Dr. B R Ambedkar Library Ramsara - Fazilka Punjab

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Dr. B R Ambedkar Library Ramsara - Fazilka Punjab Founder and Director :- Amarjeet Bodhi
तुम जब वो बन जाओ
जो तुम हमेशा बनना चाहते थे।
तब उनके लिए कुछ करना
जो कभी तुम हुआ करते थे।

10/10/2026

आंदोलनों से महकता है लोकतंत्र‚
कब तक लाठियों से लोकतंत्र चलाते रहोगे।

"जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" का नारा देकर देश में सामाजिक एवं राजनीतिक नवचेतना के सूत्रधार, बहुजन नाय...
09/10/2026

"जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" का नारा देकर देश में सामाजिक एवं राजनीतिक नवचेतना के सूत्रधार, बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी की पुण्यतिथि पर सादर वंदन।

देश में सामाजिक न्याय की दिशा में मान्यवर कांशीराम जी का संघर्ष चिरस्थायी रहेगा।

कुछ मामलों में हिन्दुओ और मुसलमानो में गजब की एकता देखने को मिलती है। यदि यह एकता देखनी हो तो नेहा वोरा के प्रदर्शन के द...
09/10/2026

कुछ मामलों में हिन्दुओ और मुसलमानो में गजब की एकता देखने को मिलती है। यदि यह एकता देखनी हो तो नेहा वोरा के प्रदर्शन के दौरान अस्त व्यस्त कपड़ो वाली कोई सोशल मीडिया पोस्ट देख लीजिए, एकता के दर्शन होंगे....।।

कोई ब्रा खोज रहा है, कोई साइज माप रहा है तो कोई ढीले टाइट होने की नाप तौल कर रहा है....।।

अरे भाई, नेहा में जो देख रहे हो,खोज रहे हो, वह तो तुम्हारे खुद के घर मे भी होगा, तो क्या ऐसे ही अपनी मम्मी बहने बेटियो बहुओं के वस्त्रो के अंदर ताकते झांकते नापते हो...??
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जब किशोरावस्था में था तब दूरदर्शन पर एक ऐड आता था-"अंकल बहुत गंदे है" वह ऐड देखकर मन मे बहुत सवाल खड़े होते थे, सोचता था चाचा जैसे रिश्ते को शक के दायरे में खड़ा करना कितना गंदा काम है...।।

लेकिन बाद में जब तमाम तरह की घटनाओ की खबर पढ़ने को मिली कि चाचा ने रिश्ते को शर्मसार किया तो पॉपा ने टिकट के लिए बेटी की आबरू का समझौता कर दिया। तब समझ मे आया कि ऐड सही था, हमारी समझ ही कमज़ोर थी...।।

दरअसल भारत की मानसिकता में ही बलात्कार है यू ही नही दुनिया में सबसे ज्यादा ब्रुचुअल रेप की घटनाएं भारत मे ही घटती है....।
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यह वह देश है जहां कन्या पूजन किया जाता है तो दूसरी तरफ कन्याभ्रूण हत्या का रिकार्ड भी कन्यापूजन करने वाले ही बनाते है।

यहां श्लोक गुनगुनाये जाते है-"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।

अर्थात-जहाँ नारियों की पूजा होती है वहा लक्ष्मी और देवताओं का वास होता है लेकिन मानसिकता में बलात्कार बसता है, बस अवसर मिलने की बात है....।।
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खैर जिस देश मे 21 वी सदी में भी बेटियो को बचाने के लिए-"बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ " के स्लोगन चलाये जाते हो, कन्याभ्रूण हत्या और बेटियो को बचाने के लिए तमाम तरह के सरकारी लालच दिये जाते हो, वहां यह अंदाजा लगाना मुश्किल नही है कि-वह देश कितना असभ्य, बर्बर, बलात्कारी और कबीलाई होगा....।।

बौद्ध परपंरा में बुद्ध की वंदना इन शब्दों से की जाती है:- "इति पि सो भगवा अरहं, सम्मासम्बुद्धो,विज्जाचरणसंपन्नो, सुगतो, ...
08/09/2026

