Kr A Ali Babar

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31/07/2021

उम्मत ए मुस्लिमा ए हिन्द से मेरी दरख़ास्त है कि इस मौज़ू पर अपनी आवाज़ को बुलंद करे व देश के मुस्लिम सांसदों से इसका मुतालबा करे.
कुँवर एहतशाम अली बाबर
पूर्व प्रत्याशी विधानसभा फ़िरोज़ाबाद

29/07/2021

डा0 भीम राव अम्बेडकर जी को अपना सियासी मसीहा व अपना सियासी आइडल मानने वाले मुस्लिम नेता व समर्थक साथ मैं डा0 अम्बेडकर के नाम पर उनकी विचारधारा पर चलने वाले राजनीतिक दलों को वोट सपोर्ट करने वाले व चंदा देने वाले भारतीय मुस्लिम डा0 अम्बेडकर की किताब पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन के ख़ास तौर से पेज न0 230 से 234 अथवा 265 तक ज़रूर पढ़े ताकि आप तमाम को डा0 अम्बेडकर की भारतीय मुसलमानों को लेकर जो घृणातमक सोच थी वो आज के मुस्लिम तबके के सामने आ सके.
आगे की बात इस मुद्दे पर फ़ेसबुक लाइव आ कर या सभाओं के ज़रिए आपके सामने रखने की कोशिश करूँगा.
कुँवर एहतशाम अली बाबर
पूर्व प्रत्याशी विधानसभा फ़िरोज़ाबाद.

18/07/2021

जिस के चुनावी जुमलों पर ताली और मन की बात पर थाली तुमने पीटी हैँ अब उसके फैसलों पर अपनी छाती भी तुम्ही पीटोगे
पैट्रोल व सरसों का तेल 100 के पार होने पर भी जानता ख़ुशी से उसे ख़रीद रही है सच मैं भारत देश व देश की जनता महान है क्यूंकि विश्व मैं इकलौता भारत देश ही ऐसा है जहाँ सरकार चलाना सबसे आसान है.
कुँवर एहतशाम अली बाबर
पूर्व प्रत्याशी विधानसभा फ़िरोज़ाबाद.

27/06/2021

डॉ दिलीप यादव जी आपका मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ कि आपने फ़िरोज़ाबाद की नस्ल के लिए तालीमी इदारा क़ायम किया.
शुक्र गुज़ार इसलिए हूँ कि फ़िरोज़ाबाद के सियासी लोगों ने ग़रीब आवाम को दौरान ए इन्तख़ाबात कुछ पैसे देकर रज़ाई कम्बल तक़सीम करके बहलाया इसीलिए सियासी लोगों के तो हालात बदले लेकिन आवाम के मसाइल जूं के तूँ रहे क्यूंकि इन सियासी लोगों ने आवाम को तालीम से दूर रखा
पर आपने फ़िरोज़ाबाद की ग़रीब आवाम के लिए सबसे बड़ी तालीमी दौलत का ताव्वुन किया
जैसा कि आम कहावत है कि उम्मीद पर दुनियां क़ायम है मैं भी उम्मीद करता हूँ कि अवाम ए फ़िरोज़ाबाद नई नस्ल को बिरादरी के इख़्तेलाफ़ के मैदान से निकाल कर तालीमी मैदान का सिपाही बनाएगी.
कुँवर एहतशाम अली बाबर
पूर्व प्रत्याशी विधानसभा फ़िरोज़ाबाद

27/06/2021

चाँद ने मुझसे कहा आँसमा के पर्दे पर रौशनी सी छा गयी
मुझको नींद आ गयी हम नशी अलबिदा
फिर मिलेंगे इस जगह
मैंने चाँद से कहा मुब्तलाए इश्क़ को जाग कर न मिल सका
तूने सो के पा लिया
चांदनी की बाहों मैं अपना घर बना लिया
जाओ दोनों ख़ुश रहो हम नशीं अलबिदा
सोचता हूँ एक दिन मैं भी सो ही जाऊँगा
रौशनी होने के बाद चांदनी की बाहों मैं
चाँद जाता है जहाँ मैं भी वहाँ जाऊँगा
लौट कर न आऊंगा
कुँवर एहतशाम अली बाबर

24/06/2021

हम तेरे शहर मैं आए हैं मुहाजिर की तरह
सिर्फ़ एक बार इज़हार ए मुहब्बत का मौक़ा देदे

