25/09/2026
चुनाव आयोग के भीतर 14 आपत्तियों का राज खुला, SIR पर सियासत गरमाई
दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट से मचा राजनीतिक भूचाल, राहुल गांधी समेत विपक्ष ने CEC पर उठाए सवाल; आयोग बोला—सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए (The Political Line)
चुनाव आयोग को लेकर चल रहा राजनीतिक विवाद अब एक नई परत के साथ सामने आया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर पहले से उठ रहे सवालों के बीच द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर दर्ज की गई लिखित आपत्तियों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और निर्देशों पर कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं।
यहीं से सवाल उठा—अगर आयोग तीन सदस्यीय संस्था है, तो उसके दो सदस्यों ने किन मुद्दों पर लिखित आपत्ति दर्ज की और ये बातें अब सार्वजनिक कैसे हुईं?
आखिर राज सामने कैसे आया?
विवाद की शुरुआत किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर हुए पत्राचार की रिपोर्ट सामने आने से हुई। इंडियन एक्सप्रेस ने आयोग से जुड़े दस्तावेजों और अधिकारियों से बातचीत के आधार पर 23 सितंबर को रिपोर्ट प्रकाशित की।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, नए मतदाताओं के Form-6, SIR से जुड़े अपीलों तथा मतदाता सूची के डिजिटल डेटा की निगरानी जैसे मुद्दों से संबंधित थीं।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने फैसलों को उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए और मतदाता डेटा के नियंत्रण के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई। दोनों ने IT व्यवस्था से जुड़े कार्य-विभाजन को लेकर कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा था।
इन खुलासों ने इसलिए ज्यादा ध्यान खींचा क्योंकि मामला किसी बाहरी आलोचक का नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के ही दो सदस्यों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों का बताया गया।
Form-6 से लेकर मतदाता सूची तक सवाल
विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाला Form-6 भी है। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में इसमें SIR से संबंधित सवाल जोड़े गए थे, जिसमें आवेदक से पिछली SIR मतदाता सूची में स्वयं अथवा माता-पिता/दादा-दादी के नाम से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी।
इसके अलावा पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए नामों तथा बाद में न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ दाखिल अपीलों को लेकर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में चुनाव आयुक्त संधू की ओर से यह सवाल किए जाने का उल्लेख है कि ऐसी अपीलें किसके अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत दाखिल की गईं।
आयोग ने क्या कहा?
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने अंदरूनी मतभेद की तस्वीर को स्वीकार नहीं किया। आयोग की ओर से कहा गया कि सदस्यों के बीच विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय सामने आना सामान्य है और व्यक्तिगत राय को आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
आयोग का कहना है कि SIR समेत सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए।
यानी एक तरफ दस्तावेजों के आधार पर दो आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई, तो दूसरी तरफ आयोग ने अंतिम निर्णय प्रक्रिया में किसी मतभेद से इनकार किया। यही विरोधाभास अब पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक और संस्थागत सवाल बन गया है।
राहुल गांधी ने खोला मोर्चा
रिपोर्ट सामने आते ही विपक्ष ने इसे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से जोड़ते हुए सरकार पर हमला तेज कर दिया। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी।
राहुल गांधी ने कथित 'वोट चोरी' को भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला बताया तथा सत्ताधारी पार्टी और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। 25 सितंबर को भी उन्होंने CEC ज्ञानेश कुमार पर चुनाव और संविधान के बीच की कड़ी को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हुए उनसे सरकारी गवाह बनने जैसी अपील की।
कांग्रेस CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें पद से हटाने की मांग को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन भी कर सकती है
राहुल गांधी के साथ कई विपक्षी नेता मैदान में
मामला केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहा। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने रिपोर्ट को गंभीर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग की।
AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने CEC की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने भी चुनावी सॉफ्टवेयर, Form-6 और मतदाता सूची में बदलावों को लेकर गंभीर आरोप लगाए और CEC के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
कांग्रेस के जयराम रमेश और मनीष तिवारी समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर सवाल उठाए।
इस तरह कुछ ही घंटों में एक प्रशासनिक रिपोर्ट ने विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा तैयार कर दिया।
BJP ने पलटवार किया
विपक्ष के हमले के बीच BJP ने चुनाव आयोग का बचाव किया। BJP प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि किसी संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय और चर्चा होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उनका तर्क था कि महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया।
BJP ने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया। इस तरह मामला अब केवल SIR की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता बनाम विपक्ष के आरोपों के रूप में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
सवाल अभी बाकी हैं
पूरे विवाद में सबसे अहम बात यह है कि दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का विवरण सामने आया है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन आपत्तियों से चुनाव प्रक्रिया में किसी गड़बड़ी का आरोप साबित हो गया है। लेकिन यह जरूर है कि SIR, मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण, Form-6 और आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर सवाल पहले से ज्यादा गंभीर हो गए हैं।
राजनीतिक घमासान के बीच अब नजर इस बात पर है कि इन आपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों और आयोग के स्पष्टीकरण के आधार पर आगे कोई न्यायिक या संस्थागत जांच होती है या नहीं।
यानी चुनाव आयोग पर उठे सवालों की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है—बल्कि 14 लिखित आपत्तियों के सामने आने के बाद इसकी अगली कड़ी अब अदालत, संसद और राजनीतिक मंचों पर लिखी जा सकती है ✍️(अब्दुल रज्जाक कुरैशी)