बौद्ध परपंरा में बुद्ध की वंदना इन शब्दों से की जाती है:-

"इति पि सो भगवा
अरहं, सम्मासम्बुद्धो,
विज्जाचरणसंपन्नो,
सुगतो, लोकविदु,
अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथी,
सत्था देवमनुस्सानं
बुद्धो भगवति ॥"

'इति पि सो भगवा' का अर्थ है वह जो सभी प्राणियों के उत्पन्न होने और नष्ट होने की प्रतिक्रिया को पूरी तरह जानता है।

'अरहं' वह जिसने अपने सभी शत्रुओं को नष्ट कर दिया है। यहां शत्रु कोई व्यक्ति नहीं है बल्कि हमारे भीतर के शत्रु हैं जैसे राग, द्वेष और मोह। बुद्ध वो हैं जिनके भीतर न लालच बचा न नफ़रत न अहंकार और न अज्ञान।

'सम्मासंबुद्धो' का अर्थ है अतिवाद से दूर मध्यम मार्ग। बुद्ध ने न तो भोग में डूबने को सही कहा ओर न कठोर तपस्या को। उन्होंने खोजा मध्यम मार्ग। 'संबुद्धो'
का अर्थ है अपने बल पर जागा हुआ। किसी इश्वर या अलौकिक शक्ति ने उन्हें ज्ञान नहीं दिया। उन्होंने स्वयं दुःख से मुक्ति का मार्ग खोजा और कहलाए सम्मासंबुद्धो।

'विज्जाचरणसंपन्नो' विज्जा का अर्थ है यथार्थ ज्ञान। चरण का अर्थ है धम्म का आचरण। बुद्ध केवल ज्ञानवान नहीं थे। उन्होंने जो जाना उसे जीया भी। क्रोद्ध को यदि बुरा कहा तो उससे मुक्त होकर दिखाया। इसीलिए उन्हें कहा गया विज्जाचरणसंपन्नो।

'सुगतो लोकविदु' सुगतो का अर्थ है जो सही मार्ग पर चला और सही मंजिल तक पहुंचा। लोकविदु का अर्थ है वह जो इस संसार को जैसा है वैसा जानता है।

'अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथी' अर्थात मनुष्यों को साधने वाला सबसे श्रेष्ठ सारथी। बुद्ध ने किसी को डराया नहीं न ही किसी को जबरन बदला। उन्होंने बिना भेदभाव के सभी को मन को साधने की कला सिखाई।

'सत्था देवमनुस्सानं' का अर्थ है कि बुद्ध केवल मनुष्य के ही नहीं देवों के भी गुरू कहे गए क्योंकि सत्य किसी एक लोक तक सीमित नहीं होता।

'बुद्धो भगवति' बुद्धो का अर्थ है जो जाग चुके हैं। भगवाति जो करूणा और प्रज्ञा से पूर्ण हैं।

बुद्ध की वंदना बुद्ध की पूजा करना नहीं है क्योंकि बुद्ध कोई देवता नहीं हैं। हम बुद्ध को वंदना इसलिए करते हैं क्योंकि बुद्ध हमें विष्वास दिलाते हैं कि यदि एक मनुष्य जाग सकता है तो हम सब भी जाग सकते हैं। बुद्ध की वंदना डर, लालच या आस्था से नहीं बल्कि समझ से होती है। बुद्ध की वंदना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है। यह एक जागे हुए जीवन के प्रति नमन है...!!!

