Brain Wish

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Photos from Brain Wish's post 09/03/2026

संहतिः कार्यसाधिका।

छोटी चीजें भी समूह में (महान) काम सिद्ध कर सकती हैं।
The group (of even small things) can accomplish (a great) work.
🇮🇳
!! भारतम् !!

15/10/2025

सप्तपर्णी नाम ही काफी है

शाही छतरी, मुफ़्त में! (The Royal Umbrella, For Free!)

ये पेड़ नहीं, कुदरत का एयर कंडीशनर है! इसकी छाँव इतनी घनी होती है कि मई-जून की गर्मी में तपता हुआ डिलीवरी बॉय भी दो मिनट रुककर कहता है, "मालिक, क्या जन्नत है!" पार्क में बैठे कपल्स के लिए तो ये किसी प्राइवेट विला से कम नहीं।

पढ़ाई-लिखाई वाला पेड़ (The Scholar Tree):

इसका एक नाम 'ब्लैकबोर्ड ट्री' भी है। इसकी लकड़ी से स्लेट और पेंसिलें बनती थीं। मतलब, आपके पहले 'क' लिखने से लेकर गणित के सवालों पर सर फोड़ने तक, इस पेड़ का कहीं न कहीं हाथ रहा है! ये पेड़ ना होता तो शायद हम आज भी दीवारों पर कोयले से लिख रहे होते!

चलता-फिरता आयुर्वेदिक क्लिनिक (The Walking Clinic):

इसकी छाल किसी दादी माँ के नुस्ख़े से कम नहीं। कहते हैं कि ये मलेरिया से लेकर पेट दर्द तक सब ठीक कर देती है। मतलब, अगर आपको हल्का-फुल्का बुख़ार लगे तो डॉक्टर के पास जाने से पहले इसके नीचे खड़े हो जाइए, क्या पता हवा से ही ठीक हो जाएँ! (चेतावनी: ऐसा सच में न करें, डॉक्टर असली होते हैं!)

इंस्टाग्राम का हीरो (The Instagram Hero):

ये पेड़ दिखने में बड़ा हैंडसम और हरा-भरा होता है। आपकी बालकनी से अगर ये दिखता है, तो सुबह की चाय वाली फोटो में चार चाँद लगा देता है। लिखने के लिए परफेक्ट बैकग्राउंड है!

अब नुकसान (यानी जब ये रिश्तेदार रात भर रुक जाता है):
"पर-भयानक" परफ्यूम ('Terri-fume' Perfume):

इसका सबसे बड़ा और खतरनाक नुकसान है इसके फूलों की गंध! अक्टूबर-नवंबर में जब ये फूल खिलते हैं, तो ये एक ऐसा परफ्यूम छोड़ता है जो पूरी गली को अपनी चपेट में ले लेता है।

गंध कैसी होती है? कल्पना कीजिए किसी ने 100 अगरबत्ती, 50 चमेली के फूल और एक पुराना जुराब एक साथ जला दिया हो। ये गंध वैसी ही होती है - मीठी, लेकिन जानलेवा!

मुफ़्त का सिरदर्द (The Free Headache):

इसकी गंध मोहल्ले को दो टीमों में बाँट देती है:

टीम A: "वाह! क्या भीनी-भीनी ख़ुशबू है!"

टीम B: "अरे यार! खिड़की-दरवाज़े बंद करो, मेरा सिर फटा जा रहा है!"
अभी भी मेरे पोस्ट पर भी दो टीमें बन सकती है।

अगर आप टीम B में हैं, तो ये मौसम आपके लिए किसी टॉर्चर से कम नहीं।

भूतों का पसंदीदा अड्डा (The Ghost's Favourite Hangout):

इसका एक नाम 'डेविल्स ट्री' (शैतान का पेड़) भी है। मोहल्ले की आंटियों के अनुसार, रात में इस पर चुड़ैलें कॉन्फ्रेंस कॉल करती हैं। इसकी तेज़ गंध और रात का सन्नाटा मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि अगर आप इसके नीचे से गुज़र रहे हों तो हनुमान चालीसा का स्पीड टेस्ट हो जाता है।

