मिशन लोकतंत्र-
लोकतंत्र की
स्थापना के चरण
लोकतंत्र में व्यवस्था का लोकतांत्रिकरण होना चाहिये यानि व्यवस्था को राजतंत्र में अपनाये जाने वाले दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी जैसे लक्षणों तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की मानसिकता से मुक्त होना ही होगा, क्योंकि यह सब तो अर्धसमझ की तानाशाही, मनमानी राजतांत्रिक व्यवस्था के तथ्य हैं, न की समझदारी की जनता की स्वयं की सभी का जीवन संरक्षण कर लोकहित करने वाली लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तथ्य।
इस प्रकार लोकतंत्र सदैव दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी को स्वीकारने वाली राजतांत्रिक मनमानी, तानाशाही व्यवस्था के लक्षणों तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की राजतांत्रिक अन्धविश्वासी मानसिकता से मुक्त ही होगा, अन्यथा लोकतंत्र के नाम पर चुनी हुई सरकार द्वारा यह सब स्वीकारने पर लोकतंत्र की स्थापना न होकर लोकतंत्र के स्थान पर छद्म लोकतंत्र एक अपराधी-तंत्र के रूप में स्थापित हो जायेगा और मूर्ख जनता इसी को लोकतंत्र समझने का भ्रम रखती रहेगी।
तानाशाही राजतंत्र से निकलने तथा लोकतंत्र की स्थापना के लिये चुनाव द्वारा सरकार बनाना लोकतंत्र स्थापित करने का पहला चरण तो हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की स्थापना होना नहीं होएगा। लोकतंत्र स्थापित करने के लिये चुनी हुई सरकार द्वारा व्यवस्था का लोकतांत्रिकरण कर सभी के जीवन को संरक्षित कर लोकहित करना सबसे पहली जरूरी संवैधानिक बाध्यता है यानि व्यवस्था को दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी की अमानवीयता तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की मनमानी, अव्यावाहारिक मानसिकता (राजतंत्र की तानाशाही व्यवस्था के प्रमुख लक्षणों को स्वीकारने वाली मानसिकता) से आजाद होना बहुत जरूरी है, इसके बिना लोकतंत्र स्थापित ही नहीं हो सकेगा और लोकतंत्र के स्थान पर छद्म लोकतंत्र एक अपराधी-तंत्र के रूप में स्थापित हो जायेगा और अर्धसमझ लोग इसी को लोकतंत्र समझने का भ्रम रखकर राजतंत्र से भी खतरनाक दुष्परिणाम पाते हुए बार बार चुनाव द्वारा दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली अपराधी पार्टियों को चुनकर सत्ता में बैठाते हुए लोकतंत्र, संविधान, देश, मानवता एवं मानवजाति से छ्ल करते हुए देशद्रोह का महा अपराध करते रहेंगे।
लोकतांत्रिकरण का मतलब है व्यवस्था को दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी की अमानवीय व्यवस्था तथा कर्मफल की मान्यता को मानते हुए किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की अवैज्ञानिक, अन्यायी, असुधारवादी मानसिकता से पूर्णतः आजाद कर सभी के जीवन को गरिमामय बनाते हुए संरक्षित कर लोकहित करना। यही असली आजादी यानि वास्तविक स्वतंत्रता को प्राप्त होना होगा, स्वराज्य स्थापित होना होगा।
यही होगी राजतंत्र के अर्धसमझ के मूर्खता-बदमाशी के मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय, अन्यायी, अधार्मिक युग से निकलकर लोकतंत्र के समझदारी के कानून एवं न्याय के मानवीय, धार्मिक, न्यायिक युग में प्रवेश करने की अभूतपूर्व, अदभुत, चमत्कारी, क्रान्तिकारी युग परिवर्तन की घटना।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
Santulitkarma
A religious, political and a social vicharak
मिशन लोकतंत्र-
धर्म एवं न्याय की स्थापना,
कौन गलत, कौन सही
