21/07/2020
Rashi Library
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21/07/2020
11/10/2017
Summary of the Book
चैतन्याचा आणि मांगल्याचा सण म्हणजे दिवाळी. दिवाळीच्या स्वागताची तयारीही उत्साहाने केली जाते. वसुबारसेपासून सुरु होणाऱ्या दिवाळीची तयारी करण्यासाठी ही दोन्ही पुस्तके उपयुक्त ठरावीत. पहिल्या पुस्तकात दिवाळीच्या प्रथांपासून फराळ आणि पारंपारिक पदार्थांची माहिती दिली आहे. एवढेच नव्हे, तर आकाशकंदील कसे बनवायचे, मेंदी कशी रेखायची, रांगोळी कशी काढायची अन् किल्ला कसा बनवायचा याविषयी सल्लाही दिला आहे.
दुसऱ्या पुस्तकात वासंती काळे यांनी ५० प्रकारच्या लाडूंच्या कृती दिल्या आहेत. नेहमीच्या लाडवांबरोबरच मटकीचे, शेवेचे, ब्रेडचे लाडू कसे बनवायचे ते त्यातून समजते. उपवासाचे लाडू हा खास विभाग आहे. याशिवाय महत्वाचे म्हणजे प्रारंभी लाडूसाठी पाक कसा बनवायचा, तो बिघडू नये यासाठी काय करायचे याचे मार्गदर्शन केले आहे.
विवेकानंद रोज की तरह अपने पीतल के लोटे को मांज रहे थे। काफी देर तक लोटा मांजने के बाद जब वह उठे तो उनके एक शिष्य ने सवाल किया कि रोज-रोज इतनी देर तक इस लोटे को मांजने की क्या जरूरत है? सप्ताह में एक बार मांज लें या ज्यादा से ज्यादा तीन बार। बाकी दिनों में तो इसे पानी से सिर्फ खंगाल कर काम चलाया जा सकता है। इससे इसकी चमक बहुत फीकी तो नहीं होगी। विवेकानंद ने कहा, 'बात तो सही ही कहते हो। रोज-रोज पांच-दस मिनट इसमें बर्बाद ही होते हैं।' उसके बाद उन्होंने उसे नही मांजा।
कुछ ही दिनों में उस लोटे की चमक फीकी पड़ने लगी। सप्ताह भर बाद विवेकानंद ने उस शिष्य को बुलाया और कहा कि मैंने इसे रोज मांजना छोड़ दिया, अब आज फुरसत में हो तो इस लोटे को साफ कर दो। शिष्य ने हामी भरी और कुएं पर ले जाकर मूंज से लोटे को मांजना शुरू कर दिया। बहुत देर मांजने के बाद भी वह पहले वाली चमक नहीं ला सका। फिर और मांजा, तब जाकर लोटा कुछ चमका।
विवेकानंद मुस्कुराए और बोले, 'इस लोटे से सीखो। जब तक इसे रोज मांजा जाता रहा, यह रोज चमकता रहा। तुमको इसकी रोज की चमक एक सी लगती होगी, जबकि मुझे यह रोज थोड़ा सा और ज्यादा चमकदार दिखता था। मैं इसे जितना मांजता, यह उतना ज्यादा चमकता। एक दिन तुमने कहा तो मैंने इसे मांजना छोड़ दिया, फलस्वरूप इसकी चमक जाती रही। ठीक ऐसे ही विद्यार्थी होता है। अगर रोज अभ्यास करे तो ऐसे ही रोज चमकेगा। तुम एक दिन अभ्यास छोड़ोगे तो तुम्हारी चमक फीकी पड़ जाएगी। पहले जैसी चमक पाने के लिए तुम्हें फिर और वक्त बर्बाद करना पड़ेगा। इसलिए अगर समाज को मजबूत स्तंभ देना चाहते हो तो नियमित अभ्यास करो। तभी इस लोटे की तरह चमक कर समाज में रोशनी बिखेरोगे।'
Can u judge who is the better person out of these 3 ?
Mr A - He had friendship with bad politicians, consults astrologers, two wives, chain smoker, drinks eight to 10 times a day.
Mr B - He was kicked out of office twice, sleeps till noon, used o***m in college & drinks whiskey every evening.
