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Sushil Shekhar Social Worker, Environmentalist

जब चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठें, तो लोकतंत्र किस पर भरोसा करे?सवाल केवल चुनाव जीतने या हारने का नहीं है। सवाल उ...
10/16/2026

जब चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठें, तो लोकतंत्र किस पर भरोसा करे?

सवाल केवल चुनाव जीतने या हारने का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिस पर देश के हर नागरिक का वोट और लोकतंत्र का भविष्य टिका है।

भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। संविधान ने उसे इसलिए स्वतंत्र संस्था बनाया, ताकि चुनाव कराने वाली संस्था उसी सरकार के प्रभाव में न रहे, जिसके भविष्य का फैसला चुनावों से होना है।

लेकिन जब आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में बदलाव और उसके शीर्ष पदों पर नियुक्ति को लेकर गंभीर सवाल उठने लगें, तो नागरिकों का जवाब माँगना लोकतंत्र के प्रति उनकी जिम्मेदारी है।

1. जब आयोग के दो सदस्य ही फैसलों पर सवाल उठाएँ

सितंबर 2026 में The Indian Express की एक जाँच-रिपोर्ट ने निर्वाचन आयोग के भीतर गंभीर मतभेदों का खुलासा किया। रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए जा रहे कुछ फैसलों पर पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की थीं। ये आपत्तियाँ मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने, अपीलों और डिजिटल प्रणालियों के संचालन जैसे विषयों से संबंधित थीं।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं के Form 6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा जोड़ने की वैधता पर भी सवाल उठाया था। उनका तर्क था कि कानून के तहत निर्धारित फॉर्म में बदलाव करने के लिए संबंधित नियमों में उचित संशोधन आवश्यक है। आयोग के भीतर उठे इन सवालों पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण और पारदर्शिता जरूरी है।

यहाँ एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: किसी आयुक्त की असहमति अपने आप में यह साबित नहीं करती कि अंतिम फैसला अवैध था। लेकिन जब एक संवैधानिक संस्था के दो सदस्य ही किसी प्रक्रिया की वैधता या पारदर्शिता पर आपत्ति दर्ज करें, तो उन आपत्तियों की निष्पक्ष जाँच और सार्वजनिक जवाबदेही की आवश्यकता बढ़ जाती है।

अगर संस्था के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं, तो नागरिकों के सवालों को अनसुना क्यों किया जाए?

2. SIR: मतदाता सूची की सफाई या नागरिक के मताधिकार की परीक्षा?

Special Intensive Revision (SIR) का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नामों को ठीक करना और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है। सिद्धांत रूप में, यह एक आवश्यक प्रक्रिया हो सकती है।

लेकिन असली कसौटी उद्देश्य नहीं, बल्कि प्रक्रिया है।

यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हट जाता है, तो उसके लिए यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं है। यह उसके संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार के इस्तेमाल में गंभीर बाधा बन सकती है।

यदि किसी नए मतदाता को नाम जुड़वाने के लिए ऐसे अतिरिक्त दस्तावेज या घोषणाएँ देनी पड़ें, जिनकी कानूनी आवश्यकता स्पष्ट नहीं है, तो प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि किसी नागरिक का नाम हटाया जाता है, तो उसे इसकी सूचना, कारण जानने का अवसर और प्रभावी अपील का रास्ता मिलना चाहिए।

मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी, कानूनसम्मत और समान रूप से लागू होनी चाहिए। न किसी अपात्र व्यक्ति का नाम बना रहना चाहिए, न किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हटना चाहिए।

SIR को लेकर सामने आई रिपोर्टों में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और आयोग के भीतर प्रक्रियागत आपत्तियों का उल्लेख है। इन रिपोर्टों से प्रत्येक नाम का गलत तरीके से हटना सिद्ध नहीं होता। इसलिए आवश्यक है कि हटाए गए नामों, कारणों, बहाली और अपील के परिणामों का विश्वसनीय आँकड़ा सार्वजनिक किया जाए।

मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर किसी योग्य नागरिक का मताधिकार छिनना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति: सबसे बुनियादी सवाल

यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत पहलू है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर देश में लंबे समय से बहस होती रही है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal बनाम Union of India मामले में निर्देश दिया था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर की जाए।

इसके बाद संसद ने 2023 में नया कानून बनाया। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। यानी चयन समिति में सरकार के दो प्रतिनिधि और विपक्ष का एक प्रतिनिधि है; भारत के मुख्य न्यायाधीश इस समिति के सदस्य नहीं हैं।

इस व्यवस्था से एक गंभीर लोकतांत्रिक सवाल पैदा होता है।

जिस सरकार के कार्यकाल का फैसला चुनाव से होना है, यदि उसी सरकार के प्रतिनिधियों को चुनाव कराने वाली संस्था के प्रमुख की नियुक्ति में बहुमत प्राप्त हो, तो उस संस्था की स्वतंत्रता पर जनता का भरोसा कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?

यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार द्वारा चुना गया हर अधिकारी पक्षपाती ही होगा। किसी व्यक्ति की निष्पक्षता का फैसला केवल उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता। लेकिन स्वतंत्र संस्था की विश्वसनीयता केवल व्यक्ति की ईमानदारी पर निर्भर नहीं होनी चाहिए; उसकी नियुक्ति की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए कि राजनीतिक प्रभाव की आशंका न्यूनतम रहे।

सवाल यह है कि जब एक अधिक संतुलित चयन समिति बनाई जा सकती है, तो मुख्य न्यायाधीश जैसे स्वतंत्र संवैधानिक पद को चयन प्रक्रिया से बाहर रखने का औचित्य क्या है?

क्या सरकार को यह भरोसा नहीं था कि मुख्य न्यायाधीश स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका निभाएँगे? या फिर मौजूदा व्यवस्था में सरकार को दो-एक का बहुमत बनाए रखने का लाभ मिलता है?

ये सवाल हैं, किसी की नीयत के बारे में सिद्ध तथ्य नहीं। लेकिन लोकतंत्र में ऐसी आशंकाओं का उत्तर पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था से दिया जाना चाहिए, केवल आश्वासनों से नहीं।

4. जब चयन प्रक्रिया में ही सरकार का बहुमत हो, तो स्वतंत्रता की गारंटी कौन देगा?

किसी भी लोकतंत्र में सरकार को प्रशासन चलाने का अधिकार होता है, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था को सरकार से पर्याप्त दूरी पर रहना चाहिए।

कल्पना कीजिए कि किसी चुनाव में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच कड़ा मुकाबला है। उसी चुनाव की प्रक्रिया पर निगरानी रखने वाली संस्था के प्रमुख की नियुक्ति में सत्तारूढ़ सरकार के प्रतिनिधियों का निर्णायक बहुमत है।

भले ही नियुक्त व्यक्ति पूरी ईमानदारी से काम करे, फिर भी व्यवस्था पर पक्षपात की आशंका उठ सकती है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि उनकी निष्पक्षता पर भरोसा करने के पर्याप्त कारण भी उपलब्ध होने चाहिए।

इसीलिए चयन प्रक्रिया में व्यापक सहमति, स्वतंत्र सदस्यों की भागीदारी, नियुक्ति के स्पष्ट मानदंड और निर्णयों की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हैं।

लोकतंत्र में संस्थाओं की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति की कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था की विशेषता होनी चाहिए।

5. क्या यह लोकतंत्र के लिए सही व्यवस्था है?