सप्तपर्णी उस दोस्त की तरह है जो पार्टी में खाना तो मुफ़्त खिलाता है, लेकिन इतना शोर मचाता है कि अगले दिन आपको छुट्टी लेनी पड़ जाए। दिन में ये एक शरीफ़, छायादार gentleman है, पर रात होते ही ये अपना 'परफ्यूम वाला' तूफ़ानी रूप दिखा देता है।
इसकी खुशबू दमा के मरीजों और माइग्रेन वालों के लिए असहनीय होता है।

15/10/2025

Sanskrit is considered the most enriched and complete language.
In English, there’s a famous pangram ...... “The quick brown fox jumps over a lazy dog.”
It contains every letter of the English alphabet. Interestingly, English has only 26 alphabets, yet this sentence uses 33 letters in total, repeating some like O, A, E, U, and R multiple times. Moreover, the sequence of letters doesn’t follow alphabetical order — the line starts with T and ends with G.Now, look at this verse from Sanskrit:

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

Meaning: Who is that king Maya — loved by birds, pure intellect, expert in overpowering others’ strength, foremost among enemy destroyers, serene and fearless at heart, and creator of the great ocean — who even received blessings from his enemies?When you observe carefully, you’ll notice that all 33 consonants of the Sanskrit alphabet appear in this verse sequentially. This kind of linguistic beauty can only be found in Sanskrit!Sanskrit is also the only language in the world in which an entire verse can be composed using just a single consonant.

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

Meaning: He who is wounded by someone weaker than himself is not a true warrior. Likewise, one who injures a weaker person is not a true man either. A master who remains unhurt while his subordinate bleeds is not a hero; and one who attacks the wounded is not a man of valor.

Sanskrit praised Another amazing example:

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः
Meaning: The generous one, who torments the wicked, purifies others, and possesses arms strong enough to destroy demons, raises his weapon against the enemy.Isn’t that beautiful? And not only this—can any other language compose a full verse with just two letters? This too is a miracle found only in Sanskrit.

Using only “bha” and “ra.”

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।

Meaning: Fearless elephants, heavy with their own weight, thundering like war drums and dark as rain clouds, charge upon their rival elephants.

Another example:
क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥

Meaning: The fierce destroyer of enemies, the protector of land, the tormentor of the evil, with hands as graceful as lotus buds, hurled away elephants and shone brightly like the sun.Once again,

Sanskrit shows its magic in an entire verse written using merely three letters..
Example:

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।

Meaning: That supreme Lord (Vishnu), who gladdens the gods and afflicts those who disdain the Vedas, fills the heavens with the same sacred sound with which he once overpowered the demon Hiranyakashipu.Now observe the next verse — its first line repeats four times across all four verses, yet each with a distinct meaning.

This is a brilliant example of the Yamaka (repetition) poetic ornament, specifically a यमक अलंकार (great repetition).

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥

Meaning: The arrows of Arjuna, lord of the earth, began to spread widely; the arrows of Lord Shiva began to shatter; the destroyers of demons, the foremost hosts, grew astonished, and the gods and sages devoted to Shiva gathered in the sky, amazed.Thus, when we say that Sanskrit is the mother of all ancient languages, it is not a baseless claim. There are many such examples that prove the depth, logic, and expressive richness of Sanskrit. It is the only language in the world that embodies where every term is named purposefully and meaningfully.Would you like this English translation to be formatted as a Facebook or article-style post highlighting the beauty of Sanskrit?

03/09/2025

कौन थी राधा रानी?

ब्रज की #राधा रानी कृष्ण की अनादि-अनन्य शक्ति, मूल प्रकृति और सर्वोच्च देवी मानी जाती हैं; उनकी लीलाएँ रावल–बरसाना–वृंदावन में प्रकट हुईं और वे वृषभानु-कीर्तिदा की पुत्री के रूप में पूजित हैं।

वे कौन थीं
प्रमुख वैष्णव ग्रंथों में #राधा को कृष्ण की आन्तरिक ह्लादिनी शक्ति और परम चेतना का प्रतीक बताया गया है, जहाँ #राधा–कृष्ण का संबंध द्रव्य–गुण की तरह अभिन्न माना गया है।

