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1. सर्वश्रेष्ठ मौलिक लेखन अवार्ड - पुरुष, महिला
2. कलम के सिपाही अवार्ड (कविता, कहानी के लिए)- पुरुष, महिला
3. प्रकाशस्तंभ अवार्ड- (धर्म,इतिहास, राजनीति, समाज और समसामयिक मुद्दों पर सशक्त लेखन) -पुरुष, महिला
4. उभरते सितारे अवार्ड- promising creator, discovery of the year- पुरुष, महिला
5. समय यात्री अवार्ड-(travel, food, photography and lifestyle)- पुरुष, महिला
6. रील्स की रानी, मीम्स का राजा- पुरुष, महिला
तो बस कमेंट बॉक्स में अपने फ़ेवरिट लेखक बताइए और टैग भी कीजिए कैटेगरी के अनुसार.
Nitin Tripathi
This is official page of Nitin Tripathi. I am an author, entrepreneur, engineer, traveller, BJP grassroots level worker and right winger.
मेरे एक मित्र हैं, mba करने के पश्चात दिल्ली में धक्के खा रहे थे. एक कम्पनी में मार्केटिंग इग्ज़ेक्युटिव की जॉब रेक्वायअर्मेंट थी, मित्र टाई सूट में गए इंटर्व्यू देने. अंग्रेज़ी में रटा रटाया अबाउट मायसेल्फ़ बोला. कम्पनी मैनेजर ने तीन बंदर निकाल सामने रख दिए. मित्र ने पूँछा यह क्या है, मैनेजर ने चाभी घुमाई, बंदर ताली पीटने लगे. जॉब था कि इन बंदरों को डोर to डोर बेंचो, दुकान दारों को बेंचो, किसी को भी बेंचो पर बेंचो. मरता क्या न करता, मित्र ने किया, बंदर बेंचे. और बीस साल बाद आज वह एक बड़ी कम्पनी में मार्केटिंग हेड के लेवल पर कार्य रत है. उसकी मुख्य वजह यह है कि अपनी पहली ही नौकरी में उसकी मार्केटिंग की इतनी ज़बर्दस्त ट्रेनिंग रही कि वह अब मार्केटिंग एक्स्पर्ट है. mba मार्केटिंग से ही किया था तो डिग्री प्लस अनुभव ने उसका शानदार कैरियर बना दिया.
नौकरी के केस में सदैव वह नौकरी अच्छी होती है जिससे आप अनुभव पा सकें. कई बार लोग b टेक करने के बाद दस हज़ार की नौकरी का उदाहरण देते हैं. मैं तो कहता हूँ दस हज़ार लेना छोड़िए पाँच हज़ार जेब से देना पड़े अगर अपने क्षेत्र की नौकरी मिल रही हो तुरंत कर लेना चाहिए. अनुभव मिलता है. दूसरी तीसरी नौकरी में एक झटके में सब वसूली हो जाएगी.
वहीं यदि पहली नौकरी में ही शर्म में पड़ कर नहीं की, अपनी फ़ील्ड में नहीं की, ऐसी नौकरी नहीं की जिससे आपकी एजुकेशनल डिग्री प्लस बाक़ी credentials को बल मिलता हो तो वैसी पचास हज़ार की नौकरी दस हज़ार की अपनी फ़ील्ड की नौकरी से बेकार है.
अगर आपके पास डिग्री है, तो अगला स्टेप अनुभव है. अनुभव लेने में मत चूकें. भले ही कितनी भी मेहनत करनी पड़े, कितनी ही कम तनख़्वाह हो अपनी शिक्षा के क्षेत्र में जो नौकरी मिले उसे अवश्य करें. यह आपका भविष्य बना देगी. ऐसी कोई भी नौकरी जिसमें पैसे तो हों पर स्किल अपग्रेड न हो रही हो वह बिल्कुल न करें.
05/08/2020
व्यक्ति बड़ा या संस्था या उद्देश्य - यह बात आडवाणी जी से बेहतर कोई नहीं जानता.
आप राम द्रोही कांग्रेसी हैं, सपाई हैं, आपिए हैं तो आपको इसी में मज़ा आ जाएगी कि राम मंदिर की नींव पूजन में आडवाणी जी नहीं हैं.
आप अति भावुक दक्षिण पंथी हैं, आप आँसू बहाएँगे कि आडवाणी जी वहाँ मौजूद नही मोदी जी मुख्य अतिथि हैं.
