Sahitya-Jyoti prakash

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hindi kavita-kabya jyoti abhisar

03/02/2019
03/06/2018

आह!दुर्भाग्य,,,आह!दुर्भाग्य!! JAI KISAN-ANNADATA- J P SINGH
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

आकाश में बनाते-बिगड़ते कभी रंगीन- कभी स्याह चित्र ,
और उफनती नदी के पानी में घुली मृत मछलियों की दुर्गन्ध //
पहाड़ो की चोटियों से लुढ़कता चट्टानों का कलेजा //

बादलों का पक्षपाती रवैया ,
मेड़ के उस पार बारिश ,
इस पार छटपटाते सूखे खेत//
रेत के मैदान में चमकते सूरज से आती हीरे का सम्मोहन !

तपते जमीन पर चलते नंगे पैरो को,
वीराने में दिखी एक पैर की टूटी चप्पल //
अधमरी नहर के सरहद को लाँघ ,मंजर जमीन में रिसता जल//

बारात विदा होने के बाद ,
जूठे पत्तलों पर गुर्राते कुत्तो की होड़!!
खड़े पेड़ को विस्मय!से निहारती,
नीचे लेटी उसकी एक कटी ड़ाल !,

बिन सीसे की टूटी लालटेन से ,
जलते दीप सा जीवन !
और मिटटी की कच्ची दीवारो प़र,
जमे धुओ का अन्धकार //

पुण्य नदी के किनारे सड़ती
भगवान के गले से निकली '
पुरानी मालाओ का ढेर !

खपरैल छज्जे से टपकती,
वर्षा बूंदों के बिच फसी खाट,
सन्नाटे में टपकने का अन्तर्नाद!
और पसीज कर सोने का अभ्यास //

गहरे कुए में तैरती ,
प्लास्टिक की टूटी बाल्टी,चप्पल,
न निचे न ऊपर ..
अंतर्द्वंद और उन्माद !!

लकड़ी के चूल्हे प़र '
फूलती रोटी का आकर्षण,मुस्कान!
और धुएं से पिघलती आँख //

मूंगफली खाकर ,
रद्दी कागज़ प़र ,
बस में उंघते हुए ,
कविता उकेरने की प्यास !!

सुनी घाटी को सुनाना,
ह्रदय की चीत्कार ,
और प्रतिध्वनि ,
निःशब्द! निःश्वास ! निरुपाय!

बिजली के तारो में फसे,
कटी पतंगों की उड़ान!
कागज की नाओ का,
आगे जा के पलट जाना!!

साथी को छटपटाते ,
कटते देख भी विवश !
लोहे की जाल में कैद ,
मुर्गो का आक्रांत !!

चींटियो के करवा से ,
चीनी के दानो और मृत फतिंगो की लुट !
पवित्र गीता की कसम खाकर ,
अदालत में धड़ल्ले से बोला जाने वाला झूठ //

कूड़े के ढेर में पेट ढूंढ़ती ,
सात-आठ साल की नाक !
बंद घर में विलुप्त उछलती गेंद,
और छत पे बिछी कई का लेप!!

सड़क के किनारे पड़े लक्ष्य लंबित,
सरकारी पुलियों प़र लिखे विज्ञापन !
अँधेरे में उसमे टिमटिमाती ,
छोटे-बड़े दस आँखों का परिवार !!

चाय के भाप से ,
भयंकर कुहरे को पिघलाने की जिद,
संडास में रखा मायूस ,बदरंग,
ऊँघता रंग का खली डिब्बा!

कटीली झाड़ियो प़र लिपटे,
चिथड़े और अंदर से आती मर्मभेदक आवाज !

टूटे ढोलक के चमड़े को ,
नोचते गली के आवारा कुत्ते !
और फटे छाते को सिलती ,
धुप की डोर !!

गर्म लोहे को पिटती,
लोहे की हथौडियो का वैराग्य !
सा कई नरमुंड का जीवन ,
आह! दुर्भाग्य! ,,,आह! दुर्भाग्य !!