भक्तिवाङ्मय में #राधा ब्रज की गोपी-नायिका हैं, जिनकी निष्काम भक्ति और विरह-वेदना भक्ति का आदर्श मानी जाती है।

जन्म और बाल्यलीला
परंपरा के अनुसार #राधा का जन्म वृषभानु और कीर्तिदा के घर ब्रज में हुआ; जन्मस्थल के रूप में रावल (गोकुल के पास) और बरसाना—दोनों का उल्लेख मिलता है; रावल में प्राकट्य और बरसाना में लालन-पालन व बाल्य-लीलाएँ मानी जाती हैं।

लोककथा में वृषभानु द्वारा यमुना में कमल पर दीप्त बालिका के रूप में #राधा का दर्शन, तथा नेत्र-उद्घाटन शिशु कृष्ण के दर्शन से होने का वर्णन मिलता है; कहीं-कहीं #राधा को कृष्ण से नौ माह ज्येष्ठ भी कहा गया है।

बरसाना और ब्रज
बरसाना (वृषभानुपुर) #राधा की लीला-भूमि के रूप में प्रसिद्ध है; यहाँ वृषभानु-कीर्तिदा का आवास, लीलास्थल और पर्व-परंपराएँ जीवित हैं।

ब्रज के रावल–बरसाना–वृंदावन क्षेत्र में अष्टसखी परंपरा, रास-लीला और सेवित तीर्थ #राधा–कृष्ण भक्ति का केन्द्रीय ताना-बाना रचते हैं।

शास्त्रीय स्वरूप
पुराण-परंपरा में #राधा को “मूल प्रकृति” और समस्त देवियों के तत्त्व-स्वरूप के रूप में प्रतिपादित किया गया है; गोलोक में #राधा–कृष्ण का अद्वैत सहअस्तित्व वर्णित है।

शक्ति-तत्त्व के रूप में #राधा, और शक्तिमान के रूप में कृष्ण—दोनों ऊर्जा–उर्जित की अखंड सत्ता माने जाते हैं।

भक्तिपरंपराएँ और कथाएँ
चैतन्य-परंपरा व ब्रज-भक्ति ग्रंथों में #राधा सर्वोच्च उपास्या, अष्टसखियों की नायिका, तथा दुर्वासा ऋषि के प्रसाद-वचन से “अमृत से भी मधुर पाक” के वरदान-प्रसंग के लिए विख्यात हैं।

राधाष्टमी, लठमार होली और बरसाने के चार पर्वत-पीठों की परंपराएँ #राधा–कृष्ण प्रेम और ब्रज-भक्ति की जीवंत धरोहर हैं।

स्थान-परंपरा: रावल और बरसाना
अनेक परंपराएँ रावल को #राधा के जन्म-प्राकट्य-स्थल और बरसाना को लालन-पालन तथा प्रमुख लीलाओं का ग्राम मानती हैं; तीर्थ-परंपरा में दोनों स्थल पूजनीय हैं।

समन्वय की दृष्टि से #राधा-तत्त्व को समस्त ब्रज-भूमि में व्याप्त माना जाता है।

दार्शनिक अर्थ
कृष्ण-भक्ति में #राधा “परम प्रेम” और “शुद्ध भक्ति” का साकार रूप हैं; कृष्ण बिना #राधा और #राधा बिना कृष्ण अधूरे माने जाते हैं—यही अविभाज्यता भक्ति का हृदय है।

#राधा-तत्त्व करुणा, माधुर्य और आनन्द का आदिस्रोत है, जिसे ब्रज-भक्ति “श्री #राधा” कहकर पूजती है।

#राधा #राधारानी #राधाकृष्ण #श्रीराधा #राधे #राधेराधे #बरसाना #वृंदावन #भक्ति #ह्लादिनीशक्ति #वृषभानुनंदिनी #राधाष्टमी #लठमारहोली #ब्रजभक्ति #कृष्णभक्ति #गोलोक #अष्टसखी #ब्रजभूमि

नोट: क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार जन्म-स्थल और कथाओं के विवरणों में भिन्नता मिलती है, पर #राधा-तत्त्व का सार ब्रज-भक्ति में समान रूप से प्रतिष्ठित है।