तानाशाही राजाओं और उनके राजतंत्रो के हितों को संरक्षित करने के लिये धर्म एवं न्याय की परिभाषा मनमाने रूप से बतायी गई ताकि इनके हित संरक्षित रह सकें, लेकिन सभी के जीवन को संरक्षित कर लोकहित करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के लिये धर्म एवं न्याय को वैज्ञानिकता, सुधार, न्याय के साथ पारिभाषित किया जायेगा, स्थापित किया जायेगा। यह सदा रहने वाला यानि सनातन धर्म एवं सनातन न्याय होगा।
धर्म कभी भी अवैज्ञानिक, अन्यायी, असुधारवादी होते हुए बौध्दिक-असन्तुलन की अर्धसमझ की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी मानसिकता यानि अमानवीयता, हैवानीयत देने वाला नहीं हो सकता। धर्म सदैव वैज्ञानिक, सुधारवादी, न्यायी होते हुए बौध्दिक-सन्तुलन की समझदारी की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता देने वाला होगा।
चूंकि 'दंड' दोहरा मापदंड, मनमानापन, नेसर्गिक न्याय का उलन्घन, बल का अनुचित प्रयोग, अवैज्ञानिकता, अन्याय, असुधार रख ताकतवर तानाशाह की तानाशाही, अमानवीय, अपराधी व्यवस्था स्थापित कर लोगों को अपराधी होने देकर असंख्य दुष्परिणाम देता हुआ सभी के जीवन संरक्षण के मौलिक अधिकार का हनन कर लोकहित को हानि करते हुए लोकतंत्र, देश, दुनिया, मानवता एवं मानवजाति के लिये बहुत ज्यादा खतरनाक होता है। अत: दंड कभी भी धर्म एवं न्याय का अंग नहीं हो सकता। अत: दंड एवं दंड की व्यवस्था को स्वीकारने वाला व्यक्ति कभी भी धार्मिक, न्यायी यानि सही व्यक्ति नहीं हो सकता, सिवाय अधार्मिक, अन्यायी यानि गलत व्यक्ति होने के।
इस प्रकार दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली व्यवस्था कभी भी धार्मिक, न्यायी यानि सही व्यवस्था नहीं हो सकती, सिवाय गलत व्यवस्था होने के।
अब दंड को अपनाने वाली गलत व्यवस्था को त्याग कर दंड से रहित बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाली लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था यानि सही व्यवस्था अपनाकर सही व्यक्ति बनने यानि असली धार्मिक, न्यायी बनने का समय आ गया है अथवा सही व्यक्ति बनकर यानि असली धार्मिक, न्यायी बनकर दंड को अपनाने वाली गलत व्यवस्था को त्याग कर दंड से रहित सही व्यवस्था अपनाने का समय आ गया है। यानि अर्धसमझ की अमानवीय अवस्था से निकलकर समझदारी की मानवीय अवस्था में आकर युगपरिवर्तन करने का समय आ गया है। आओ! इस युगपरिवर्तन का भाग बनकर जीवन मिलने को सार्थक करें। तभी मानवजाति सुख, शान्ति, सुरक्षा के सन्तुलित, संयमित, अनुशासित, सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ दीर्घकाल तक पृथ्वी पर संरक्षित रह सकेगी।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
कल्कि अवतार
आ चुके हैं
कुछ लोगों का मानना है की कल्कि अवतार जन्म लेंगे। नेस्त्रोदोमस की भविष्य वाणी थी की भारत में एक बच्चा जन्म लेगा जो दुनिया को एक नई दिशा देकर धर्म, न्याय की स्थापना करते हुए विश्वशान्ति का सन्देश देगा।
सवाल यह है कि कल्कि अवतार पृथ्वी पर आकर करेंगे क्या? अर्धसमझ की मूर्खता-बदमाशी के मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय कार्य तो वह बिल्कुल भी नहीं करेंगे। कल्कि अवतार अर्धसमझ की दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली तानाशाही, गुलामी, अपराध की अमानवीय, अपराधी, हैवानी मानसिकता एवं ऐसी अपराधी व्यवस्था का समर्थन तो बिल्कुल भी नहीं करेंगे, वह लोगों को सही सोच एवं सही व्यवस्था अपनाने के बजाये गलत सोच एवं गलत व्यवस्था अपनाने देकर इनके दुष्परिणामो से मुक्ति के लिये सोच एवं व्यवस्था को सही करने के बजाये किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे कर कर्तव्यविमुख बनाकर व्यवस्थापक को अत्याचारी बनाते हुए अन्धविश्वास, आडंबरो, काल्पनिकता, अव्यावाहारिकता, तानाशाही, गुलामी, अपराध के गुमराह करने वाले हैवानी युग में तो बिल्कुल भी नहीं रखेंगे। फिर वह करेंगे क्या ?
