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Vyam Rakshamah - We Protect we are social worker's group.

03/11/2025

*𝐂.𝐇.𝐀.𝐌.𝐏.𝐈.𝐎.𝐍.𝐒 🏆*

*Congratulations to on winning their maiden ICC Women's Cricket World Cup 🇮🇳*

*Take. A. Bow 🙌*

तबांग में घायल चीनी फौजियों से मिलने अस्पताल पहुंचे जिनपिंग को उनके फौजियों ने बताया कि, इस बार भारतीय सेना मंत्रोच्चारण...
15/12/2022

तबांग में घायल चीनी फौजियों से मिलने अस्पताल पहुंचे जिनपिंग को उनके फौजियों ने बताया कि, इस बार भारतीय सेना मंत्रोच्चारण के साथ मार रहे थे। उन मंत्रों का उच्चारण से उनके अंदर अद्भुत ताकत आ गई थीं ।

जिनपिंग ने सर हिलाया और बोला कि, भारत साधुओं का देश है। उन साधुओं ने भारत को अनेकानेक मंत्र दिए हैं। उनका प्रधानमंत्री भी गुफा में बैठकर मंत्र पढ़ता है।

पर, वो मंत्र क्या थे ?
*तब एक चीनी फौजी ने बताया -- मांग चोंग, बहंग चोंग, बहंग के लौगे, गांग तोंग देंगे!!!!*
जिनपिंग ने ट्रांसलेटर मशीन मंगा कर मंत्रों का भावार्थ जानने का आदेश दिया है!🙄

चियर्स

19/01/2022

बूथ पर जाने से पहले याद रखना इस बार होली जुमे के दिन पड़ रही है...

दोपहर 2 बजे तक रंग खेलना हो तो इधर ही रहना 🚩

3 बजे के बाद शाम को होली मनाना हो तो उधर चले जाना🇵🇰

23/10/2021

समझो इस बात को

इस साल गिफ्ट की अदला बदली बंद ...
क्यूँ न इस दीवाली एक नया विचार करे। दोस्तों को मिले तो बिना गिफ्ट के मिले। ये भी क्या परम्पराएँ हम शुरू कर बैठे की तुम मेरे यहाँ आना तो गिफट लेते आना और फिर मैं तेरे यहाँ जाऊंगा तो गिफ्ट लेता जाऊंगा। बड़ी बड़ी कंपनियां चांदी काट रही है और मध्यम वर्ग डिब्बों के रेट उलट पलट रहा है की किस दोस्त को क्या देना है, कौन सा रिश्तेदार कितनी हैसियत का है। कोई दोस्त महंगा गिफ्ट देता है तो उसको गिफ्ट भी महंगा ही वापिस करना होगा और कोई हल्का दोस्त तो गिफ्ट भी हल्का दे दो। और कभी कभी तो पिछले वर्षो के गिफ्ट ही दे देते हे।ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, टीवी और सारा मीडिया आपको ये बताने पर लगा है की कितना कितना सामान कहाँ कहाँ बेचा जा रहा है। ये खबरे नहीं है दोस्तों ये आपका दिमाग घुमाने की साजिश है की आपको लगे सारी दुनिया लगी है सामान खरीदने में आप रह गए पीछे। इस साल इस विचार पर काम करे, दीवाली को दीवाला न बनाए।

इस साल दोस्ती को सेलिब्रेट करे। प्यार को सेलिब्रेट करे।

कुछ छोटे छोटे गिफ्ट्स जैसे बिस्कुट ,लड्डू,फ्रूटी,मोमबती,कपडे,इत्यादि उन गरीब बचो में बांटे जो आपको आते जाते टुकर टुकर देखते रहते है। यही सच्ची दिवाली होगी।

बदलो समाज को , लाओ नए विचार और शुरुआत करो अगर कुछ अच्छा लगे

शुभेच्छा🥰
अमिताभ 💓🙏🏽

26/09/2021

पता नहीं कैसे, कार के पावर स्टीयरिंग का ऑयल लीक हो गया... चलते चलते स्टीयरिंग फेल होने का खतरा पैदा हो गया.... जहां हूँ, वहां सिर्फ एक पावर स्टीयरिंग मैकेनिक है,नाम सद्दाम मिस्त्री !... आज सुबह दस बजे अपॉइंटमेंट मिला ! सद्दाम बमुश्किल 24 साल का लौंडा था, एकदम अंगूठा छाप....

