मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भगवद गीता, वेदांत और योग को पढ़ाना या बढ़ावा देना भारतीय कानून के तहत “धार्मिक गतिविधि” नहीं है, और इसलिए इसे FCRA (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) के तहत विदेशी फंडिंग को मना करने या रद्द करने के आधार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने क्या साफ़ किया
कोर्ट ने तीन ज़रूरी कानूनी फ़र्क किए:
1. भगवद गीता
कोर्ट ने माना कि गीता मुख्य रूप से नैतिक फ़िलॉसफ़ी और नैतिक गाइडेंस का काम है, न कि कोई सांप्रदायिक धार्मिक किताब।
यह सिखाती है:
• फ़र्ज़ (धर्म)
• सेल्फ़-डिसिप्लिन
• सेल्फ़-रियलाइज़ेशन
• नैतिक काम
इसलिए, गीता पढ़ाना नैतिक विज्ञान की शिक्षा है, धार्मिक उपदेश नहीं। ⸻
2. वेदांत
वेदांत को एक फिलॉसफी सिस्टम माना जाता था जो इनसे जुड़ा था:
• अवेयरनेस
• रियलिटी
• सेल्फ-नॉलेज
यह वेस्टर्न फिलॉसफी जैसा है, धार्मिक रीति-रिवाजों या पूजा से नहीं।
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3. योग
योग को एक सिविलाइज़ेशनल और साइंटिफिक डिसिप्लिन माना जाता था, जो इनसे जुड़ा था:
• फिजिकल हेल्थ
• मेंटल डिसिप्लिन
• साइकोलॉजिकल वेल-बीइंग
यह धार्मिक शिक्षा नहीं है।
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यह क्यों मायने रखता है
फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) के तहत:
विदेशी पैसे का इस्तेमाल धार्मिक प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका इस्तेमाल एजुकेशन, रिसर्च, कल्चर और सोशल डेवलपमेंट के लिए किया जा सकता है।
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि:
गीता, वेदांत या योग सिखाना एजुकेशन और कल्चरल एक्टिविटी के तहत आता है, धर्म के तहत नहीं।
इसलिए इन सब्जेक्ट्स को पढ़ाने वाले NGOs कानूनी तौर पर विदेशी फंडिंग पाने के हकदार हैं। ⸻
संवैधानिक मतलब
इस फैसले ने इस बात की पुष्टि की कि:
• भारत की सभ्यता आज के धर्मों से भी पुरानी है
• इसकी दार्शनिक परंपराएं देश की संस्कृति का हिस्सा हैं, न कि सांप्रदायिक आस्था का
• सरकार को भारतीय ज्ञान के सिस्टम को दबाने के लिए उन्हें “धर्म” के तौर पर गलत तरीके से नहीं बताना चाहिए
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एक वाक्य में
मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि गीता, वेदांत और योग ज्ञान के सभ्यता के सिस्टम हैं—धार्मिक उपदेश नहीं—और इसलिए उन्हें भारत के FCRA के तहत रोका नहीं जा सकता।
बहुत बढ़िया फैसला।
केसरिया राष्ट्रवादी समूह KRT
KRT(केसरिया राष्ट्रवादी टीम) का उद्देश्य धर्म और राष्ट्रहित के विषयों पर हैशटैग ट्रेंड अभियान करना
*🧠 𝐁𝐫𝐚𝐢𝐧 𝐒𝐭𝐫𝐨𝐤𝐞 : पहले की तुलना में वर्तमान में अधिक, और अब युवा वर्ग भी बन रहा शिकार, समय रहते शरीर की चेतावनी को समझें और जीवन बचाएँ।*
हम सभी धीरे-धीरे वृद्ध हो रहे हैं और शरीर हमें समय-समय पर चेतावनी देता है। इसलिए यह संदेश पढ़ना आपके और आपके परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों के लिए बेहद जरूरी हो सकता है।
हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहाँ सुविधाएँ बढ़ी हैं लेकिन स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा है। समय के साथ बदलती लाइफस्टाइल के कारण कुछ बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इनमें से ब्रेन स्ट्रोक भी एक गंभीर बीमारी है। अभी तक ब्रेन स्ट्रोक और लकवा (पैरालिसिस) जैसी गंभीर बीमारियाँ बुजुर्गों तक सीमित मानी जाती थीं, लेकिन आज युवा वर्ग भी इसका शिकार हो रहे हैं। 18 से 44 साल की उम्र के लोगों में स्ट्रोक के मामले बढ़ना एक बड़ा संकेत है कि अब यह सिर्फ उम्र से जुड़ी समस्या नहीं रही है। यह अचानक होने वाली घटना जरूर लगती है, लेकिन सच यह है कि इसकी शुरुआत हमारे शरीर के अंदर बहुत पहले से हो चुकी होती है।
एक पुराने सहपाठियों की पुनर्मिलन सभा का किस्सा बहुत कुछ सिखाता है। उस दिन एक महिला अचानक 𝐁𝐚𝐫𝐛𝐞𝐜𝐮𝐞 𝐏𝐚𝐫𝐭𝐲 में फिसल गई। सभी ने कहा, 'आप ठीक हैं…?' लेकिन उन्होंने कहा, 'हाँ, मैं ठीक हूँ।' शायद नई सैंडल की वजह से या ईंट से टकराने की वजह से ऐसा हुआ होगा। उन्होंने संभलकर खाने की प्लेट ली और बाकी समय हँसती-बतियाती रहीं।
लेकिन बाद में उनके पति ने सभी को फोन करके बताया कि उन्हें अस्पताल ले जाया गया था और शाम 6:00 बजे उनका निधन हो गया। कारण: पार्टी के दौरान ही उन्हें स्ट्रोक (आघात) हुआ था। यदि वहाँ मौजूद लोग स्ट्रोक के चेतावनी संकेत समझ पाते, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी।
जानकारों का कहना था कि दिमाग में रक्त पहुंचाने वाली नस में खून के थक्के जमने के चलते इस तरह के स्ट्रोक की समस्या पैदा हुई है। साथ ही जानकारों का यह भी कहना था कि थक्का जमने के चलते दिमाग में ऑक्सीजन और ब्लड की सप्लाई नहीं पहुंच पा रही थी।
आज के समय में 𝐁𝐫𝐚𝐢𝐧 𝐒𝐭𝐫𝐨𝐤𝐞 अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि 40 साल से कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह एक गंभीर स्थिति है, जो तब होती है जब दिमाग तक पहुंचने वाला खून अचानक रुक जाता है या किसी ब्लड वेसल के फटने से दिमाग को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में दिमाग की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और वे प्रभावित होने लगती हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, कम उम्र में स्ट्रोक के बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं, जैसे; धूम्रपान और नशीले पदार्थों का सेवन, जो खून की नसों को नुकसान पहुंचाते हैं और थक्के बनने का खतरा बढ़ाते हैं। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, लगातार तनाव, अनियमित दिनचर्या, असंतुलित आहार, मोटापा और शारीरिक गतिविधि की कमी भी इसके बड़े कारण हैं।
स्ट्रोक होने से पहले कुछ स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं, और समय पर इलाज मिलने पर मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है। एक न्यूरोसर्जन ने बताया कि अगर मरीज तक 3-4 घंटे के भीतर पहुँच जाएँ तो जीवन बचाना संभव है।