निश्चित है कि वह अब तक जो भी चल रहा है और जो होना चाहिये के भेद को वैज्ञानिक तरीके से भली-भांति समझाकर देश-दुनिया के लोगों को सत्य की समझ देकर सतयुग लाने का प्रयास करेंगे यानि दुनिया के लोगों, दुनिया की सरकारों, दुनिया के उच्चतम न्यायालयों को वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की बौध्दिक-सन्तुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता की बुनियादी समझदारी देकर अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच की अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय मान्यताओं, धारणाओं, नीतियों से आजादी दिलाते हुए असली स्वतंत्रता दिलाएंगे, सभी लोगों का व्यावाहारिक रूप मे सम्भव जीवन संरक्षण करेंगे, तानाशाही, गुलामी, अपराध से मुक्त लोक हितकारी लोकतंत्र की स्थापना करवायेंगे। मतलब साफ है कि कल्कि अवतार लोगों को अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की तानाशाही, गुलामी, अपराध की अमानवीय, अपराधी मानसिकता एवं व्यवस्था से आजादी दिलाकर समझदारी की बौध्दिक-सन्तुलन की लोक हितकारी, लोकतांत्रिक, मानवीय मानसिकता एवं व्यवस्था की समझ देकर सभी का जीवन संरक्षण करने वाली (भारत में अनुच्छेद 21 को सार्थक करने वाली) लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित एवं संरक्षित करवाने का प्रयास करेंगे।
यही कार्य तो भारत में जन्म लेना वाला वह बालक भी करेगा जिसकी भविष्यवाणी नेस्त्रोदोमस ने की थी। मतलब साफ है की यह दौनों व्यक्ति वही युगप्रवर्तक होगा जो देश-दुनिया को अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच की अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय, हैवानी मानसिकता एवं व्यवस्था से आजादी यानि असली स्वतंत्रता दिलाकर वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की समझदारी की बौध्दिक-सन्तुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता देकर दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी की अमानवीय व्यवस्था तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की मानसिकता से रहित, बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाली (भारत में अनुच्छेद 21 को सार्थक करने वाली) लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित एवं संरक्षित करवाने का प्रयास करेगा।
अब आप को समझ आ जाना चाहिये की कल्कि अवतार या वह बालक कौन है जिसकी भविष्यवाणी नेस्त्रोदोमस ने बहुत पहले की थी।
में वही हूँ जोकि देश-दुनिया को अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच के अर्धसमझ के बौध्दिक-असन्तुलन के मूर्खता-बदमाशी के मनोविकृत-अपराधी यानि हैवानी कलियुग से निकालकर वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच के बौध्दिक-संतुलन के स्वस्थ, मानवीय मानसिकता के समझदारी के सतयुग में ले जाने का प्रयास कर युगपरिवर्तन करवाते हुए पृथ्वी पर स्वर्ग या जन्नत स्थापित करवाने का प्रयास कर मानवजाति को दीर्घकाल तक पृथ्वी पर सुख, शान्ति, सुरक्षा के सन्तुलित, संयमित, अनुशासित, सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ संरक्षित करवाने का प्रयास कर रहा हूँ।
मेरी लड़ाई अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय, राक्षसी मानसिकता एवं व्यवस्थाओं से है, न कि किसी भी व्यक्ति से। मेरा उददेश्य व्यक्ति के दिमाग में रह रहे अर्धसमझ रूपी राक्षस को मारना है न कि व्यक्ति को। दिमाग में बैठा अर्धसमझ रूपी राक्षस मर जायेगा तो दिमाग में मनुष्य का जन्म हो जायेगा। तब व्यक्ति की सोच को तो सुधारना है। सोच को अर्धसमझ की अवस्था से निकालकर समझदारी की अवस्था पर लाना है। व्यक्ति को अवैज्ञानिकता, असुधार, अन्याय के असत्य पर आधारित अमानवीय युग से निकलकर वैज्ञानिकता, सुधार, न्याय के सत्य पर आधारित मानवीय युग में आना है। सोच सुधर जायेगी तो सबकुछ लोक हितकारी हो जायेगा, क्योंकि तब व्यक्ति हैवानीयत से निकलकर सही अर्थ में मनुष्य बन जायेगा, उसमें से हैवानीयत निकलकर उसमें मनुष्य्ता आ जायेगी। तब मानवजाति दीर्घकाल तक सुख, शान्ति, सुरक्षा के सन्तुलित, संयमित, अनुशासित, सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ पृथ्वी पर संरक्षित हो जायेगी।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
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मिशन लोकतंत्र-
सतयुग आरम्भ
हो चुका है