आडवाणी जी लौह पुरुष हैं. वह इन दोनो कैटेगरी में नहीं है. उन्हें मालूम है उद्देश्य बड़ा फ़िर संगठन फ़िर व्यक्ति.
आडवाणी जी ने आज विडीओ जारी कर बोला :
१) भारत के प्रधान मंत्री राम मंदिर की स्थापना करने जा रहे हैं, यह मेरे लिए ही नहीं, बल्कि सभी भारतीयों के लिए ऐतिहासिक और भावुक दिन है.
२) राम मंदिर निर्माण का सपना भारतीय जनता पार्टी का सपना भी रहा है और मिशन भी.
३) नियति ने मुझे (आडवाणी जी को) मौक़ा दिया कि 1990 में रथ यात्रा का दायित्व प्रदान किया. इस यात्रा ने अधिसंख्य लोगों की आकाँक्षा ऊर्जा और अभिलाषा को प्रेरित किया.
आडवाणी जी का लिखा एक एक वाक्य सोने की लकीर है सब नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए phd करने के लायक़.
यूँ ही हर कोई भाजपा का अध्यक्ष आडवाणी नहीं बन जाता. उसके लिए आजीवन संघ के संस्कार चाहिए होते हैं.
अंग्रेजों के जमाने में राम प्रकाश शर्मा का हाता बहुत विख्यात था. बड़ी हवेली. चारों ओर खुला मैदान. हवेली के दरवाज़े इतने ऊँचे थे कि हाथी अंदर आ सके. दरवाजा पार करते ही बरामदा था जिसमें रस्सियाँ लटकी रहती थीं. लगान ना दे पाने वालों को वहीं बांध कर कोड़ों से पीटा जाता था. फ़िर अतिथियों के रुकने के कमरे थे. खुला हाता था. फ़िर अंदर भव्य महल था. हाते के पीछे की तरफ़ घूर था.
यह क़िस्से बताते बताते दादी की आँख भर आई. बारह साल की आयु में बम्बई के एक बड़े व्यापारी से शादी कर दी गई थी. पिता की मृत्यु के बाद मायके से सम्पर्क टूट गया. अब पचास सालों बाद एंग्लैंड में रह रहे पोते कमलेश के साथ कुम्भ मेले में उत्तर प्रदेश आना हुआ. रास्ते में राम पुर का बोर्ड देख अपना बचपन याद आ गया. कमलेश ने भी अंग्रेज बच्चों को भारत के गाँव दिखाने के लिए गाड़ी रामपुर की ओर मोड़ ली.
पचास सालों में दुनिया ही बदल चुकी थी. हवेली का तो नामों निशान तक ना था. सब जगह कच्चे पक्के घर बने हुवे थे. पुराने युग की इकमात्र निसानी वह जनता को बांध कर रखने वाला बरामदा अभी भी सलामत था, बाक़ी कुछ भी ना बचा था. गाँव वालों ने बताया शर्मा जी की मृत्यु के बाद एक ही पीढ़ी में नौटंकी के नाच, मेलों और शराब में सारी सम्पत्ति लड़कों ने उड़ा दी. अभी भी चचेरी पीढ़ी के वंशज बचोले पीछे घूरे में रहते हैं.
बचोले के घर को सरकारी नियमानुसार घर ना कहा जाएगा. घर में छत तक ना थी. हाँ बीघे भर की जगह ज़रूर थी, विपन्नता चीख रही थी. ब्राह्मण थे तो किसी सरकारी स्कीम से मदद ना थी. प्रधान के चहेते ना थे तो प्रधान मंत्री से आवास भी ना मिलना था. पुराने ज़मींदार थे तो BPL में नाम लिखाने में बेज्जती महसूस होती थी. कुलीन ब्राह्मण ठहरे तो शहर जाकर रिक्शा भी ना चला सकते थे. आय का कोई श्रोत ना था, बस थोड़ा बहुत साझे की खेती से जो आ जाए उतना ही. पर जैसे ही बचोले को पता लगा कि बम्बई वाली जिज्जी आई हैं, क्या आव भगत की.
