24/01/2026
Taxation Secretarial Digital Media Agriculture
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24/01/2026
काश यह योजना 1990 में आई होती, यह हमारा दुर्भाग्य हे कि आज हम जवान नही ...........
मूल उद्देश्य - हर नागरिक के घर में , उसके आस पास में trained पर्सनल उपलब्ध होंगे , हर एक फोजी होगा
...
अग्निवीर के लाभ :---
१-- १० वीं पास गरीब युवा को ४ साल बाद आर्मी के परिक्षण के साथ साथ १२ वीं पास का सार्टिफिकेट मिलेगा और वह आगे इंजीनियरिंग का कोर्स और आगे की पढ़ाई कर सकता है।
२-- जिन गरीब मां बाप का इकलौता लड़का है वह लड़का आर्मी की ट्रेनिंग के बाद सिविल में नौकरी करके मां बाप के पास ही रहकर उनकी सेवा भी करेगा।
३-- पुलिस, सी आई एस एफ, सी आर पी एफ, रेलवे पुलिस में वह नौकरी करके दो नौकरियों का अनुभव लेगा।
४-- सिविल में वह आर्मी की अपेक्षा २५ वर्ष की नौकरी पूरी कर सकेगा।
५-- २५% अग्निवीर बिल्कुल फिट युवा सलैक्ट होंगे और युद्ध में उनकी कैजुअल्टी कम होगी।
६-- हर विभाग में अग्निवीर होने से आतंकवादी घटनाओं पर रोक लगेगी।
७-- पुलिस, रेलवे , और अन्य अर्धसैनिक बलों को ट्रेंड सिपाही मिल जाएंगे और उनकी ट्रेनिंग का खर्चा बच जाएगा।
८-- अग्निवीर को लोन की सुविधा भी सरकार बिजनेस के लिए देगी।
९-- अग्निवीर यदि चार साल तकनीकी ग्रेड से है तो पब्लिक सैक्टर यूनिट में वह ६० साल तक सरकारी नौकरी तकनीकी ग्रेड में करेगा।
१०-- प्राईवेट में अग्निवीर को हाथों हाथ कम्पनियां लेंगी।
११-- सेक्यूरिट गार्ड में सीधे सेक्यूरिटी सुपरवाइजर के पद पर तैनाती मिलेगी।
१२-- १७ से २४ वर्ष की अवस्था में युवा सबसे अधिक नशे के लत और गलत संगत में पड़ते हैं और अग्निवीर बनने से बहुत से युवा गलत मार्ग पर जाने से बचेंगे।
१३-- भारत के पास आर्मी रिजर्व तीन गुना हो जाएगा और भारत चीन - पाकिस्तान और अन्य तीसरे देश से तीन मोर्चों पर लड़ सकता है।
१४-- अग्निवीर को धार्मिक शिक्षाएं भी दी जाएंगी और उनके माथे पर तिलक लगाकर उनको योगा भी कराया जाएगा और उन्हें गायत्री मंत्र और महामृत्युजंय मंत्र सिखाकर गीता भी पढ़ाई जाएगी ताकि जेहादी अग्निवीर में ना जा सके इसका भी पूरा ख्याल रखा जाएगा।
राहुल गांधी ने अग्निपथ योजना को यूज एंड थ्रू बताया ????
जानते हैं क्यूं ?????
ताकि कोई भी हिंदू अपने बच्चों को आर्मी में ना भेजे और इसका लाभ पड़ोसी दुश्मन उठा लें।
अग्निवीर योजना भविष्य में आपके बच्चों को इस्राइल के युवाओं की तरह कर्मठ बनाएगी।
चार साल आर्मी में वह एक योद्धा बनकर घर आएगा !
सिविल में सर्विस करेगा और बिजनेस में आगे जाएगा आर्मी में तकनीकी ज्ञान सीखेगा।
जो २५% युवा आर्मी में परमांनैंट नौकरी करेंगे वो शारीरिक रूप से परफैक्ट होंगे और आर्मी को १००% फिट जवान मिलेगा जिससे आर्मी में कैजुअल्टी कम होगी और आतंकवादी अभियान और युद्ध में भारतीय सैनिकों के शहीद होने की दर में ७०% की गिरावट आएगी।
Will Indian National Congress file FIR against Mr. , Ex-President, USA ?