सत्य का दर्शन तो वैज्ञानिक तथ्य ही कर सकते हैं। लोगों का मानना है की सतयुग आयेगा। मतलब साफ है की अब सत्य पर आधारित युग यानि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित युग आयेगा। तब समझना होगा की-
अब सत्य पर आधारित सतयुग यानि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच के बौध्दिक-संतुलन के स्वस्थ, मानवीय मानसिकता के समझदारी के मानवीय, न्यायी, धार्मिक, सभ्य-विकसित, लोकतांत्रिक युग में प्रवेश करने का समय प्रारम्भ हो चुका है। यानि सतयुग का आगमन हो चुका है जो कि अपने बिल्कुल प्रारम्भिक अवस्था पर है। मेरा प्रयास देश-दुनिया में सतयुग के ज्ञान को देकर सतयुग की स्थापना के मार्ग को आसान करना है।
अब अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच के बौध्दिक-असन्तुलन के अर्धसमझ के मूर्खता-बदमाशी के मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय, हैवानी युग यानि असत्य पर आधारित कलियुग के अन्त का समय भी आ चुका है जोकि धीरे धीरे पूर्णतः समाप्त हो जायेगा।
यानि अब दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी, गुलामी, तानाशाही की अमानवीय, अपराधी व्यवस्था तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की अन्धविश्वासी, काल्पनिक, अव्यावाहारिक मानसिकता से रहित, बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता के साथ बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाली (भारत में अनुच्छेद 21 को सार्थक करने वाली) लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित एवं संरक्षित करने का समय प्रारम्भ हो चुका है।
आओ! मेरे साथ वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की बौध्दिक-सन्तुलन की समझदारी की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का न्यायिक, धार्मिक, सभ्य-विकसित, लोकतांत्रिक प्राणी यानि सही अर्थ में न्यायाधीश, धर्मात्मा बनकर, सत्य पर आधारित तानाशाही, गुलामी, अपराध, अन्धविश्वास, आडंबरो, काल्पनिकता, अव्यावाहारिकता, अमानवीयता से रहित, लोक हितकारी लोकतंत्र रूपी सतयुग की समझ का प्रचार, प्रसार कर इसकी स्थापना एवं संरक्षण कर मानव जीवन मिलने को सार्थक करते हुए सुख, शान्ती, सुरक्षा के सन्तुलित, संयमित, अनुशासित, सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ मानवजाति को दीर्घकाल तक पृथ्वी पर संरक्षित करने का प्रयास कर पृथ्वी को स्वर्ग एवं जन्नत बनाएँ।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
यूनिफॉर्म
सिविल कोड
जब यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात करी जाती है तो समझो विभिन्नता-विरोधो में एकरूपता की बात कर सभी में प्रेमभाव, भाईचारा बडाने की सोची जाती है।
स्कूल में यूनिफॉर्म रखने का मूल उद्देश्य ही यह है की जब स्कूल में बच्चे जाएँ तो सभी केवल छात्र लगें। वह गरीब, अमीर, हिन्दू, मुसलमान आदि आदि न दिखे इसीलिये स्कूल में यूनिफॉर्म बनाई जाती है और बच्चों को ऐसे भेदों एवं उनके दुष्परिणामो से मुक्त रखा जाता है।
देश, दुनिया को भी यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत है। देश-दुनिया में विभिन्नता-विरोध होते हुए भी बुनियादी नीतियों में एकरूपता चाहिये ताकि अनावश्यक संघर्षों एवं उनके दुष्परिणामो से शान्ती मिलकर सुरक्षा का वातावरण स्थापित होते हुए सभी का जीवन संरक्षण होकर लोक हितकारी व्यवस्था स्थापित हो सके।
बुनियादी लोक हितकारी नीतियाँ अपनाने के लिये सबसे पहले तो देश-दुनिया के लोगों के बुनियादी सोच में एकरूपता आनी चाहिये यानि एक बुनियादी एवं व्यावाहारिक सोच बनाने का प्रयास होना चाहिये, अन्यथा सभी की भिन्न-भिन्न प्रकार की मनमानी मानसिकताएं परस्पर मनमानेपन, तानाशाही, दोहरे मापदंड, नेसर्गिक न्याय का उलन्घन, बल का अनुचित प्रयोग, सत्ता-संघर्ष, मार-काट, छल-कपट, छीना-झपटी आदि आदि का कारण बनकर सभी के जीवन संरक्षण के मौलिक जन्मसिद्ध अधिकार का हनन कर लोकहित को हानि करते हुए व्यक्तियों को मूर्ख-बदमाश यानि हैवान बना देंगी।