16/08/2025

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
देश के लगभग 90% पञ्चाङ्गों में स्मार्तों के लिये 15 अगस्त 2025 की लिखी है और वैष्णवों के लिए 16 अगस्त । लेकिन अधिकांश लोगों ने अपने को वैष्णव मानकर 16 अगस्त को ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई है । एक आम आदमी भगवान कृष्ण को विष्णु का अवतार मानकर वैष्णव जन्माष्टमी के दिन व्रत करता है । एक सामान्य आदमी व्रत-पर्वों के सन्दर्भ में स्मार्त और वैष्णव का भेद नहीं समझता । जबकि परिभाषा के अनुसार ९९.९% लोग स्मार्त हैं और हजारों में कोई एक वैष्णव । पञ्चाङ्गकारों को वास्तव में एक दिन ही जन्माष्टमी, एकादशी आदि पर्व लिखना चाहिए जोकि सर्वसामान्य के लिए हो । दो-दो दिन पर्व लिखने से जनता भ्रमित होती है ।
हरि शरणम् !!

15/08/2025

जय हिंद। वंदे मातरम।

30/07/2025

हिन्दी #राधा
संस्कृत #राधा
गुजराती #રાધા
पंजाबी #ਰਾਧਾ
बंगाली #রাধা
ओड़िया #ରାଧା
तमिल #ராதா
तेलुगु #రాధా
कन्नड़ #ರಾಧಾ
मलयालम #രാധാ
उर्दू #رادھا
कश्मीरी #رادھا या #रادہ
असमिया #ৰাধা
मैथिली #राधा
संथाली #ᱨᱟᱫᱷᱟ
कोंकणी #राधा
सिंधी #رادھا या #राधा
🙏🚩🙏
#प्रेमानंदमहाराजजी

11/07/2023

पूरी पोस्ट पढ़ें...

#मुस्लिम_इतिहासकार ऐसा लिखते है कि इस्लाम द्वारा भारत विजय का प्रारंभ मुहम्मद बिन कासिम के 712 AD में सिंध पर आक्रमण से हुआ और महमूद गजनवी के आक्रमणों से स्थापित, तथा मुहम्मद गौरी के द्वारा दिल्ली के प्रथ्वीराज चौहान को 1O92 A.D. में हराने से पूर्ण हुआ !

फिर दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंश के सुल्तान और मुग़ल बादशाह हिंदुस्तान के शासक बताये गए !

यह इतिहास का पूरा सच नहीं हैं ,सच यह है कि य़ह 1200 वर्षोँ तक चलने वाला राजपूत मुस्लिम युद्ध था ! जिसमे शुरू के 500 वर्षो में स्लामिक आक्रान्ताओ को राजपूतो ने भारत मे घुसने तक नही दिया था. और बाद के 700 वर्ष में राजपूत और स्लामिक संघर्ष चरम पर रहा, जिसमे अंतिम विजय मराठा साम्राज्य, राजपूत और सिख साम्राज्य के रूप में हुयी और अब सच की विवेचना के लिए इनके बारे में कुछ तथ्य !

मुहम्मद बिन कासिम 712 AD में जब वह सिंध के राजा दाहिर को हराकर आगे बढ़ा उसे गहलोत वंश के राजा कालभोज ने बुरी तरह हराकर वापस भेजा !
अब अगले 250 वर्ष तक मुस्लिम प्रयास तो बहुत हुए पर पीछे धकेल दिए गए इस बीच भारत में राजपूत राज्य ही प्रभावी रहे !

1000 AD से महमूद गजनवी के कथित सत्रह आक्रमणों में पांच हारे, और पांच मन्दिरों की लूट की,
सबसे महत्वपूर्ण सोमनाथ की लूट की दौलत भी गजनी तक वापस नहीं ले जा पाया, जिसे सिन्ध मे लूट लिया गया था वह कही भी सत्ता स्थापित नहीं कर पाया !

इसके बाद अगले 150 वर्ष तक फिर कोई मुसलमान राजपूत सत्ता को चुनौती देने को नहीं आया और भारत में राजपूत राज्य प्रभावी बने रहे !

