कृष्ण ने अश्वत्थामा की शक्तियों का जो वर्णन किया, वह सुनकर दुर्योधन सन्न रह गया:

🔱 रुद्र अवतार: अश्वत्थामा में भगवान शिव का क्रोध और शक्ति समाहित थी।

⚜️ अजेय सामर्थ्य: जहाँ कृपाचार्य 60,000 योद्धाओं से लड़ सकते थे, अश्वत्थामा अकेले 72,000 महारथियों को धूल चटाने की क्षमता रखते थे।

♾️ सर्वश्रेष्ठ शिक्षा: उन्हें ज्ञान केवल द्रोण से नहीं, बल्कि परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से मिला था।

🔆 नारायणास्त्र का ज्ञान: अर्जुन के पास भी जिसका काट नहीं था, वह अस्त्र अश्वत्थामा के पास था।

कृष्ण ने कहा: "दुर्योधन! यदि 16वें दिन सेनापति अश्वत्थामा होते, तो पांडव तो क्या, तीनों लोकों की शक्तियां भी उसे रोक नहीं पातीं।"

🌑 प्रमाण: 18वें दिन की वो 'काली रात'

दुर्योधन को कृष्ण की बातों का प्रमाण उसी रात मिल गया। जब वह मृत्युशैया पर अंतिम सांसे ले रहा था, उसने अश्वत्थामा को अपना अंतिम सेनापति घोषित किया।

और फिर... अश्वत्थामा ने तांडव किया।

अकेले अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में घुसकर वह कर दिखाया जो 11 अक्षौहिणी सेना 18 दिनों में न कर सकी:

✔️ धृष्टद्युम्न (द्रोण का हत्यारा) का वध।

✔️शिखंडी और पांचों उपपांडवों का संहार।

✔️पांडवों की शेष बची पूरी सेना को एक ही रात में गाजर-मूली की तरह काट दिया।

सुबह जब दुर्योधन को यह समाचार मिला, तो उसकी आँखों से आंसू बह निकले। यह आंसू खुशी के नहीं, गहरे पछतावे के थे।

उसके अंतिम शब्द मौन चीत्कार बन गए।

"हाय! जिस शक्ति को मैं अंत में ढूंढ पाया, यदि उसे पहले पहचान लेता... तो आज कुरुक्षेत्र का विजेता मैं होता!"

दुर्योधन की यह कहानी हमें प्रबंधन (Management) और जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाती है:

"संसाधन (Resources) होना ही काफी नहीं है, सही समय पर सही व्यक्ति की पहचान करना ही असली नेतृत्व है।"

अक्सर हम भावनाओं (Emotions) या पूर्वाग्रहों (Biases) में पड़कर अपने सबसे काबिल 'योद्धाओं' (Team Members) को नजरअंदाज कर देते हैं, और जब तक हमें उनकी कीमत समझ आती है... तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

क्या आप भी अपने जीवन या टीम में किसी 'अश्वत्थामा' को
नजरअंदाज कर रहे हैं?

🙏🏻 हरे कृष्णा🙏

03/01/2026

महान वैज्ञानिक डॉ होमी भाभा ने परमपूज्य गुरु जी (द्वितीय सरसंघचालक) से एक बार रज्जू भैय्या (चौथे सरसंघचालक) को लेकर कहा था कि"आपने देश से एक महान भौतिक विज्ञानी छीन लिया है"
इस उच्च कोटि के भौतिक विज्ञानी थे प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह जी रज्जू भैय्या
आज पढ़िए संघ कार्य में कितने विद्वान और उत्कृष्ट अकादमिक पृष्ठभूमि के लोग आरम्भ से आज तक जुटे हुए हैं। Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS)

14/10/2025

क्या आप जानते है विश्व की सबसे अधिक समृद्ध भाषा कौन सी है ?

अंग्रेजी में 'THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG' एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए,

मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया जिसमे चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है।

इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।

अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये:

*क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।*
*तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।*

अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के *सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार*। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है!

पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-

*न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।*
*नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥*

अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्!

