बी•ए• पास.....?
Pankaj Singh Yadav
•संघर्ष ही जीवन है•
•सभी प्रतियोगी पर?
मौर्य काल:-
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मौर्य वंश का इतिहास:-
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⭐मौर्य साम्राज्य पूर्व में मगध राज्य में गंगा नदी के मैदानों (आज का बिहार एवं बंगाल) से शुरु हुआ। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र (आज के पटना शहर के पास) थी.
⭐चन्द्रगुप्त मौर्य (322 ई. पू. से 298 ई. पू.): चाणक्य की सहायता से अंतिम नन्द शासक घनानंद को पराजित कर 25 वर्ष की आयु में चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध का सिंहासन प्राप्त किया और उसने प्रथम अखिलभारतीय सम्राज्य की स्थापना की। 305 ई. पू. में यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया तथा काबुल, हेरात, कंधार, बलूचिस्तान, पंजाब आदि क्षेत्र उससे ले लिया। सेल्यूकस ने अपने पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया तथा मेगास्थनीज को राजदूत के रूप में उसके दरबार में भेजा।
⭐पतन के कारण:-
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अशोक के उत्तराधिकारी अयोग्य निकले। इस वंश का अंतिम राजा बृहद्रथ मौर्य था। 185 ई.पू. में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर डाली और शुंग वंश नाम का एक नया राजवंश आरंभ हुआ।
•अयोग्य एवं निर्बल उत्तराधिकारी,
•चेतना का अभाव,
•आर्थिक एवं सांस्कृतिक असमानताएँ,
•प्रान्तीय शासकों के अत्याचार,
•करों की अधिकता
⭐मौर्य वंश के शासक_
चन्द्रगुप्त मौर्य 322 ईसा पूर्व- 298 ईसा पूर्व
बिन्दुसार 298 ईसा पूर्व -272 ईसा पूर्व
अशोक 273 ईसा पूर्व -232 ईसा पूर्व
दशरथ मौर्य 232 ईसा पूर्व- 224 ईसा पूर्व
सम्प्रति 224 ईसा पूर्व- 215 ईसा पूर्व
शालिसुक 215 ईसा पूर्व- 202 ईसा पूर्व
देववर्मन 202 ईसा पूर्व -195 ईसा पूर्व
शतधन्वन मौर्य 195 ईसा पूर्व 187 ईसा पूर्व
बृहद्रथ मौर्य 187 ईसा पूर्व- 185 ईसा पूर्व
#इतिहास
02/02/2023
आप जो भी बीज बोयेंगे....
#सुविचार
सिकन्दर महान:-
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⭐सिकन्दर का वास्तविक नाम अलेक्जेंडर तृतीय था. भारत में उसे सिकंदर कहकर सम्बोधित किया जाता हैं. अलेक्जेंडर तृतीय मेकडोनिया का राजा और पर्शियन साम्राज्य का वो विजेता था, जिसे अपने जीवन में सबसे ज्यादा किये गए फौजी अभियानों के लिए जाना जाता हैं. ग्रीक इतिहासकारों के अनुसार अलेक्जेंडर ने पूरी दुनिया को जीत लिया था, इसलिए उसे विश्व विजेता भी कहा जाता है. और उसके नाम के साथ महान या दी ग्रेट भी लगाया जाता हैं.