1178 में मुहम्मद गौरी का गुजरात पर आक्रमण हुआ, चालुक्य राजा ने गौरी को बुरी तरह हराया !इसके बाद 1191 में पृथ्वीराज ने भी गौरी को वुरी तरह हराया ! और जान की भीख दी.

1192 में गौरी ने पृथ्वीराज को हराया फिर गौरी ने पंजाब, सिंध, दिल्ली, और कन्नौज जीते !
पर ये विजयें अस्थायी रहीं क्योंकि वह 1206 में सिंध के खक्खरों के साथ युद्ध में गौरी मार डाला गया !

उसके बाद सत्ता में आया कुतुबुद्दीन ऐबक भी 1210 में लाहौर में ही मर गया और गौरी का जीता हुआ क्षेत्र बिखर गया !

उसके बाद इल्तुतमिश ने अजमेर, रणथम्मौर, ग्वालियर कालिंजर और महोबा जीते !

मगर कुछ समय में ही कालिंजर चंदेलों ने, ग्वालियर को प्रतिहारों ने, बूंदी को चौहानो ने मालवा को परमारों ने वापस ले लिया, रणथम्मौर, मथुरा पर राजपूत कब्ज़ा कर चुके थे !

गहलोत वंशी जैत्र सिंह ने इल्तुतमिश से चित्तौड़ वापस ले लिया इस प्रकार सत्ता राजपूतों के हाथ में ही रही थी !

उसके बाद बलबन ने राज्य बिखराव और राजपूत ज्वार रोकने में असफल रहा और सल्तनत सिमटकर दिल्ली के आसपास रह गयी थी !

गुलाम वंश को हटाकर खिलजी वंश आया, इस वंश के अलाउद्दीन खिलजी ने 1298 में गुजरात और 1303 मे चित्तौड़ जीत लिया !

पर 1316 में राजपूतों ने युद्ध कर पुनः चित्तौड़ वापस जीत लिया, रणथम्मौर में भी खिलजी को हार का मुंह देखना पड़ा था !

खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने देवगिरी, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुराई पर अभियान किया और जीता !
पर उसके वापस जाते ही इन राजाओं ने अपने को स्वतत्र घोषित कर दिया !
1316 में खिलजी के मरने के बाद उसका राज्य ध्वस्त हो गया !

इसके बाद तुगलक वंश आया 1325 में मुहम्मद तुगलक ने देवगिरी और काम्पिली राज्य पर विजय और द्वारसमुद्र और मदुराई को शासन के अन्तर्गत लाया ! राजधानी दिल्ली से हटाकर देवगिरी ले गया !

पर मेवाड़ के महाराणा हम्मीर सिंह ने मुहम्मद तुगलक को बुरी तरह हराया और कैद कर लिया था !
फिर अजमेर, रणथम्मौर और नागौर पर आधिपत्य के साथ 50 लाख रुपये देने पर छोड़ा जिससे तुगलक राज्य दिल्ली तक सीमित रह गया और 1399 में तैमूर के आक्रमण से तुगलक राज्य पूरी तरह बिखर गया !

मुहम्मद तुगलक पर विजय के उपलक्ष्य में हम्मीर ने “महाराणा“ की उपाधि धारण की !

उसके बाद महाराणा कुम्भा द्वारा गुजरात के राजा कुतुबुद्दीन और मालवा के सुल्तान पर विजय प्राप्त की.
इन विजयों के उपलक्ष्य में चित्तौड़ गढ़ मे विजय स्तम्भ और पूरे राजस्थान में 32 किले भी बनवाये !

महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) ने अपने शुरू के शासनकाल में मालवा के शासक को पराजित कर बंदी बनाया और छह महीने बाद छोड़ा !
1519 में इब्राहीम लोदी को भी बुरी तरह हराया !

इस प्रकार महाराणा हम्मीर से राणा सांगा तक 1326 से 1527 (200 वर्ष तक) उत्तर भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राजपूत साम्राज्य छा रहा था और इन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं था !

इसी बीच दक्षिण में विजय नगर साम्राज्य क्षत्रिय शक्ति के रूप में केन्द्रित हो चूका था और कृष्ण देव राय (1505-1530) के समय चरम उत्कर्ष पर था और उड़ीसा ने भी क्षत्रिय स्वातंत्र्य पा लिया था !