आनन फ़ानन में बहू ने लड़के को पीछे दरवाज़े से पाँच किलो गेहूं लेकर भेज दिया कि बनिया की दुकान पर गेहूं बेंच बर्फ़ी ले आओ. गाँव वाली बर्फ़ी एंग्लैंड के रहने वालों से एक कौर ना खाई गई, सबने थोड़ा थोड़ा चीख कर नींचे फेंक दिया. वह बर्फ़ी जिसके लिए बचोले के परिवार ने अपना दो वक्त का राशन बेंचा. पर एंग्लैंड के रहने वाले बच्चों को खुला खुला घर बहुत पसंद आया. बच्चों की आँखों में अमीर गरीब का फ़िल्टर नहीं होता. इधर कमलेश गाँव वालों की बेवक़ूफ़ी पर मन ही मन हंस रहा था. कमलेश ने बचोले को बोला भी इतनी बड़ी ज़मीन है घर की, इसे बेंच दो ढाई तीन करोड़ मिल जाएँगे, बम्बई में बढ़िया फ़्लैट लेकर रहो तो बचोले समझाने लगे कि देहरी को बेंचा नहीं जाता.
चलने का वक्त आया. फ़िर से बहू ने बच्चे को भेजा बाहर. दादी सब समझ रही थीं. बच्चा अड़ोस पड़ोस उधार माँगने गया है. आसानी से कोई उधार भी ना देगा. बड़ी मुश्किल से शायद सत्तर रुपए उधार माँग कर लाया और चुपके से माँ को दे दिया. ग़रीबों के बच्चों को लज्जा संस्कार में मिलती है. बचोले ने पचास रुपए कमलेश को और बीस रुपए उसके अंग्रेज बेटे को दिए. कमलेश मन ही मन सोंच रहा था यह एक यूरो के लिए किसी का अहसान क्यों लेना. कमलेश ने भी पचास रुपए बचोले को देना चाहा तो बचोले ने डाँट दिया कि रिश्ते में हम तुम्हारे बाबा लगते हैं. अभी इतने बड़े नहीं हो कि अपने चाचा बाबा को पैसे दे सको.
बचोले बार बार हाथ जोड़ रहा था दुबारा आना. मालूम उसे भी था कि यह पहली और अंतिम मुलाक़ात है. पर उसने सामर्थ्य भर ख़ानदान की इज्जत निभाई. कमलेश को उबकाई आ रही थी. जल्दी से वापस चला जाए AC गाड़ी में बैठा जाए. बचोले के बच्चे भी इंतज़ार में थे कि मेहमान वापस जाएँ तो उन्हें बची बर्फ़ी का एक टुकड़ा खाने को मिले.
संक्षेप में यही कहानी हर भारतीय की है. अपनी छतरी तुमको दे दें, कभी जो बरसे पानी, कभी नए पैकेट में बेंचे तुमको चीजें पुरानी.
#क़िस्से_रामपुर_के े_मेहमान 4
गाँव देहात में सांसद चुनाव जीतना आसान होता है, सबसे मुश्किल होता है प्रधानी का चुनाव जीतना. हर आदमी को वैध / अवैध तरीक़े से खुश रखना होता है. रामपुर में तो प्रधानी का चुनाव एक जलसे की तरह से होता है. छः महीने पहले से ही तैयारी चालू हो जाती है. घाघ लोग पहले से ही निगाह रखते हैं और इसी समय रास्ते पर क़ब्ज़ा, ग्राम पंचायत की ज़मीन पर क़ब्ज़ा सबसे ज़्यादा होता है.
मालूम होता है, इस समय वर्तमान प्रधान जी कुछ ना बोलेंगे. ज़्यादा बड़ी बात हुई / किसी ने बड़े स्तर का सोर्स लगाया भी, तो भी ये वाले प्रधान जी या दूसरे ख़ेमे का प्रत्याशी पूरी तरह से साथ रहेगा. हल्का फ़ुल्का ले देकर काम हो जाएगा. बाद में अपने पक्ष का प्रधान जीता तो आवंटन नहीं तो मुक़दमा लड़ने से रामपुर वाले डरते नहीं. शायद ही कोई ऐसा हो जो पहले से दो तीन मुक़दमे ना लड़ रहा हो.
जैसे जैसे चुनाव पास आएँगे, भंडारे चालू होंगे. हर पक्ष की ओर से भंडारा चल रहा होगा. इधर पूरी सब्ज़ी तो उधर पनीर. तीसरी ओर तो बकरा मुर्ग़ा भी. यही इक मात्र अवसर है जब राम पुर के सब लोग कच्ची से नाक भौं सिकोड़ते हैं. सबको अंग्रेज़ी ही चाहिए होती है. जनता को भी मालूम होता है यह ऐश चुनाव तक ही है. तब तक जितना हो सके मौज ले लो.