भाई ने कार का बोनट उठाया,झुका, आंखों से एक्सरे जैसा किया और घोषणा कर दी कि कार का स्टीयरिंग रैक 'लीकेज' है ! हमने पूछा कि पावर स्टीयरिंग ऑयल पम्प तो ठीक है,सद्दाम ने चाबी लेकर गाड़ी में एक सेल्फ मारा और पम्प के 'टनाटन' अर्थात OK होने की घोषणा कर दी....

हमारे पेट मे मरोड़ उठने लगा कि कम से कम रु 1000-1200 /- का चूना तो पक्का लगेगा ! सद्दाम मिस्त्री ने बम फोड़ा.... आठ सौ रु स्टीयरिंग असेम्बली की उतराई और फिट कराई के लगेंगे... रु 3000/- सद्दाम मिस्त्री के रैक रिपेयरिंग के... मने रु 3800/-... रु और 200/- का ऑयल पड़ेगा ....

बुढ़िया कार के ऊपर रु 4000/-....? हमारे माथे पर आ पसीना गया.... हम घिघियाये कि " भाई हम पुराने ग्राहक हैं,पड़ोसी हैं " (हालांकि यह सफेद झूठ था ) ! मग़र 24 साल के अनपढ़ मग़र हुनरमंद लौंडे ने हमारी बात पर गौर करने की जगह दूसरे ग्राहक से बात शुरू कर दी !... चार पैसे बच जाएं तो हिन्दू अपनी पगड़ी तक ज़मीन पर रख देता है... सो हमने भी कोशिश की !... मग़र सद्दाम मिस्त्री नहीं माना ....

पूरा दिन इंतजारी में बिता... सद्दाम साहेब की नज़रे इनायत अपरान्ह 3 बजे हुई... 6 बजे,शाम.... रु 3800 /- सद्दाम मिस्त्री को थमा कर रोते-धोते घर लौटे !...

मेरे सामने कुछ घण्टों में कटिहार के रहने वाले 24 साल के अनपढ़ लड़के ने कम से कम रु 15000-20000 रु पैदा कर लिए ! विश्वास मानिए, मेरे द्वारा दिये गए रु 3800/- में मात्र 200 रु का ऑयल, 2-3 खुद की जुगाड़ की गई सीलें, जो 25 रु से ज़्यादा की नहीं होंगी... डाली गईं ! सूखे रु 3500 /- सद्दाम की जेब मे गए ! कोई हेल्पर नहीं ! यह होती है,हुनर की कीमत और पारितोषिक ! 24 साल का सद्दाम फिलहाल एक कार भी एफोर्ड करता हैं ....

हमारे बच्चे क्या करते हैं ? जनाब लाखों रु खर्च कर दिल्ली,नोएडा में बीटेक करते हैं....दो दो हज़ार किलोमीटर दूर जाकर पेइंग गेस्ट रहकर रु 15-20,000 की महीना तनख्वाह उठाते हैं.... मां-बाप ...बेटे-बेटी के दीदार को तरस जाते हैं ! कुछ को बड़े पैकेज भी मिल जाते हैं.... मग़र यह बीटेक/MCA... इनकम, अवकाश और वर्क सैटिस्फैक्शन में 'सद्दाम' से हमेशा पीछे रहते हैं...

सद्दाम दस-बारह साल में 6 बच्चों की टीम तैयार कर देता है ! हमारे बच्चे 35-38 साल के होकर 'सूटेबल' 'ब्राइड' और 'ग्रूम' की तलाश करते रहे जाते हैं !... हमारे बच्चों के बूढे... मां-बाप... अंतिम सांस लेते समय अक्सर अकेले होते हैं .....

सच बताना ज़िंदगी की असली जंग में कौन जीता...?
मेरे हिसाब से सद्दाम !!

02/08/2021

सिर्फ जिस्म ही नहीं..

जान भी होती हैं औरत में..