Mr C - He is a decorated war hero,a vegetarian, doesn't smoke , doesn't drink and never cheated on his wife.
You would say Mr.C
right?
But..
Mr. A was Franklin Roosevelt! ( 32nd President of the USA)
Mr. B was Winston Churchill!! (Former British Prime Minister)
Mr C Was ADOLF HI**ER!!!
Strange but true..
Its risky to judge anyone by his habits !
Character is a complex phenomenon.
So every person in ur life is important ,don't judge them ,accept them.
Three beautiful thoughts
1. None can destroy iron, but its own rust can!
Likewise, none can destroy a person, but his own mindset can.
2. Ups and downs in life are very important to keep us going, because a straight line even in an E.C.G. means we are not alive.
3. The same Boiling Water that hardens the egg, Will Soften the Potato!
It depends upon Individual's reaction To stressful circumstances!
Enjoy the journey called life.
😊
महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले के एक गांव में चांदभाई रहते थे, जिन्हें सब पाटिल कहते थे। एक दिन उनका घोड़ा खो गया। वे उसे ढ़ूंढ़ते रहे। इतने में देखा कि फकीर की वेशभूषा में सोलह साल का एक तरुण खड़ा है।
चांदभाई को देखते ही उसने पुकारा, ‘क्यों चांद पाटिल! आपका घोड़ा गुम हो गया है न?’ ‘हां, उसे ही तो ढ़ूंढ़ रहा हूं,’ चांदभाई ने कहा। लेकिन वे हतप्रभ थे कि यह लड़का उनका नाम कैसे जानता है? इसने कैसे जाना कि मेरा घोड़ा खो गया है? उस तरुण फकीर ने उनसे कहा, ‘उस पहाड़ी के पीछे एक बाड़ा है। वहीं आपका घोड़ा घास चर रहा है।’ चांद पाटिल वहां पहुंचे तो देखा घोड़ा सचमुच उसी बाड़े में चर रहा था। वह अपने घोड़े के साथ घर लौट गए, पर फकीर के व्यक्तित्व ने उन्हें गहरे प्रभावित किया था।
तब से उस तरुण फकीर की चर्चा उस पूरे इलाके में फैलने लगी। संयोग की बात चांदभाई के घर में ही किसी का विवाह था। बारात औरंगाबाद से शिरडी जानी थी। बारात के साथ वह सोलह वर्षीय तरुण फकीर भी चल दिया। शिरडी में खंडोबादेव का मंदिर आज भी है। उस मंदिर के पुजारी म्हालसापति थे। उन्होंने उस सोलह साल के फकीर को देखते ही उसका स्वागत किया, ‘आओ साई!’ वह फकीर तब से वहीं रहने लगा।
किसी को पता नहीं कि उस तरुण के माता-पिता कौन हैं, उसका जन्म कब और कहां हुआ, वह हिंदू है या मुसलमान। लेकिन वह मस्जिद में रहता था और मंदिर में भी। शिरडीवासी समझ चुके थे कि वह फकीर सही मायनों में हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर है। कोई पूजा करे या नमाज पढ़े, उनकी नजरों में कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह कहता - ईश्वर, अल्लाह अलग नहीं हैं। सबका मालिक एक है। यही चमत्कारी तरुण फकीर आगे चलकर शिरडी के साईं बाबा कहलाए।
मां का विश्वास