लोकतंत्र का अर्थ केवल हर पाँच साल में मतदान करना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि मतदाता सूची विश्वसनीय हो, चुनाव कराने वाली संस्था स्वतंत्र हो, विपक्ष को अपनी शिकायतें रखने का अवसर मिले और हर पात्र नागरिक को बिना भेदभाव वोट देने का अधिकार मिले।

यदि चुनाव आयोग पर सवाल उठते हैं, तो हर सवाल को राजनीतिक साजिश कहकर खारिज करना भी गलत है। उसी तरह हर आरोप को बिना जाँच सच मान लेना भी उचित नहीं है।

सही रास्ता है—तथ्यों की स्वतंत्र जाँच, समय पर जवाब, पारदर्शी प्रक्रिया और आवश्यक सुधार।

यदि दो निर्वाचन आयुक्तों ने औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की हैं, तो उन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, यह जनता को बताया जाना चाहिए। यदि SIR में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे बहाल करने का प्रभावी तंत्र होना चाहिए। और यदि नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक बहुमत की वजह से स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, तो कानून में सुधार पर खुली बहस होनी चाहिए।

निष्कर्ष: चुनाव सरकार नहीं, जनता का भरोसा तय करता है

भारत का लोकतंत्र केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह हर नागरिक का साझा अधिकार और जिम्मेदारी है।

निर्वाचन आयोग को न किसी राजनीतिक दल का पक्षधर होना चाहिए, न किसी सरकार का विरोधी। उसे संविधान और मतदाता के अधिकारों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की ऐसी व्यवस्था क्यों न हो, जिसमें सरकार और विपक्ष के साथ स्वतंत्र संवैधानिक प्रतिनिधित्व भी शामिल हो? मतदाता सूची में हर बदलाव का स्पष्ट रिकॉर्ड क्यों न उपलब्ध हो? और आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों पर पारदर्शी जवाबदेही क्यों न सुनिश्चित की जाए?

ये माँगें किसी दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। ये उस लोकतंत्र के पक्ष में हैं, जिसमें हर नागरिक का वोट बराबर हो और चुनाव कराने वाली संस्था पर भरोसा किसी राजनीतिक विचारधारा पर निर्भर न करे।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सत्ता किसके पास है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सत्ता बदलने का फैसला करने वाली प्रक्रिया पर भरोसा किस आधार पर कायम है।

और यदि चुनाव कराने वाली संस्था की स्वतंत्रता पर ही प्रश्नचिह्न लगने लगें, तो उन प्रश्नों का उत्तर माँगना लोकतंत्र को कमजोर करना नहीं—उसे मजबूत करना है।

चुनाव प्रचार के दौरान कई तीखे राजनीतिक बयान और नारे चर्चा में रहे, जिनमें "हिंदू–मुस्लिम की राजनीति" और "कुत्ता-बिल्ली भ...
08/04/2026

चुनाव प्रचार के दौरान कई तीखे राजनीतिक बयान और नारे चर्चा में रहे, जिनमें "हिंदू–मुस्लिम की राजनीति" और "कुत्ता-बिल्ली भी बांकीपुर से जीत जाएगा" जैसे बयान भी शामिल थे।
चुनाव परिणाम आने के बाद बांकीपुर के मतदाताओं ने अपने वोट से स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है।

"राम के नाम लूट है, लूट सको तो लूट..."कबीर की इस पंक्ति को शायद किसी ने बहुत गंभीरता से ले लिया।जिस राम के नाम पर करोड़ो...
06/22/2026

"राम के नाम लूट है, लूट सको तो लूट..."

कबीर की इस पंक्ति को शायद किसी ने बहुत गंभीरता से ले लिया।
जिस राम के नाम पर करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है, उसी राम के नाम पर चढ़ावे और दान को लेकर सवाल उठ रहे हैं। SIT जांच कर रही है, आरोप गंभीर हैं, और जनता जवाब चाहती है।