30/07/2021

*जिसपर था सर्वस्व लुटाया,*
*मेरा वो अरमान कहां है?*
*बोलो नेहरू बोलो गांधी,*
*मेरा हिन्दुस्तान कहां है?*

*सैंतालीस में भारत बांटा,*
*'उनको' पाकिस्तान दे दिया;*
*"दो गालों पे थप्पड़ खा लो"*
*मुझे फालतू ज्ञान दे दिया;*
*मुझे बताओ यही ज्ञान तुम,*
*'उनको' भी तो दे सकते थे;*
*नहीं बंटेगी भारत माता,*
*ये निर्णय तुम ले सकते थे;*
*मगर देश को छिन्न-भिन्न कर,*
*दुनिया भर की सीख दे गए,*
*हिन्दू को दो-फाड़ कर दिया,*
*आरक्षण की भीख दे गए!*
*एक अरब हिन्दू लावारिस,*
*कहो हमारा मान कहां है?*
*बोलो नेहरू बोलो गांधी,*
*मेरा हिन्दुस्तान कहां है?*

*'सेकुलर' राष्ट्र बनाना था तो,*
*बिन बंटवारे भी संभव था;*
*छद्म-धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र,*
*बिन भारत हारे भी संभव था;*
*'उन्हें' पालना ही था तो,*
*क्यों टुकड़े भारत के कर डाले?*
*मुझे बताओ किस की ख़ातिर,*
*डाके अपने ही घर डाले?*
*एक चीन क्या कम दुश्मन था,*
*बाजू पाकिस्तान बिठाया;_*
*कदम-कदम पर इसी पाक से,*
*हम सब ने फिर धोखा खाया;*
*जितनी सस्ती जान हमारी,*
*उतनी सस्ती जान कहां है?*
*बोलो नेहरू बोलो गांधी,*
*मेरा हिन्दुस्तान कहां है?*

*मुस्लिम की ज़िद पूरी कर दी,*
*हिन्दू का अधिकार भुलाया;*
*भूले सावरकर की पीड़ा,*
*और बोस का प्यार भुलाया;*
*धूल-धूसरित, जग में लज्जित,*
*भारत का सम्मान कर दिया;*
*दो लोगों की पदलोलुपता,*
*पे भारत बलिदान कर दिया !*
*उधम सिंह को पागल बोला,*
*मरने दिया भगत को तुमने;*
*चापलूस के हैं पौ-बारह,*
*दिखला दिया जगत को तुमने;*
*जो जीते उनको हरवाया,*
*'वल्लभ' का सम्मान कहाँ है?*
*बोलो नेहरू बोलो गांधी,*
*मेरा हिन्दुस्तान कहां है?*

*टूटा -फूटा जैसा भी था,*
*सैंतालिस में भारत पाया;*
*पर मुझको भी हक़ मिल जाये,*
*ये तुमको हरगिज़ ना भाया;*
*मुल्लों की तनख्वाह बांध दी,*
*मंदिर लूटे तुमने जी भर;*
*सेकुलर की परिभाषा गढ़ दी,*
*उन्हें सब्सिडी हिन्दू पे कर !*
*ना पुराण ना वेद पढ़ाये,*
*जाने क्या बकवास पढ़ाया;*
*शिक्षा में घोटाला कर के,*
*अधकचरा इतिहास पढ़ाया;*
*पूछे गौरव इस भारत में,*
*हिन्दू की पहचान कहां है?*
*बोलो नेहरू बोलो गांधी,*
*मेरा हिन्दुस्तान कहां है?*

