जय श्री राधे
धार्मिक शुरुवात देखकर मन में यह भाव बिलकुल मत लाइयेगा कि मैं किसी पौराणिक चरित्र का वर्णन करना चाहती हूं। यद्यपि धर्म में मेरी अगाध आस्था है, मैं यह भी मानती हूं कि प्राणी का धार्मिक आचरण उसके जीवन के कलुशों को मिटाकर उसे प्रेम, दया, क्षमा, श्रद्वा, करुणा आदि गुणों से परिपूर्ण कर उसे आदर्श बना देता है और प्राणी ईश्वर भक्ति में लीन खुद को उसके चरणों में समर्पित कर भव बन्धनों से विमुक्ति पा आवागमन से मुक्ति पा जाता है ऐसा हमारे धार्मिक ग्रंथों के कई आख्यानों में वर्णित है।
परन्तु यदि मैं अपनी योनि के वर्तमान जीवन खण्ड पर दृष्टिपात करती हूं तो मैं पाती हूं कि जिस जाति को अदृश्य आत्माओं/शक्तियों का भी अनुभव हो जाता है उसकी आत्मा स्वयं शापित होकर मातृ स्नेहवश अतृप्त मोक्ष की अभिलाषा में भटक रही है।
लख चैंरासी योनियों के पदानुक्रम में निम्न क्रम में अवस्थित मैं अपने सम्पूर्ण जीवन प्रेम की कामना हृदय में समेटे इस योनि को प्राप्त हो गयी।
यह सोचकर मैं आज भी रोमांचित हो जाती हूं कि मैं वात्सल्य से परिपूर्ण नन्हें नन्हे चार सुदर्शन शावकों की जननी हूं। जब मेरे बन्द चक्षु शिशुओं के छोटे छोटे मुंह प्यार से मेरे उदर को स्पर्श करते तो अनायास ही मेरे कोमल स्तनों से दूध स्रवित होने लगता और अबोध शिशु उभ चुभ कर उस पीने लगते और मैं आत्म विभोर प्यार से सराबोर अपनी जबान से उन्हें चाट कर अपना प्यार प्रदर्शित करती अपने मातृत्व को सम्पूर्ण मानती। क्षुधा तृप्त होकर नन्हें शिशु एक दूसरे के आगोश में लिपट कर निद्रालीन हो जाते और मैं असीम मातृृत्व से लवरेज सुरक्षा की दृष्टि से चैबीसों याम उनके पास बैठी रहती। परन्तु मैं भूखी प्यासी इंसानों से अपने रिश्तों की तलाश में कुछ अपनी भूख के वशीभूत और कुछ विकसित होते अपने शिशुओं की आवश्यकता पूर्ति हेतु खाने की तलाश में आशा और याचना पूर्ण निगाहों से दर दर भटकती रहती कि कहीं से कुछ मिल जाये और जिसे खाकर मेरी छातियों में दूध उतर आये और मेरे बच्चों की भूख मिट सके। परन्तु मुझे मिलती है उनकी दुत्कार और पत्थर तब भी मैं उनपर भरोसा करके रात भर जाग कर भूक भूक कर उनकी चौकीदारी करती हूं।
यद्यपि मानवों के सभी धार्मिक ग्रन्थों में हमारी योनियों के महिमा मंडन के आख्यान भरे पड़े हैं, हमें काल भैरव का वाहन बनाया गया है हमारी प्रस्तर की मूर्ति को तो भांति भांति के भोग भी लगाये जातें हैं, हमारी स्वामिभक्ति के किस्से हर जबान पर हैं, हमें पांडव कुलकीर्ति धर्मराज युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग विमान का सहयोगी भी बनाया गया है परन्तु यदि चन्द स्वजातीयों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश को तो मनुष्यों की उपेक्षा, दुत्कार, पाद प्रहार और उत्पीड़न के सिवा कुछ नहीं मिलता है। इसी उपेक्षा, दुत्कार, पाद प्रहार और उत्पीड़न की वास्तविकता भरे समाज में मैं मजबूरी वश भोजन की आशा में निरन्तर एक घर से दूसरे घर भागती फिरती अपने और इंसानों के बीच के रिश्ते को तलासती फिरती और प्रयास में सफल होकर जब अपने बच्चों की भूख मिटा पाती तब मुझे अनन्य सुख की अनुभूति होती।
