12/10/2026
12 अक्टूबर 2025 — त्याग, समर्पण और सामाजिक नेतृत्व की एक ऐसी मिसाल, जिसका वास्तविक मूल्य भावनाओं से समझा जा सकता है।
कुछ रिश्ते खून से नहीं, संघर्ष से बनते हैं। कुछ सपने केवल देखे नहीं जाते, बल्कि जीवन के अनगिनत वर्ष उन्हें साकार करने में लगा दिए जाते हैं। और कुछ पौधे ऐसे होते हैं, जिन्हें इंसान अपने हाथों से लगाता है, अपने पसीने से सींचता है, हर कठिन मौसम में उनकी रक्षा करता है और फिर एक दिन जब वही पौधा विशाल वृक्ष बनकर हजारों लोगों को फल, फूल और छाया देने लगता है, तो उसे अपने तक सीमित रखने के बजाय समाज के नाम समर्पित कर देता है।
मेरे लिए अंतरराष्ट्रीय जाट संसद केवल एक संगठन नहीं, बल्कि मेरे जीवन के 16 वर्षों के संघर्ष, सपनों, विचारों, त्याग और समर्पण की जीवंत कहानी है।
वर्ष 2010 में जिस विचार के साथ मैंने अंतरराष्ट्रीय जाट संसद की स्थापना की थी, उस समय शायद यह कल्पना करना भी आसान नहीं था कि एक दिन यह संगठन दुनिया के अनेक देशों में समाज की आवाज बनेगा। इस सफर में अनगिनत चुनौतियाँ आईं, कठिन परिस्थितियाँ सामने आईं, लेकिन मन में एक ही संकल्प रहा—अपने समाज को संगठित करना, नई पीढ़ी को जागरूक करना, महापुरुषों के गौरवशाली इतिहास को जन-जन तक पहुँचाना और समाज को वैश्विक स्तर पर एक सशक्त पहचान दिलाना।
16 वर्षों की इस यात्रा में न जाने कितने सपने जुड़े, कितने साथी साथ आए, कितने संघर्षों का सामना किया और कितनी उम्मीदों को अपने हृदय में संजोकर आगे बढ़ते रहे। संगठन को खड़ा करना, लोगों का विश्वास अर्जित करना, उसे विस्तार देना और समाज के बीच उसकी स्वीकार्यता स्थापित करना किसी एक दिन का काम नहीं था। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, निरंतरता, धैर्य और समाज के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रही है।
आज जब अंतरराष्ट्रीय जाट संसद दुनिया के अनेक हिस्सों में समाज के लिए कार्य कर रही है, सामाजिक एकता, शिक्षा, संस्कृति, इतिहास और युवा नेतृत्व की आवाज बन रही है, तो मन में स्वाभाविक रूप से संतोष और भावनाओं का सागर उमड़ता है।
लेकिन मेरे जीवन की सबसे बड़ी कसौटी शायद संगठन को खड़ा करना नहीं, बल्कि उस समय एक ऐसा निर्णय लेना था, जब संगठन आगे बढ़ने लगा था।
जिस पौधे को अपने हाथों से लगाया हो, जिसकी हर जड़ को अपने परिश्रम से मजबूत किया हो, जिसकी रक्षा के लिए वर्षों तक संघर्ष किया हो और जिसे अपनी आँखों के सामने एक विशाल वृक्ष बनते देखा हो—जब वही वृक्ष फल-फूल देने लगे, तब उसे किसी योग्य और जिम्मेदार साथी को सौंप देना, मेरे लिए त्याग और विश्वास की सबसे बड़ी अभिव्यक्तियों में से एक है।
12 अक्टूबर 2025 को जयपुर, राजस्थान में आयोजित अधिवेशन में मैंने अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद अपने बड़े भाई श्री मनु चौधरी ‘दाँतल’ जी को समर्पित करने का निर्णय लिया।
यह फैसला किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि एक विचार, एक विश्वास और एक सामाजिक दृष्टिकोण के साथ लिया गया था। मेरा विश्वास था कि संगठन को आगे बढ़ाने के लिए नई जिम्मेदारियों, नई ऊर्जा और सामूहिक नेतृत्व को अवसर मिलना चाहिए। जिस संगठन को हमने समाज की सेवा के लिए बनाया है, उसकी मजबूती किसी एक व्यक्ति के पद पर बने रहने से नहीं, बल्कि योग्य लोगों को जिम्मेदारी सौंपने से बढ़नी चाहिए।
सच कहूँ तो जिस संगठन को अपने हाथों से खड़ा किया हो, उससे भावनात्मक जुड़ाव होना स्वाभाविक है। उसके नाम के साथ अपनी मेहनत की यादें जुड़ी होती हैं, उसके हर पड़ाव में अपने जीवन का एक हिस्सा दिखाई देता है। लेकिन जब समाज का हित सामने हो, तो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर निर्णय लेना ही नेतृत्व की वास्तविक जिम्मेदारी है।
मैंने संगठन से अपना रिश्ता नहीं छोड़ा, मैंने केवल एक जिम्मेदारी दूसरे जिम्मेदार हाथों में सौंपी। मैंने अपनी यात्रा समाप्त नहीं की, बल्कि नेतृत्व की एक नई यात्रा के लिए रास्ता खोला।