डॉ. अमृतपाल कौर...🌷🌲🌷

विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है...
10/08/2026

विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है। बौद्धधम्म के खज़ाने में भी देश-विदेश से अपना एक विशाल मात्रा में साहित्य मौजूद है परन्तु विश्व भर के अन्य धर्मों के साहित्य की तुलना में बौद्ध साहित्य में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। जहां अन्य धर्मों के ग्रंथों का एक भी शब्द इधर से उधर करने की अनुमति नहीं है वहीं पर बौद्धधम्म का साहित्य आलोचना के कटहरे में बरसों से खड़ा किया जाता रहा है। इस वजह से बौद्ध साहित्य में समय-समय पर वृद्धि होती रही है।

इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि विश्व के अन्य धर्मों के ग्रंथ ईश्वर द्वारा रचित समझ कर पूजे जाते हैं परन्तु न तो बुद्ध ने स्वयं को एक गैर-दुनियावी पुरुष (अलौकिक पुरुष) घोषित किया और न ही उनका कहा गया हर शब्द पत्थर की लकीर घोषित किया जाता है। यही कारण है कि बौद्ध साहित्य को कई परीक्षणों से गुज़रना पड़ता रहा है जिस वजह से बौद्ध साहित्य में समय-समय पर वृद्धि होती रही है। परन्तु ऐसा सिर्फ़ बौद्ध साहित्य के साथ ही क्यों..??

बौद्ध धम्म का प्रहार तर्कहीन सिद्धांतों पर सबसे तीखा रहा है जिसका एक उदाहरण बौद्ध धम्म का मृत्यु के सिद्धांत के प्रति दृष्टिकोण है जो कि कर्मकांड के गोरखधंधे के विपरीत बिल्कुल पारदर्शी और सरल है।

बौद्ध यह कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं करते कि सारिपुत्र आदि प्रमुख श्रावक ही मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए, बल्कि स्वयं बुद्ध भी मृत्युरूपी सत्य द्वारा कुचल दिए गए। इस दृष्टिकोण पर बेहतरीन उदाहरण बाहरवीं शताब्दी के कल्याणी नामक भिक्षु का दिया जा सकता है जिन्होंने पालि में रचित अपनी कृति " तेलकटाहगाथा " में गाथा नं २० और २१ में बहुत स्पष्ट तौर पर मृत्यु की अनिवार्यता पर लिखा है :-

" जो सदा शुद्ध, मलरहित, श्रेष्ठा को प्राप्त सारिपुत्र प्रमुख मुनि तथा श्रावक थे, वे भी मृत्यु रूपी बड़वाग्नि के मुख में डूब गए और उसी तरह नष्ट हो गए जैसे वायु के झोंको से दीपक विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।

खिले हुए कमल की भांति निर्मल, सुन्दर नेत्रवाले, बत्तीस लक्षणों से सुशोभित रूप शोभा वाले तथा समस्त आश्रवों का क्षय करने वाले, लोक के नाथ बुद्ध भी मृत्युरूपी मस्त महाहाथी द्वारा कुचल डाले गए..."

अन्य धर्मों में मृत्यु का सिद्धांत कर्मकांडी अथवा स्वर्ग-नर्क के लालच की विचारधारा पर टिका है जो धर्म की दुकान चलाने का एक बीजमंत्र है परन्तु बौद्ध धम्म में मृत्यु का सिद्धांत निरंतर परिवर्तनशील होने पर टिका है।

बौद्ध धम्म में वैचारिक उड़ान कितनी ऊँची तथा गहरी है, इसका अनुमान इसमें निहित नैतिक विशेषताओं अथवा दुनिया भर में मौजूद बेहिसाब बौद्ध साहित्य से लगाया जा सकता है जो विश्व के अन्य किसी धर्म के संदर्भ में नज़र नही पड़ता...!!!

डा. अमृतपाल कौर....

10/07/2026

संस्कृत कभी कंप्यूटर भाषा क्यों नहीं बन सकती......यह दावा हर कुछ सालों में फिर से सामने आता है। कहा जाता है कि संस्कृत का व्याकरण इतना सटीक है कि NASA ने प्रोग्रामिंग के लिए इसकी जांच की थी। यह बात गलत है। लेकिन इस विफलता से कुछ सीखने को मिलता है। प्रोग्रामिंग भाषा में हर किसी के लिए एक ही सिंबल और एक ही मतलब की ज़रूरत होती है। संस्कृत में ऐसा कभी नहीं था। इसके अर्थ व्याख्या करने वाली हर पीढ़ी के साथ बदलते रहे।