दरअसल, अनहेल्दी लाइफस्टाइल, स्ट्रेस, नींद की कमी और नशे की आदतों से युवाओं के दिमाग पर बुरा असर पड़ रहा है। इसलिए इसके पीछे के कारण और लक्षणों को समझना जरूरी है, ताकि इनसे निपटने के उपायों पर ध्यान दिया जा सके।
*🧠 स्ट्रोक की त्वरित पहचान के लिए तीन सरल कदम हमेशा याद रखें— 🇸 🇹 🇷*
🇸 Smile (मुस्कुराएँ) : मरीज से मुस्कुराने को कहें। अगर चेहरा एक तरफ झुक रहा है तो चेतावनी।
🇹 Talk (बोलना) : सामान्य वाक्य बोलने को कहें, जैसे "आज आसमान साफ़ है।" बोलने में परेशानी → संकेत।
🇷 Raise (हाथ उठाएँ) : दोनों हांथ ऊपर उठाने को कहें। अगर एक हांथ नीचे गिर रहा है या उठ नहीं पा रहा → संकेत।
👉 एक और आसान संकेत : मरीज से जीभ बाहर निकालने को कहें। अगर जीभ एक तरफ मुड़ जाए → स्ट्रोक का लक्षण।
इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो बिना देर किए तुरंत एम्बुलेंस 108 या नज़दीकी अस्पताल में संपर्क करें। लक्षण विस्तार से बताना बहुत जरूरी है। याद रखें, समय पर की गई कार्रवाई ही जीवन बचा सकती है।
नवीनतम शोध बताता है कि स्ट्रोक के केस व मृत्यु दर 2050 तक 50% बढ़ सकती है, यदि रोकथाम व जन-जागरूकता नहीं बढ़ी। याद रखें कि ब्रेन स्ट्रोक जानलेवा हो सकता है लेकिन समय पर पहचान और इलाज से मरीज की जान बचाई जा सकती है और उसे सामान्य जीवन में वापस लाया जा सकता है।
लेकिन सवाल उठता है कि आखिर यह समस्या इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है। इसके पीछे कई गहरे कारण हैं। डॉक्टरों के अनुसार— हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, शराब, मोटापा और शारीरिक गतिविधि की कमी — ये सभी स्ट्रोक के प्रमुख कारण हैं। दिल की अनियमित धड़कन भी खून के थक्के बनाकर दिमाग तक पहुँचा सकती है, जिससे स्ट्रोक हो सकता है।
*🧠 क्यों बढ़ जाता है स्ट्रोक का खतरा —*
डॉक्टर ने कहा कि आजकल लोग घंटों बैठकर काम के दबाव में जी रहे हैं, तनाव लगातार बढ़ रहा है और सबसे बड़ी समस्या है नींद की कमी। साथ ही बाहर का जंक फूड ज्यादा खाते हैं। इससे मोटापा बढ़ रहा है, और कम उम्र में ही ब्लड प्रेशर और शुगर जैसी बीमारियां लोगों काे हो रही हैं। स्मार्टफोन और कंप्यूटर की वजह से चलना-फिरना तो बंद ही हो गया है। वहीं नींद की कमी और तनाव की समस्या भी लोगों में देखी जा रही है।
उन्होंने ये भी बताया कि देर रात तक मोबाइल/कंप्युटर पर समय बिताना, 𝐑𝐞𝐞𝐥𝐬 देखना, 𝐖𝐡𝐚𝐭𝐬𝐀𝐩𝐩 और अन्य मनोरंजन में लगे रहना, कई बार रात 1–2 बजे तक जाग कर बातें करना यह सभी आदतें धीरे-धीरे दिमाग को थका देती है। और जब मस्तिष्क को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, तो शरीर का संतुलन बिगड़ता है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है और स्ट्रोक का खतरा बढ़ने लगता है। बहुत से लोग लोग नशा, वैपिंग और ज्यादा शराब पीते हैं। इस कारण स्ट्रोक का खतरा और अधिक बढ़ जाता है।