बच्चों की आंखें अब खुल गयीं हैं और वह अब सड़क पर अपने अनुजों अग्रजों के साथ खेलने लगे हैं यद्यपि मैं इसके आसन्न खतरों से अवगत हूं परन्तु क्या करूं। जो नियति में होगा वही भुगतना पड़ेगा।
एक दिन जब मैं अपने बच्चों के लिए जो इस उम्मीद में मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे कि मां हमारे लिए खाना लेकर आयेगी और हमें खिलायेगी । मैं उनका विश्वास टूटने नहीं देना चाहती । मैं बच्चों के लिए खाना लेकर वापस आ रही थी और उन तक पंहुचने ही वाली थी कि बचने की लाख कोशिशों के वावजूद एक तेज रफतार कार से टकरा गयी। मैं दूर जाकर गिर जाती हूं। गगन भेदी आर्तनाद के बाद कुछ देर तड़पती रही मेरी सांसे रुक रुक कर चल रही थी मुझे अपना अंत सामने दिख रहा था। मैं धूप में पड़ी तड़पती रही और इंसान बगल से गुजरते रहे । किसी को भी मुझ पर दया न आयी, अपने ही खून में लथपथ मेरा निर्जीव शरीर सड़क पर पड़ा था। मैं सिर्फ आंसू बहा सकती हूं अपने मन की बात किसी से नहीं कह नहीं सकती । कोई मेरे बच्चों को यह बताने वाला भी ना था कि उनकी मां अब इस संसार में नहीं है। मेरे सहमें हुए बच्चे मुझ से कुछ दूर खड़े अपलक मुझे निहार रहे थे। मेरे शरीर में किसी प्रकार की हलचल नहीं देख आसन्न विप्पत्तियों से अनभिज्ञ यह सोंचकर कि शायद मां दूध पिलाने के लिए लेटी है सभी मेरी बेजान छातियों से मुंह लगाकर दूघ पीने लगे। शरीर से दूर खड़ी मेरी आत्मा आंसू बहाती अपने शिशुओं को निहार रही थी और उनके अनिश्चित भविष्य के बारे में सोच रही थी। इंसानियत मर जाती है । मेरी मृत्यु के बाद कुछ दिनों के अन्दर ही मेरे दो शिशुओं की भी आक्समिक दुर्घटनाओं में मृत्यु हो गयी और मैं अशरीरी चाहकर भी कुछ न कर सकी।
अपना एवं अबोध शिशुओं की असामायिक मृत्यु से मैं टूट चुकी हूं। पर शायद यह मेरी नियति की इन्तिहा नहीं है मुझे अभी और कठिन दिन देखने थे। जिस घर में मेरा अस्थाई आशियाना था, उसके मालिक ने मेरे दोनों बच्चों को घर से निकाल कर एक अंजान चैराहे पर लावारिस अवस्था में छोड़ दिया। मुझे लग रहा है कि शायद मेरे बच्चे अब नहीं बचेंगे। में सिर्फ आंसू बहा सकती हुूं। अपने मन की बात किसी से नहीं कह सकती । मेरे बच्चे भूख से तड़प् रहें हैं । मैने क्या चाहा था जमाने से, एक निवाला और थोड़ा सा प्यार ही तो चाहा था। हम भी तो उसी भगवान के बनाये खिलौने हैं जिसने तमाम दूसरे प्राणियों के साथ हमें भी बनाया है क्या हमें भगवान की बनाई इस दुनिया में अपनी मर्जी से जीने का हक नहीं है, प्यार पाने का हक नहीं है। कैसी है यह दुनिया हृदय हीन। भीख ही तो मांगते हैं हम आपसे प्यार के बदले में।