26/07/2021

देश के बड़े अख़बार दैनिक भास्कर के दिवंगत ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक की आत्महत्या के मामले में मंगलवार को बहस के दौरान न्यायाधीश ने ऐसी टिप्पणी की, जो इस अख़बार विश्वसनीयता पर कड़ा प्रहार करती है। न्यायाधीश ने कहा जिस संपादक ने इस अखबार को खून पसीना देकर खड़ा किया, उसकी मौत को भी जब ये लोग सच्चे तरीके से नहीं छाप सकते तो इनकी विश्वसनीयता कहां है। एक ऐसा अख़बार जो हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की नींव पर खड़ा हुआ, उसके कंगूरे पर सेकुलरिज्म और राष्ट्र विरोध अट्टाहस कर रहे हैं।
सन 1958 में दैनिक भास्कर बहुत छोटे स्वरूप में शुरू हुआ था। 1983 आते-आते इसने मध्यप्रदेश में अपने पैर पसारना शुरू कर दिए थे। नब्बे के दशक में भास्कर राम जन्मभूमि की शानदार रिपोर्टिंग कर अचानक पाठकों का प्रिय अख़बार बन गया। ये वक्त बाहुबली नईदुनिया के ढहने का समय था और भास्कर के उदय का। जैसे-जैसे इस अख़बार के कदम शिखर पर बढ़ते चले गए, राष्ट्रवाद नदारद होने लगा। सेकुलरिज्म के कोढ़ ने जल्द ही भास्कर को आ घेरा। सन 2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद ये अख़बार केवल मोदी और सरकार का विरोधी बनकर रह गया।
पत्रकारों की बेहतरी के लिए आए मजीठिया वेतन आयोग का सारे ही अख़बारों ने विरोध किया लेकिन दैनिक भास्कर ने तो इस प्रकरण में क्रूरता की सीमाएं पार कर दी। कितने ही प्रतिभाशाली पत्रकार प्रताड़ित किये गए। कितनों से इस्तीफे लिखा लिए गए। भास्कर के सैकड़ों कर्मचारी अपने परिवार सहित सड़कों पर आ गए। जिन लोगों ने कोर्ट की शरण ली, उन्हें मजीठिया का पैसा तो मिल गया लेकिन वे भास्कर में नौकरी करने लायक नहीं रहे। स्थापित होने के बाद अख़बार ने उन विश्वासपात्र कर्मचारियों/पत्रकारों पर तलवार चलानी शुरू कर दी, जिन लोगों ने इसे शीर्ष पर लाकर खड़ा किया था।
आज दैनिक भास्कर कई गंभीर प्रकरणों में घिरा हुआ है। भास्कर पर आरोप है कि अपने संस्कार वैली स्कूल के लिए वन विभाग की 35 एकड़ जमीन हड़प कर निर्माण करवा दिया। जबकि ये भूमि चरनोई की थी। अब मामला ग्रीन ट्रिब्यूनल में लंबित है। भास्कर के संचालकों के नाम एक बड़े घोटाले में भी आए हैं। मध्यप्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम का ये घोटाला लगभग सात हज़ार करोड़ का बताया जा रहा है। भास्कर के संचालक सुधीर अग्रवाल और गिरीश अग्रवाल पर इस मामले में एक बार गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो चुके हैं।
जब दैनिक भास्कर ने होली पर पानी बचाओ अभियान की शुरुआत की थी, तब इसे लोगों ने सामान्य तौर पर लिया था। जबकि ये अभियान दैनिक भास्कर के हिन्दू विरोधी अभियान की शुरुआत थी। इसके बाद तिलक वाली होली का अभियान आया तो कम संख्या में ही सही विरोध शुरू हो चुका था। अब तक स्पष्ट हो चुका था कि कभी हिंदुत्व की बात करने वाले भास्कर पर अब ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग का रंग चढ़ने लगा है। आए दिन त्योहारों को लेकर भास्कर की अपीलें लोगों को परेशान करने लगी। भास्कर ने कभी ईद पर बकरे काटने के विरोध में अपील जारी नहीं की, इस कारण पाठकों का गुस्सा और बढ़ने लगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चढ़ता सितारा इस अख़बार को रास नहीं आया। भास्कर ने फेक ख़बरों के माध्यम से प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल की छवि ख़राब करने प्रयास किया। मोदी विरोध इस कदर हावी रहा कि अख़बार के कार्टूनिस्ट और फ़िल्मी कॉलम भी मोदी विरोध के काम आने लगे। दैनिक भास्कर शीर्ष पर बैठा भांप नहीं सका कि उसकी छवि राष्ट्र विरोधी हो चुकी है और वह हिंदुत्व पर प्रहार कर रहा है। हाल ही में पुलवामा हमले की रिपोर्टिंग में अख़बार की बेशर्मी सामने आई और देश के लोगों का गुस्सा फट पड़ा। अख़बार ने पहले पेज पर विज्ञापन लगाकर जताया कि पुलवामा अटैक उसके लिए रोजमर्रा की घटना है।
पुलवामा के जवानों के बलिदान को व्यवसायिक रूप से भुनाने वाला भास्कर अब भी अपनी घटती लोकप्रियता से बेखबर है। पुलवामा पर अपने बेशर्मी के लिए माफ़ी मांगना तो दूर, उसने कार्टूनों की एक नई सीरीज शुरू कर दी। जवानों के बलिदान से आहत भारत की जनता ने अब खुलकर भास्कर का विरोध शुरू कर दिया है। भास्कर ने जता दिया है कि वह आगे भी ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के हाथों खेलता रहेगा। शिखर पर चढ़ना उतना मुश्किल नहीं होता, जितना उस पर टिके रहना। दैनिक भास्कर के पैर शिखर से फिसल रहे हैं। भास्कर से प्रताड़ित सैकड़ों कर्मचारियों की बद्दुआ और देश के लाखों लोगों की लानत-मलानत अब रंग ला रही है। राष्ट्रवाद की लौ से प्रज्जवलित हुआ भास्कर का सूर्य अस्त होने की ओर अग्रसर है।
साभार 🙏

