12/09/2026
इतिहास में बड़े-बड़े बादशाहों और विद्वानों का ज़िक्र मिलता है, लेकिन बसरा की गलियों में एक ऐसी फ़कीर औरत गुज़री जिन्होंने बड़े बड़े धर्मात्माओं को इबादत का असली मतलब सिखाया।
उनका नाम था हज़रत राबिया बसरी।
उनका एक बहुत मशहूर वाक़िआ है, जो आज के दौर में हम सबके लिए एक आईना है।
एक बार लोगों ने देखा कि राबिया एक हाथ में जलती हुई मशाल (आग) और दूसरे हाथ में पानी का मटका लेकर पागलों की तरह भाग रही हैं।
किसी ने रोक कर पूछा— "ऐ राबिया! यह क्या माजरा है? यह आग और पानी लेकर कहाँ जा रही हो?"
राबिया ने जो जवाब दिया, वो सुनहरे लफ़्ज़ों में लिखने लायक है।
उन्होंने कहा:
"मैं इस आग से 'जन्नत' को जलाने जा रही हूँ, और इस पानी से दोजख़ की आग बुझाने जा रही हूँ।"
लोग सन्न रह गए। पूछा— "मगर क्यों?"
राबिया बोलीं:
"ताकि यह दोनों पर्दे हट जाएं। मैं चाहती हूँ कि लोग अल्लाह की इबादत 'जन्नत के लालच' या दोज़ख़ के डर' से न करें।
इबादत सिर्फ़ इसलिए हो क्योंकि वो 'रब' है, और वो मोहब्बत के लायक है। अगर जन्नत और दोजख न भी होती, तो क्या वो सजदे के लायक न होता?
ज़रा सोचिये, आज हम सब अनजाने में एक 'दुकानदार नहीं बन गए हैं?
हम नेकी भी करते हैं तो हिसाब लगाकर कि इसका 'रिटर्न क्या मिलेगा। हम इंसानियत भी दिखाते हैं तो इस उम्मीद में कि बदले में हमें क्या मिलेगा।
लेकिन याद रखिए असली किरदार तो वो है जो बिना किसी लालच और बिना किसी डर के सही काम करे।
सच्ची मोहब्बत चाहे वो ख़ुदा से हो या उसके बंदों से शर्तों' पर नहीं की जाती।