अगर आरोप गलत हैं, तो सच्चाई सामने आनी चाहिए। अगर आरोप सही हैं, तो दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब देशभर के लोग श्रद्धा से दान देते हैं, तो उस धन की सुरक्षा और पारदर्शिता की जिम्मेदारी किसकी है?
आस्था जनता की है, लेकिन जवाबदेही भी होनी चाहिए। राम मंदिर किसी दल, संगठन या व्यक्ति की संपत्ति नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। राम के नाम पर राजनीति बहुत हुई, राम के नाम पर वोट भी बहुत मिले, लेकिन अगर राम के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ है, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, करोड़ों लोगों के विश्वास के साथ विश्वासघात है।

अब समय है कि जांच निष्पक्ष हो, पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक हो और सच देश के सामने आए। जय श्री राम का नारा लगाने से पहले, राम के आदर्शों—सत्य, मर्यादा और न्याय—को भी याद रखना होगा।

लखनऊ अग्निकांड एक बार फिर कई सवाल खड़े कर गया है।चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, आम लोगों की जान शायद सिर्फ एक आंकड़ा ब...
06/22/2026

लखनऊ अग्निकांड एक बार फिर कई सवाल खड़े कर गया है।
चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, आम लोगों की जान शायद सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह गई है। हर बड़ी दुर्घटना के बाद जांच, बयान और आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन क्या वास्तव में कोई सबक लिया जाता है?

हर बार वही लापरवाही, वही व्यवस्थागत खामियां, और फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। आखिर कब तक निर्दोष लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे? कब तक हादसों के बाद सिर्फ संवेदनाएं और मुआवज़े बांटे जाते रहेंगे?

जरूरत सिर्फ दोषियों को ढूंढने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस और जवाबदेह व्यवस्था बनाने की है। पता नहीं यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा, लेकिन हर खोई हुई जान हम सबकी सामूहिक विफलता की याद दिलाती है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज FIR और ED की कार्रवाई को खारिज करते हुए ...
06/12/2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज FIR और ED की कार्रवाई को खारिज करते हुए इसे "कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" बताया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आपराधिक आरोप नहीं था जिससे मनी लॉन्ड्रिंग या धोखाधड़ी का मामला बनता हो।

लेकिन सवाल सिर्फ कानूनी जीत का नहीं है।

वर्षों तक चली जांच, छापेमारी, बैंक खातों पर असर, संपत्तियों की जब्ती, पत्रकारों से पूछताछ और लगातार चलाए गए अभियानों ने न्यूज़क्लिक को गंभीर आर्थिक और संस्थागत नुकसान पहुँचाया। कई पत्रकारों, वीडियो संपादकों, तकनीकी कर्मचारियों और फ्रीलांस सहयोगियों की आजीविका प्रभावित हुई। जिन लोगों ने वर्षों तक जनता के मुद्दों को उठाया, उन्हें कानूनी अनिश्चितता और पेशेवर असुरक्षा का सामना करना पड़ा।

आज न्यूज़क्लिक अभी भी काम कर रहा है और अपनी पत्रकारिता जारी रखे हुए है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इतने वर्षों की कार्रवाई ने संस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है।

यदि अंत में अदालत यह कहती है कि मामला ही नहीं बनता था, तो क्या केवल बरी हो जाना पर्याप्त है? क्या उन पत्रकारों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को हुए आर्थिक और मानसिक नुकसान की कोई जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?

लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, सत्ता की प्रशंसा करना नहीं। यदि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल आलोचनात्मक मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह सिर्फ एक मीडिया हाउस पर हमला नहीं, बल्कि नागरिकों के जानने के अधिकार पर हमला है।

न्यूज़क्लिक का मामला हमें याद दिलाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल संविधान की किताबों में नहीं, बल्कि संस्थाओं के व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।

सवाल पूछना देशद्रोह नहीं है। पत्रकारिता अपराध नहीं है।

दिल्ली के एक होटल में आग लगती है। बिहार के एक अस्पताल में आग लगती है। कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं। टीवी चैनलों पर बहस ...
06/04/2026

दिल्ली के एक होटल में आग लगती है। बिहार के एक अस्पताल में आग लगती है। कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं। टीवी चैनलों पर बहस होती है, नेताओं के बयान आते हैं, मुआवज़े की घोषणा होती है और जांच के आदेश दे दिए जाते हैं।

फिर क्या होता है?