14/07/2021

कोई तुम से पूछे कौन हूँ मैं
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा
एक झूठ है आधा सच्चा सा
एक ख़्वाब अधूरा पुरा सा
एक फूल है रुखा सुखा सा
एक सपना है बिन सोचा सा
एक अपना है अनदेखा सा
एक रिश्ता है अंजाना सा
हक़ीकत में अफ़साना सा
कुछ पागल सा दिवाना सा
बस एक बहाना अच्छा सा
जीवन का ऐसा साथी है
जो दूर हो तो कुछ पास नहीं
कोई तुम से पूछे कौन हूँ मैं
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
👍

30/05/2021

उर्दू गालियों की विकृत कुसंस्कृति का बोझ ढोती हिन्दी

भाषा मनुष्य के सर्वोत्तम आविष्कारों में से एक है। यह भावों को व्यक्त करने में सहायता करती है। आपस में संवाद को सुगम बनाती है। पीढ़ियों और सभ्यताओं के मध्य सेतु का कार्य करती है। विचारों की गहनता को बढ़ाती है। अर्जित ज्ञान का संचय शुद्ध रूप में लंबे समय तक करती है।

भाषा का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह उस स्थान की संस्कृति और सामाजिक मान्यताओं को अपने साथ लेकर चलती है जहाँ से उसका उद्भव हुआ हो।

एक उदाहरण लेते हैं जिससे अधिक स्पष्टता आए। वर्ष 2004 की बात है। लखनऊ विश्वविद्यालय के खचाखच भरे मालवीय सभागार में के.एन. गोविंदचार्य जी वक्तव्य दे रहे थे। उन्होंने उपस्थित समूह से कहा कि ‘पुण्य’ शब्द के समान अर्थ वाला किसी दूसरी भाषा का कोई शब्द बताएँ। किसी ने ‘Blessing’ बोला, किसी ने ‘शबाब’ बताया तो किसी ने ‘Virtuous’। Holy, Sacred, Charity, Righteous आदि उत्तर भी दिए गए। परंतु न तो बाकी लोग किसी भी उत्तर से संतुष्ट थे, न गोविंदचार्य जी और न ही स्वयं उत्तर देने वाले।

कारण ये है की ‘पुण्य’ केवल एक शब्द नहीं है। भारतीय संस्कृति की झलक दिखने वाला एक झरोखा भी है। कोई गंगा नहा के पुण्य कमा सकता है तो कोई माँ-बाप की सेवा कर के। भूखे को खाना खिलाकर या प्यासे को पानी पिलाकर भी पुण्य अर्जित हो सकता है। चींटी को आटा, मछली को चावल, गाय को पहली रोटी खिलाकर या कुत्ते को आखिरी रोटी देकर पुण्य का पलड़ा भारी किया जा सकता है। पेड़ लगाना पुण्य का काम है तो उन्हे सींचना भी कम पुण्यकारी नहीं है। राजा प्रजा की सेवा करके पुण्य कमा सकता है तो प्रजा राजा को कर (टैक्स) देकर। ऐसे अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं। आस्था आधारित पुण्य प्राप्ति के विकल्प तो अलग से हैं हीं।