पहले ब्रेन स्ट्रोक को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं और युवा वर्ग भी इसकी चपेट में आ रहा है। कोरोना से पहले यानी 2015 से 2019 के बीच 18 से 44 साल के लोगों में स्ट्रोक के मामले काफी कम, लगभग 5–7% के आसपास माने जाते थे। उस समय यह बीमारी मुख्य रूप से 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों तक सीमित थी।
फिर आया कोरोना काल (2020–2022), जिसने शरीर के अंदर कई ऐसी समस्याएं बढ़ा दीं जिनका असर सीधे दिमाग और रक्त प्रवाह पर पड़ा। इसी दौरान 18 से 44 साल के लोगों में स्ट्रोक के मामलों में लगभग 14.6% तक बढ़ोतरी देखी गई, और 45 से 64 साल के लोगों में यह वृद्धि करीब 15.7% तक पहुंच गई। डॉक्टरों ने इसके पीछे कोविड संक्रमण के बाद खून के गाढ़े होने (ब्लड क्लॉटिंग), हार्ट और फेफड़ों पर असर, और लंबे समय तक घर में बैठे रहने जैसी वजहों को जिम्मेदार माना।
कोरोना के बाद यानी 2022 से 2026 तक के ट्रेंड और हॉस्पिटल ऑब्जर्वेशन बताते हैं कि स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है। अब 18 से 44 साल के लोगों में स्ट्रोक के मामले बढ़कर लगभग 18% से 22% के बीच पहुंच चुके हैं, जबकि 45 से 64 साल के लोगों में यह 20% से 25% तक माना जा रहा है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार अब हर चार में से एक स्ट्रोक मरीज 50 साल से कम उम्र का होता है, जो पहले बहुत ही दुर्लभ था।
साथ आज एक और चर्चा आम है कि आखिर 'कोविड वैक्सीन' के बाद स्ट्रोक और पैरालिसिस के मामले क्यों बढ़े हैं। इस विषय पर स्पष्ट और संतुलित समझ जरूरी है। वैज्ञानिक स्तर पर अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है कि वैक्सीन सीधे तौर पर बड़े स्तर पर स्ट्रोक का कारण बन रही है। कुछ दुर्लभ मामलों में साइड इफेक्ट्स जरूर सामने आए हैं। दूसरी ओर, कोविड संक्रमण स्वयं शरीर में सूजन और खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ाता है, जिससे स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही आजकल जांच और जागरूकता पहले से ज्यादा है, इसलिए केस अधिक दिखाई दे रहे हैं।
कोविड के बाद इम्यून सिस्टम और ब्लड सर्कुलेशन पर जो असर पड़ा, उसने इस खतरे को और अधिक बढ़ा दिया है। अब स्थिति यह है कि ब्रेन स्ट्रोक केवल उम्र से जुड़ी बीमारी नहीं रही, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की आदतों और जीवनशैली का परिणाम बन चुकी है। अगर समय रहते हमने अपनी आदतों में बदलाव नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में युवा पीढ़ी इसके सबसे बड़े शिकार बन सकती है।
इसलिए हमें अपनी दिनचर्या सुधारनी होगी। पर्याप्त नींद लेना, समय पर खाना, नियमित व्यायाम, मोबाइल का सीमित उपयोग, मानसिक शांति ये केवल सलाह नहीं, बल्कि जीवन बचाने के उपाय हैं। क्योंकि स्ट्रोक अचानक नहीं होता, यह हमारी रोज़मर्रा की आदतों का परिणाम होता है। और जब यह होता है, तो हर सेकंड कीमती होता है। सही समय पर पहचान और तुरंत इलाज ही जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकता है।
