10/16/2026
जब चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठें, तो लोकतंत्र किस पर भरोसा करे?
सवाल केवल चुनाव जीतने या हारने का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिस पर देश के हर नागरिक का वोट और लोकतंत्र का भविष्य टिका है।
भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। संविधान ने उसे इसलिए स्वतंत्र संस्था बनाया, ताकि चुनाव कराने वाली संस्था उसी सरकार के प्रभाव में न रहे, जिसके भविष्य का फैसला चुनावों से होना है।
लेकिन जब आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में बदलाव और उसके शीर्ष पदों पर नियुक्ति को लेकर गंभीर सवाल उठने लगें, तो नागरिकों का जवाब माँगना लोकतंत्र के प्रति उनकी जिम्मेदारी है।
1. जब आयोग के दो सदस्य ही फैसलों पर सवाल उठाएँ
सितंबर 2026 में The Indian Express की एक जाँच-रिपोर्ट ने निर्वाचन आयोग के भीतर गंभीर मतभेदों का खुलासा किया। रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए जा रहे कुछ फैसलों पर पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की थीं। ये आपत्तियाँ मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने, अपीलों और डिजिटल प्रणालियों के संचालन जैसे विषयों से संबंधित थीं।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं के Form 6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा जोड़ने की वैधता पर भी सवाल उठाया था। उनका तर्क था कि कानून के तहत निर्धारित फॉर्म में बदलाव करने के लिए संबंधित नियमों में उचित संशोधन आवश्यक है। आयोग के भीतर उठे इन सवालों पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण और पारदर्शिता जरूरी है।
यहाँ एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: किसी आयुक्त की असहमति अपने आप में यह साबित नहीं करती कि अंतिम फैसला अवैध था। लेकिन जब एक संवैधानिक संस्था के दो सदस्य ही किसी प्रक्रिया की वैधता या पारदर्शिता पर आपत्ति दर्ज करें, तो उन आपत्तियों की निष्पक्ष जाँच और सार्वजनिक जवाबदेही की आवश्यकता बढ़ जाती है।
अगर संस्था के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं, तो नागरिकों के सवालों को अनसुना क्यों किया जाए?
2. SIR: मतदाता सूची की सफाई या नागरिक के मताधिकार की परीक्षा?
Special Intensive Revision (SIR) का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नामों को ठीक करना और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है। सिद्धांत रूप में, यह एक आवश्यक प्रक्रिया हो सकती है।
लेकिन असली कसौटी उद्देश्य नहीं, बल्कि प्रक्रिया है।
यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हट जाता है, तो उसके लिए यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं है। यह उसके संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार के इस्तेमाल में गंभीर बाधा बन सकती है।
यदि किसी नए मतदाता को नाम जुड़वाने के लिए ऐसे अतिरिक्त दस्तावेज या घोषणाएँ देनी पड़ें, जिनकी कानूनी आवश्यकता स्पष्ट नहीं है, तो प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि किसी नागरिक का नाम हटाया जाता है, तो उसे इसकी सूचना, कारण जानने का अवसर और प्रभावी अपील का रास्ता मिलना चाहिए।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी, कानूनसम्मत और समान रूप से लागू होनी चाहिए। न किसी अपात्र व्यक्ति का नाम बना रहना चाहिए, न किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हटना चाहिए।
SIR को लेकर सामने आई रिपोर्टों में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और आयोग के भीतर प्रक्रियागत आपत्तियों का उल्लेख है। इन रिपोर्टों से प्रत्येक नाम का गलत तरीके से हटना सिद्ध नहीं होता। इसलिए आवश्यक है कि हटाए गए नामों, कारणों, बहाली और अपील के परिणामों का विश्वसनीय आँकड़ा सार्वजनिक किया जाए।
मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर किसी योग्य नागरिक का मताधिकार छिनना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति: सबसे बुनियादी सवाल
यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत पहलू है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर देश में लंबे समय से बहस होती रही है। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal बनाम Union of India मामले में निर्देश दिया था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर की जाए।
इसके बाद संसद ने 2023 में नया कानून बनाया। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। यानी चयन समिति में सरकार के दो प्रतिनिधि और विपक्ष का एक प्रतिनिधि है; भारत के मुख्य न्यायाधीश इस समिति के सदस्य नहीं हैं।
इस व्यवस्था से एक गंभीर लोकतांत्रिक सवाल पैदा होता है।
जिस सरकार के कार्यकाल का फैसला चुनाव से होना है, यदि उसी सरकार के प्रतिनिधियों को चुनाव कराने वाली संस्था के प्रमुख की नियुक्ति में बहुमत प्राप्त हो, तो उस संस्था की स्वतंत्रता पर जनता का भरोसा कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?
यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार द्वारा चुना गया हर अधिकारी पक्षपाती ही होगा। किसी व्यक्ति की निष्पक्षता का फैसला केवल उसकी नियुक्ति की प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता। लेकिन स्वतंत्र संस्था की विश्वसनीयता केवल व्यक्ति की ईमानदारी पर निर्भर नहीं होनी चाहिए; उसकी नियुक्ति की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए कि राजनीतिक प्रभाव की आशंका न्यूनतम रहे।
सवाल यह है कि जब एक अधिक संतुलित चयन समिति बनाई जा सकती है, तो मुख्य न्यायाधीश जैसे स्वतंत्र संवैधानिक पद को चयन प्रक्रिया से बाहर रखने का औचित्य क्या है?
क्या सरकार को यह भरोसा नहीं था कि मुख्य न्यायाधीश स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका निभाएँगे? या फिर मौजूदा व्यवस्था में सरकार को दो-एक का बहुमत बनाए रखने का लाभ मिलता है?
ये सवाल हैं, किसी की नीयत के बारे में सिद्ध तथ्य नहीं। लेकिन लोकतंत्र में ऐसी आशंकाओं का उत्तर पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था से दिया जाना चाहिए, केवल आश्वासनों से नहीं।
4. जब चयन प्रक्रिया में ही सरकार का बहुमत हो, तो स्वतंत्रता की गारंटी कौन देगा?
किसी भी लोकतंत्र में सरकार को प्रशासन चलाने का अधिकार होता है, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था को सरकार से पर्याप्त दूरी पर रहना चाहिए।
कल्पना कीजिए कि किसी चुनाव में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच कड़ा मुकाबला है। उसी चुनाव की प्रक्रिया पर निगरानी रखने वाली संस्था के प्रमुख की नियुक्ति में सत्तारूढ़ सरकार के प्रतिनिधियों का निर्णायक बहुमत है।
भले ही नियुक्त व्यक्ति पूरी ईमानदारी से काम करे, फिर भी व्यवस्था पर पक्षपात की आशंका उठ सकती है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि उनकी निष्पक्षता पर भरोसा करने के पर्याप्त कारण भी उपलब्ध होने चाहिए।
इसीलिए चयन प्रक्रिया में व्यापक सहमति, स्वतंत्र सदस्यों की भागीदारी, नियुक्ति के स्पष्ट मानदंड और निर्णयों की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हैं।
लोकतंत्र में संस्थाओं की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति की कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था की विशेषता होनी चाहिए।
5. क्या यह लोकतंत्र के लिए सही व्यवस्था है?
लोकतंत्र का अर्थ केवल हर पाँच साल में मतदान करना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि मतदाता सूची विश्वसनीय हो, चुनाव कराने वाली संस्था स्वतंत्र हो, विपक्ष को अपनी शिकायतें रखने का अवसर मिले और हर पात्र नागरिक को बिना भेदभाव वोट देने का अधिकार मिले।
यदि चुनाव आयोग पर सवाल उठते हैं, तो हर सवाल को राजनीतिक साजिश कहकर खारिज करना भी गलत है। उसी तरह हर आरोप को बिना जाँच सच मान लेना भी उचित नहीं है।
सही रास्ता है—तथ्यों की स्वतंत्र जाँच, समय पर जवाब, पारदर्शी प्रक्रिया और आवश्यक सुधार।
यदि दो निर्वाचन आयुक्तों ने औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की हैं, तो उन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, यह जनता को बताया जाना चाहिए। यदि SIR में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे बहाल करने का प्रभावी तंत्र होना चाहिए। और यदि नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक बहुमत की वजह से स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, तो कानून में सुधार पर खुली बहस होनी चाहिए।
निष्कर्ष: चुनाव सरकार नहीं, जनता का भरोसा तय करता है
भारत का लोकतंत्र केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह हर नागरिक का साझा अधिकार और जिम्मेदारी है।
निर्वाचन आयोग को न किसी राजनीतिक दल का पक्षधर होना चाहिए, न किसी सरकार का विरोधी। उसे संविधान और मतदाता के अधिकारों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की ऐसी व्यवस्था क्यों न हो, जिसमें सरकार और विपक्ष के साथ स्वतंत्र संवैधानिक प्रतिनिधित्व भी शामिल हो? मतदाता सूची में हर बदलाव का स्पष्ट रिकॉर्ड क्यों न उपलब्ध हो? और आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों पर पारदर्शी जवाबदेही क्यों न सुनिश्चित की जाए?
ये माँगें किसी दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। ये उस लोकतंत्र के पक्ष में हैं, जिसमें हर नागरिक का वोट बराबर हो और चुनाव कराने वाली संस्था पर भरोसा किसी राजनीतिक विचारधारा पर निर्भर न करे।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सत्ता किसके पास है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सत्ता बदलने का फैसला करने वाली प्रक्रिया पर भरोसा किस आधार पर कायम है।
और यदि चुनाव कराने वाली संस्था की स्वतंत्रता पर ही प्रश्नचिह्न लगने लगें, तो उन प्रश्नों का उत्तर माँगना लोकतंत्र को कमजोर करना नहीं—उसे मजबूत करना है।