इसीलिए किसी और भाषा में ऐसा समानार्थी शब्द नहीं मिलता जो ‘पुण्य’ में निहित समग्र विचार को समेट सके। ‘पुण्य’ की व्यापकता उन संस्कृतियों से उपजे शब्दों के बांधे नहीं बंधती जहाँ इतनी विराट संकल्पना ही न हो।

‘तलाक’ या ‘Divorce’ शब्द के साथ भी यही है। ढूँढने पर भी हिन्दी में इसके समानार्थी शब्द नहीं मिलता क्योंकि विवाह जैसे पवित्र बंधन के विच्छेद का कोई कान्सेप्ट ही यहाँ नहीं था।

ऐसे ही धर्म, वर्ण, शब्दोें के समानार्थी शब्द किसी अन्य भाषा में नहीं मिलते।

अब आते हैं उन शब्दों पर जिन्हे हम ‘हिन्दी गाली’ कहते हैं। जितने भी फूहड़ और यौन-कुंठा के शब्द हिन्दी गालियों के रूप में बोले या बताए जाते हैं अगर उनके उद्भव की पड़ताल करें तो हिन्दी क्या किसी भी भारतीय भाषा से उनका संबंध दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं मिलता।

हाँ, उर्दू का विकास अवश्य ऐसी भाषा के रूप में हुआ है जिसमें मुख्यतः अरबी-फारसी-तुर्की शब्द ही बहुतायत हैं। उर्दू के शिक्षक, शायर आदि सभी प्रयुक्त अरबी-फारसी-तुर्की शब्दों को उर्दू के शब्द कहते हैं। यह सही भी है। वस्तुतः सही अर्थों में उर्दू भारत में अरबी-फारसी-तुर्की भाषा की वाहक है।

और इसी आधार पर हिन्दी में प्रयोग होने वाली सभी अश्लील गालियाँ हिन्दी नहीं अपितु ‘उर्दू गालियाँ’ हैं।

प्रमाण के लिए किसी को माँ की गाली देने हेतु प्रयुक्त सर्वाधिक प्रचलित शब्द को लेते हैं। इसका पहला भाग ‘मादर’ शब्द है। ‘मादर’ अरब में माँ के लिए प्रयुक्त होता है इससे बनने वाले अन्य शब्द जैसे मादरे-वतन (मातृभूमि) या मादरे–जबान (मातृभाषा) उर्दू में भी बहुलता से पढ़ने-सुनने को मिल जाएंगे। इस गाली का दूसरा पद (मैं यहां लिख नहीं सकता क्योंकि मेरे संस्कार मुझे इसकी इजाजत नही देते) आक्रामक यौनिकता का शब्द है। जो संस्कृत, अवधी, बृजभाषा, खड़ी बोली आदि में कहीं भी नहीं मिलता।

इसी तरह से ‘हराम’ भी अरबी शब्द है। हरामखोर, हरामज़ादा, हरामी, हराम की औलाद जैसी गालियाँ इसी से निकली हुई हैं। ये सभी गालियाँ भी व्युत्पत्ति के आधार पर आयातित हैं और भारत में इन्हे उर्दू गालियाँ कहना सर्वथा उपयुक्त होगा।

बिल्कुल ऐसे ही शरीर के अंगों को अश्लील शब्दों में व्यक्त करना इन गालियों की एक अन्य प्रवृत्ति है। इन शब्दों में शरीर के गुप्तांगों को गाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। हाँ, जो भी गालियाँ जो इसस समय आपके दिमाग में आ रही हैं वो सभी। इन अंगसूचक गालियों का प्रयोग सदैव नापने की सूक्ष्मतम इकाई के लिए, किसी को मूर्ख बताने के लिए, किसी को अक्षम या असहाय प्रदर्शित करने के लिए, किसी वस्तु की निरर्थकता साबित करने हेतु अथवा किसी कथन की महत्वहीनता को प्रकट करने में किया जाता है। इन अंगसूचक अश्लील शब्दों में से किसी का भी उद्भव किसी भी हिन्दी अथवा इसकी बोलियों में नहीं मिलता। अरबी, फारसी, तुर्की भाषाओं में कुछ शब्द, कुछ उपसर्ग-प्रत्यय अवश्य मिल जाते हैं। भारत में इस शब्दावली की वाहक सहज रूप से उर्दू ही है।