वेदांत के बंटवारे से शुरुआत करते हैं। शंकराचार्य ने उपनिषदों को पूरी तरह से अद्वैतवाद (non-dualism) के तौर पर समझा: दुनिया एक भ्रम है, और ब्रह्म ही एकमात्र सच्चाई है। रामानुज ने इसे नहीं माना। उनके अनुसार दुनिया असली थी, ईश्वर का शरीर थी। मध्वाचार्य ने दोनों को ही नहीं माना। आत्मा और ईश्वर हमेशा अलग-अलग रहे। तीन व्याख्याकार, वही संस्कृत श्लोक, और तीन ऐसी विचारधाराएं जो आपस में मेल नहीं खाती थीं। इसका कोई समाधान कभी नहीं निकला। हर विचारधारा आज भी मौजूद है और आज भी असहमत है।

फिर चौदहवीं सदी में विजयनगर दरबार के मुख्य विद्वान सायण आए। ऋग्वेद पर उनकी व्याख्या पांच सदियों तक मानक बनी रही। अग्नि में आहुति दी जाती थी। सोम रस चढ़ाया जाता था। बारिश, मवेशियों और बेटों के लिए जानवरों की बलि दी जाती थी। यह आम सहमति थी, कोई अलग-थलग राय नहीं।

उन्नीसवीं सदी में दयानंद सरस्वती ने इसे पूरी तरह बदल दिया। उनके अनुसार घोड़ा मन का प्रतीक था, कोई जानवर नहीं। भैंसा बारिश का बादल था। खून की बलि बाद में आई एक विकृति थी, जो असली वेदों में नहीं थी। सायण के दरबार में इस व्याख्या को सिरे से खारिज कर दिया जाता। इसके बजाय, यह आर्य समाज का सिद्धांत बन गया और आज वेदों की हिंदू सुधारवादी व्याख्याओं को आकार देता है।

एक ही शब्द की दो व्याख्याएं, पांच सदियों के अंतर पर, और दोनों को ही प्रमाणिक माना गया। गणित ऐसे काम नहीं करता। अंकगणित की कोई नई विचारधारा आने से दो और दो मिलकर शून्य नहीं हो जाते। वैदिक संज्ञा (noun) का अर्थ पहले के अर्थ से बिल्कुल उल्टा हो सकता है, और दोनों ही अर्थों के समर्थक मिल जाएंगे।

यही कारण है कि गीता के सौ अंग्रेज़ी अनुवाद मौजूद हैं। कोई भी भौतिकी के समीकरण के सौ अनुवाद प्रकाशित नहीं करता। गीता के अनुवाद इसलिए बढ़ते जाते हैं क्योंकि कोई भी अनुवाद अंतिम प्रमाणिकता का दावा नहीं कर सकता। पुरोहितों का यह तर्क कि वेदों को समझने के लिए संस्कृत सीखना ज़रूरी है, इस बात के सामने टिक नहीं पाता। अगर भाषा के बिना अनुवाद सचमुच असंभव होता, तो सभी सौ अनुवाद समान रूप से बेकार होते, फिर भी हर अनुवाद के पाठक और समर्थक मिल जाते हैं। अस्पष्टता कोई ऐसी बाधा नहीं है जिसे विशेषज्ञता से दूर किया जा सके। यह तो वह कच्चा माल है जिसे विशेषज्ञता बेचती है।

वेदों को भी लगभग एक हज़ार वर्षों तक मौखिक रूप से ही रखा गया, और यह पसंद से किया गया था, मजबूरी में नहीं। किसी के भी वेद लिखने से सदियों पहले ही मौर्य राजाओं के आदेशों के लिए ब्राह्मी लिपि मौजूद थी। ज़बानी तौर पर याद करके सुनाने की परंपरा ने इस ज्ञान को एक खास समूह (गिल्ड) तक ही सीमित रखा। जब कोई लिखित पांडुलिपि ही नहीं थी, तो कोई बाहरी व्यक्ति उसकी जाँच कैसे करता? लिखने से यह ज्ञान चुनौती के दायरे में आ जाता। ज़बानी सुनाने की परंपरा ने ज्ञान की व्याख्या और परख का अधिकार सिर्फ़ पुरोहित वर्ग के पास ही बनाए रखा।