⭐जन्म – 356 BC
पिता – फिलीप
माता – ओलंपिया
विवाह – रुखसाना के साथ
⭐अनेक शानदार युद्ध अभियानों के बीच उसमे एशिया माइनर को जीतकर सीरिया को पराजित किया और मिस्र तक जा पहुंचा। जहाँ उसने अलेक्जांड्रिया नाम का एक नया नगर बसाया। वहां उसने एक विश्वविद्यालय की भी स्थापना की।
⭐अगले वर्ष सिकन्दर मेसोपोटामिया होता हुआ फ़ारस (ईरान) पहुंचा और वहां के राजा डेरियस तृतीय को अरबेला के युद्ध में हरा कर वह स्वयं वहां का राजा बन गया। जनता का ह्रदय जीतने के लिए उसने फारसी राजकुमारी रुखसाना से विवाह भी कर लिया।
⭐कुछ समय बाद सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया और पंजाब में सिन्धु नदी के तट तक जा पहुंचा। उसने भारत का सीमांत प्रदेश जित लिया था। परन्तु भारतीय राजा पुरु (पोरस) ने उसका बड़े साहस और शौर्य से सामना किया तथा आगे नहीं बढ़ने दिया। तभी सिकन्दर को फ़ारस के विद्रोह का समाचार मिला और वह उसे दबाने के लिए वापस चल दिया।
⭐वह 323 ई.पू. में बेबीलोन पहुंचा और वहां पर उसे भीषण ज्वर ने जकड़ लिया। उस रोग का कोई इलाज नहीं था। अत:33 वर्ष की आयु में वहीँ सिकन्दर की मृत्यु हो गई। केवल 10 वर्ष की अवधि में इस अपूर्व योध्दा ने अपने छोटे से राज्य का विस्तार कर एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया था। जिसमें यूनान और भारत के मध्य का सारा भूभाग सम्मिलित था।
#इतिहास
बौद्ध धर्म:-
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बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और महान दर्शन है। ईसा पूर्व 6 वी शताब्धी में बौद्ध धर्म की स्थापना हुई है। बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध है। भगवान बुद्ध का जन्म
563 ईसा पूर्व में लुंबिनी, नेपाल और महापरिनिर्वाण 483 ईसा पूर्व कुशीनगर, भारत में हुआ था। उनके महापरिनिर्वाण के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला और अगले दो हजार वर्षों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया।
⭐गौतम बुद्ध_____:
⭐नाम – सिद्धार्थ गौतम बुद्ध
⭐जन्म – 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी, नेपाल
⭐मृत्यु – 483 ईसा पूर्व कुशीनगर, भारत
⭐विवाह – राजकुमारी यशोधरा
⭐बच्चें – एक पुत्र, राहुल
⭐पिता का नाम – शुद्धोदन (एक राजा और कुशल शासक)
⭐माता का नाम – माया देवी (महारानी)
⭐बौद्ध धर्म की स्थापना – चौथी शताब्दी के दौरान
#इतिहास
जैन धर्म:- जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। 'जैन धर्म' का अर्थ है - 'जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म'। जो 'जिन' के अनुयायी हों उन्हें 'जैन' कहते हैं। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने - जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया और विशिष्ट ज्ञान को पाकर सर्वज्ञ या पूर्णज्ञान प्राप्त किया उन आप्त पुरुष को जिनेश्वर या 'जिन' कहा जाता है'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान् का धर्म।
⭐ जैन ग्रंथों के अनुसार इस काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव आदिनाथ द्वारा जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था।
⭐ जैन धर्म के तीर्थंकर, नाम, चिन्ह और जन्म स्थान:-
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1. श्री ऋषभनाथ जी - बैल (अयोध्या)
2. श्री अजितनाथ जी - हाथी (अयोध्या)
3. श्री संभवनाथ जी - घोड़ा (सावत्थी)