Watch this Video Analysis on and written by Mr. Barak Obama
1903 - 1857 -1947-1966-1996-2024
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INDIAN YOUTH & THIER STRUGGLE V/S INDIAN POLITICS V/S HISTORY OF NATION V/S INTERNATIONAL APPROCH WITH INDIA
एक कल्पना कीजिए... तीस वर्ष का पति जेल की सलाखों के भीतर खड़ा है और बाहर उसकी वह युवा पत्नी खड़ी है, जिसका बच्चा हाल ही में मृत हुआ है...
इस बात की पूरी संभावना है कि अब शायद इस जन्म में इन पति पत्नी की भेंट न हो। ऐसे कठिन समय पर इन दोनों ने क्या बातचीत की होगी। कल्पना मात्र से आप सिहर उठे ना?
जी हाँ!! मैं बात कर रहा हूँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चमकते सितारे विनायक दामोदर सावरकर की।
यह परिस्थिति सावरकर के जीवन में आई थी, जब अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी (Andaman Cellular Jail) की कठोरतम सजा के लिए अंडमान जेल भेजने का निर्णय लिया और उनकी पत्नी उनसे मिलने जेल में आईं।
मजबूत ह्रदय वाले वीर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) ने अपनी पत्नी से एक ही बात कही... “तिनके तीलियाँ बीनना और बटोरना तथा उससे एक घर बनाकर उसमें बाल बच्चों का पालन पोषण करना... यदि इसी को परिवार और कर्तव्य कहते हैं तो ऐसा संसार तो कौए और चिड़िया भी बसाते हैं। अपने घर परिवार बच्चों के लिए तो सभी काम करते हैं। मैंने अपने देश को अपना परिवार माना है, इसका गर्व कीजिए। इस दुनिया में कुछ भी बोए बिना कुछ उगता नहीं है। धरती से ज्वार की फसल उगानी हो तो उसके कुछ दानों को जमीन में गड़ना ही होता है। वह बीच जमीन में, खेत में जाकर मिलते हैं तभी अगली ज्वार की फसल आती है।
यदि हिन्दुस्तान में अच्छे घर निर्माण करना है तो हमें अपना घर कुर्बान करना चाहिए। कोई न कोई मकान ध्वस्त होकर मिट्टी में न मिलेगा, तब तक नए मकान का नवनिर्माण कैसे होगा...। कल्पना करो कि हमने अपने ही हाथों अपने घर के चूल्हे फोड़ दिए हैं, अपने घर में आग लगा दी है। परन्तु आज का यही धुआँ कल भारत के प्रत्येक घर से स्वर्ण का धुआँ बनकर निकलेगा।”
“यमुनाबाई, बुरा न मानें, मैंने तुम्हें एक ही जन्म में इतना कष्ट दिया है कि यही पति मुझे जन्म जन्मांतर तक मिले, ऐसा कैसे कह सकती हो... यदि अगला जन्म मिला, तो हमारी भेंट होगी... अन्यथा यहीं से विदा लेता हूँ...” (उन दिनों यही माना जाता था, कि जिसे कालापानी की भयंकर सजा मिली वह वहाँ से जीवित वापस नहीं आएगा)।
अब सोचिये, इस भीषण परिस्थिति में मात्र 25-26 वर्ष की उस युवा स्त्री ने अपने पति यानी वीर सावरकर से क्या कहा होगा? यमुनाबाई (अर्थात भाऊराव चिपलूनकर की पुत्री) धीरे से नीचे बैठीं, और जाली में से अपने हाथ अंदर करके उन्होंने सावरकर के पैरों को स्पर्श किया। उन चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाई। सावरकर भी चौंक गए, अंदर से हिल गए... उन्होंने पूछा... “ये क्या करती हो?” अमर क्रांतिकारी की पत्नी ने कहा... “मैं यह चरण अपनी आँखों में बसा लेना चाहती हूँ, ताकि अगले जन्म में कहीं मुझसे चूक न हो जाए। अपने परिवार का पोषण और चिंता करने वाले मैंने बहुत देखे हैं, लेकिन समूचे भारतवर्ष को अपना परिवार मानने वाला व्यक्ति मेरा पति है... इसमें बुरा मानने वाली बात ही क्या है। यदि आप सत्यवान हैं, तो मैं सावित्री हूँ। मेरी तपस्या में इतना बल है, कि मैं यमराज से आपको वापस छीन लाऊँगी। आप चिंता न करें... अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें... हम इसी स्थान पर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं...”