थॉमस अल्वा एडिसन प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन स्कूल में टीचर ने एडिसन को एक मुड़ा हुआ कागज दिया और कहा कि यह ले जाकर अपनी मां को दे देना। एडिसन घर आए और अपनी मां को वह कागज देते हुए कहा, 'टीचर ने यह आपको देने को कहा है।' मां ने वह कागज हाथ में लिया और पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। एडिसन ने मां से पूछा, 'इसमें क्या लिखा है मां? यह पढ़कर तुम रो क्यों रही हो?' आंसू पोंछते हुए मां ने कहा, 'इसमें लिखा है कि आपका बेटा बहुत होशियार है और हमारा स्कूल नीचे स्तर का है। यहां अध्यापक भी बहुत शिक्षित नहीं हैं। इसलिए हम इसे नहीं पढ़ा सकते। इसे अब आप स्वयं शिक्षा दें।' उस दिन के बाद से मां खुद उन्हें पढ़ाने लगीं और मां के मार्गदर्शन में एडिसन पढ़ते-सीखते रहे। कई वर्षों बाद मां गुजर गई। मगर तब तक एडिसन प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन चुके थे और उन्होंने फोनोग्राफ और इलेक्ट्रिक बल्व जैसे कई महान अविष्कार कर लिए थे। एक दिन फुरसत के क्षणों में वह अपने पुरानी यादगार वस्तुओं को देख रहे थे। तभी उन्होंने आलमारी के एक कोने में एक पुराना खत देखा और उत्सुकतावश उसे खोलकर पढ़ने लगे। यह वही खत था जो बचपन में एडिसन के शिक्षक ने उन्हें दिया था। उन्हें याद था कि कैसे स्कूल में ही उन्हें अत्यधिक होशियार घोषित कर दिया गया था। मगर पत्र पढ़ कर एडिसन अचंभे में पड़ गए। उस पत्र में लिखा था, 'आपका बच्चा बौद्धिक तौर पर काफी कमजोर है। इसलिए उसे अब स्कूल ना भेजें।' अचानक एडिसन की आंखों से आंसू झरने लगे। वह घंटों रोते रहे और फिर अपनी डायरी में लिखा, 'एक महान मां ने बौद्धिक तौर पर काफी कमजोर बच्चे को सदी का महान वैज्ञानिक बना दिया।'
बुद्धि का प्रयोग
एक शिष्य ने गुरु से पूछा, ‘गुरु जी, सभी प्राणी जन्म लेते हैं और मरते हैं। इस जगत के सभी प्राणी चाहे वे जीव-जंतु हों अथवा मनुष्य, सभी में भूख, पीड़ा, हर्ष आदि के भाव प्रकट करने की क्षमता है। सभी अपना बचाव करना भी जानते हैं। सभी को बीमारी आदि से भी जूझना पड़ता है। पशु-पक्षी, जीव-जंतु, मनुष्य सभी का अंत निश्चित है, लेकिन क्या कारण है कि केवल मनुष्यों में ही साधु, तपस्वी, ज्ञानी, चोर, डाकू, लुटेरे, आंतकवादी, वहशी दरिंदे आदि होते हैं? मनुष्यों में ही भांति-भांति की जातियां और धर्म क्यों होते हैं?’
शिष्य का प्रश्न सुनकर गुरु जी मुस्कुरा कर बोले, ‘तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न पूछा वत्स। दरअसल इसके पीछे प्रमुख कारण है व्यक्ति के अंदर बुद्धि का होना। बुद्धि के कारण ही मनुष्य वह भी हो सकते हैं जो पशु-पक्षी, जीव-जंतु आदि नहीं हो सकते। वह पंडित, ज्ञानी, तपस्वी, चोर, लुटेरे और आतंकवादी भी हो सकते हैं। किंतु मनुष्य अपनी बुद्धि का सार्थक प्रयोग करने के बजाय भटक जाता है और गलत कार्यों के वशीभूत अपने जीवन को बर्बाद कर अपनी बुद्धि का गलत प्रयोग कर विनाश की ओर चला जाता है।
इस बुद्धि का सही दिशा में ही प्रयोग करना चाहिए। बुद्धि का प्रयोग करके मनुष्य ने स्वयं को एकता के सूत्र में बांधने की जगह धर्मों, जातियों और विभिन्न पेशों में बांट लिया है और असंख्य विवादों को जन्म दिया है। यदि मनुष्य चाहता तो वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करके सारी मनुष्य जाति को एकता के सूत्र में बांध कर अपना जीवन सार्थक व सफल बना सकता था किंतु उसने ऐसा नहीं किया। यदि अभी भी मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग अच्छे व नेक कार्यों में करे तो वह जीवन को कामयाब बना सकता है जो कि जीव जगत के अन्य प्राणी नहीं कर सकते।’ शिष्य गुरु की बात से सहमत हो गया।