4. श्री अभिनन्दन जी - बंदर (अयोध्या)
5. श्री सुमतिनाथ जी - पक्षी (अयोध्या)
6. श्री पद्मप्रभु जी - कमल (कौसाम्बी)
7. श्री सुपार्श्वनाथ जी - स्वस्तिक (वाराणसी)
8. श्री चंद्रप्रभु जी - चन्द्रमा (चन्द्रपुरी)
9. श्री सुविधिनाथजी - मगरमच्छ (काकंदिपुर)
10. श्री शीतलनाथ जी - कल्प वृक्ष (भद्रिलपुर)
11. श्री श्रेयांसनाथ जी - गेंडा (सिंहपुर)
12. श्री वासपुज्य जी - भैंसा (चम्पापुर)
13. श्री विमलनाथ जी - शूकर (कम्पिला)
14. श्री अनन्तनाथ जी - सेही (अयोध्या)
15. श्री धर्मनाथ जी - (वज्र रत्नपुर)
16. श्री शांतिनाथ जी - हिरण (हस्तिनापुर)
17. श्री कुथुनाथ जी - बकरा (हस्तिनापुर)
18. श्री अरनाथ जी - मछली (हस्तिनापुर)
19. श्री मल्लिनाथ जी - कलश (मिथिलापुरी)
20. श्री मुनिस्रुवत जी - कछुआ (राजगृही)
21. श्री नमिनाथ जी - नीलकमल (मिथिलापुरी)
22. श्री नेमिनाथ जी - शंख (सौरिपुर)
23. श्री पार्श्व नाथ जी - सर्प (वाराणसी)
24. श्री महावीर स्वामीजी - सिंह(क्षत्रिय कुंड)
⭐ जैन धर्म के 5 मूलभूत सिद्धांत है।
1)- अहिंसा
2)- सत्य
3)- अचौर्य
4)- ब्रह्मचर्य
5)- अपरिग्रह
#इतिहास
(महाजनपद):-
महाजनपद, प्राचीन भारत में राज्य या प्रशासनिक इकाईयों को कहते थे। उत्तर वैदिक काल में कुछ जनपदों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथों में इनका कई बार उल्लेख हुआ है।
ये निम्नलिखित थे।
1.अंग:- यह राज्य मगध के पश्चिम में स्थित था। इनमें आधुनिक बिहार के मुंगेर और भागलपुर जिले सम्मिलित थे। मगध वह अंग राज्यों के बीच चंपा नदी बहती थी। चंपा इसकी राजधानी का भी नाम था। यह उस काल के व्यापार व सभ्यता का प्रसिद्ध केंद्र था। अंग और मगध के मध्य निरंतर संघर्ष हुआ करते थे। अंत में यह मगध में विलीन हो गया।
2. मगध:- इस राज्य का अधिकार क्षेत्र मोटे तौर पर आधुनिक बिहार के पटना और गया जिलों के भूप्रदेश पर था इस की प्राचीन राजधानी गिरीव्रज थी। बाद में राजगृह व् पाटलिपुत्र राजधानी बनी प्रारंभ में एक छोटा राज्य था पर इसकी शक्ति में निरंतर विकास होता गया बुद्ध के काल में यह चार शक्तिशाली राजतंत्रो में से एक था।
3. काशी:- महाजनपद काल का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था इसकी राजधानी वाराणसी थी। जो अपने वैभव ज्ञान एवं शिल्प के लिए बहुत प्रसिद्ध थी। महाजनपद काल का अंत होते होते यह कोसल राज्य में विलीन हो गया।
4.वत्स:- यह राज्य गंगा नदी के दक्षिण में और काशी व कौशल के पश्चिम स्थित था और इसकी राजधानी कौशांबी थी जो व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र थी कौशांबी इलाहाबाद से लगभग 48 किलोमीटर की दूरी पर है बुद्ध के समय यहां का राजा उदयन था जो बड़ा शक्तिशाली पराकर्मी था उसकी मृत्यु के बाद मगध ने इस राज्य को हड़प लिया। वत्स का राज्य भी बुद्ध के समय चार प्रमुख राजतंत्रो में से एक था।
5. वज्जि:- यह राज्य गंगा नदी के उत्तर में नेपाल की पहाड़ियों तक विस्तृत था। पश्चिम में गंडक नदी इसकी सीमा बनाती थी और पूर्व में संभवत इसका विस्तार कोशी और महानंदा नदियों के तटवर्ती जंगलों तक था। यह एक संघात्मक गणराज्य था जो 8 कुलो से बना था। बुद्ध और महावीर के काल में यह एक अत्यंत शक्तिशाली गणराज्य था बाद में मगध के शासक ने इसे अपने राज्य का एक प्रदेश बना दिया।
