Ashok Kumar Jain - A K JAIN Ratnawat

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15/03/2026
07/06/2022
02/06/2022

सभी दुपहियां एवं चोपहियां वाहनों के साथियों से निवेदन है कि आप सभी मिलकर एन जी टी के द्वारा 10 साल एवं 15 साल के लिए हम सभी पर जो नियम लगाए गए वह आम जनता के खिलाफ हैं अतः उनको वापस लेना जरूरी है क्योंकि यह नियम केवल व्यवसिक वाहनों के लिए तो ठीक है परन्तु निजी वाहनों के लिए बिल्कुल भी लागू नही होना चाहिये हम सभी भलीभांति जानते हैं कि निजी वाहन इतने समय में कुछ ज्यादा नही चल पाते हैं अति आवश्यक होने पर ही ये सडक पर निकलते हैं सभी भाई फैमली की सुविधा के लिए ही वाहन खरीदते हैं ताकि बसों एवं ट्रेनों की भीड़ से बचा जा सके एवं इनकी मैनटेन्स का भी सभी भाई बहुत ज्यादा ध्यान रखते हैं। अपने शरीर से भी ज्यादा वाहन को मैन्टेन रखते हैं जिस तरह हमारे शरीर का यदि कोई अंग बीमार हो जाता है तो उसका इलाज कराकर उसको सही करा लिया जाता है लेकिन एक अंग के उपर पूरे शरीर को ही नही बदला जाता है ठीक उसी प्रकार वाहन का भी वही पार्ट बदलकर उसे भी ठीक करा लिया जाता है अतः वाहन को कन्डम घोषित करना हमारे उपर अन्याय करना है बडी मुश्किल से एक एक पैसा जोडकर हम अपनी फैमिली के लिए यह सुविधा कर पाते हैं लेकिन एन जी के मुट्ठी भर लोग कुछ घंटों की मीटिंग में ही हमारी फैमिली को इस सुविधा से वंचित कर देते हैं यह हम सभी के लिए बहुत ही बड़ा अन्याय है एवं अन्याय के उपर लडना हमारा अधिकार है लेकिन हम सब चुप रहकर कुछ मुट्ठी भर लोगों के द्वारा किए गए इस अन्याय के विरुद्ध आवाज नही उठाते हैं अब हम सभी को एकता के सूत्र में बंधकर इसके विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए ताकि सरकार की समझ में आ जाए कि हम लोग अब किसी भी ऐसे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए एकता के सूत्र में बंधकर सरकार के अन्यायपूर्ण नियमों का विरोध करेंगे एवं सरकार को ऐसे नियम वापस लेने के लिए बाध्य कर देंगे। धन्यवाद सभी भाईयों से सविनय निवेदन है कि इस POST ज्यादा से ज्यादा शेयर करो ताकि आम जनता की आवाज सरकार तक पहुंच जाए एवं सरकार को ऐसे नियम वापिस लेने के लिए बाध्य होना पडे सभी आदरणीय भाईयों को प्रणाम ।

23/09/2019

यह भारत की एक प्रतिशत जनसँख्या है, जिसके पास यहाँ की 73 दौलत है. यह सरकारी आंकडा है, भावनात्मक बात नहीं है. यह GDP घट बढ़ रही है तो उसकी चिंता इसी एक प्रतिशत को है.

यह जो तमाशा देख रहे हो, हर तरफ, उसी का रचा हुआ है. बाकी बची 99 % आम जनता उनके लिए जानवरों से ज्यादा नहीं है. उसे बहलाना, फुसलाना बहुत आसान है. इसके लिए आमजन के अन्दर के तर्क को, सवाल को मार दिया गया है. पेट की आग को धर्म और जाति के पानी से ठंडा कर दिया गया है, आँखों में 'आस' की जगह 'घृणा' भर दी गई है.

ये राजनेता रूपी कठपुतलियां (देश के आजाद होने से पहले से लेकर आज तक) , ये चेनल, अखबार, सोशल मीडिया, यह जमीन, यह पानी, यह आसमान, सब उसी एक प्रतिशत का है.