एक और उदहारण है:

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः

अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

है ना खूबसूरत? इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल 2 अक्षर से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असम्भव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।

अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

एक और उदाहरण:

क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥

अर्थात- क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।

पुनः क्या किसी भाषा मे केवल *तीन अक्षर* से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!
उदहारण

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।

अर्थात- वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था

अब इस छंद को ध्यान से देखें इसमें पहला चरण ही चारों चरणों में चार बार आवृत्त हुआ है, लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, जो यमक अलंकार का लक्षण है। इसीलिए ये महायमक संज्ञा का एक विशिष्ट उदाहरण है

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥

अर्थात- पृथ्वीपति अर्जुन के बाण विस्तार को प्राप्त होने लगे, जबकि शिवजी के बाण भंग होने लगे। राक्षसों के हंता प्रथम गण विस्मित होने लगे तथा शिव का ध्यान करने वाले देवता एवं ऋषिगण (इसे देखने के लिए) पक्षियों के मार्गवाले आकाश-मंडल में एकत्र होने लगे।

जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान- सार्थकता" मिलती है अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है।

Photos from Dr. Satya Chaudhary's post 01/10/2025

शताब्दी वर्ष के अवसर पर भारत सरकार द्वारा डाक टिकट और सौ रुपए का सिक्का का अनावरण......
100 वर्ष की संघ यात्रा
मातृभूमि की सेवा के लिए सदैव समर्पित.....

RSS@100

30/09/2025

यहाँ भी चोरी ........
जहाँ भी ये कामी वामी तथाकथित इतिहासकारों ने लिखा है मात्र चौपट ही किया है।
गुलामी के प्रतीकों को मिटाकर व अपने इतिहास को जानकर ही विकसित भारत का सपना पूरा होगा। इजरायल से सीखो, ये तो यहाँ भी पढ़ाया जाना चाहिए।

29/07/2025

बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय को यूजीसी द्वारा श्रेणी-I का दर्जा दिए जाने के उपलक्ष्य में, माननीय कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय जी के नेतृत्व में विश्वविद्यालय के एक प्रतिनिधिमंडल को उत्तर प्रदेश की माननीय राज्यपाल आनंदीबेन पटेल जी ने लखनऊ स्थित सरकारी आवास "राजभवन" में बधाई व शुभकामनाएं प्रेषित की व विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे कार्यों की सराहना की।

09/05/2025

जब कश्ती समंदर में मछली पकड़ने उतरती है तो मछुवारे वापस आके बहुत कहानी सुनाते हैं। एक बार ऐसी लहर आई, एक बार ऐसी बारिश , एक बार ये मिला ...

जब पोत समंदर की यात्रा करने उतरते हैं तो कप्तान हर किसी को कहानी सुनाना बंद कर देते हैं। वो लहरे नहीं तूफान से जूझते हैं, उन्हें बारिश की जगह बादल का फटना मिलता है, उन्हें बड़ी मछली नहीं खजाने और नए द्वीप मिलते हैं, उनपर संकट नहीं सीधा विपत्ति आती है।

जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है। जब अनुभवों का स्तर छोटा होता है तो बोलने, बताने, शेयर करने का बहुत मन होता है। बड़े किस्से होते हैं सुनाने को।

फिर धीरे धीरे आप भरते जाते हैं। अनुभव बढ़ते जाते हैं, शब्द कम होते जाते हैं। दिल टूटने पे आवाज होना बंद हो जाती है। सपने टूटने का तो खुद को भी कभी कभी पता नहीं चलता। और कभी कभी तो बहुत कुछ अच्छा हो जाने पर भी खुशी मनाने का दिल नहीं करता।

अब शेयर किया तो जाता है लेकिन बस कुछ लोगों के साथ.. एक शेर याद आया..

ये महफिल में नहीं खुलता, तन्हाई में खुलता है
समंदर कितना गहरा है ये बस गहराई में खुलता है।
#कालचक्र #जीवनदर्शन

04/03/2025

66 करोड़ लोग कुम्भ नहाये और आज 68 करोड़ लाइव देख रहे थे 🏏
🇮🇳 भारत के बारे में सच है कि यहाँ क्रिकेट भी एक धर्म है जिसमें भारत के जितने पर हर भारतीय गर्व और विश्वास से भर जाता है। #बधाई 🇮🇳

12/01/2025

युग प्रणेता पूज्य स्वामी विवेकानंद जी की जन्मजयंती पर सभी को बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएं #युवा_दिवस