अप्रवासी मज़दूर जो नकनाऊ / बम्बई/ कम्पू तक में हैं वह भी चुनाव का इंतज़ार करते हैं. दोनो पक्षों से वादा करके रखते हैं
एक की टिकट तो दूसरे से हज़ार रुपया लेकर अपना अनमोल वोट डालने गाँव आते हैं. मज़दूरों की पाँच वर्ष की इकमात्र पेड वैकेशन प्रधानी चुनाव ही होते हैं.
वैसे यह क़िस्से तो काल्पनिक गाँव राम पुर के हैं, पर यह हक़ीक़त सारे गाँवों की है. सोसल मीडिया पर मैं आप हम सब चाहे जितना चारित्रिक ज्ञान बाँटे, भ्रस्टाचार को गालियाँ दें, प्रधानी के चुनाव में अधिसंख्य वोट ऐसे ही पड़ते हैं, हम आप भी इसमें शामिल हैं. बाक़ी तो फ़िर पुलिस प्रशाशन नेता भ्रस्ट हैं ही..
#क़िस्से_रामपुर_के #प्रधान 3
यूँ तो गाँव देहात में जबसे विकास हुआ है, शाम को सड़क पर शुद्ध शायद ही कोई दिखाई दे, पर टिंकू सुनार का स्वैग ही अलग है. यूँ तो गाँव में देशी, अंग्रेज़ी, बियर सबकी दुकाने हैं, पर जिसे कच्ची की लत लग जाए उसे ये सब असर नहीं करती. टीले वाली माता के पूजन में भले ही कभी कभार विलम्ब हो जाए, टिंकू साल के 365 दिन सूरज निकलने से पहले ही निकल पड़ते हैं मिशन में. कहीं से दस बीस का जुगाड़ हो तो नमक चाँट कर कच्ची पी जाए.
दीवाली का दिन था. टिंकू को उनकी बीबी ने गरिया कर उन्हें घर से निकाल दिया. शाम का समय. बाज़ार में ज़बरदस्त चहल पहल. बिरादरी के सारे नाते रिश्तेदारों के घर ज़बरदस्त चहल पहल तो टिंकू के घर मुहर्रम मन रहा था. टिंकू जीवन से निराश परेशान, निश्चय कर लिया कि अब माता के मंदिर के बाहर तालाब में कूद कर मर ही जाएगा. मन ही मन माता को सच्चे दिल से याद करते हुवे और उलाहना देते हुवे कि माता हम भी तो तुम्हारे भक्त हैं. हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यों? भाई बंधुवों के बच्चे खिलौना, चूरा, गट्टा, मिठाई खा रहे हैं - मेरे बच्चों को दीवाली के दिन सूखी रोटी भी नहीं. आँखों में आँसू भर आए टिंकू की.
माता सबकी सुनती हैं. यक़ीन मानिए टिंकू को सामने सड़क पर सौ रुपए का नोट पड़ा दिखा. टिंकू बता रहे थे कि माता पर उनका विश्वास और गहरा हो गया. नोट को उठाया, आँसू पोंछे, बार बार नोट को माथे से लगाया. ज़मीन को चूमा. फ़िर उस नोट को लेकर तुरंत पहुँच गए मल्लाह बस्ती. माता के आशीर्वाद से आज भर पेट पीने को मिली दालमोठ के साथ.
वैसे यही हाल भारत के विपक्ष का भी हो रखा है. अपनी बेवक़ूफ़ी में 2019 चुनाव में राफ़ेल मुद्दा बना कर, चौकीदार चोर है जैसे ऊल जलूल बातें कर बाप दादाओं की कमाई राजनैतिक सम्पत्ति राहुल बाबा गँवा चुके हैं. फ़िर माफ़ी माँगनी पड़ी अदालत में और जनता से भी. जीसस के आशीर्वाद से मौक़ा मिला चाहें तो अर्थ व्यवस्था जैसे मौक़ों पर सरकार को घेर सकते हैं. पर मौक़ा मिलते ही उन्हें फ़िर से राफ़ेल में ख़राबियाँ याद आ रहा है. तो वहीं अखिलेश भैय्या की यह शिकायत अब तक दूर ना हुई कि इतने महँगे जहाज़ में केवल एक सीट है, कम से कम पीछे कैरियर तो बांध ही सकते थे. मोदी अस्तीफ़ा दो.
#क़िस्से_रामपुर_के #रामपुर_की_इकॉनमी 2
एक नेता जी थे, ज़ोरावर सिंह. बड़े ज़बरदस्त लंबरदार. क्षेत्र जवार में दूर दूर तक उनका भौकाल चलता था.