तब सभी व्यक्तियों के जीवन संरक्षण के लिये, देश-दुनिया में लोकहित के लिये, तानाशाही, गुलामी, अपराध से मुक्त लोक हितकारी लोकतंत्र की स्थापना के लिये तथा तानाशाही, गुलामी, अपराध से आजादी यानि असली स्वतंत्रता के लिये सभी के सोच में एकरूपता आना बहुत ही जरूरी है, और सोच की यह एकरूपता तभी आ सकती है जबकि सभी का सोच वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी होकर बौध्दिक-संतुलन की बुध्दियोग की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का बनकर एक जैसा होते हुए, अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच की अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय सोच से आजाद हो जायेगा यानि दंड, निजीकरण, पूंजीवाद, टैक्स, नौकरी की अवैज्ञानिक, असुधारवादी, अन्यायी, अमानवीय नीतियों तथा कर्मफल की मान्यता के साथ किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने की अन्धविश्वासी, काल्पनिक, अव्यावाहारिक, अवैज्ञानिक, असुधारवादी, अन्यायी सोच से आजाद हो जायेगा।
तभी देश-दुनिया में दंड से रहित, बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाली लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की स्थापना होकर सभी व्यक्तियों का जीवन गरीबी-अमीरी, जाति-धर्म, ऊँच-नीच, मालिक-दास, देश-प्रदेश आदि आदि के भेद से आजाद होकर मानवीय, गरिमामय बनते हुए दीर्घकाल तक पृथ्वी पर संरक्षित हो सकेगा।
यही होगी तानाशाही, गुलामी, अपराध से आजादी यानि असली स्वतंत्रता का मिलना, यही होगा तानाशाही, गुलामी, अपराध से मुक्त लोक हितकारी लोकतंत्र का स्थापित होना, यही होगा सभी को गरिमामय मानवीय जीवन मिलते हुए सभी का जीवन वास्तव में व्यावाहारिक रूप से संरक्षित होना। तब मानव जीवन मिलना सार्थक हो जायेगा क्योंकि तब मानवजाति अर्धसमझ के अर्ध विकसित, काल्पनिक, अव्यावाहारिक, अन्धविश्वासी, आडम्बरी, तानाशाही गुलामी, अपराध के अमानवीय युग से निकल कर समझदारी के सन्तुलित, संयमित, अनुशासित, सभ्य-विकसित, विश्वासी, आधुनिक, व्यावाहारिक, लोकतांत्रिक, मानवीय युग में आ जायेगी। यही होगी सतयुग में आने की युग परिवर्तन की अभूतपूर्व अदभुत, चमत्कारी, क्रांतिकारी घटना। अब सत्य पर आधारित सतयुग यानि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी युग में प्रवेश करने का समय आ चुका है।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
धर्म और अधर्म का
वास्तविक ज्ञान
राजतंत्रिक व्यवस्थाओं में मूर्ख बनाकर गुमराह करने को धर्म बताया गया और गुमराह हुए मूर्ख लोगों को धार्मिक माना गया। गुमराह हुए ऐसे मूर्ख लोग ताकतवर तानाशाह की दंड की मनमानी, तानाशाही यानि अपराधी व्यवस्था को स्वीकार कर इसके असंख्य दुष्परिणामो को इस तानाशाही, अपराधी व्यवस्था का परिणाम मानने के बजाये अपने बुरे कर्मो का फल मानकर इनसे मुक्ति के लिये इस तानाशाही, अपराधी व्यवस्था को सुधारकर न्याय पर आधारित करने के बजाये (सुधारवादी, न्यायी होने के बजाये), किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होकर अवैज्ञानिक, असुधारवादी, अन्यायी सोच के मूर्ख-बदमाश रहते हुए गुमराह होकर ताकतवर तानाशाह को अत्याचार करने को निरंकुश छोड़ते हुए मानवता एवं मानवजाति के लिये खतरनाक होते थे।
राजतंत्र में दंड की तानाशाही, अपराधी व्यवस्था को स्वीकार कर इसके दुष्परिणामो से मुक्ति के लिये किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने वाले अवैज्ञानिक, असुधारवादी, अन्यायी सोच के ऐसे गुमराह हुए मानवता एवं मानवजाति के लिये खतरनाक बने मूर्ख-बदमाश लोगों को ही धार्मिक होना माना गया क्योंकि तब तानाशाह राजाओं को ही अन्नदाता मानते हुए उसके हितों को साधना ही मूल कर्तव्य था, न की लोकहित करना। तब जनता गुलाम प्रजा के रूप में होती थी जिसके कोई संवैधानिक, नागरिक अधिकार नहीं थे, उसे सिर्फ तानाशाह राजा का गुणगान करना होता था, उसके आदेश का पालन करना होता था। तब सिर्फ ताकतवर तानाशाह राजा की मनमानी ही चलती थी। राजा की मर्जी से किसी को कभी भी मारा जा सकता था तो किसी को कभी भी धनवान बना दिया जाता था। तब बुध्दि एवं शरीर से कमजोर व्यक्ति के पास किन्हीं राजा की शरण में गुलाम बनकर रहने तथा किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं था।
