आतंकी हमले की विपक्ष निंदा करता है तो समझ आता है क्योंकि वो सिर्फ वही कर सकता है
लेकिन अगर सरकार भी निंदा करके काम चलाएगी तो कैसे चलेगा?
India Against Corruption
One aim-To make India Corruption Free
सोचिए यदि कल रात हमारे देश में किसी हज यात्री को सिर्फ एक थप्पड़ पड़ा होता
तो आज देश में क्या हो रहा होता.....?
एक नाबालिग के फेसबुक पोस्ट पर ऐसा गुस्सा, की शरिया के तहत पत्थरों से उसकी जान लेना चाहते हैं? क्या सहिष्णुता ब्रिगेड छुट्टी पर है?
अख़लाक़ हत्या से असहिष्णुता बढ़ी थी। DSP अयूब के बर्बर क़त्ल से भाईचारा बढ़ा।
हफ़्ते का शनिवार दलित है
ऑफ़िस में रविवार दलित है
प्रीतम ने ठुकराया हाये
देखो मेरा प्यार दलित है
कोई नहीं अब खाता इसको
घर मे रखा अचार दलित है
सोने का पानी उतर गया
पीतल का यह हार दलित है
सिग्नल पर घण्टों रुकती है
जाम फँसी हर कार दलित है
हरिजन ऐक्ट लगे हैं इतने
जनरल की दुत्कार दलित है
आरक्षण पाकर उठती है
शायद यह तलवार दलित है
जब मीरा कोविन्द को देखा
लगा कि यह संसार दलित है।।
कविवर "अमलेश" भाई से साभार,,
Liberals can accept Sunny Leone without clothes but will refuse to accept a saffron clad man. Such is the level of their hate !
प्रिय इवीएम, सदा सुहागन रहो।
ग़नीमत है तुम्हारे साथ केवल छेड़छाड़ ही होती/हो सकती है, मुझे तो सरेआम लूट लिया जाता था।
तुम्हारा मतपत्र।।
If u really want end reservation..crush caste system first....
मैं : मौलवी साहब, फ़र्ज़ करो की एक 19 साल की ज़हीन लड़की घर से झूठ बोल कर 4 दिन के लिए 4 मर्दों के साथ बिना हिजाब,बिना नकाब,बिना बुरखे के, जिसमें की ना तो उसका कोई शौहर, भाई या बाप हो अगर गायब होतो शरीयत के कानून के हिसाब से उसे क्या कहेंगे या उसके साथ क्या होना चाहिए?
मौलवी : बदचलन हैं वह लड़की जो बिना किसी मेहरान ( अपने घर के मर्द) के बिना घूम रही हैं और ऐसी लड़की को आधा ज़मीन में गाड़ कर उसपे पत्थर बरसाने चाहिए ।
मैं : वैसे मौलवी साहब, मैं उस लड़की का नाम बताना भूल गया, #इशरत जहाँ नाम था उसका।
मौलवी : मियां, इबादत के टाइम पे फ़िज़ूल के सवाल न किया करो।
एक आम भारतीय करदाता ( indian tax payer) का खुला पत्र JNU के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के नाम
#कन्हैया_कुमार....
आपका भाषण सुना जो आपने जेल से वापस आ कर दिया, सुना कि आपको ग़रीबी, भुखमरी, जातिवाद, साम्राज्यवाद और पूँजीवाद से आज़ादी चाहिये। मेरे विचार मे, इन सबसे आजादी पाने के लिए मन लगाकर पढाई करें, खूब मेहनत करें, कैरियर बनायें और आगे बढ़ें तो अपने आप मिल जायेगी आजादी और अापके साथी जो नारे लगा रहे हैं उनको भी ये समझायें। आपका भाषण तो अच्छा था लेकिन मैं आपकी बातों में लाजिक ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी, इसके लिये मेरे दो चार सवाल है ज़वाब देने की मेहरबानी करें
1- आपका भाषण तो पूरा राजनैतिक था, तो ये पढ़ाई का ढोंग क्यों?? बाहर आईये और राजनीति में करियर चमकाईये और अपनी जगह किसी उपयुक्त छात्र को दीजिये जो पढ़ाई के नाम पर राजनीति न करे। पढ़ाई के नाम पर ये मुफ़्तख़ोरी बंद करिये, आपके राजनैतिक करियर पर टैक्स पेयर जनता का पैसा बर्बाद क्यों हो??
