28/07/2026
Gen Z गुस्से में क्यों है?
कारण राजनीतिक नहीं
आर्थिक है।
भारत में आज पहली बार ऐसा हो रहा है कि-
पढ़ाई सब कर रहे है,
डिग्रीधारी बढ़ रही है,
युवा आबादी के अनुपात में बढ़ रहे हैं,
लेकिन अच्छी नौकरियाँ उसी गति से नहीं बढ़ रहीं।
यहीं से गुस्सा पैदा होता है।
1989 और 2000 के दशक में एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए एक सीधा-सा फ़ॉर्मूला था,
अच्छी पढ़ाई करो → अच्छी नौकरी मिलेगी → वेतन बढ़ेगा → घर खरीदोगे → जीवन बेहतर होगा।
यह फ़ॉर्मूला करोड़ों भारतीयों के लिए काम करता था।
इसीलिए Gen X और अधिकांश Millennials ने व्यवस्था पर भरोसा किया।
लेकिन Gen Z एक बिल्कुल अलग भारत में बड़ी हुई है।
वह देख रही है कि,
* इंजीनियरिंग की सीटें बढ़ीं-
* कॉलेजों में प्रवेश रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा,
* हर साल करोड़ों युवा नौकरी की दौड़ में शामिल हो रहे हैं,
लेकिन अच्छी नौकरियाँ उतनी नहीं बढ़ीं।
प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं अधिक है।
स्थिति को और कठिन बना रहा है AI
जो काम कभी फ्रेशर करते थे,
उन्हें अब सॉफ़्टवेयर, ऑटोमेशन और AI करने लगे हैं।
अब सॉफ्टवेर भी नौकरी नहीं देता
यानी सीढ़ी की पहली पायदान ही छोटी होती जा रही है।
दूसरी तरफ़
घर खरीदना महँगा है।
शिक्षा महँगी है।
स्वास्थ्य महँगा है।
लेकिन वेतन की रफ़्तार उतनी नहीं बढ़ी।
इसलिए आज का युवा केवल नौकरी नहीं खोज रहा
वह भविष्य खोज रहा है।
Millennials अलग क्यों दिखते हैं?
क्योंकि उनके पास,
नौकरी है,
धनी दिखने की होड़ है, और इसके
EMI है।
बच्चों की फ़ीस है।
परिवार की ज़िम्मेदारी है।
होम लोन है।
वे हर महीने की पहली तारीख़ से बंधे हुए हैं।
उनके पास असंतोष हो सकता है,
उनमे जोखिम लेने की क्षमता कम होती जाती है।
Gen Z के पास खोने के लिए क्या है
ऐसा भविष्य जो विश्वास नहीं देता , आशा नहीं जागता
लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है।
इसलिए उसका गुस्सा अधिक दिखाई देता है।
यह केवल भारत की कहानी नहीं है।
दुनिया के अनेक देशों में युवाओं के असंतोष के
पीछे एक समान आर्थिक प्रश्न दिखाई देता है,
क्या शिक्षा अभी भी बेहतर जीवन की गारंटी है?
जब इस प्रश्न का उत्तर धुंधला होने लगता है…
तब समाज बेचैन होने लगता है।
सबसे बड़ा प्रश्न सरकारों के सामने यह
नहीं है कि GDP कितनी बढ़ी।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है,
क्या विकास पर्याप्त संख्या में अच्छी, सम्मानजनक और उत्पादक नौकरियाँ भी पैदा कर रहा है?
यदि इसका उत्तर “हाँ” नहीं है…
तो असंतोष केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा।
यही शायद आज के भारत की सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती है।