मेरे लिए यह पद छोड़ना किसी उपलब्धि का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस विचार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता थी कि संगठन किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं, समाज की सामूहिक धरोहर होता है।
मैं चाहता हूँ कि हमारे समाज में ऐसी परंपरा मजबूत हो, जहाँ पदों से चिपके रहने के बजाय नई पीढ़ी को आगे बढ़ाया जाए; जहाँ नेतृत्व का अर्थ केवल स्वयं आगे रहना नहीं, बल्कि दूसरों को भी आगे आने का अवसर देना हो; जहाँ संगठन की सफलता किसी एक नाम से नहीं, बल्कि हजारों लोगों के सामूहिक योगदान से पहचानी जाए।
मेरे महापुरुषों ने मुझे सिखाया है कि व्यक्ति का जीवन सीमित होता है, लेकिन उसके विचार और उसके द्वारा स्थापित परंपराएँ पीढ़ियों तक जीवित रह सकती हैं। इसलिए मेरा सपना केवल अंतरराष्ट्रीय जाट संसद को बड़ा बनाना नहीं, बल्कि उसे इतना मजबूत बनाना है कि आने वाली पीढ़ियाँ भी इसे अपना संगठन समझें, इसकी जिम्मेदारी उठाएँ और इसे नई ऊँचाइयों तक लेकर जाएँ।
मुझे पद से अधिक उस परंपरा की चिंता है, जो मेरे बाद भी संगठन को मजबूत बनाए रखे। मुझे अपने नाम से अधिक उस विचार की चिंता है, जो आने वाली पीढ़ियों के काम आए।
आज इस निर्णय को एक वर्ष पूरा हो रहा है। इस अवसर पर मैं अपने बड़े भाई श्री मनु चौधरी ‘दाँतल’ जी को अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में एक वर्ष पूर्ण करने पर हृदय की गहराइयों से बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ।
ईश्वर करे, आपके नेतृत्व में यह संगठन और अधिक मजबूत हो, समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचे, युवाओं को अवसर दे, सामाजिक एकता को नई दिशा दे और दुनिया भर में समाज के हितों के लिए अपनी भूमिका और प्रभावी बनाए।
मुझे खुशी होगी यदि मेरे द्वारा शुरू की गई यह यात्रा मुझसे आगे बढ़कर नई ऊँचाइयों को छुए। क्योंकि किसी संस्थापक के लिए सबसे बड़ा संतोष यह नहीं कि संगठन हमेशा उसी के नेतृत्व में चले, बल्कि यह है कि उसके द्वारा स्थापित संगठन उसके बाद भी निरंतर आगे बढ़ता रहे।
मैंने 2010 में एक पौधा लगाया था। 16 वर्षों तक उसे सींचने का प्रयास किया। आज जब वह पौधा एक विशाल वृक्ष बनकर समाज को छाया देने लगा है, तो मेरी कामना है कि उसकी शाखाएँ और फैलें, उसकी जड़ें और मजबूत हों और उसकी छाया में आने वाली पीढ़ियाँ अपने सपनों को साकार कर सकें।
यही मेरे संघर्ष की सार्थकता है। यही मेरे समर्पण का उद्देश्य है। और यही अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के उज्ज्वल भविष्य के प्रति मेरी सबसे बड़ी कामना है।
मेरी पहचान किसी पद से नहीं, बल्कि उस विश्वास से बने, जो समाज मेरे विचारों और कर्मों पर करता है। मेरा सम्मान किसी कुर्सी से नहीं, बल्कि समाज के बीच मेरे कार्यों की स्वीकार्यता से तय हो—मेरे लिए इससे बड़ी उपलब्धि कोई नहीं हो सकती।
कुर्सी छोड़ देना एक निर्णय है, लेकिन अपने हाथों से खड़े किए गए संगठन को समाज की धरोहर मानकर नई जिम्मेदारियों के लिए स्थान बनाना एक विचार है।
मैं आज भी उसी संकल्प के साथ खड़ा हूँ, जिसके साथ वर्ष 2010 में अंतरराष्ट्रीय जाट संसद की शुरुआत की थी। पद की जिम्मेदारी भले बदल गई हो, लेकिन समाज के प्रति मेरा समर्पण, संगठन के प्रति मेरी निष्ठा और अपनी क़ौम के उज्ज्वल भविष्य का सपना आज भी उतना ही जीवंत है।
पद बदल सकते हैं, जिम्मेदारियाँ बदल सकती हैं, नेतृत्व की भूमिकाएँ बदल सकती हैं—लेकिन समाज के प्रति सच्चा समर्पण कभी नहीं बदलना चाहिए।
आइए, हम सब मिलकर ऐसी परंपरा बनाएँ, जहाँ व्यक्ति से बड़ा विचार हो, पद से बड़ी जिम्मेदारी हो, स्वार्थ से बड़ा समाज हो और वर्तमान से बड़ा आने वाली पीढ़ियों का भविष्य हो।
अंतरराष्ट्रीय जाट संसद मेरी मेहनत से शुरू हुई एक यात्रा अवश्य है, लेकिन इसका भविष्य पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। समाज सर्वोपरि था, समाज सर्वोपरि है और समाज सर्वोपरि रहेगा।
डॉ. रामावतार पलसानिया
(संस्थापक अध्यक्ष — अंतरराष्ट्रीय जाट संसद)