6. कोसल:- इस राज्य का विस्तार आधुनिक उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में था। रामायण में इसकी राजरानी अयोध्या बताई गई है प्राचीन काल में दिलिप,रघु, दशरथ और श्रीराम आदि सूर्यवंशी शासको ने इस पर शासन किया था बौद्ध ग्रंथ मैं इसकी राजधानी श्रावस्ती कही गई है। बुद्ध के समय यह चार शक्तिशाली राजतंत्र में से एक था।
7. अवन्ति:- इस राज्य के अंतर्गत वर्तमान उज्जैन का भू प्रदेश तथा नर्मदा घाटी का कुछ भाग जाता था। यह राज्य भी दो भागों में बंटा था। उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी और दक्षिणी भाग की राजधानी महिष्मति थी। बुद्धकालीन चार शक्तिशाली राजतंत्र में से एक यह भी था बाद में यह मगध राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
8. मल्ल:- यह भी एक गणराज्य था यह दो भागों में बंटा हुआ था। एक की राजधानी कुशीनारा (वर्तमान उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में आधुनिक कुशीनगर) और दूसरे की पावा। मल लोग अपने साहस अपने साहस व युद्ध प्रियता के लिए विख्यात थे। मल राज्य अनन्त मगध द्वारा जीत लिया गया।
9. पांचाल:- इस महाजन पद का विस्तार आधुनिक बंदायू और फर्रुखाबाद की जिले रोहिलखंड और मध्य दोआब में था। यह दो भागों में विभक्त था-उतरी पांचाल और दक्षिण पांचाल। उतरी पांचाल की राजधानी अहिछत्र और दक्षिण पंचाल की राजधानी कापील्य थी और यहां गणतन्त्रीय व्यवस्था कायम थी।
10. चेदि:- यह राज्य आधुनिक बुंदेलखंड के पश्चिम भाग में स्थित था। इसकी राजधानी शक्तिमती थी। इसे बौद्ध साक्ष्य में सोत्तथवती कहा गया है। चेदि लोगों का उलेख ऋग्वेद में भी मिलता है। महाभारत में यहां के राजा शिशुपाल का उल्लेख है। जिसके शासनकाल में इस राज्य ने बहुत उन्नति की। इसी समय इस वंश की एक शाखा कलिंग में स्थापित हुई।
11.कुरु:- इस राज्य में आधुनिक दिल्ली के आसपास के प्रदेश थे। इसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ थी। जिसकी स्मृति आज भी दिल्ली के निकट इंद्रप्रस्थ गांव में सुरक्षित मिलती है। यह महाभारत काल का एक प्रसिद्ध राज्य था। हस्तिनापुर इस राज्य का एक अन्य प्रसिद्ध नगर था।
12. मत्स्य:- इस राज्य का विस्तार आधुनिक राजस्थान के अलवर जिले से चंबल नदी तक था। इसकी राजधानी विराटनगर (जयपुर से अलवर जाने वाले मार्ग पर स्थित, वर्तमान नाम बैराठ) थी। महाभारत के अनुसार पांडेय ने यहां अपना अज्ञातवास का समय बिताया था।
13. कम्बोज:- इसका उल्लेख सदैव गंधार के साथ हुआ है। अत यह महाजनपद गंधार राज्य से सटे हुए भारत की पश्चिमउत्तर भाग (कश्मीर का उतरी भाग पामीर तथा बदख्शां के प्रदेश) में स्थित रहा होगा। राजपुर और द्वारका इस राज्य के दो प्रमुख नगर थे। यह पहले एक राजतंत्र था, किंतु बाद में गणतंत्र बन गया।
14. शूरसेन:- इस जनपद की राजधानी मथुरा थी। महाभारत तथा पुराणो में यहां के राजवंशो को यदु अथवा यादव कहा गया है। इसी राजवंश की यादव शाखा में श्री कृष्ण उत्पन्न हुए।
15.अश्मक:- यह राज्य दक्षिण में गोदावरी नदी के तट पर स्थित था। इसकी राजधानी पोतली अथवा पोदन थी। बाद में अवन्ति ने इसे अपने राज्य मे मिला लिया।
16. गांधार:- यह राज्य (वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर तथा राहुल पिंडी के जिले) पूर्वी अफगानिस्तान में स्थित था। इस राज्य में कश्मीर घाटी तथा प्राचीन तक्षशिला का भू प्रदेश भी आता था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी। तक्षशिला का विश्वविद्यालय उस समय शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र था।
#इतिहास
23/01/2023
True 💯
21/01/2023
हर सुबह इस यकीन के साथ उठो...