चूंकि लोकतंत्र सदैव राजतंत्रिक व्यवस्था से विपरीत होता है क्योंकि इसमें राजाओं के हितों को नहीं वरन लोकहित को साधना ही मुख्य कर्तव्य होता है, लोकतंत्र में जनता गुलाम प्रजा नहीं वरन लोकतंत्र जनता की अपनी स्वयं की व्यवस्था होती है, जिसमें जनता अपने हितों के लिये अपनी सरकार मेनेजर के रूप में चुनती है। लोकतंत्र में जनता के मौलिक संवैधानिक अधिकार होते हैं, जीवन संरक्षण का मौलिक संवैधानिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को मिला हुआ होता है, जिनको देना सरकार एवं उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक बाध्यता है, जिसकी उपेक्षा सरकार एवं उच्चतम न्यायालय को असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक बना देगी। लोकतंत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद, ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करना प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य होता है। अत: लोकतंत्र में तानाशाही के प्रमुख तत्व दंड को स्वीकारते हुए मूर्ख-बदमाश रहकर गुमराह होने को धर्म एवं न्याय नहीं वरन अधर्म एवं अन्याय देखा जायेगा। अत: लोकतंत्र में व्यवस्था को सुधार कर ( दंड से रहित, बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाली लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाकर) न्यायी बनाने के बजाये किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने को मूर्खता-बदमाशी, गुमराह होना देखकर (असुधारवादी, अन्यायी होते हुए देखकर) अधर्म देखा जायेगा, अन्याय देखा जायेगा, मानवता एवं मानवजाति के लिये खतरनाक देखा जायेगा।
लोकतंत्र में धर्म एवं न्याय का बुनियादी आधार वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की बौध्दिक-सन्तुलन की बुध्दियोग की समझदारी की स्वस्थ, मानवीय, मानसिकता होगी जो लोकहित करती हुई मानवजाति को पृथ्वी पर दीर्घकाल तक सुख, शान्ति, सुरक्षा के सन्तुलित, संयमित, अनुशासित, सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ संरक्षित करेगी। अत: लोकतंत्र में वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की बौध्दिक-सन्तुलन की बुध्दियोग की समझदारी की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता वाले व्यक्ति को ही वास्तविक, व्यावाहारिक धार्मिक, न्यायी माना जायेगा जोकि सनातन यानि सदैव रहने वाला सत्य है यानि सनातन सत्य है।
इस प्रकार लोकतंत्र में दंड की तानाशाही, अपराधी व्यवस्था को विधि के रूप में स्वीकार कर इसके दुष्परिणामो को इस तानाशाही व्यवस्था का परिणाम मानने के बजाये अपने कर्मो का फल मानकर, इनसे मुक्ति के लिये दंड की तानाशाही, अपराधी व्यवस्था को सुधार कर न्यायी बनाने के बजाये किन्हीं भगवान, अल्लाह आदि के भरोसे होने वाले बौध्दिक रूप से असंतुलित अर्धसमझ, अर्ध-विकसित, असभ्य लोग मूर्ख-बदमाश, मनोविकृत-अपराधी, राक्षस देखे जाते हुए अधार्मिक, अन्यायी देखे जायेंगे, तो वहीं दंड से रहित, बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाली लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित एवं संरक्षित करने वाले बौध्दिक रूप से सन्तुलित स्वस्थ, मानवीय मानसिकता के समझदार लोग स्पष्ट रूप से विश्वास के साथ धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, लोक हितकारी, लोकतांत्रिक, मानवीय देखे जायेंगे।
यही होगी अर्धसमझ के हैवानी, अधार्मिक, अन्यायी युग से निकल कर समझदारी के मानवीय, धार्मिक, न्यायिक युग में प्रवेश करने की युगपरिवर्तन की अभूतपूर्व अदभुत, चमत्कारी, क्रांतिकारी घटना।
लोकतंत्र में दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली राजतंत्र वाली मनमानी, तानाशाही, अपराधी सोच बिल्कुल भी नहीं चलेगी, अन्यथा सभी का जीवन संरक्षण करने वाले लोक हितकारी लोकतंत्र के स्थान पर मूर्खता-बदमाशी रखने वाले मनोविकृत-अपराधी लोगों का 'छद्म लोकतंत्र' एक अपराधी-तंत्र के रूप में स्थापित हो जायेगा।
लोकतंत्र में दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली राजतंत्रिक सोच अन्याय, अपराध, अधर्म मानी जायेगी, क्योंकि ऐसी सोच सभी के जीवन संरक्षण के मौलिक अधिकार (भारत में अनुच्छेद 21) का हनन कर लोकहित को हानि करते हुए लोकतंत्र, देश, दुनिया, मानवता एवं मानवजाति के लिये बहुत ज्यादा खतरनाक होगी।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
धार्मिक, न्यायिक
कौन
धर्म कभी भी अन्याय पर आधारित नहीं हो सकता। धर्म सदैव न्याय पर आधारित होता है। न्याय कभी भी दंड को मान्यता नहीं देता क्योंकि दंड दोहरा मापदंड, मनमानापन, नेसर्गिक न्याय का उलन्घन, बल का अनुचित प्रयोग, अवैज्ञानिकता, असुधार, अन्याय रखता हुआ ताकतवर तानाशाह की मनमानी, तानाशाही, अपराधी व्यवस्था स्थापित कर, लोगों को अपराधी होने देता हुआ, असंख्य दुष्परिणाम देकर, सभी के जीवन संरक्षण के जन्मसिद्ध एवं मौलिक संवैधानिक अधिकार (भारत में अनुच्छेद 21 का हनन) का हनन कर लोकहित को हानि करता हुआ देश, दुनिया, लोकतंत्र, मानवता एवं मानवजाति के लिये बहुत ज्यादा खतरनाक होता है।