मैं 'कबीर' की तरह सब देख समझ रहा हूँ पर अभी तक कुछ कर नहीं पाया हूँ. मेरे जैसे हजारों हैं इस देश में , पर वे चुप से हो गए हैं. संविधान में लिखे 'समाजवाद' शब्द का अनर्थ कब का हो चुका है. पर उसे फिर से सार्थक करने में हम अपनी भूमिका बखूबी निभाएंगे.

धरती बीज खाती नहीं है ! पूरी दुनिया में बदलाव होने लगा है. जैसा एक सदी पहले हुआ था...रूस में, चीन में, योरोप में...

अभिनव अशोक,
अभिनव राजस्थान पार्टी

14/07/2019

राजस्थान पुलिस का स्वागत योग्य निर्णय,
बजरी मामले में पुलिस का सीधा दखल बंद !
ऐसे ही राजस्व विभाग को भी स्कूल-अस्पताल के मामलों में दखल बंद कर देना चाहिए ! सब अपना अपना विभाग देखें. सभी एक जैसे देशभक्त हैं !

अब राजस्थान में पुलिस बजरी के ट्रक और ट्रोलियों को नहीं रोकेगी. वैध है या अवैध, इसका निर्णय खनिज विभाग करेगा. अगर उस विभाग के अधिकारी कहेंगे तो पुलिस सहयोग करेगी. इसका व्यवहारिक पक्ष यह है कि पुलिस किसी दूसरे विभाग के काम में दखल देकर अपनी वर्दी पर दाग नहीं लगाना चाहती है. यह भी तथ्य है कि अनेक पुलिस अधिकारियों को यह नया खून इतना अधिक मुंह लग चुका था कि उनका मन पुलिस के मूल काम में लग ही नहीं रहा था ! उनको सपने में भी बजरी के ट्रक और गांधीजी दिखाई देने लगे थे !

अवैध खनन अभी नहीं रुकेगा क्योंकि राजस्थान की खनिज नीति और माननीय सुप्रीम कोर्ट में समन्वय बैठना बाकी है. उम्मीद करें कि वह काम जल्द हो जाए और यह अवैध कारोबार खत्म हो और मकान बनाने वालों को राहत हो.

मैं यह मानता हूँ कि इसी तर्ज पर पुलिस को अवैध शराब और हाईवे पर ट्रेफिक के मामलों से अलग कर दिया जाना चाहिए. उनके लिए आबकारी और परिवहन विभाग हैं. स्टाफ कम का बहाना कब तक चलेगा ? सब विभाग अपना अपना काम करें.

इसी तर्ज पर राजस्व विभाग के अधिकारियों को स्कूल या अस्पताल की पंचायती से तुरंत दूर किया जाना चाहिए. वे जमीन के झगड़े निपटाएं. तीन लाख मुक़दमे उनकी अदालतों में अटके पड़े हैं. इस चक्कर में माथे फूट रहे हैं, हत्याएं हो रही हैं. ये लोग वह काम तो करते नहीं हैं, न पटवारियों को नियंत्रित कर रहे हैं...आये दिन मास्टर और डॉक्टर को 'चेक' करते घूम रहे हैं. जूनियर सीनियर का फर्क भी नहीं देखते हैं. नव सामंतवाद फैला रहे हैं. मास्टर और डॉक्टर भी 'बेचारे' बने हुए 'डांट' खा रहे हैं और मीडिया भी नए सामंतों की हुजूरी में लेख लिखता है. 'तहसीलदार ने लगाई डॉक्टर को फटकार' 'प्रधानाचार्य को फटकार'...

और राजनेता ? वे तो खुद राज में अपना हिस्सा ढूंढने में लगे हैं. प्रशासन में सुधार से उनको तो खुद को नुकसान है !

अभिनव अशोक,
अभिनव राजस्थान
असली लोकतंत्र और असली विकास के लिए समर्पित.

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