तुगलकों के बाद सैयद वंश 1414 से 1451 तक और लोदी वंश 1451 से 1526 तक रहा जो दिल्ली के आस पास तक ही रह गया था !

इसके बाद फिर दोवारा इब्राहीम लोदी को राणा सांगा ने हराया !

प्रमुख इतिहासकार आर सी मजूमदार लिखते है कि दिल्ली सल्तनत अलाउद्दीन खिलजी राज्य के 20 साल (1300-1320)और
मुहम्मद तुगलक के 10 साल इन दो समय को छोड़कर भारत पर तुर्की का कोई साम्राज्य नहीं रहा था !

फिर मुग़ल वंश आया मुग़ल बाबर ने कुछ विजयें अपने नाम की पर कोई स्थायी साम्राज्य बनाने में असफल रहा, इसी दौर में मेवाड़ के राणा सांगा ने बयाना के युद्ध मे बाबर को धूल चटाई....उसके बाद उसका बेटा हुमायु भी शेरशाह से हार कर भारत से बाहर भाग गया था !

शेर शाह (1540-1545) तक रणथम्मौर और अजमेर को जीता पर कालिंजर युद्ध के दौरान उसकी मौत हो गयी और उसका राज्य अस्थायी ही रहा !

फिर एक बार राजपूत राज्य सगठित हुए और दिल्ली की गद्दी पर राजा हेम चन्द्र ने 1556 में विक्रमादित्य की उपाधि धारण की !

1556 में ही अकबर ने हेमचन्द्र (हेमू ) को हराकर मुग़ल साम्राज्य का स्थायी राज्य स्थापित किया जो 150 वर्ष तक चला जिसमे सभी दिशाओं राज्य विस्तार हुआ ! लेकिन इस दौर मेवाड़ ऐसा राज्य था जो अकबर के अधीन नही था, हल्दीघाटी और दिवेर में अकबर की सेना को मुंह की खानी पड़ी.....

इस काल के अधिकांश विजयें राजपूत सेनापतियों और उनकी सेनाओं द्वारा हासिल की गयीं जिनका श्रेय अकबर ने अकेले लिया !
अकबर ने इस्लामिक कट्टरता छोड़ राजपूतों की शक्ति को समझा और उन्हें सहयोगी बनाया !

जहाँगीर और शाहजहाँ के समय तक यही नीति चली, इन 100 वर्षों में मुसलमानों और राजपूत का संयुक्त और राजपूत शक्ति पर आश्रित राज्य था इस्लामी राज्य नहीं |
पूरे मुग़ल राज्य के बीच भी मेवाड़ में राजपूतों की सत्ता कायम रही !

औरंगजेब ने जैसे ही अकबर की नीतियों के विपरीत इस्लामी नीतियां लागू करनी आरम्भ की राजपूतों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया !

उधर शिवाजी ने मुग़ल साम्राज्य के खिलाफ विगुल बजा दिया और 1707 तक मुग़ल राज्य का समापन हो गया उसके बाद के दिल्ली के बादशाह दयनीय स्थिति में कभी राजपूतों के, कभी अंग्रेजों के आश्रित रहे !

1674 से 1818 तक मराठा साम्राज्य भारत में बढ़ता व घटता रहा....
राजस्थान में राजपूत राज्य और पंजाब में सिख साम्राज्य राज्य के रूप में विजयी हुए |

इन शक्तियों के द्वारा मुस्लिम सत्ता की पूर्ण पराजय और अंत हुआ !

इस पूरे विषम काल मे राजपूतों ने 712 ईसवी से ,बप्पा रावल के रूप से संघर्ष शुरू किया और 1000 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद 1600ईसवी में महाराणा प्रताप तक रक्तसंचित संघर्ष किया...1600 के बाद मराठा,सिख, व और साम्रज्यों की नींव पड़ी....जिन्होंने भी इस्लामिक शक्तियों से लोहा लिया......