*🙏 एक छोटा नेक काम :* एक हृदय रोग विशेषज्ञ ने जोर देकर कहा है कि यदि यह संदेश हर व्यक्ति कम-से-कम 10 लोगों तक पहुँचाए, तो कम-से-कम एक जीवन बच सकता है। मैंने अपना कर्तव्य निभाया – अब आपकी बारी है।
*याद रखें :—* "जब आप किसी को गुलाब देते हैं, उसकी खुशबू आपके हाथों में भी रहती है।" पुण्य के कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता दें। स्वास्थ्य सेवा, मानव सेवा – जिंदगी खुल कर जियो और अपनों के साथ जियो।
*RSS की स्थापना भारत की आजादी से पहले 1925 में हुई देश में हिन्दू तब भी थे*
*लेकिन वो RSS के साथ नहीं, महात्मा गाँधी के साथ चले।*
*इस साथ के बदले गाँधी ने हिंदुओं की जमीन काट कर मुसलमानों को दे दी, वो जमीन जो हज़ारों साल से हिंदुओं की थी।*
*क्षणिक आवेश के बाद शांत हुआ देश का हिन्दू तब भी गोडसे के साथ नहीं गया, नेहरू के साथ गया।*
*चार दशक बाद,1980 में भाजपा बनी लेकिन देश का हिन्दू तब भी भाजपा के साथ नही था, इंदिरा के साथ था, राजीव के साथ था।*
*तब संसद भवन/ राष्ट्रपति भवन में रोजा इफ्तार होता था,हिन्दू ने कोई ऐतराज नहीं किया।*
*हिन्दू तो अपने घर में माता को चूनर चढ़ा कर खुश था।*
*हज के लिए सब्सिडी दी जा रही थी, हिन्दू तब अमरनाथ वैष्णो देवी की यात्रा में आतंकियों की गोली खा कर भी खुश था।*
*ट्रेनों में, पार्कों में, बसों में, सड़कों को घेर कर नमाज होती थी।*
*बेचारा हिन्दू खुद को बचा के कच्ची पगडंडी से घर-ऑफिस निकल जाता था।*
*( दिल्ली में CAA,NRC के विरोध में महीनों धरना चला, हिन्दू १५-२० किमी चक्कर लगाकर घर आफिस जाता था लेकिन फ्री के चक्कर में केजरीवाल को जिताया। भीषण दंगों का दंश झेला*
*पूरे देश मे वक्फ की आड़ में अनगिनत मस्जिदें बन रही थीं, हिन्दू को कोई ऐतराज नहीं था।*
*वो तो तब अस्पताल मांग रहा था।*
*जगह जगह मज़ारें बना कर जमीन कब्जाई जा रही थी, हिन्दू उन्हीं मज़ारों पर माथा टेककर अपने बच्चों के लिए स्कूल मांग रहा था।*
*फिर एक दिन हिंदुओं ने अपने आराध्य श्रीराम जी का अपना एक मंदिर वापस मांग लिया।*
*लेकिन कुछ लोग रावण की तरह अभिमान में डूबे थे।*
*रावण ने कहा था सीता वापस नहीं करूँगा, ये राम और इसकी वानर सेना क्या ही कर लेगी।*
*कलयुग के रावणों को भी लगा, मन्दिर वापस नहीं करेंगे, ये काल्पनिक राम और इसकी वानर सेना क्या ही कर लेगी।*
*बाबर न तो अयोध्या में पैदा हुआ था और न अयोध्या में मरा था।*
*उसके नाम से मस्ज़िद देश में कहीं भी बन सकती थी।*
*देश में हज़ारों लाखों मस्जिदों के बनने पर भी हिन्दू को ऐतराज नहीं था।*
*उसे चाहिए था तो बस एक मंदिर, लेकिन उसे मिला क्या?*
*माथे पर लगाने के लिए रामभक्तों के रक्त से सनी अयोध्या की मिट्टी, अर्चन के लिए खून से लाल सरयू का जल, अर्पण के लिए ट्रेन की बोगी में जली हुई रामभक्तों की लाशें।*