हाँ, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा निर्मित ‘वर्धा हिन्दी शब्दकोश’ में ही इनमें से कुछ शब्दों को पाया जा सकता है। और वो भी इसलिए कि उस शब्दकोश में प्राक्कथन में ही यह स्पष्ट लिखा है कि हिन्दी क्षेत्र में बहुलता से प्रयोग होने वाले अरबी-फ़ारसी आदि शब्दों को इस शब्दकोश में सम्मिलित किया गया है।

एक स्टैन्ड-अप कॉमेडियन है- जाकिर खान। अपने चुटकुलों में अपनी गर्लफ्रेंड को वो बार-बार बहन कहकर संबोधित करता है। बाद में श्रोताओं से दांत फाड़ते हुए पूरे गर्व के साथ कहता है कि मैं तो मुसलमान हूँ हमारे यहाँ भाई-बहन में ये सब चलता है। जाकिर खान इकलौता नहीं है। ऐसी विकृत मानसिकता के अधिकतर व्यक्तियों से सामान्य बातचीत में आप यह विचार देख सकते हैं।

हाल ही में पाकिस्तान में महिला अधिकारों से संबंधित ‘औरत-मार्च’ निकाला गया। इसमें एक पोस्टर बहुचर्चित रहा जिसमें लिखा था- ‘My brother showed me porn’ (sic). इस पोस्टर के ट्वीट पर लाहौर के एक डॉक्टर फैसल राँझा ने लिखा कि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से यह सत्य है कि उनके पास ढेर सारे माता-पिता अपनी बेटी के गर्भपात के लिए उनके पास आते हैं जो लड़कियाँ अपने भाइयों द्वारा गर्भवती हुई होती हैं।

अब इस विकृत वैचारिक कुसंस्कृति से जो भाषा निकलेगी उसमें ‘मादर # #’ , ‘बहन # #’ , 'मां की # #' , 'बहन की # #' , जैसे शब्द निकल के आयें तो यह बिल्कुल भी अचरज की बात नहीं है।

कहावत ही है- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय।

बाकी रक्षाबंधन या भाई-दूज मनाने वाली संस्कृति से निकला कोई भी व्यक्ति लोक-प्रचलन के कारण अथवा अनजाने में इनका प्रयोग भले कर ले परंतु ऐसे शब्दों का निर्माण नहीं कर सकता। इतनी कुत्सितता मस्तिष्क में आने का कोई वैचारिक स्रोत भी होना तो चाहिए!

अब बात करते हैं हिन्दी भाषा में आने वाले अपमानजनक शब्दों की। हिन्दी में अपमानजनक शब्दों का भी अपना शब्दकोश है जिसमें मूर्ख, गदहा, कुकुर, ऊदबिलाव, सरऊ, मुँहझौंसे, बिलबिलहे, चपड़गंजू, मग्घे, जैसी अनेकों गालियाँ हैं। कई मुहावरे भी अपमान के लिए प्रयोग में आते हैं जैसे ‘दाल-भात में मूसरचंद’, ’बिना पेंदी का लोटा’, ‘सावन का अंधा’, ‘थोथा चना बाजे घना’, ‘कुत्ते की पूँछ सीधी नहीं होती’ आदि। विदेशज शब्दों के प्रयोग से भी नए मुहावरों का भी निर्माण हुआ है जैसे- ‘बाप मरे अंधेरे में, बेटा पावरहाउस’। परंतु इनमें न तो स्त्री के अपमान का भाव है और न ही यौन कुंठा का। उल्लेखनीय यह भी है कि अलग-अलग इन मुहावरों का प्रयोग भिन्न-भिन्न परिस्थिति के अनुसार ही किया जाता है। अतः इन अपमानजनक शब्दों के प्रयोग के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता होती है।

कदाचित अब समय है कि हम सभी हमारी दिनचर्या की शब्दावली में घुसपैठ कर चुके इन अनैतिक, स्तरहीन, असामाजिक और कुंठाग्रस्त शब्दों का क्रमिक रूप से बाहर करने के प्रयास आरम्भ करें। प्रक्रिया लंबी है; और दुरूह भी। परंतु कहीं न कहीं से आरंभ करना होगा। संभवतः इन अपशब्दों के अभारतीय होने का उद्घाटन और इस संदेश का प्रसार इस दिशा में एक लघु प्रयास होगा।

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