अम्मा जी की सरकार में नेता जी विधायक बने, मंत्री बने. नेता जी वैसे थे काला अक्षर भैंस बराबर वाले नेता जी ही. पर थे बहुत दबंग. अधिकारियों और अपने पालतू कुत्ते में कोई फ़र्क़ नहीं समझते थे. बड़ी बड़ी मीटिंग में बैठते थे, अधिकारियों को माँ बहन की गालियाँ सुनाते, और अपना हिस्सा सीधे वहीं प्लानिंग बैठक में ही दुगुना कर देते.
अम्मा जी ने बैठक बुलाई थी. अम्मा जी का दरबार सजता था. अम्मा जी सिंहासन पर. बाक़ी सारे मंत्री विधायक नींचे ज़मीन पर. ज़ोरावर सिंह चुनाव का टिकट लेते वक़्त तो पैंर छू आए थे, पर उन्हें लगा था यह वन टाइम डील है. ख़ानदानी लंबरदार ठहरे तो ऐसे नींचे बैठने में उनकी भावना आहत होती थी. पर कोई चारा ना था. सबसे पीछे बैठे. झुक कर बैठने में उनका कुर्ता फँस गया टांगों के बीच तो पोज़ीशन गड़बड़ हो गई. बार बार हिल डुल रहे थे. अम्मा जी ने डाँट लगाई का रे ज़ोरावर काहे धोबी के ग़दहा की तरह फुदक रहा है. ज़ोरावर इस समय तक बिलकुल ग़ुलाम मानसिकता में आ चुके थे.
बैठक समाप्त हुई. ज़ोरावर को रुकने को बोला गया. अम्मा जी आईं. बोला का रे ज़ोरावर सुना है दुगना खा रहा है तू. अधिकारी को बुला कर बोला इसके कुर्ते की जेब बहुत गहरी हो गई है. चेक करो. अधिकारी ने ज़ोरावर के दोनो हाथ ऊपर किए और आठ दस हाथ धरे. फिर ज़ोरावर के कुर्ते की जेब फाड़ उन्हें विदा किया गया. इस निर्देश के साथ कि जितना खाया था सब फटाफट अम्मा जी को पहुँचा जाओ.
उस दिन के पश्चात ज़ोरावर सिंह की राजनीति में वह बात ना रही. उन्होंने लम्बे समय तक राजनीति की, पर दबंगई भौकाल समाप्त सा हो गया था. जब भी वह अग्रेसिव होते तो उन्हें वह घटना याद आ जाती कि किस तरह पहले उन्हें गधा बनाया गया फिर पिटाई की गई फिर नंगा किया गया था. अंत तक आते आते वो ज़ोरावर जो कभी निर्दलीय विधायक जीत जाते थे, उन्हीं अछूत लोगों से जिनके हाथ का वह पानी ना पीते थे, उनसे BDC के चुनाव तक हारने लगें.
और फिर अंत में ज़ोरावर सिंह ने रामनामी पहन ली और भगवा राजनीति करते हुवे जय श्री राम बोल विष्णु लोक में गए.
#क़िस्से_रामपुर_के #रामपुर_की_राजनीति - 1
नोट: रामपुर विषय पर एक सीरीज़ लिखना आरम्भ किया है. यह एक काल्पनिक गाँव है, किसी भी जीवित या मृत्यु से इस घटना या इस सीरीज़ की किसी भी घटना का कोई भी सम्बंध संयोग मात्र माना जाए :-)
यदि मैं कभी बॉलीवुड में फ़िल्म बनाऊँ तो उसमें नाग पंचमी के दिन मनाया जाने वाला गुड़िया का त्योहार ज़रूर दिखाऊँ.
एक ज़माने में साल भर इंतज़ार होता था गुड़िया त्योहार का. सबेरे से ही गाँव के बाहर कोने में प्रधान जी टाइप के लोग दंगल के लिए ज़मीन खुदवाने लगते थे. इधर गली मुहल्ले के लड़कों में साल भर प्रतिस्पर्धा रहती थी दंगल जीतने की. अमीर ग़रीब, बच्चा बूढ़ा, ब्राह्मण ठाकुर तेली मोची सब बिना भेद भाव के दस बजे के आस पास से दंगल में एकत्रित हो जाते थे. और फिर चालू होता दंगल. सब कुश्ती लड़ते थे अपनी अपनी आयु और सेहत के अनुसार. कई बार तो एक ही अखाड़े में चार पाँच कुश्ती चलने लगती. बढ़िया लड़ने वालों को हाथ के हाथ नगद पुरुष्कार.