उसी खास समूह ने राजपूत योद्धा कुलों को संस्कृत सिखाने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें इसके लायक नहीं समझा गया। संस्कृत से दूर रहने के कारण, उन कुलों ने ब्रज, अवधी और राजस्थानी भाषाओं में भक्ति साहित्य रचा और ऐसे लोगों तक पहुँचे जहाँ तक कोई संस्कृत ग्रंथ नहीं पहुँच पाया था। आज संस्कृत बोलने वाले कुछ हज़ार लोग ही हैं। जिन स्थानीय भाषाओं को संस्कृत से दूर रखा गया, उन्हें आज करोड़ों लोग बोलते हैं।

एक के बाद एक तीन नाकामियाँ हुईं: सदियों तक कोई निश्चित अर्थ न होना, एक हज़ार साल तक ज़बानी परंपरा का दबाव, और बाहरी लोगों को न सिखाने का जानबूझकर किया गया फ़ैसला। इन तीनों ने ज्ञान की व्याख्या पर उस खास समूह का एकाधिकार बनाए रखा। इनमें से किसी से भी ऐसी भाषा नहीं बनी जिसे कोई कंप्यूटर या उस समूह से बाहर का कोई व्यक्ति भरोसे के साथ समझ या प्रोसेस कर सके।

29/06/2026

नमो बुद्धाय

28/06/2026
कोचेरिल रामन नारायणन: लोकतंत्र की ऊँचाइयों तक पहुँचा एक साधारण बेटा!!! 27 अक्टूबर 1920 को केरल के पलक्कड़ ज़िले के एक सा...
02/03/2026

कोचेरिल रामन नारायणन: लोकतंत्र की ऊँचाइयों तक पहुँचा एक साधारण बेटा!!! 27 अक्टूबर 1920 को केरल के पलक्कड़ ज़िले के एक साधारण परिवार में जन्मे कोचेरिल रामन नारायणन भारतीय गणराज्य के पहले दलित राष्ट्रपति और एक विद्वान राजनयिक थे।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा, संघर्ष और सेवा से कोई भी व्यक्ति भारत के सर्वोच्च पद तक पहुँच सकता है।
उन्होंने University of Travancore से स्नातक की पढ़ाई की और फिर London School of Economics से राजनीति विज्ञान में डिग्री प्राप्त की, जहाँ उनके शिक्षक थे प्रसिद्ध विचारक Harold Laski।
नारायणन ने भारतीय विदेश सेवा (IFS) में कार्य किया और बर्मा, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका में भारत के राजदूत रहे।
राजनीति में आने के बाद वे तीन बार लोकसभा सांसद, केंद्रीय मंत्री, और फिर भारत के उपराष्ट्रपति (1992–1997) बने।
25 जुलाई 1997 को वे भारत के 10वें राष्ट्रपति बने, और अपने कार्यकाल में उन्होंने संविधान की मर्यादा को सर्वोपरि रखा।
📌 संक्षिप्त आँकड़े और उपलब्धियाँ:
- जन्म: 27 अक्टूबर 1920, उझावूर, केरल
- निधन: 9 नवंबर 2005, नई दिल्ली
- शिक्षा: University of Travancore, London School of Economics
- राजनयिक सेवा: IFS अधिकारी, राजदूत – अमेरिका, जापान, UK, बर्मा
- राजनीतिक पद: लोकसभा सांसद, केंद्रीय मंत्री, उपराष्ट्रपति (1992–1997), राष्ट्रपति (1997–2002)
- विशेषता: भारत के पहले दलित राष्ट्रपति, संवैधानिक मर्यादा के रक्षक
- प्रसिद्ध कथन: “I am not a rubber stamp President.”
नारायणन जी ने दिखाया कि संविधान का सम्मान, सामाजिक न्याय और नैतिक नेतृत्व ही लोकतंत्र की असली पहचान है।
उनकी विरासत आज भी भारत के हर नागरिक को समानता और गरिमा की प्रेरणा देती है।

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