एक मछुआरे ने अपना जाल उठाया और नदी की ओर चल पड़ा। नदी पहुंचकर उसने देखा कि अभी दिन पूरी तरह से नहीं निकला है तो वह नदी के किनारे-किनारे टहलने लगा। टहलते-टहलते अचानक उसके पैरों से कोई सख्त सी चीज टकराई। उसने झुककर वह चीज उठाई तो पाया कि नन्हे-नन्हे पत्थरों से भरी हुई एक छोटी-सी थैली है। सूरज निकलने में अभी भी कुछ देर थी इसलिए मछुआरे ने जाल एक तरफ रख दिया और समय गुजारने के लिए उन छोटे-छोटे पत्थरों से खेलने लगा। फिर वह एक के बाद एक उन पत्थरों को नदी में फेंकने लगा। ऐसा करते-करते आखिर में अब मछुआरे के हाथ में अंतिम पत्थर बचा था। इसे भी वह फेंकने जा रहा था लेकिन तभी सूरज निकल आया। सूरज की रोशनी में उसने देखा कि उसके हाथ में पत्थर नहीं बल्कि एक बहुमूल्य हीरा था। मछुआरे को अपनी नादानी पर बहुत अफसोस हुआ कि वह बेशकीमती हीरों को यूं ही फेंकता रहा। लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
हमारे साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है। हम मछुआरे की तरह ही हीरे जैसी कीमती चीजों को अपनी अज्ञानता के कारण नष्ट करते रहते हैं अथवा उनका सदुपयोग नहीं करते। ऐसी बहुत सी चीजें और कार्य होते हैं। समय भी उनमें से एक है और सबसे महत्त्वपूर्ण भी है। शुरू में हम उसकी कीमत नहीं समझते और जिस दिन कीमत समझ में आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारा जीवन अथवा जीवन में मिला हुआ समय हीरे से भी कीमती है।
23/01/2017
ेपठान का खाना
लंबे समय तक पठानों को लेकर यह आम राय बनी हुई थी कि यह लड़ाकू लोगों का झुंड है। ये लोग लड़ते वक्त इंसान और इंसानियत को भूल जाते हैं। पठानों में ताकत ही दर्जे तय करती है। इनका बदला जितना खूंखार होगा उतना ही इनकी ताकत के ढोल बजेंगे। तब किसने सोचा था कि कोई आएगा और इन्हें लड़ाई-झगड़ों के रास्ते से इतर शांति और सेवा की पगडंडियों पर ले जाएगा? इनमें मुल्क और माटी की सोंधी खुशबू भर देगा। यह काम किया खान अब्दुल गफ्फार खान ने। हर कबीले के पठानों को इकट्ठा करके शांति, सद्भावना और प्रेम के लिए संगठित करके उन्होंने 'खुदाई खिदमतगार' की नींव रखी। हर एक पर हाथ उठा लेने वाले पठान जबसे खुदाई खिदमतगार बने, तबसे उनका हर विरोध अहिंसा की राह होकर जाने लगा। अंग्रेजों की लाठियों से इनके सिर से खून की धार बह उठती, फिर भी खान बाबा के ये अनुशासित सिपाही गांधी मार्ग से नहीं डिगते। बादशाह खान इकलौते शख्स थे जिन्हें महात्मा गांधी की जिंदगी में ही दूसरा गांधी कहा जाने लगा। सरहदी गांधी के नाम से मशहूर बादशाह खान के बहुत से दिलचस्प किस्से हैं। एक बार जब वह गांधी जी के पास रुकने आए तो गांधी जी फिक्र में थे कि अपने इस पख्तून पठान को खाने में गोश्त कैसे दें। आश्रम में मांसाहार वर्जित था। फिर भी गांधी जी खुद खान साहब के लिए गोश्त पकाने को तैयार हो गए। तब बादशाह खान बोल उठे, 'वाह बापू, एक पठान के लिए आप आश्रम का नियम तोड़ सकते हैं तो एक पठान क्या एक वक्त अपना खाना नहीं छोड़ सकता?' आज उन्हीं बादशाह खान की पुण्यतिथि है। गांधी जी अपने इस पठान साथी के लिए खुद वुजू का पानी रखते, जानमाज बिछाते, तो यह अफगानी पठान भी गांधी की प्रार्थना सभा में सबसे ऊंची आवाज में भजन गाता। बादशाह खान जैसे लोगों ने प्रेम, समर्पण और त्याग से देश की नींव को मजबूत बनाया।
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