उधर दूसरी ओर लड़कियाँ घर में गुड़िया बनाती. रंग बिरंगी किलकारी मारती गुड़िया. फिर सारी लड़कियाँ एक ही जगह एकत्रित होती और यह गुड़िया रास्ते में डाल दी जातीं. लड़के दंगल लड़ने के पश्चात दोपहर जब वापसी कर रहे होते तो डंडे/ नीम के डँठल आदि से इन गुड़िया की ख़ूब पिटाई करते. नेपथ्य से लड़कियाँ मधुर स्वर में लोक गीत वाली गालियाँ सुनाती.
तीसरी ओर घर में ग्रहणियाँ खाने की तैयारी कर रही होती. साल के सबसे बड़े त्योहार में यह त्योहार होता था. ग़रीबी बहुत थी. दंगल लड़ने के पश्चात लड़के थक गए होंगे, उन्हें बढ़िया खाने की ज़रूरत है तो शानदार भोजन बनता. पूरी, सब्ज़ी, पनीर वाला. अधिसंख्य घरों में ऐसा शानदार भोजन केवल गुड़िया में ही बनता था.
खाने के पश्चात सब घर से बाहर निकलते. सावन का महीना है, हर घर के बाहर पेंड़ होते थे, हरियाली छाई होती थी और रस्से में लकड़ी का बड़ा पटरा बाँध झूला टंगा होता था. झूले पर तीन चार लोग बैठते और दो लोग पैंगे मारते. बैठे हुवे लोग गाना गाकर पैंग मारने वालों का उत्साह वर्धन करते. हँसी, किलकारी से पूरा माहौल गुंजाय मान हो उठता.
अब गाँव गाँव में पैसे आ गए, प्रगति हो गई, दारू के ठेके आ गए, लेकिन वह किलकारी, वह संगीत, वह सभ्यता विलुप्त हो गई. समाज जातियों में बँट गया. फ़ेमिनिस्ट आ गए जिन्हें गुड़िया का पीटा जाना नारीवादी अधिकारों का हनन लगने लगा. सावन के झूले अब बस वही पार्क में एक बच्चे के झूला झूले जाने जैसे हो गए. गाँवों के घर छोटे होने लगे, हरियाली ग़ायब होने लगी. घर के बाहर खुली जगह, पेंड़ बचे नहीं. सामान्य जीवन में झूम कर गाया जाने वाला लोक संगीत विलुप्त हो गया. बच्चे मिट्टी में खेलने से डरने लगे. निहसंदेह मनुष्य ने बीते दसकों में बहुत पाया है तो गँवाया भी बहुत है.
मोदी जी और योगी जी दो अलग अलग पर्सनालिटी हैं और अपने प्रदेश के स्वाभाविक गुण को रेप्रेज़ेंट करती हैं. दोनो ही ज़मीन से उठे हैं तो ज़मीन की मिट्टी की महक उनकी राजनीति में होना स्वाभाविक है.
मोदी जी गुज्जू भाई हैं. मिठास पसंद. उन्हें आप गाली भी देंगे तो भी मोदी जी बोलेंगे आपकी गाली हमारी ताक़त है. आपिये, लाखों जिहादी, अरविंद, राहुल, मीडिया का एक समूह मोदी जी को क्या क्या नहीं बोला करता. कोई चाय वाला बोलता है तो कोई उससे भी बदतर शब्दों का इश्तेमाल करता है. लेकिन मोदी जी कभी जवाब नहीं देते. जितना मन हो गाली दे लीजिए, मोदी जी का हर ऐक्शन नपा तुला गुजराती चाशनी से भरपूर. मोदी जी से तो उनके कुछ समर्थक ही महीने में दस बार फूफा बने रहते हैं कभी नोटा वाले हो जाते हैं तो कभी स्पाइन दिखाने की बात करने लगते हैं.
योगी जी हैं UP के. इधर नेता में थोड़ी दबंगई ना हो तो लोग उसका मज़ाक़ ही बना डालते हैं. इधर सीधे होना एक लेवल तक तो ठीक है पर जब आपके ख़िलाफ़ में सपा जैसे गुंडे और इटैलियन पार्टी जैसे भ्रस्त हों तो आपको समय समय पर डंडा भी दिखाते रहना होता है. मेरे कई मित्र सपाई हैं, उनसे अक्सर बात होती है तो मैं पूछता हूँ तुम विपक्ष में हो सड़क पर उतरो संघर्ष करो - उनका उत्तर होता है योगी बाबा बहुत पिटाई करेंगे. इधर मजाल नहीं कि कोई जिहादी बवाल काटे. योगी बाबा पहले मारेंगे फिर डंडे के पैसे लेंगे, फिर जेल डालेंगे, फिर जेल भेजने के पैसे भी लेंगे.