इस प्रकार जिसे मुस्लिम साम्राज्य कहा जाता है वह वस्तुतः राजपूत राजाओं और मुसलमान आक्रमण कारियों के बीच एक लम्बे समय (1200 वर्ष) तक चलने वाला युद्ध था कुछ लड़ाइयाँ राजपूत हारे, कुछ में हराया और अंतिम जीत राजपूतों की ही रही !!!!
#राजन्य_क्रॉनिकल्स_टीम

30/06/2023

#केले के पत्तों पर खाना खाने का रिवाज

दक्षिणी भारत में केले के पत्तों पर विशेष भोजन परोसा जाता है। सामुदायिक परोसने की थाली के रूप में एक बड़े पत्ते का उपयोग करने की प्रथा है। इस प्रकार के भोजन को तमिल में सापड़ कहा जाता है।
विभिन्न प्रकार के भोजन को भाप में पकाने, ग्रिल करने और पकाने के दौरान केले के पत्तों का उपयोग प्राकृतिक खाद्य आवरण के रूप में किया जाता है।

सांस्कृतिक मान्यताएँ:

किसी भी दक्षिण भारतीय उत्सव में केले के पत्ते पर पारंपरिक भोजन जरूरी है। सबसे पहले कार्बोहाइड्रेट (चावल), फिर प्रोटीन (दाल), आयरन से भरपूर सब्जियां और वसा (दही) खाना होगा। यही वह क्रम है जिसमें खाना परोसा भी जाता है और खाया भी जाता है। फर्श पर चटाई पर बैठकर खाना खाना और भी अधिक पारंपरिक है। व्यक्ति को ऐसे बैठना होता है जैसे कि वह पद्मासन (कमल) की मुद्रा में बैठा हो।

केले के पत्ते से खाना स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। किसी भी अतिथि को केले के पत्ते पर भोजन परोसा जा सकता है जिसे विनम्र और सम्मानजनक माना जाता है।

केले के पत्तों के उपयोग के फायदे:

केले के पत्ते पर गर्म खाना परोसने से पत्ते से महत्वपूर्ण पोषक तत्व निकलेंगे जो खाने में मिल जाएंगे और खाए जाएंगे।

अतीत में कोई प्लेटें उपलब्ध नहीं थीं; केले के पत्ते आसानी से उपलब्ध थे और इतने बड़े थे कि उनमें सारा भोजन समा सके। इसके अलावा, पत्ते में कोई विशेष गंध नहीं होती जो आपको परेशान कर सके।

पत्तियां आसानी से डिस्पोज़ेबल और पर्यावरण के अनुकूल हैं। पत्तियां जलाने पर भी ओजोन परत प्रभावित नहीं होती।

वैज्ञानिक कारण:

केले के पत्तों में बड़ी मात्रा में पॉलीफेनोल्स जैसे एपिगैलोकैटेचिन गैलेट या ईजीसीजी होते हैं, जो ग्रीन टी में भी पाए जाते हैं। पॉलीफेनोल्स प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट हैं जो कई पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं।

चूँकि कोई रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं होती है, भोजन अपना मूल्य बरकरार रखता है: यह गर्मी सहन कर सकता है और गर्मी से अलग हुए बिना अच्छी तरह से प्रतिक्रिया कर सकता है।

फर्श पर बैठकर खाना भी फायदेमंद होता है, क्योंकि यह स्थिति भोजन को आहार नली के माध्यम से पेट तक कुशलतापूर्वक पहुंचने में मदद करती है। जिससे अधिक खाने के खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है।

29/04/2023



भारत की संस्कृति जितनी ज़्यादा रोचक है, उतनी दुनियां के किसी देश की नहीं है। विविधताओं से भरे हमारे देश का हर रंग निराला है.. जब रंगों की बात होती है तो याद आते हैं यहाँ मनाये जाने वाले उत्सव या पर्व!
भारत में बहुत समय पहले से त्योहारों पर नृत्य करने की परम्परा चली आ रही हैं और प्रत्येक राज्य के अपने कुछ लोक नृत्य हैं। सामान्य भाषा में कहें तो ऐसा नृत्य जो लोगो या समुदाय में प्रिय हो, वह लोक नृत्य कहलाता है।
इन्हीं अलग-अलग नृत्यों को भारत के मानचित्र में हमने दर्शाने की कोशिश की है। इनमें से आपके राज्य का लोक नृत्य कौन-सा है, हमें कमेंट बॉक्स में बताएँ।

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