क्या जबरदस्त ताकत है... उस युवावस्था में पति को कालापानी की सजा पर ले जाते समय, कितना हिम्मत भरा वार्तालाप है... सचमुच, क्रान्ति की भावना कुछ स्वर्ग से तय होती है, कुछ संस्कारों से। यह हर किसी को नहीं मिलती।
वीर सावरकर को 50 साल की सजा देकर भी अंग्रेज नहीं मिटा सके, लेकिन कांग्रेस व मार्क्सवादियों ने उन्हें मिटाने की पूरी कोशिश की.26 फरवरी 1966 को वह इस दुनिया से प्रस्थान कर गए। लेकिन इससे केवल 56 वर्ष व दो दिन पहले 24 फरवरी 1910 को उन्हें ब्रिटिश सरकार ने एक नहीं, बल्कि दो-दो जन्मों के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।
वीर सावरकर भारतीय इतिहास में प्रथम क्रांतिकारी हैं, जिन पर हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्या्यालय में मुकदमा चलाया गया था। उन्हें काले पानी की सजा मिली। कागज व लेखनी से वंचित कर दिए जाने पर उन्होंने अंडमान जेल की दीवारों को ही कागज और अपने नाखूनों, कीलों व कांटों को अपना पेन बना लिया था, जिसके कारण वह सच्चाई दबने से बच गई, जिसे न केवल ब्रिटिश, बल्कि आजादी के बाद तथाकथित इतिहासकारों ने भी दबाने का प्रयास किया। पहले ब्रिटिश ने और बाद में कांग्रेसी वामपंथी इतिहासकारों ने हमारे इतिहास के साथ जो खिलवाड़ किया, उससे पूरे इतिहास में वीर सावरकर अकेले मुठभेड़ करते नजर आते हैं।
भारत का दुर्भाग्यय देखिए, भारत की युवा पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि वीर सावरकर को आखिर दो जन्मों के कालापानी की सजा क्यों मिली थी, जबकि हमारे इतिहास की पुस्तकों में तो आजादी की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू के नाम कर दी गई है। तो फिर आपने कभी सोचा कि जब देश को आजाद कराने की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू ने लड़ी तो विनायक दामोदर सावरकर को कालेपानी की सजा क्यों दी गई। उन्होंने तो भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों की तरह बम बंदूक से भी अंग्रेजों पर हमला नहीं किया था तो फिर क्यों उन्हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।
वीर सावरकर की गलती यह थी कि उन्होंंने कलम उठा लिया था और अंग्रेजों के उस झूठ का पर्दाफाश कर दिया, जिसे दबाए रखने में न केवल अंग्रेजों का, बल्कि केवल गांधी नेहरू को ही असली स्वतंत्रता सेनानी मानने वालों का भी भला हो रहा था। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को केवल एक सैनिक विद्रोह करार दिया था, जिसे आज तक वामपंथी इतिहासकार ढो रहे हैं।
1857 की क्रांति की सच्चा्ई को दबाने और फिर कभी ऐसी क्रांति उतपन्न न हो, इसके लिए ही अंग्रेजों ने अपने एक अधिकारी ए.ओ.हयूम से 1885 में कांग्रेस की स्थांपना करवाई थी। 1857 की क्रांति को कुचलने की जयंती उस वक्त ब्रिटेन में हर साल मनाई जाती थी और क्रांतिकारी नाना साहब, रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे आदि को हत्यारा व उपद्रवी बताया जाता था। 1857 की 50 वीं वर्षगांठ 1907 ईस्वी में भी ब्रिटेन में विजय दिवस के रूप मे मनाया जा रहा था, जहां वीर सावरकर 1906 में वकालत की पढ़ाई करने के लिए पहुंचे थे।