कोरोना संकट के बीच जब दिल्ली में जमातियों के एकत्रित होने और उनके द्वारा फैलाए गए नर्क की ख़बरें आई तो अरब से वित्त पोषित भारतीय मीडिया का एक समुदाय आरम्भ हो गया फ़ेक स्टोरी प्लांट करने. उन स्टोरीज़ का मुख्य बिंदु यह था कि जैसा जमाती कर रहे हैं वैसा ही हिन्दू भी कर रहे हैं. पहले फ़ेक ख़बर उड़ाई गई कि वैष्णो देवी में श्रद्धालु फँसे हैं. बाद में वैष्णो देवी बोर्ड ने ख़ानदान किया कि उन्होंने तो लॉक डाउन से एक सप्ताह पूर्व स्वतः ही मंदिर बंद कर दिया था. फिर the wire के वर्धराजन ने फ़र्ज़ी ख़बर उड़ाई कि अयोध्या में राम नवमी का वृहद मेला लगने जा रहा है और जैसे जमाती बोल रहे हैं कोरोना से अल्लाह रक्षा करेंगे, इधर योगी जी बोल रहे हैं राम रक्षा करेंगे.
बस यही गड़बड़ कर दी. कुछ भी कह लेते जोगी बाबा के नाम से फ़र्ज़ी स्टोरी नहीं पेलनी थी. उन्हें पहले विशुद्ध तरीक़े से ट्विटर पर ही समझाया गया, मान जाओ माफ़ी माँग लो - पर वह ठहरे खान मार्केट गैंग वाले. पूरा भरोसा था इटलियन प्रटेक्शन, अरबी फ़ंडिंग और अरविंद के सहारे का. ख़ैर. इधर अयोध्या में ही उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज हुआ है. आज UP पुलिस दिल्ली उनके आवास भी पहुँच गई. चौदह तारीख़ तक का समय दिया है पेशी का. आपराधिक मुक़दमा दर्ज हुआ है.
चोट करारी है, पूरा समूह बिलबिला रहा है.
बाक़ी सनद रहे. जोगी बाबा ऐसे तो संत हैं, पर जब क्रोध में होते हैं तो भय बिनु होहि ना प्रीत भी कहना जानते हैं. UP या जोगी बाबा को टार्गट कर फ़र्ज़ी लिखेंगे तो अपने सामान की सुरक्षा के ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे.
यदि आपने अभी तक भारत सरकार का आरोग्य सेतु ऐप नहीं इंस्टाल किया है तो तुरंत इसे इंस्टाल करें. आज पूरे विश्व ने इस ऐप को गेम चेंजर माना है. यदि देश के सभी लोग इस ऐप को इंस्टाल कर लें तो कोरोना से लड़ाई में यह एक ज़बरदस्त भूमिका अदा करेगा.
ध्यान दें, इस ऐप को ऑल्वेज़ अलाउ लोकेशन की परमीशन अवश्य दें और अपना ब्लू टूथ आन रखें.
प्रथम दृष्टि में तो यह ऐप बस यूँ ही लगता है, आपसे कुछ बेसिक प्रश्न करेगा और इस आधार पर बता देगा कि आप रिस्क की किस कैटेगरी में हैं. यह तो किसी भी वेब्सायट में मालूम पड़ जाता है.
इस ऐप की अहमियत वहाँ है जैसे आप आज किसी परचून की दुकान पर गए. वहाँ कोई सज्जन रमेश भी आए हैं, दोनों ही लोगों को आज नहीं पता कि रमेश के शरीर में कोरोना पल रहा है. दस दिन बाद जब पता चला कि रमेश को कोरोना है, आपको तो पता ही ना होगा कि दस दिन पहले परचून की दुकान में बग़ल में खड़े व्यक्ति को कोरोना निकल आया है.
