06/09/2026
जिन्हें मस्जिद बचानी होती है, वो बचा लेते हैं—सिर्फ़ मीडिया में बयानबाज़ी नहीं करते।
नामपल्ली के विधायक माजिद हुसैन साहब इसकी मिसाल हैं। जब मस्जिद पर बुलडोज़र पहुँचा, तो वे ख़ुद हुकूमत के सामने मस्जिद में बैठ गए और उसे शहीद होने से बचाया।
बुलडोज़र वहाँ भी था, फ़र्क़ सिर्फ़ क़यादत का था।
आज सवाल उत्तर प्रदेश के मुस्लिम MP और MLA से है—क्या हमारे बीच भी ऐसा कोई जनप्रतिनिधि है, जो अपनी कौम के धार्मिक स्थलों की हिफाज़त के लिए सिर्फ़ बयान नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरकर संघर्ष करने का हौसला रखता हो?
क्योंकि मस्जिदों की हिफाज़त सिर्फ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं होती। जब वक़्त आता है, तो मैदान में खड़ा होना पड़ता है।
जहाँ माजिद हुसैन साहब जैसे लोग खड़े होते हैं, वहाँ AIMIM की क़यादत, हौसला और इश्क़-ए-मिल्लत नज़र आता है।
AIMIM — सिर्फ़ सियासत नहीं, हक़ की आवाज़ और इश्क़-ए-मिल्लत का जज़्बा।