08/12/2024

बुकवा!
जब सर्दियों में छोटे बच्चों के हाथ मुंह पछुवा की रूखी हवा से फटते थे तब मां काली सरसों सेंक कर तनिक कच्ची हल्दी डालकर सिल पर बारीक पीस लेती थी।
इसे पीसी सरसों के पेस्ट को बुकवा कहते हैं। आप इसे उबटन भी कह सकते हैं।
कटोरी में रखकर कौड़े में हल्का गर्म करके बच्चों के हाथ, पैर, मुंह में लगाकर मल मलकर छुड़ाया जाता था। इसकी लिझी संग हाथ पैर की मैल उतर जाती थी और त्वचा चमकदार हो जाती थी।
हमारे यहां जब प्रसूति होती है तब बारह दिनों तक दोनों समय जच्चा और बच्चा दोनों को यही बुकवा शुरुआत के कुछ दिन गोड़इतिन अईया और बाद में नाउन काकी लगाती हैं। इससे जच्चा को बहुत आराम मिलता है। शारीरिक दर्द कम होता है।
जब प्रसूति का सूतक खत्म होता है और बच्चा बाहर आ जाता है तब जिसके पास भी समय हो वही बच्चे को बुकवा लगाने बैठ जाता है। बच्चे को दिन भर में चार पांच बार बुकवा दो तीन बार तेल लगाया जाता है और कस कस कर मालिश की जाती है ताकि उसकी हड्डी मजबूत हो और स्वस्थ हो।
सारा दिन बच्चा बिस्तर पर लेटा रहता है इसलिए उसका शरीर दुखता ही होगा इसलिए मालिश करवाने के बाद मां का दूध पीकर कुछ घंटे मस्त सो जाता है।
हमारे यहां जब बिटिया का गौना होता है तब काली सरसों को भाप में उबालकर उसमें लाल हरे रंग में रंग कर कुछ ककड़ी के बीज, कच्ची हल्दी, कचूर, नगरवट मिला कर बुकवा की सामग्री तैयार की जाती है इसे उझिला कहते हैं। उझिला कभी धूप में नहीं सुखाया जाता है उसे छांव में सुखाते हैं कहते हैं कि धूप में सुखाने से बिटिया को ससुराल में जरते(जलते यानि दुखी)रहना पड़ेगा।
ये उझिला सास की पिटारी में रखकर जाता है। सास इसे अपने कुछ खास महिला मित्रो को उपहार स्वरूप देती हैं बाकी नाउन काकी आकर पीसकर नई बहु को लगाती हैं।
इसके बदले में शगुन लेती है।
बेटी के विवाह का दिन नजदीक आते ही भौजाई महीना पहले से ही रोज शाम को बुकवा पीसकर ननद रानी को लगाती हैं ताकि विवाह वाले दिन तक उनका रंग और निखर जाए त्वचा नर्म मुलायम चमकदार हो जाए।

बुकवा पीसकर रखने के लिए बढ़ई काका डोकवा बनाते थे। मोर आकार के डोकवा में आगे गोल कटोरी सी बनी हुई होती थी जिसमें बुकवा रखते थे और पीछे पूंछ की तरफ तेल रखने की जगह होती थी ऊपर से पंख की तरह बना ढक्कन होता था। ढक्कन और डोकवा को जोड़ने के लिए मोर की गर्दन और सर बनाकर लगाया जाता था।
डोकवा बड़ा ही कलात्मक रूप से बना बहुत सुंदर होता था जो बहु उझिला के साथ ही लाती थी और बाद में जब मां बनती थी तब उसके बच्चों को बुकवा लगाने में इस डोकवा का उपयोग होता था।

हमारे उत्तर प्रदेश और बिहार में होली के एक दिन पहले घर के सभी सदस्यों को बुकवा पीसकर लगाया जाता है ताकि होली का रंग त्वचा को नुकसान न पहुंचाएं।


अरूणिमा सिंह

01/12/2024

#आपत्तिकालेमर्यादा_नास्ति
4000 किमी० साझेदारी है बांग्लादेश से हमारी with 100℅ तैयारी
भारत की No First Use (NFU of Nuclear Weapons) and No First Attack की पॉलिसी (मर्यादा) के कारण अबतक ज़मात-ए-इस्लामिक अथवा जेईएल के जेहादियों का उत्पीड़न बांग्लादेशी हिन्दू और अल्पसंख्यक समुदाय को सहन करना पड़ रहा है। अन्यथा भारतीय सेना को मिला एक आदेश मात्र 03 घण्टे में इस पाप और अत्याचार के साम्राज्य को धराशयी कर देगा।
मुस्तैदी का आलम यह है कि अगर दो-चार मिसाइलें गलती से भी चल गई भारत की तरफ़ से तो पैज़ामों का रंग पीला पड़ जायेगा।
हासीमारा एयर फोर्स बेस (20 किमी०)
बागडोगरा एयर फोर्स बेस (30 किमी०)
बिन्नागुड़ी कैंटोनमेंट आर्मी बेस (10 किमी०)
मिस्सामारी आर्मी बेस (20 किमी०)
INS नेताजी सुभाष (200 किमी०)
कई बटालियन "क्रीक क्रोकोडाइल कमांडो"
ये सब शूरवीर वहाँ गुलाब का फूल बांटने के लिए नहीं बैठे हैं।
किन्तु अवश्यकता है तो सनातनी हिंदुओं के जागने की जो दिल्ली में बैठी सरकार को आश्वस्त करें कि देश उनके साथ है।
हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत् ।
मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र समानता: ।।
~ सत्या चौधरी

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