सावरकर को रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहब, तात्या टोपे का अपमान करता नाटक इतना चुभ गया कि उन्होंने उस क्रांति की सच्चाई तक पहुंचने के लिए भारत संबंधी ब्रिटिश दस्तावेजों के भंडार 'इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी' और 'ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी' में प्रवेश पा लिया और लगातार डेढ़ वर्ष तक ब्रिटिश दस्तावेज व लेखन की खाक छानते रहे। उन दस्तावेजों के खंगालने के बाद उन्हें पता चला कि 1857 का विद्रोह एक सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। इसे उन्होंने मराठी भाषा में लिखना शुरू किया।
10 मई 1908 को जब फिर से ब्रिटिश 1857 की क्रांति की वर्षगांठ पर लंदन में विजय दिवस मना रहे थे तो वीर सावरकर ने वहां चार पन्ने का एक पंपलेट बंटवाया, जिसका शीर्षक था 'ओ मार्टर्स' अर्थात 'ऐ शहीदों'। आपने पंपलेट द्वारा सावरकर ने 1857 को मामूली सैनिक क्रांति बताने वाले अंग्रेजों के उस झूठ से पर्दा हटा दिया, जिसे लगातार 50 वर्षों से जारी रखा गया था। अंग्रेजों की कोशिश थी कि भारतीयों को कभी 1857 की पूरी सच्चाई का पता नहीं चले, अन्यथा उनमें खुद के लिए गर्व और अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव जग जाएगा।
1910 में सावरकर को लंदन में ही गिरफ्तार कर लिया गया। सावरकर ने समुद्री सफर से बीच ही भागने की कोशिश की, लेकिन फ्रांस की सीमा में पकड़े गए। इसके कारण उन पर हेग स्थित अंतरराष्ट्रींय अदालत में मुकदमा चला। ब्रिटिश सरकार ने उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया और कई झूठे आरोप उन पर लाद दिए गए, लेकिन सजा देते वक्त न्यायाधीश ने उनके पंपलेट 'ए शहीदों' का जिक्र भी किया था, जिससे यह साबित होता है कि अंग्रेजों ने उन्हें असली सजा उनकी लेखनी के कारण ही दिया था। देशद्रोह के अन्ये आरोप केवल मुकदमे को मजबूत करने के लिए वीर सावरकर पर लादे गए थे।
वीर सावरकर की पुस्तक '1857 का स्वायतंत्र समर' छपने से पहले की 1909 में प्रतिबंधित कर दी गई। पूरी दुनिया के इतिहास में यह पहली बार था कि कोई पुस्तक छपने से पहले की बैन कर दी गई हो। पूरी ब्रिटिश खुफिया एजेंसी इसे भारत में पहुंचने से रोकने में जुट गई, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी। इसका पहला संस्करण हॉलैंड में छपा और वहां से पेरिस होता हुए भारत पहुंचा। इस पुस्तक से प्रतिबंध 1947 में हटा, लेकिन 1909 में प्रतिबंधित होने से लेकर 1947 में भारत की आजादी मिलने तक अधिकांश भाषाओं में इस पुस्तक के इतने गुप्त संस्करण निकले कि अंग्रेज थर्रा उठे।
भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, पूरा यूरोप अचानक से इन पुस्तकों के गुप्त, संस्कंरण से जैसे पट गया। एक फ्रांसीसी पत्रकार ई. पिरियोन ने लिखा, "यह एक महाकाव्यक है, दैवी मंत्रोच्चांर है, देशभक्ति का दिशाबोध है। यह पुस्तक हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है, क्योंकि महमूद गजनवी के बाद 1857 में ही हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर समान शत्रु के विरुद्ध युद्ध लड़ा।
यह सही अर्थों में राष्ट्रीय क्रांति थी। इसने सिद्ध कर दिया कि यूरोप के महान राष्ट्रोंद के समान भारत भी राष्ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है।"
आपको आश्चर्य होगा कि इस पुस्तक पर लेखक का नाम नहीं था...।
#साभार
27/02/2024