23/06/2021

👉बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़ ओ शब देखेगा कौन
लोग तेरा जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन
हाथ मैं सोने का कासा लेके आए हैं फ़क़ीर
इस नुमाइश मैं तेरा दस्त ए तलब देखेगा कौन
#बाबर📝👉 हुकूमत ओ सियासत मैं बक़्र ओ उमर जैसे ज़माने अब कहाँ
ज़ुल्म जब इतना सस्ता हो तो अद्ल देखेगा कौन

22/06/2021

मैं शुक्र गुज़ार हूँ भाई एहसान साहब का जिन्होंने मेरी जानिब से दी गयी ज़िम्मेदारी को अपने तन्ज़िया अंदाज़ मैं फ़ेसबुक पर बख़ूबी निभाया मैं ज़िंदा हूँ इसका एहसास मुखिलफ़ीन ए बाबर को कराया

21/06/2021

ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना
पाँव बक्शे हैं तो तौफ़ीक़ ए सफ़र भी देना
गुफ़्तगू तूने सिखाई है के मैं गूंगा था
अब मैं बोलूंगा तो बातों मैं असर भी देना
मैं तो इस ख़ाना बदोशी मैं भी ख़ुश हूँ लेकिन
अगली नस्लें न भटकें उन्हें घर भी देना
कुँवर एहतशाम अली बाबर

21/06/2021

#अस्सामुअलैकुम_उम्मत_ए_मुस्लिमा_ए_हिन्द नौजवानो वक़्त मिले तो इन चंद हक़ीक़ी लाइनों के क़ीमती अल्फ़ाज़ पर ग़ौर ज़रूर करना.
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त ए परवाज़ मगर रखती है
क़ुद्सी उल अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती है
ख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती है
इश्क़ था फ़ितना गरो सरकशो चालक मेरा
आसमां चीर गया नाला ए बेबाक़ मेरा
हम तो माइल बा करम हैं कोई साहिल ही नहीं
राह दिखलाएं किसे रह रवे मंज़िल ही नहीं
तरबियत आम तो है जौहर ए क़ाबिल ही नहीं
जिससे तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहीं
कोई क़ाबिल हो तो हम शान कई देते हैं
ढूंढ़ने वालों को दुनियां भी नई देते हैं
तुमको आता नहीं दुनियां मैं फ़न तुम हो
नहीं जिस क़ौम को परवाह ए नशेमन तुम हो
बिजलियाँ जिसमें हो आसूदा वो चिलमन तुम हो
बेच खाते हैं अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
होने को नाम जो क़ब्रों कि तिजारत करते
क्या न बेचोगे जो मिलजाएँ सनम पत्थर के
क्या कहा दहर ए मुसलमां हैं फ़क़त आला ए हूर
शिक़वा बेजा भी करें कोई तो लाज़िम है शऊर
अदल है हाकिर ए हस्ती का अज़ल से दस्तूर
मुस्लिमां अयीं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ कुसूर
तुममें हूरों का कोई चाहने वाला ही नहीं
जलवा ए तूर तो मौजूद है मूसा ही नहीं
मुफ़ाद एक है इस क़ौम की नुक्सान भी एक
एक ही सबका नबी दींन भी ईमान भी एक
हरम ए पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एक
कुछ बड़ी बात थी जो होते मुसलमान भी एक
फ़ितना बंदी है कहीं और कहीं दातें हैं
क्या ज़माने पनपने की यहीं बातें हैं
कौन है तारिक ए आईंन ए रसूब ए मुख़्तार
मसलेहत वक़्त की है किसके अमल का मियार
किसकी आँखों मैं समाया है शआरे अग़ियार
हो गयी किस की निगाह तर्ज़े सलफ़ से बेज़ार
क़ल्ब मेँ सोज़ नहीं रूह मैं एहसास नहीं
कुछ भी पैग़ाम ए मौहम्मद का तुम्हें पास नहीं
शोर है हो गए दुनियां से मुसलमां नाबूद
हम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूद
वज़ा मैं तुम्हो नसारा तो तमद्दन मैं हुनूद
ये मुसलमां हैं जिन्हें देख के शर्मा ए यहूद
#यूँ_तो_सय्यद_भी_हो_मिर्ज़ा_भी_हो_पठान_भी_हो
#तुम_सभी_कुछ_हो_बताओ_तो_मुसलमान_भी_हो
अल्लामा इक़बाल रहमातुल्लाअलय
कुँवर एहतशाम अली बाबर

20/06/2021

अस्सलामुअलैकुम

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