21/09/2026
Case Citation: Smt. Chandrakanta v. State of U.P., Order dated 15 September 2026, Allahabad High Court, per Hon’ble Mr. Justice Arun Kumar Singh Deshwal.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में गवाहों के बयान की अब ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य करने के निर्देश दिए हैं।कोर्ट ने यूपी के DGP को सभी जांच अधिकारियों को अब इस दिशा-निर्देश की जानकारी देने व इसका पालन सुनिश्चित कराने को कहा है। इसके तहत गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड पुलिस के पास सुरक्षित रखना होगा। अदालत के इस निर्देश का उद्देश्य जांच प्रक्रिया में रिकॉर्ड और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
पूरे मामले को समझने के लिए मूल विवाद, कोर्ट में हुई कार्यवाही और हाईकोर्ट के निर्देश तीनों को साथ देखना जरूरी है। 15 सितंबर 2026 के आदेश में न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने यह मामला उठाया।�
•मामला शुरू कैसे हुआ?
यह मामला मूल रूप से आगरा के दहेज से जुड़े एक आपराधिक केस में जमानत याचिका का था। याचिका पर सुनवाई के दौरान संबंधित Investigating Officer (IO) कोर्ट में मौजूद था।
कोर्ट ने जांच के दौरान दर्ज किए गए बयान के बारे में सवाल किया। IO ने स्वीकार किया कि उसने BNSS की धारा 180 के तहत प्रथम सूचनाकर्ता का बयान दर्ज करते समय उसका ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड नहीं किया था।
कोर्ट ने जब उससे पूछा कि ऐसा क्यों किया गया, तो DGP के पहले जारी दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया गया। इसके बाद IO ने कोर्ट के सामने बिना शर्त माफी मांगी।
•असली सवाल यहीं से उठा
कोर्ट ने पाया कि BNSS की धारा 180(3) और उत्तर प्रदेश BNSS Rules, 2024 के Rule 20(1) में गवाहों के बयान को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड करने का प्रावधान है।
लेकिन सामान्य मामलों में यह रिकॉर्डिंग विवेचक के लिए विकल्प के रूप में थी। वहीं DGP के 2025 के सर्कुलर में रेप पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य किया गया था। दूसरे मामलों में यह व्यवस्था वैकल्पिक थी।�
“हाईकोर्ट ने कहा कि उसे ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं जहां विवेचकों ने इस विकल्प का इस्तेमाल करके ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की।“
कोर्ट की चिंता यह थी कि यदि बयान की रिकॉर्डिंग नहीं होगी तो बाद में यह आरोप लग सकता है कि गवाह ने जो कहा ही नहीं, वह विवेचक ने खुद लिख दिया, या FIR की बातों को ही गवाह के बयान के रूप में दर्ज कर दिया।
•कोर्ट ने DGP को क्या कहा?
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के DGP को निर्देश दिया कि धारा 180 BNSS के तहत दर्ज गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाने पर विचार किया जाए।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है: आदेश की सटीक भाषा “consider making it mandatory” है। इसलिए इसे यह कहना कि “हाईकोर्ट ने उसी दिन से पूरे यूपी में हर गवाह की रिकॉर्डिंग अनिवार्य कर दी” कानूनी रूप से पूरी तरह सटीक नहीं होगा। कोर्ट ने DGP को इसे अनिवार्य बनाने पर विचार करने को कहा है। �
साथ ही DGP को कोर्ट के दिशा-निर्देश सभी Investigating Officers तक पहुंचाने को कहा गया है। कोर्ट ने जांच अधिकारियों को क्या-क्या करने को कहा?