अत: दंड को विधि के रूप मे स्वीकारने वाली मानसिकता अन्यायी होते हुए अधार्मिक होती है। जो मानसिकता अन्यायी होते हुए अधार्मिक हो वह कभी भी मानवीय नहीं हो सकती। इस प्रकार दंड की व्यवस्था को स्वीकारना कभी भी धार्मिक, न्यायिक, मानवीय जीवन-शैली का अंग नहीं हो सकता।
तब दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाले लोग कभी भी समझदारी की बौध्दिक-सन्तुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता के धार्मिक, न्यायिक, मानवीय लोग नहीं हो सकते, सिवाय अधार्मिक, अन्यायी, अमानवीय होकर लोकहित को हानि करने वाले देशद्रोही, महा अपराधी यानि अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी रखने वाले मनोविकृत-अपराधी यानि महा राक्षस होने के।
राक्षसों की ढोंग-आडम्बर, अन्धविश्वास, तानाशाही, गुलामी, अपराध, काल्पनिकता, अव्यावाहारिकता की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी यानि अर्धसमझ दुनिया से निकलकर मनुष्यों की ढोंग-आडंबरो, अन्धविश्वास, तानाशाही, गुलामी, अपराध, काल्पनिकता, अव्यावाहारिकता से मुक्त बौध्दिक-सन्तुलन की संयम, अनुशासन, विश्वास, व्यावाहारिकता की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता की समझदारी की नई दुनिया के युग में प्रवेश करने का समय आ चुका है।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
देश, दुनिया को
कैसा नेता चाहिये
नेता होना चुनाव जिताने या चुनाव जीतने पर निर्भर है, तो लोकतंत्र की स्थापना होना दंड से रहित व्यवस्था स्थापित होने पर ही सम्भव है, अन्यथा चुनाव जिताने वाला नेता भी दंड की व्यवस्था अपनाकर लोकतंत्र की जगह छद्म लोकतंत्र स्थापित कर अप्रत्यक्ष तानाशाही व्यवस्था स्थापित कर एक अपराधी-तंत्र व्यवस्था स्थापित कर देगा।
तानाशाही व्यवस्था से मुक्ति तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हेतु पहला चरण तो चुनाव जीतकर सरकार बनाना होता है, परंतु लोकतंत्र स्थापित करने लिये व्यवस्था को दंड से रहित करना पहली परम आवश्यक शर्त है। लोकतंत्र की स्थापना समझदारी का विषय है जबकि नेता होना भीड़ द्वारा चुनाव जिताने या चुनाव जीतने का विषय।
इसी कारण अभी तक लोग नेता तो बनते रहे, परंतु कोई भी छद्म लोकतंत्र से आजादी दिलाकर सभी का जीवन संरक्षण करने वाला लोक हितकारी लोकतंत्र यानि असली लोकतंत्र स्थापित करने वाला असली नेता नहीं बन सका।
देश, दुनिया, मानवता एवं मानवजाति को भीड़ द्वारा दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाले अर्धसमझ चुने हुए नेताओं की जरूरत नहीं वरन दंड से रहित, बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी प्रयोग द्वारा सभी का जीवन संरक्षण करने वाले लोक हितकारी लोकतंत्र को स्थापित करने वाले असली समझदार नेता की जरूरत है, अन्यथा दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाले भीड़ द्वारा चुने हुए अर्धसमझ नेता एक दिन देश, दुनिया, मानवता एवं मानवजाति के विनाश का कारण बन जायेंगे।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
अर्धसमझ से निकलकर
समझदार बनना है
दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाले लोग अर्धसमझ, अर्ध विकसित, अलोकतान्त्रिक, अधार्मिक, अन्यायी, अमानवीय, महा अपराधी होते हैं, जो अपनी अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता- बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी यानि अमानवीय, राक्षसी मानसिकता के कारण दोहरे मापदंड की मनमानी, नेसर्गिक न्याय का उलन्घन कर बल का अनुचित प्रयोग करने वाली तानाशाही, अपराधी व्यवस्था स्थापित कर लोगों को अपराधी होने देते हुए असंख्य दुष्परिणाम आने देकर सभी के जीवन संरक्षण के जन्मसिद्ध एवं मौलिक संवैधानिक अधिकार का हनन कर, लोकहित को हानि करते हुए देश, दुनिया, मानवता एवं मानवजाति के लिये बहुत ज्यादा खतरनाक होते हैं। इसमें दोष इन अर्धसमझ लोगों का नहीं वरन अब तक इन्है मिली अर्धसमझ की गलत सोच का है, अर्धसमझ की गलत शिक्षा का है। जब इनकी सोच वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होकर सुधारवादी, न्यायी होते हुए बौध्दिक-सन्तुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता की समझदार बन जायेगी तो यह लोग समझदार, सभ्य-विकसित, लोकतांत्रिक, धार्मिक, न्यायी बनते हुए मानवजाति को सुख, शान्ति, सुरक्षा के सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ दीर्घकाल तक पृथ्वी पर संरक्षित करने वाले संरक्षक भी बन जायेंगे।