टेक दिग्गज मेटा 2024 में दुनिया भर में चुनावों के लिए कमर कस रही है, उसने "चुनावों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने" की योजना बनाई है क्योंकि वैश्विक लोकतंत्र इस साल मतदान करने के लिए तैयार हैं। भारत, जिसे अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, इन देशों में से एक है, और मेटा वसंत में चुनाव से पहले डीपफेक और गलत सूचना की महामारी से लड़ने के लिए काम कर रहा है।
Tech giant Meta is gearing up for worldwide elections in 2024, having laid out plans to "protect elections online" as global democracies are set to vote this year. India, often referred to as the world's biggest democracy, is amongst these countries, and Meta is working to fight an epidemic of deepfakes and misinformation ahead of the election in spring.
Meta Is Fighting Deepfakes And Misinformation In India Ahead Of 2024 Elections As the world's largest democracy gears up for an election, the threat of deepfakes has never been more clear.
साल के पहले महीने का 19वां दिन भारत के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ी जगह रखता है।
1966 में वह 19 जनवरी का ही दिन था, जब इंदिरा गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद इंदिरा गांधी ने वह कुर्सी संभाली जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार उनके पिता जवाहर लाल नेहरू ने संभाली थी। वह 1967 से 1977 और फिर 1980 से 1984 में उनकी मृत्यु तक इस पद पर रहीं
1597 : मेवाड़ के राणा प्रताप सिंह का निधन।
1883 : नार्थ सी में जर्मन स्टीमर सिंब्रिया और ब्रिटिश स्टीमर सुलतान के बीच टक्कर से 340 लोगों की मौत।
1905 : हिन्दू दार्शनिक देबेन्द्रनाथ टैगोर ने अंतिम सांस ली।
1942 : जापान की सेना ने बर्मा की राजधानी रंगून से 235 मील दक्षिण पूर्व में स्थित तटीय बंदरगाह तिवोय पर कब्जा किया।
1966 : तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद इंदिरा गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया गया।
1968 : कोलंबिया और सोवियत संघ के बीच 20 वर्ष के अंतराल के बाद राजनयिक संबध बहाल।
1979 : दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति पार्क चुंग ही ने उत्तर कोरिया के साथ एकीकरण और युद्ध टालने जैसे विषयों पर बातचीत की पेशकश की।
1987 : नारायण दत्त ओझा ने रात के दस बजे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली और दो घंटे बाद ही रिटायर हो गए
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14/01/2024
मकर संक्रांति के दिन सुबह उठे और अपने इष्ट देवी-देवता और सूर्य देव के ध्यान से दिन की शुरुआत करें। अब स्नान कर और साफ वस्त्र धारण करने के बाद तांबे के पात्र में जल लें, इसमें लाल फूल, गंगाजल और कुमकुम डालकर विधिपूर्वक सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद आसन पर बैठकर सूर्य गायत्री मंत्र का जाप करें।
'ॐ आदित्याय विदमहे प्रभाकराय धीमहितन्न: सूर्य प्रचोदयात् ।।'
मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान करने का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 7 मिनट से सुबह 8 बजकर 12 मिनट तक है। इसके अलावा पुण्यकाल में मकर संक्रांति की पूजा-अर्चना करना बेहद फलदायी होता है। इस दिन पुण्यकाल का समय सुबह 7 बजकर 15 मिनट से शाम 6 बजकर 21 मिनट तक है। महा पुण्यकाल दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक है।
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