ER. JYOTI PRAKASH SINGH

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03/06/2018

आह!दुर्भाग्य,,,आह!दुर्भाग्य!!
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आकाश में बनाते-बिगड़ते कभी रंगीन- कभी स्याह चित्र ,
और उफनती नदी के पानी में घुली मृत मछलियों की दुर्गन्ध //
पहाड़ो की चोटियों से लुढ़कता चट्टानों का कलेजा //



बादलों का पक्षपाती रवैया ,
मेड़ के उस पार बारिश ,
इस पार छटपटाते सूखे खेत//
रेत के मैदान में चमकते सूरज से आती हीरे का सम्मोहन !



तपते जमीन पर चलते नंगे पैरो को,
वीराने में दिखी एक पैर की टूटी चप्पल //
अधमरी नहर के सरहद को लाँघ ,मंजर जमीन में रिसता जल//



बारात विदा होने के बाद ,
जूठे पत्तलों पर गुर्राते कुत्तो की होड़!!
खड़े पेड़ को विस्मय!से निहारती,
नीचे लेटी उसकी एक कटी ड़ाल !,



बिन सीसे की टूटी लालटेन से ,
जलते दीप सा जीवन !
और मिटटी की कच्ची दीवारो प़र,
जमे धुओ का अन्धकार //



पुण्य नदी के किनारे सड़ती
भगवान के गले से निकली '
पुरानी मालाओ का ढेर !



खपरैल छज्जे से टपकती,
वर्षा बूंदों के बिच फसी खाट,
सन्नाटे में टपकने का अन्तर्नाद!
और पसीज कर सोने का अभ्यास //



गहरे कुए में तैरती ,
प्लास्टिक की टूटी बाल्टी,चप्पल,
न निचे न ऊपर ..
अंतर्द्वंद और उन्माद !!



लकड़ी के चूल्हे प़र '
फूलती रोटी का आकर्षण,मुस्कान!
और धुएं से पिघलती आँख //



मूंगफली खाकर ,
रद्दी कागज़ प़र ,
बस में उंघते हुए ,
कविता उकेरने की प्यास !!



सुनी घाटी को सुनाना,
ह्रदय की चीत्कार ,
और प्रतिध्वनि ,
निःशब्द! निःश्वास ! निरुपाय!



बिजली के तारो में फसे,
कटी पतंगों की उड़ान!
कागज की नाओ का,
आगे जा के पलट जाना!!



साथी को छटपटाते ,
कटते देख भी विवश !
लोहे की जाल में कैद ,
मुर्गो का आक्रांत !!



चींटियो के करवा से ,
चीनी के दानो और मृत फतिंगो की लुट !
पवित्र गीता की कसम खाकर ,
अदालत में धड़ल्ले से बोला जाने वाला झूठ //



कूड़े के ढेर में पेट ढूंढ़ती ,
सात-आठ साल की नाक !
बंद घर में विलुप्त उछलती गेंद,
और छत पे बिछी कई का लेप!!



सड़क के किनारे पड़े लक्ष्य लंबित,
सरकारी पुलियों प़र लिखे विज्ञापन !
अँधेरे में उसमे टिमटिमाती ,
छोटे-बड़े दस आँखों का परिवार !!



चाय के भाप से ,
भयंकर कुहरे को पिघलाने की जिद,
संडास में रखा मायूस ,बदरंग,
ऊँघता रंग का खली डिब्बा!



कटीली झाड़ियो प़र लिपटे,
चिथड़े और अंदर से आती मर्मभेदक आवाज !

टूटे ढोलक के चमड़े को ,
नोचते गली के आवारा कुत्ते !
और फटे छाते को सिलती ,
धुप की डोर !!



गर्म लोहे को पिटती,
लोहे की हथौडियो का वैराग्य !
सा कई नरमुंड का जीवन ,
आह! दुर्भाग्य! ,,,आह! दुर्भाग्य !!


JYOTI PRAKASH SINGH

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