सिंधु घाटी सभ्यता:-
सिंधु घाटी सभ्यता (अंग्रेज़ी:Indus Valley Civilization) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी।
इस सभ्यता का उदय सिंधु नदी की घाटी में होने के कारण इसे सिंधु सभ्यता तथा इसके प्रथम उत्खनित एवं विकसित केन्द्र हड़प्पा के नाम पर हड़प्पा सभ्यता, आद्यैतिहासिक कालीन होने के कारण आद्यैतिहासिक भारतीय और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है।
सभ्यता की खोज:-
इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय 'रायबहादुर दयाराम साहनी' को जाता है। उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक 'सर जॉन मार्शल' के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। लगभग एक वर्ष बाद 1922 में 'श्री राखल दास बनर्जी' के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के 'लरकाना' ज़िले के मोहनजोदाड़ो में स्थित एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला।
सभ्यता का विस्तार:-
अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के भागों में पाये जा चुके हैं। इस सभ्यता का फैलाव उत्तर में 'जम्मू' के 'मांदा' से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने 'भगतराव' तक और पश्चिमी में 'मकरान' समुद्र तट पर 'सुत्कागेनडोर' से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ तक है। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल 'सुत्कागेनडोर', पूर्वी पुरास्थल 'आलमगीर', उत्तरी पुरास्थल 'मांडा' तथा दक्षिणी पुरास्थल 'दायमाबाद' है। लगभग त्रिभुजाकार वाला यह भाग कुल क़रीब 12,99,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सिन्धु सभ्यता का विस्तार का पूर्व से पश्चिमी तक 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 किलोमीटर था। इस प्रकार सिंधु सभ्यता समकालीन मिस्र या 'सुमेरियन सभ्यता' से अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी।
#इतिहास
प्रागैतिहासिक काल:-
भारत का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है।
प्रागैतिहासिक शब्द प्राग+इतिहास से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है- इतिहास से पूर्व का युग ।
प्रागैतिहासिक (Prehistory) इतिहास के उस काल को कहा जाता है जब मानव तो अस्तित्व में थे लेकिन जब लिखाई का आविष्कार न होने से उस काल का कोई लिखित वर्णन नहीं है।इस काल में मानव-इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई जिनमें हिमयुग, मानवों का अफ़्रीका से निकलकर अन्य स्थानों में विस्तार, आग पर स्वामित्व पाना, कृषि का आविष्कार, कुत्तों व अन्य जानवरों का पालतू बनना इत्यादि शामिल हैं। ऐसी चीज़ों के केवल चिह्न ही मिलते हैं, जैसे कि पत्थरों के प्राचीन औज़ार, पुराने मानव पड़ावों का अवशेष और गुफ़ाओं की कला।
यह वो समय है जब हम पशु से मनुष्य के रूप में विकसित हुए है जब मनुष्य ने खाद्य उत्पादन आरम्भ नही किया था ।
प्रागैतिहासिक भारत को निम्नलिखित भागों में विभक्त किया गया है :-
पूर्व पाषाण काल
मध्य पाषाण काल
उत्तर पाषाण काल
धातु पाषाण काल
पूर्व पाषाण काल