2- ग़रीबी, भुखमरी, जातिवाद, साम्राज्यवाद और पूँजीवाद ... लेकिन ये नही बताया ये समस्या कब से है ? और इसके असली जिम्मेदार कौन है ?? ज़रा बतायेंगे ये सारी समस्यायें कब से हैं ?? या ये सिर्फ पिछले 18 महीने मे खड़ी हुई हैं ?? जो पार्टी 60 सालों से राज कर रही थी उसकी जवाबदारी कितनी मानते है या उनके शासन में रामराज्य था ??आप प्रधानमंत्री की सूट पकड़ कर उनसे प्रश्न पूछना चाहते हैं तो सोनिया गांधी की साड़ी पकड़ कर उनसे प्रश्न क्यों नही पूछते??
3- आपके बताया नहीं कि ग़रीबी, भुखमरी, जातिवाद, साम्राज्यवाद और पूँजीवाद को कैसे हटायेंगे और इसका ब्लूप्रिंट क्या है या सिर्फ़ नारों से हट जायेगी ?? आज सारी दुनिया मे वामपंथ फ़ेल हो चुका है तो ये भारत में किस तरह से सफल होगा ??
4- आपकी पार्टी की सरकार पश्चिम बंगाल मे 35 साल तक थी, आप बतायेंगे कितनी ग़रीबी, भुखमरी या जातिवाद दूर हो गया?? आँकड़े तो इसका उल्टा ही बताते हैं तो हम क्यो विश्वास करें आपका??
5- अगर भारत के संिवधान या लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करते हैं तो जनता के बीच जाकर, चुनाव लड़कर ईमानदारी से सिस्टम मे सुधार करते और ग़रीबी भुखमरी के खिलाफ लड़ते न कि जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के खिलाफ ज़हर उगलते
6. आपको पुलिसवाला अपने जैसा ही इंसान लगा अच्छी बात है पर बतायेंगे जिन पुलिसवालों को दंतेवाड़ा में आपके साथियों(DSU) ने मारा वो अपने जैसे लगते थे या नही ?? जिनकी मौत पर JNU में जश्न मनाया जाता है वो भी ग़रीब परिवार के ही थे जिन्हें लाल सलाम वालों ने मारा है
7- आपको फ़ौजी भी अपने जैसे लगते हैं ना, तो आपके साथ कंधे से कंधा मिला कर जो नारे देते हैं 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' कभी सोचा है उनके उपर क्या गुज़रती होगी ?? उनका मोराल कितना डाउन होता होगा ?? कभी सोचा है एक भारतीय की आत्मा तड़पती है जब JNU के ये नारे सुनते हैं "भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी" आपको भी यही लगता तो आप कहीं विरोध दर्ज करते ना
8- आप कहते है कि इस देश के क़ानून पर आपको भरोसा है तो कैसे आपके साथी तो आपके सामने ही नारा देते हैं ?? "अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैंंंं', "कितने अफ़ज़ल मारोगे, घर घर से अफ़ज़ल निकलेगा",
पुलिस वालों से आपको सहानुभूति है ना, कितने पुलिसवाले संसद में हुए हमले में कितने मरे मालूम है या दिल में अफ़ज़ल से आधी भी सहानुभूति है ?? ये भारत की सर्वोच्च न्यायालय का ही तो फ़ैसला था फिर ये आपका ढोंग नहीं है तो और क्या है ??