हाईकोर्ट ने केवल रिकॉर्डिंग के मुद्दे पर टिप्पणी नहीं की, बल्कि जांच की गुणवत्ता को लेकर कई निर्देश दिए।
1. घटनास्थल पर जल्द पहुंचना
संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर विवेचक को जल्द घटनास्थल पर पहुंचकर प्रथम सूचनाकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करने चाहिए।
2. E-Sakshya का इस्तेमाल
जहां संभव हो, बयान और जांच की महत्वपूर्ण प्रक्रिया की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग e-Sakshya App के माध्यम से करने पर जोर दिया गया। जरूरत पड़ने पर यह रिकॉर्ड कोर्ट के सामने उपलब्ध कराया जा सके।
3. स्वतंत्र गवाहों के बयान
केवल शिकायतकर्ता या उसके करीबी लोगों के बयान पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध स्वतंत्र गवाहों के बयान भी दर्ज करने पर जोर दिया गया।
4. रेप/यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की सुविधा
ऐसे मामलों में पीड़िता का बयान उसकी सुविधा के अनुसार, महिला पुलिस अधिकारी द्वारा उसके घर अथवा उपयुक्त स्थान पर दर्ज करने पर जोर दिया गया। मेडिकल परीक्षण भी समय से कराने को कहा गया।
5. गंभीर अपराधों में मजिस्ट्रेट के सामने बयान
जिन अपराधों में 10 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, उनमें BNSS की धारा 183(6) के अनुसार संबंधित गवाह/पीड़िता का बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष कराने की प्रक्रिया पर जोर दिया गया।
6. अश्लील वीडियो से जुड़े मामलों में डिजिटल जांच
यदि किसी मामले में अश्लील वीडियो से संबंधित आरोप हो तो मोबाइल/डिजिटल डिवाइस को जब्त कर FSL जांच कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर Cyber Cell की सहायता लेने को कहा गया।
7. CDR और तकनीकी साक्ष्य
यदि घटना में किसी व्यक्ति की लोकेशन या बातचीत महत्वपूर्ण हो तो Call Detail Records (CDR) जैसे तकनीकी साक्ष्य जुटाने पर जोर दिया गया।
8. पहचान की प्रक्रिया
आरोपी अथवा बरामद वस्तुओं की पहचान आवश्यक होने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार Test Identification Parade (TIP) और पहचान संबंधी कार्रवाई करने को कहा गया।
Note points, : कोर्ट की सबसे बड़ी चिंता क्या थी?
हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की भूमिका को सिर्फ “बयान लिखने वाले कर्मचारी” तक सीमित नहीं माना।
कोर्ट ने पुलिस नियमों में बताए गए विवेचक के दायित्वों का हवाला देते हुए कहा कि जांच अधिकारी का काम केवल अभियोजन के लिए सामग्री जुटाना नहीं, बल्कि सच्चाई का पता लगाना है। उसे किसी व्यक्ति को आरोपी मानकर पहले से निष्कर्ष नहीं बना लेना चाहिए और उपलब्ध साक्ष्यों को निष्पक्ष रूप से देखना चाहिए।
कोर्ट की चिंता यह भी थी कि गलत या लापरवाहीपूर्ण जांच से दो तरह का नुकसान हो सकता है—वास्तविक अपराधी बच सकता है और निर्दोष व्यक्ति को आपराधिक मामले में परेशानी झेलनी पड़ सकती है। �
जमानत वाले मामले में क्या हुआ?
जिस मामले से यह पूरा मुद्दा सामने आया, उसमें आरोपी महिला पर दहेज से संबंधित मौत के मामले में आरोप थे। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार वह मृतका की सास/संबंधित महिला रिश्तेदार थीं और उन्होंने जमानत की मांग की थी।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा रिकॉर्ड में मौजूद बयानों में अंतर है। राज्य और शिकायतकर्ता पक्ष ने जमानत का विरोध किया।
कोर्ट ने मामले के तथ्यों, आरोपी महिला की स्थिति, जेल में बिताए समय और जमानत से संबंधित लागू कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए जमानत मंजूर कर दी, हालांकि कोर्ट ने मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई फैसला नहीं दिया। आरोपों का अंतिम परीक्षण ट्रायल में होना है।
•इसका व्यावहारिक मतलब क्या है?
अगर DGP इस दिशा में नियम/निर्देश जारी करके रिकॉर्डिंग को अनिवार्य करते हैं, तो जांच अधिकारी द्वारा गवाह से वास्तव में क्या कहा गया था, उसका एक डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। इससे आगे चलकर अदालत में यह जांचना आसान हो सकता है कि लिखित बयान और वास्तविक मौखिक बयान में कोई महत्वपूर्ण अंतर है या नहीं। साथ ही जांच की प्रक्रिया का एक अतिरिक्त रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। लेकिन फिलहाल सबसे सटीक स्थिति यही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP को इसे अनिवार्य बनाने पर विचार करने और अपने दिशा-निर्देश सभी विवेचकों तक पहुंचाने को कहा है।
मामला: Smt. Chandrakanta v. State of U.P.
आदेश: 15 सितंबर 2026
पीठ: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल
मुख्य मुद्दा: BNSS धारा 180 के तहत गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता। �