पूर्व पाषाण कालीन सभ्यता के केन्द्र दक्षिण भारत में मदुरा त्रिचनापल्ली, मैसूर, तंजौर आदि क्षेत्रों में इस सभ्यता के अवशेष मिले है । इस समय मनुष्य का प्रारंभिक समय था, इस काल में मनुष्य और जानवरों में विशेष अन्तर नहीं था । पूर्व पाषाण कालीन मनुष्य कन्दराओं, गुफाओं, वृक्षो आदि में निवास करता था । पूर्व पाषाण कालीन मनुष्य पत्थरों का प्रयोग अपनी रक्षा के लिये करता था । कुल्हाड़ी और कंकड के औजार सोहन नदी की घाटी में मिले है । सोहन नदी सिंधु नदी की सहायक नदी है। उसके पत्थर के औजार साधारण और खुरदुरे थे । इस युग में मानव शिकार व भोजन एकत्र करने की अवस्था में था । खानाबदोश जीवन बिताता था और उन जगहों की तलाश में रहता था, जहॉं खाना पानी अधिक मात्रा में मिल सके ।
मध्य पाषाण काल
मध्य पाषाण काल में पत्थर के औजार बनायें जाने लगे इस काल में कुल्हाडियों के अलावा, सुतारी, खुरचनी और बाण आदि मिले है । इस काल में मिट्टी का प्रयोग होने लगा था । पत्थरों में गोमेद, जेस्पर आदि का प्रयोग होता था । इस काल के अवशेष सोहन नदी, नर्मदा नदी और तुगमद्रा नदी के किनारे पाये गये ।
उत्तर पाषाण काल
इस काल में भीमानव पाषाणो का ही प्रयोग करता था, किन्तु इस काल में निर्मित हथियार पहले की अपेक्षा उच्च कोटि के थे । पाषाण काल का समय मानव जीवन के लिये विशेष अनुकूल था । इस काल के मनुष्य अधिक सभ्य थे ।उन्होंने पत्थर व मिट्टी को जोड़कर दीवारे व पेड़ की शाखाओं व जानवरों की हड्डियों से छतों का निर्माण किया एवं समूहों में रहना प्रारम्भ कर दिया । मिट्टी के बर्तन, वस्त्र बुनना आदि प्रारम्भ कर दिया । हथियार नुकीले सुन्दर हो गये। इस काल के औजार सेल्ट, कुल्हाड़ियाँ, छेनियाँ, गदायें, मूसला, आरियाँ इत्यादि थे । उत्तर पाषाण कालीन लोग पत्थर को रगड़कर आग जलाने व भोजन पकाने की कला जानते थे । इस काल में धार्मिक भावनायें भी जागृत हुर्इ । प्राकृतिक पूजा वन, नदी आदि की करते थे ।
धातु युग
धातु यगु मानव सभ्यता के विकास का द्वितीय चरण था । इस युग में मनुष्य ने धातु के औजार तथा विभिन्न वस्तुयें बनाना सीख लिया था । इस युग में सोने का पता लगा लिया था एवं उसका प्रयोग जेवर के लिये किया जाने लगा । धातु की खोज के साथ ही मानव की क्षमताओं में भी वृद्धि हुर्इ । हथियार अधिक उच्च कोटि के बनने लग गये । धातुकालीन हथियारों में चित्र बनने लगे। इस युग में मानव ने धातु युग को तीन भागों में बांटा गया:-
ताम्र युग
कांस्य युग
लौह युग
ताम्र युग:
इस युग में ताबें का प्रयोग प्रारम्भ हुआ । पाषाण की अपेक्षा यह अधिक सुदृढ़ और सुविधाजनक था । इस धातु से कुल्हाड़ी, भाले, तलवार तथा आवश्यकता की सभी वस्तुयें तॉबे से बनार्इ जाने लगी । कृषि कार्य इन्ही औजारों से किया जाने लगा ।
कांस्य युग:
इस यगु में मानव ने तांबा और टिन मिलाकर एक नवीन धातु कांसा बनाया जो अत्यंत कठोर था । कांसे के औजार उत्तरी भारत में प्राप्त हुये इन औजार में चित्र भी थे । अनाज उपजाने व कुम्हार के चाक पर बर्तन बनाने की कला सीख ली थी । वह मातृ देवी और नर देवताओं की पूजा करता था । वह मृतकों को दफनाता था और धार्मिक अनुष्ठानों में विश्वास करता था । ताम्र पाषाण काल के लोग गांवों में रहते थे ।
लौह युग:
दक्षिण भारत में उत्तर पाषाण काल के उपरान्त ही लौह काल प्रारम्भ हुआ। लेकिन उत्तरी भारत में ताम्रकाल के उपरान्त लौह काल प्रारम्भ हुआ । इस काल में लोहे के अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किया जाने लगा । ताम्र पाषाण काल में पत्थर और तांबे के औजार बनाये जाते थे ।
#इतिहास
20/01/2023
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