*अभी तक स्कूल अस्पताल नौकरी के सपनों में खोया बहुसंख्यक हिन्दू जिद पर अड़ गया।* *उसका स्वाभिमान जाग गया।* *वो उठ खड़ा हुआ, एकजुट हुआ और अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बने रहने का अभिशाप एक झटके में उखाड़ फेंका।*
*बात सिर्फ एक मंदिर की थी, आज वो अपना हर मन्दिर वापस लेने की जिद पकड़ बैठा है।*
*हिंदुओं ने वो कर दिखाया है, जो संसार की कोई भी सभ्यता नहीं कर पाई।*
*न यहूदी अपने धार्मिक स्थल वापस ले पाए, न ईसाई और न पारसी।*
*और ना ही मुसलमान यहूदियों या ईसाइयों से अपने धार्मिक स्थल वापस ले पाए*
*लेकिन हिंदुओं ने इनके जबड़े में हाथ डाल कर अपने आराध्य का घर वापस ले लिया।*
*ये मदमस्त वानरों की टोली है,*
*इनके रास्ते में मत आओ,*
*भले ही आप राजनीति के सर्वोच्च पद पर हों या धर्म के।*
*ये राम की वानरसेना है, जो लड़ना भी जानती है और अब जीतना भी।*
*और हां अयोध्या तो झांकी है अभी हिंदू राष्ट्र व मथुरा काशी बाकी है ।*
*भारत माता की जय*
*वंदे मातरम - जय हिंद*
*इस संदेश को कम से कम पांच ग्रुप मैं जरूर भेजें*
*कुछ लोग नहीं भेजेंगे जो नहीं भेजेंगे वो वही हिंदू हैं जो उस वक्त भी हिंदुओं के साथ नहीं बल्कि विधर्मियों के साथ खड़े थे*
*लेकिन मुझे यकीन है आप जरूर भेजेंगे। *{शपथ है आपको* *"राम" की,*
*५ ग्रुप मे भेजना ही है सोए हुऐ आलसी और मंदभक्त हिन्दुओं के लिये}* *जय जयश्री राम*
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
05/04/2025
*हिंदुओं के विनाश का कारण क्या वाकई विधर्मी हैं, या खुद हिंदुओं की अकर्मण्यता…?*
जब उनका सुनियोजित आक्रमण होता है तो हममें से कोई दुकान पर और कोई ऑफिस में होता है, उनकी भीड़ें इकट्ठी होती रहती हैं, चौराहों पर जालीदार टोपीधारी लोग बड़ी संख्या में खड़े होकर हिंदुओं को घृणा से घूरते दिखते हैं। हिन्दू थोड़ा बहुत समझने की कोशिश करता है मगर 'हमे क्या' कहकर अपने घर की ओर बढ़ जाता है। घर में चाय का ऑर्डर करके मोबाइल चलाने लगता है या TV देखने लगता है। उसे जिज्ञासा ही नहीं होती कि आखिर मार्केट में इतनी सनसनी क्यों थी।
जब गगनभेदी खौफनाक नारे लगने लगते हैं तो वह दौड़ के खिड़की-दरवाजे बंद करता है। डरते-डरते छत पर चढ़कर 'माहौल' का जायज़ा लेने की कोशिश करता है मगर तब तक पथराव शुरू हो जाता है। खिड़की और दरवाजें हिलाए जाने लगते हैं। घर में पत्नी है, बेटी है, छोटा बेटा है, सब "हे भगवान - हे भगवान" जपना शुरू कर देते हैं।
घर का मालिक 112 या 100 नंबर पर फोन करता है मगर कुछ नहीं उखड़ता। घण्टी बजती रहती है लेकिन कोई फोन तक नहीं उठाता। पड़ोसी यूसुफ मियां को फोन करता है कि "भाई साहब हमे बचाओ, हमारे बाप-दादा एक ही थाली में खाते आये हैं।" यूसुफ मियां बताते है कि "मैं तो शहर में ही नहीं हूँ
तब घर का मालिक मच्छरदानी का डंडा ढूँढता है, पत्नी किचन से ₹10 वाला चक्कू हाथ में लेती है, लेकिन बेटी मम्मी से चक्कू छीनकर वापस गैस के चूल्हे के नीचे छिपा देती है। 8 वर्षीय लड़का खिड़की से देखता है कि उसका दोस्त अनस उसके घर पर पत्थर चला रहा है क्यों…?