9- रोहित वेमुला जिसका SFI से मोहभंग हो चुका था उसका येचुरी के बारे में लिखा ख़त/विचार क्यो नहीं बताया?? क्योंकि वो आपकी विचारधारा को सपोर्ट नहीं करता ??मरने वाला इंसान कभी झूठ नहीं बोलता और dying declaration तो कोर्ट भी मानता है, जब रोहित ने आख़िरी ख़त में किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं बताया पर आप किसी न किसी तरह से इसका भी राजनैतिक फ़ायदा उठाना चाहते है तभी तो ये मुद्दा बार बार उठाते हैं
आपकी असली समस्या है एबीवीपी, आरएसएस, बीजेपी और मोदी जिनसे आज़ादी चाहिये, आपको लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार नहीं चाहिये क्योंकि आपको पंसद नही, उसके जाने के बाद सब आज़ादी मिल जायेगी। भाषण की जगह बस एकबार अपना ही जजमेंट ही पढ़ कर सुना देते छात्रों के सामने, ख़ुद पर शर्म आ जायेगी और सारी ग़लतफ़हमी दूर हो जायेगी
एक आम भारतीय
कितने मच्छर मारोगे हर घर से मच्छर निकलेगा"
मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!! फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!! मैंने कहा तुम खून चूसोगे तो मैं मारूंगा.!! इसमें असहिष्णुता की क्या बात है.??? वो कहने लगे खून चूसना उनकी आज़ादी है.!!
"आज़ादी" शब्द सुनते ही कई बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आये और बहस करने लगे.!! इसके बाद नारेबाजी शुरू हो गई., "कितने मच्छर मारोगे हर घर से मच्छर निकलेगा".???
बुद्धिजीवियों ने अख़बार में तपते तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख लिखना शुरू कर दिया.!! उनका कहना था कि मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे लेकिन खून चूस रहे थे ये कहाँ सिद्ध हुआ है.?? और अगर चूस भी रहे थे तो भी ये गलत तो हो सकता है लेकिन 'देहद्रोह' की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि ये "बच्चे" बहुत ही प्रगतिशील रहे हैं., किसी की भी देह पर बैठ जाना इनका 'सरोकार' रहा है.!!
मैंने कहा मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा बस.!!! तो कहने लगे ये "एक्सट्रीम देहप्रेम" है.! तुम कट्टरपंथी हो, डिबेट से भाग रहे हो.!!! मैंने कहा तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता.!!! इस पर उनका तर्क़ था कि भले ही यह गलत हो लेकिन फिर भी थोड़ा खून चूसने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती, लेकिन तुमने मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली.!! "फेयर ट्रायल" का मौका भी नहीं दिया.!!! इतने में ही कुछ राजनेता भी आ गए और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की 'बहार' का बेटा बताने लगे.!!
हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि लेकिन ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है, और तुरंत न सही बाद में बीमार और कमज़ोर होकर मौत हो जाती है.!! इस पर वो कहने लगे कि तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं इसलिए तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर अपने 'फासीवादी' फैसले को ठीक ठहरा रहे हो..!!! मैंने कहा ये साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है., मुझे इससे पहले अतीत में भी ये झेलना पड़ा है.!! साइंटिफिक शब्द उन्हें समझ नहीं आया.!! तथ्य के जवाब में वो कहने लगे कि मैं इतिहास को मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूँ., जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिए..!!! इतने हंगामें के बाद उन्होंने मेरे ही सर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया.!!!
मेरे ख़िलाफ़ मेरे कान में घुसकर सारे मच्छर भिन्नाने लगे कि "लेके रहेंगे आज़ादी".!!!
मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था., उससे ज़्यादा जितना कि खून चूसे जाने पर हुआ था.!!! आख़िरकार मुझे तुलसी बाबा याद आये: "सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती...."। और फिर मैंने काला हिट उठाया और मंडली से मार्च तक, बगीचे से नाले तक उनके हर सॉफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा.!!! एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत.!! उसके बाद से न कोई बहस न कोई विवाद., न कोई आज़ादी न कोई बर्बादी., न कोई क्रांति न कोई सरोकार.!!! अब जब कुछ ठीक है.!! यही दुनिया की रीत है.!!
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