लगभग वही जो हर बार होता है—कुछ दिनों तक शोर, कुछ दिनों तक संवेदनाएं, और फिर सब कुछ सामान्य।

हर बड़ी दुर्घटना के बाद कहा जाता है कि इससे सबक लिया जाएगा। अग्नि सुरक्षा नियमों की समीक्षा होगी। जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी। लेकिन वर्षों से हो रही ऐसी घटनाओं को देखकर सवाल उठता है कि हमने वास्तव में क्या सीखा? शायद कुछ भी नहीं।

होटल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, फैक्ट्री या आवासीय इमारत—दुर्घटना का स्थान बदल जाता है, लेकिन कारण अक्सर वही रहते हैं: लापरवाही, नियमों की अनदेखी और कमजोर जवाबदेही।

सबसे दुखद बात यह है कि मृतकों की संख्या कुछ दिनों तक सुर्खियां बनती है, फिर आंकड़ों में बदल जाती है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके लिए यह जीवन भर का दर्द है। लेकिन व्यवस्था के लिए अक्सर यह सिर्फ एक और घटना बनकर रह जाती है।

यदि हर दुर्घटना के बाद वही गलतियां दोहराई जाएं, तो यह कहना कठिन है कि हमने कोई सबक सीखा है। असली श्रद्धांजलि केवल शोक व्यक्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।

दुर्भाग्य से, हमारा अनुभव यही बताता है कि कुछ महीनों बाद लोग इन घटनाओं को भूल जाएंगे, मीडिया किसी नए मुद्दे की ओर बढ़ जाएगा और व्यवस्था अगले हादसे का इंतजार करेगी।

जब भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा था, तब मीडिया चैनलों पर जश्न का माहौल था। घंटों तक बहसें ह...
06/04/2026

जब भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा था, तब मीडिया चैनलों पर जश्न का माहौल था। घंटों तक बहसें हुईं, बड़े-बड़े दावे किए गए और इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया। लेकिन आज जब भारत का शेयर बाज़ार पूंजीकरण (Stock Market Capitalization) के आधार पर दुनिया में सातवें स्थान पर खिसक गया है, तब वही मीडिया लगभग खामोश क्यों है?

अगर चौथे स्थान की खबर हेडलाइन बन सकती है, तो सातवें स्थान पर फिसलने की खबर भी उतनी ही प्रमुखता से दिखाई जानी चाहिए। मीडिया का काम केवल सकारात्मक खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना नहीं, बल्कि जनता को पूरी और संतुलित तस्वीर दिखाना है।

हाल के दिनों में Bloomberg Economics की रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि रुपये पर दबाव को कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देने के लिए RBI ने सोने से जुड़े लेनदेन किए। हालांकि RBI ने इस व्याख्या को खारिज किया और कहा कि उसके भौतिक स्वर्ण भंडार में कोई कमी नहीं आई है।

साथ ही यह भी सच है कि रुपये पर दबाव बढ़ा, विदेशी निवेशकों की बिकवाली देखी गई और बाजार में अस्थिरता बनी रही। लेकिन इन मुद्दों पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी उपलब्धियों के समय होती है।

सवाल किसी सरकार या पार्टी का नहीं है। सवाल मीडिया की निष्पक्षता का है। यदि उपलब्धियों का श्रेय दिखाया जाता है, तो चुनौतियों और कमजोरियों पर भी उतनी ही ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए।

लोकतंत्र में पत्रकारिता का उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि जनता को तथ्य बताना और सत्ता से जवाबदेही मांगना है।

भारत को “दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” बनने का ढिंढोरा पीटने वाले आज चुप क्यों हैं, जब खबर आ रही है कि भारत छठे...
04/24/2026