उसे समझ नहीं आता। माँ डांटती है कि खिड़की से दूर हो जा, शीशा टूटकर लग गया तो ग़ज़ब हो जाएगा।
घर के बाहर खड़े स्कूटर और कार पर पहले पथराव होता है फिर आग लगा दी जाती है। स्कूटर/कार का मालिक पहले घबराता है, फिर यह सोचकर खुश हो जाता है कि "कोई बात नहीं, इंश्योरेंस से पैसा मिल जाएगा।"
फिर पेट्रोल की एक धार बाहरी दरवाजे के नीचे से घर में आती दिखती है, पीछे-पीछे कपड़े या पेट्रोल में भीगी जलती हुई रस्सी के सहारे आग आगे बढ़ती है। छत पर पथराव हो रहा है और नीचे आग बढ़ती जा रही है।
अगले दिन जले हुए घर और कोयले जैसे कुछ शरीर, जली हुई दीवारों के बीच से बरामद होते हैं।
और इस घटनाक्रम के पश्चात मुख्यमंत्री जी का ब्यान आता है कि “गुनहगारों को बिल्कुल भी बख्शा नहीं जाएगा।”
हिंदुओं समय रहते जाग जाओ, शत्रु और उसके एजेंडे को समझकर तैयारी करो अन्यथा एक दिन अपनी बहन, बेटी, मां, पत्नी को अपनी ही नग्न आंखों के सामने लुटते हुए देखोगे और कुछ नहीं कर पाएंगें।
03/04/2025
मुस्लिम आपको कभी अंगदान करते नहीं मिलेंगे लेकिन अंगदान लेते जरूर मिलेंगे - इस्लाम में दान (जकात) गैर मुस्लिमों को तब ही दिया जाता है जब वह इस्लाम का विरोध न करते हो और इस्लाम की तरफ उनका रुझान हो-
आज के विधेयक से साफ़ है कि वक़्फ़ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगेगी - किसी की संपत्ति पर उंगली रखने से वह वक़्फ़ की नहीं होगी - कोई भी सरकारी संपत्ति वक़्फ़ की नहीं मानी जाएगी- और कोई भी मुस्लिम अपनी ही संपत्ति वक़्फ़ को दे सकेगा जिसके लिए उसका 5 साल तक इस्लाम महजब को मानना जरूरी होगा - संपत्ति का पंजीकरण भी होगा और कलेक्टर उसकी देखभाल करेगा - वक्फ बोर्ड के निर्णय को कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी -
इमरान मसूद आज लोकसभा में कह रहा था कि उत्तर प्रदेश में वक़्फ़ की 74% संपत्ति सरकारी घोषित कर दी गई हैं - लूट कर संपत्ति वक़्फ़ में जोड़ी हैं तो उनका कब्ज़ा तो सरकार लेगी ही - वैसे इमरान मसूद को पता होना चाहिए कि ओवैसी खुद कहता रहता है कि उत्तर प्रदेश में वक़्फ़ की 129 लाख में से 112 लाख संपत्तियों के कागज ही नहीं हैं वक़्फ़ बोर्ड के पास -
ऐसा कोई नहीं है जिसे वक़्फ़ बोर्ड ने ठगा नहीं - इसलिए 1000 चर्च भी इस बिल के समर्थन में खड़ी हैं - मजे की बात है 239 विपक्षी सांसदों में केवल 24 मुस्लिम है और 215 “हिंदू काफिर” है जो गला फाड़ फाड़ कर बिल का विरोध कर रहे हैं -
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विपक्ष को वक़्फ़ बोर्ड/कौंसिल में 2 मुस्लिम महिलाओं see more.....
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