बस जरूरत अर्धसमझ से निकलकर समझदार बनते हुए समझदारी के सत्य के युग (सतयुग) में प्रवेश करने की है। सतयुग के आगमन का प्रारम्भ हो चुका है यानि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की समझदारी की बौध्दिक-सन्तुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का जन्म हो चुका है। तानाशाही, गुलामी, महा अपराध से रहित, सभी का जीवन संरक्षण करने वाली समझदारी की मानवीय, लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने का प्रयास प्रारम्भ हो चुका है।
समझदारी की बुनियादी एवं व्यावाहारिक शिक्षा प्राप्त करना तथा समझदारी की तानाशाही, गुलामी, महा अपराध से मुक्त लोक हितकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक संवैधानिक अधिकार है, जिसे देना सरकार एवं उच्चतम न्यायालय की अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत संवैधानिक बाध्यता है। इसकी उपेक्षा सरकार एवं उच्चतम न्यायालय को संविधान, लोकतंत्र, मानवता, मानवजाति एवं देश से छल करने वाला देशद्रोही, महा अपराधी बना देगी।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
--विश्व-व्यापी बुध्दियोग जनजागरण अभियान।
14-A, अशोक नगर,आगरा
मिशन लोकतंत्र-
दंड का मार्ग चाहिये
याकि
सुधार का मार्ग चाहिये
किसी व्यवस्था को चलाने के दो ही मार्ग हैं-
1- दंड का मार्ग यानि बल के अन्यायी, अमानवीय प्रयोग का मार्ग
2- सुधार का मार्ग यानि बल के न्यायी, मानवीय प्रयोग का मार्ग
1- दंड का मार्ग-
जब व्यवस्थापक अवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असुधारवादी, अन्यायी सोच की अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी मानसिकता का होता है तो वह दंड की अन्यायी, अपराधी, अमानवीय व्यवस्था को प्रत्यक्ष तानाशाही व्यवस्था अथवा लोकतंत्र के नाम पर अप्रत्यक्ष तानाशाही व्यवस्था को छद्म लोकतंत्र के रूप स्थापित एवं संरक्षित करता हुआ सभी के जीवन संरक्षण के मौलिक अधिकार का हनन कर लोकहित को हानि करता हुआ महा अपराध करता है, यानि बल के अन्यायी प्रयोग की अपराधी व्यवस्था को स्वीकार करता है। ऐसी मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी सोच की अर्धसमझ जनता भी दंड की ऐसी अन्यायी, अपराधी, अमानवीय व्यवस्था को स्वीकार करती है।
2- सुधार का मार्ग-
जब व्यवस्थापक वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सुधारवादी, न्यायी सोच की बौध्दिक-सन्तुलन की समझदारी की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का होता है तो वह सुधार की न्यायी, मानवीय व्यवस्था को स्थापित एवं संरक्षित करता हुआ सभी के जीवन को संरक्षित कर लोकहित करता हुआ न्याय करता है, यानि बल के न्यायी प्रयोग की व्यवस्था को स्वीकार करता है। ऐसी स्वस्थ, मानवीय मानसिकता की समझदार जनता भी बल के सुधारवादी प्रयोग की न्यायी, मानवीय व्यवस्था को स्वीकार करती है।
अब सरकार, उच्चतम न्यायालय एवं जनता के ऊपर है की दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाली व्यवस्था को स्वीकार कर अर्धसमझ की बौध्दिक-असन्तुलन की मूर्खता-बदमाशी की मनोविकृत-अपराधी मानसिकता के अमानवीय, राक्षस बनते हुए सभी के जीवन संरक्षण के मौलिक अधिकार का हनन कर लोकहित को हानि करते हुए मानवजाति के शीघ्र विनाश का कारण बनते हैं, याकि बल के नेसर्गिक न्याय के लिये सुधारवादी मार्ग को अपनाकर बौध्दिक-संतुलन के समझदार, सभ्य-विकसित, लोकतांत्रिक बन सही अर्थ में मनुष्य बनते हुए सभी का जीवन संरक्षण कर लोकहित करते हुए मानवजाति को सुख, शान्ति, सुरक्षा के सहज, सरल, गरिमामय, मानवीय जीवन के साथ दीर्घकाल तक पृथ्वी पर संरक्षित करते हैं।
अब मानवजाति का दंड को विधि के रूप में स्वीकारने वाले मूर्खता-बदमाशी के अर्धसमझ के मनोविकृत-अपराधी युग से निकल कर दंड से रहित, बल के सुधार, न्याय के समझदारी के सभ्य-विकसित, लोकतांत्रिक युग में प्रवेश करने का समय आ चुका है।
युगपरिवर्तन समय की माँग
-युगप्रवर्तक सूरजपाल 'बुध्दियोगी'
बुध्दियोग मार्ग (बौध्दिक-संतुलन की स्वस्थ, मानवीय मानसिकता का समझदारी का मार्ग) अपनाऔ। धार्मिक, न्यायिक, सभ्य-विकसित, मानवीय, लोकतांत्रिक बनकर लोकतंत्र स्थापित करो।
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