भारत को “दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” बनने का ढिंढोरा पीटने वाले आज चुप क्यों हैं, जब खबर आ रही है कि भारत छठे स्थान पर फिसल गया है? जब रैंकिंग ऊपर जाती है तो इसे अपनी नीतियों की बड़ी उपलब्धि बताया जाता है, लेकिन जैसे ही गिरावट आती है, वही लोग या तो चुप्पी साध लेते हैं या बहाने बनाने लगते हैं। सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था केवल रैंकिंग से नहीं, बल्कि रोजगार, महंगाई, आम लोगों की आय और जीवन स्तर से आंकी जाती है। अगर देश में बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है और छोटे व्यवसाय संघर्ष कर रहे हैं, तो केवल रैंकिंग का जश्न मनाना या गिरावट पर चुप रहना जनता के साथ ईमानदारी नहीं है। जिम्मेदार नेतृत्व का मतलब है अच्छे समय में श्रेय लेना ही नहीं, बल्कि खराब समय में जवाबदेही भी स्वीकार करना।

हाल ही में Raghav Chadha का Aam Aadmi Party छोड़कर Bharatiya Janata Party में जाना एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। अपने ...
04/24/2026

हाल ही में Raghav Chadha का Aam Aadmi Party छोड़कर Bharatiya Janata Party में जाना एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। अपने फैसले के बाद उन्होंने कहा कि AAP “अपने रास्ते से भटक गई है” और वे “गलत कामों का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।”

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कई अहम सवाल खड़े होते हैं।

सबसे पहले—अगर वे वास्तव में इतने असंतुष्ट थे, तो क्या उन्हें अपनी अलग राजनीतिक राह नहीं बनानी चाहिए थी? क्या एक नई पार्टी बनाकर या स्वतंत्र रूप से जनता के बीच जाकर अपने सिद्धांतों को साबित करना ज्यादा ईमानदार कदम नहीं होता?

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि जब वे AAP में इतने वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका में रहे, तब उन्होंने पार्टी के कितने फैसलों या कामों की खुलकर आलोचना की? अगर पार्टी पहले से ही “भटक” रही थी, तो क्या उस समय उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया, या फिर सत्ता और पद में रहते हुए चुप्पी बनाए रखी?

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास—जिन आरोपों या संकेतों के आधार पर उन्होंने AAP छोड़ी, क्या वही सवाल Bharatiya Janata Party पर भी समय-समय पर नहीं उठते रहे? विपक्ष लगातार BJP पर भी संस्थाओं के दुरुपयोग, राजनीतिक दबाव और पारदर्शिता की कमी जैसे आरोप लगाता रहा है। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि जो बातें AAP में अस्वीकार्य थीं, वे BJP में स्वीकार्य कैसे हो गईं।

यह कदम केवल एक दल बदल नहीं, बल्कि राजनीतिक विचारधारा की लचीलेपन—या कहें अवसरवाद—पर भी रोशनी डालता है। जनता के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि नेता सिद्धांतों के आधार पर फैसले लेते हैं या परिस्थितियों के अनुसार अपने रुख बदलते हैं।

76 साल की उम्र में भी वही जुनून और समर्पण—यह पहचान है प्रणय रॉय की। भारतीय पत्रकारिता में उनका नाम विश्वसनीयता और गहराई ...
04/16/2026

76 साल की उम्र में भी वही जुनून और समर्पण—यह पहचान है प्रणय रॉय की। भारतीय पत्रकारिता में उनका नाम विश्वसनीयता और गहराई के साथ जुड़ा हुआ है।

NDTV की स्थापना से लेकर उसे एक भरोसेमंद समाचार मंच बनाने तक उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। NDTV के मालिक से यहां तक पहुंचने की यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन पत्रकारिता के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।

इस उम्र में भी एक हाथ में मोबाइल से विजुअल लेते और दूसरे हाथ में माइक थामे, दिखाता है कि उनके अंदर आज भी वही पत्रकारिता का जुनून जिंदा है।

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