यह ऐप लोकेशन ट्रैकिंग से यह सब रेकर्ड रखता है और जैसे ऊपर उदाहरण दिया, उस केस में यह आपको तुरंत अलर्ट कर देगा कि सावधान हो जाइए दस दिन पूर्व आपके बग़ल में एक सज्जन थे, जिन्हें कोरोना निकला है. आप अकॉर्डिंग्ली ऐक्शन ले सकते हैं, ख़ुद को आइसलेट कर सकते हैं और यदि आपमें कोई लक्षण दिखते हैं तो तुरंत डॉक्टर की मदद लें, उन्हें भी आसानी रहेगी इस ऐप से बैक ट्रैक करने में कि आपको कहाँ से हुआ और आपसे किसको किसको हो सकता है.
तो यदि आपने इंस्टॉल नहीं किया है तो तुरंत ही aarogya setu ऐप इंस्टॉल करें.
कणिका कपूर के केस में एक व्यक्ति ना मिलेगा जिसने कणिका का पक्ष लिया हो क्योंकि वह हिंदू है. जबकि यह केस तो काफ़ी पहले हुआ था - सबने उसकी लानत मलानत की और उचित भी है.
मज़हबी लोगों को देख लीजिए. ज़हरीली मस्जिद ने पूरे भारत में करोना फैला दिया लेकिन हर मज़हबी बचाव करता नज़र आएगा. पुलिस की गलती, प्रशाशन की गलती, मोदी की गलती, ट्रम्प की गलती - बस हमारी गलती नहीं कि हमने गैधरिंग की फ़िर जाने से मना किया कि अल्लाह बचा लेंगे.
जिहाद यही कहलाता है एक तबका हत्याएँ करता है तो दूसरा घर बैठ उन हत्याओं को उचित ठहराता है.
ज़्यादा नहीं बस दस दिन पहले एंग्लैंड के प्रधानमंत्री कह रहे थे करोना से डरने की ज़रूरत नहीं है. एंग्लैंड को लॉक डाउन भी नहीं करेंगे. वह उलटा डारविन सिद्धांत के आधार पर समझा रहे रहे थे सर्वाइवल ओफ़ थे फिटेस्ट कि सब लोग बाहर निकलो धीमे धीमे करोना से लड़ने की इम्यूनिटी आ जाएगी. उनका कु-तर्क भी था लॉक डाउन से इकॉनमी बर्बाद हो जाएगी, करोना आएगा बस कुछेक लोग मारेंगे बाक़ी सब नोर्मल पहले जैसा.
बस केवल दस दिन में हालत यह हो गई कि एंग्लैंड में रोज़ हज़ारों मरीज़ आ रहे हैं (नब्बे प्रतिशत का तो टेस्ट ही नहीं कर रहे हैं जिससे आँकड़ा कम दिखा सकें). यहाँ तक कि एंग्लैंड के राजा प्रिन्स चार्ल्ज़ को भी करोना हो रखा है. अब एंग्लैंड लॉक डाउन है, प्रधान मंत्री अपील कर रहे हैं कि इकॉनमी गई भाड़ में सब घर में बैठों नहीं पेनल्टी लगेगी. दुनिया हंस रही है उन पर कि बेवक़ूफ़ नंदन दस दिन पहले वैज्ञानिकों को साथ लाकर बेवक़ूफ़ों जैसी theory दे रहे थे और अब लाखों लोगों को मरवा कर वही काम कर रहे हैं जो इन्हें पहले कर लेना था.
और यह हाल एंग्लैंड का जिसके राज में कभी सूर्यास्त नहीं होता था. विश्व के सबसे विकसित देशों में एक. हेल्थ सुविधाएँ वाह वाह. कल्पना कीजिए यदि भारत में ऐसा होता तो प्रलय आ जाती. मोदी जी ने फिर भी थोड़ा संयम से बोला भारत इकीस साल पीछे चला जाता - यदि ऐक्शन ना लिए जाते तो भारत सोमालिया बन जाता.
भारत लकी है कि ऐसे नाज़ुक वक़्त में उसके पास ऐसे नेता हैं जो विजनरी हैं और जो देश का इतना ध्यान रखते हैं. निहसंदेह लॉक डाउन से थोड़ी बहुत कठिनाइयाँ हैं, पर जब ऐसी कठिनाई दिखे तो याद रखिएगा अभी ऐक्शन ना लिया जाता तो इससे दस गुना बड़ी कठिनाई भी आती और घर परिवार वालों की बलि भी देनी पड़ती.
लॉक डाउन का स्ट्रिक्ट्ली पालन करें. चंद बेवक़ूफ़ लोगों की आदत होती है हर अच्छी बात का विरोध करने की, बाक़ी हर समझदार नागरिक समझ रहा है लॉक डाउन अति आवश्यक है.
मोदी जी के शब्दों में जान है तो जहान है.
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