तभी एक लड़की फरिश्ता बन कर आयी मानवता का सिर एक बार फिर ऊंचा हो गया है। उसने मेरे मृतप्राय बच्चों को प्यार से उठाकर आश्रय दिया नहला धुलाकर पेट भर कर खाना खिलाया उनके सोने के लिए आराम दायक उपक्रम भी किये। उसने उनका नाम करण भी किया है। जोई और पोलका कितने सुन्दर नाम हैं ना मेरे बच्चों के । मेरी आत्मा उसे दुआयें दे रही है। मेरे बच्चे अब भूखे नहीं मरेंगे एैसा मुझे विश्वास हो रहा है।
कालान्तर में पोलका जो स्वभाव से नटखट थी किसी स्वाजातीय के प्यार के वशीभूत कहीं चली गयी और आजतक उसका अता-पता नहीं है परन्तु जोई अपने भरे पूरे परिवार के साथ अपने पहले की जगह पर रहकर अपने पालकों की सेवा कर रही है। भगवान उसको सुखी रखे। अब मैं चैन से इस योनि से छुटकारा पा सकती हूं। मैं अब जा रही हूं।
ईश्वर से शिकायत है हमें कि हमारी वाणी को वह शब्द क्यों नहीं दिये जिससे हम अपनी बात इंसानों से कह सकती कि क्यों रोज उनकी रफतार हमारे प्राणों पर भारी पड़ती है और हम बिना किसी गिला शिकवे के अपनी जान गंवाते रहते हैं। उन्हें थोड़ा ज्ञान दो ना । हमें भी अपनी मर्जी से जीने का हक दो ना।
@ #गजेंद्र सिंह
We for each other
Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from We for each other, Library, National Highway , 24, Bareilly.
निर्माण नीड़ का निरख रहा चिड़िया की निष्ठा को प्रणाम,
अनवरत कठिन श्रम निष्पादन पल भर को ना लेती विराम।
तन्हा बैठा मैं देख रहा अपने घर की दालानों में,
छोटी चिड़िया का बनता घर निज घर के रोशनदानों में।
उड़ती पल पल तिनके लाती नन्हीं सी चोंचो में भर भर,
थी मनोयोग से बना रही अपने सपनों का सुन्दर घर।
तिनकों की ईंटो को चुन कर तिनके का गारा बना दिया,
छोटे तिनको को जुटा जुटा एक सुन्दर घर है बना लिया।
अपने प्रयास का रूप निरख कर वह फूली नहीं समाती है,
प्यारा सा अति सुन्दर वितान वह मन ही मन हर्षाती है।
फिर चली हवा ऋतु बदल गई मौसम ने भी ली अंगड़ायी,
आबाद हुआ चिड़िया का घर किलकारी उसके घर छायी।
नन्हे दाने ला चोंचों में दिनभर वह उन्हें खिलाती है,
कैसे खाना कैसे उड़ना वह रोज उन्हें सिखलाती है।
दोनो चिड़कोले बड़े हुए मां के अहसान को भूल गये,
ऊंची उड़ान नभ में भरने को दोनों बच्चे मचल गये।
कोशिश को उनकी देख देख जज्बात हमारे जुड़ ही गये,
अपनी मां को करके तनहा वह नीड़ छोड़ कर उड़ ही गये।
मैंने फिर पूछा चिड़िया से तेरे बच्चे क्यों छोड़ गये,
ममता को तेरी ठुकराकर क्यों तुझसे मुंह को मोड़़ गयेे।
मैने बच्चों को जन्म दिया रहते वो मेरे साथ नहीं,
क्यों रहे वो फिर मेरे समीप मेरी कोई जायदाद नहीं।
इंसान बंधा हैं लालच से जर से बस इनका नाता है,
ना मिले अगर इनको हिस्सा वो कोर्ट कचहरी जाता है।
दे जन्म उन्हे लायी जग में पर रखी कोई आश नहीं,
रिश्तों की दुहाई को देकर परवाज पे रखा पाश नहीं।
नन्हीं चिड़िया ने दुनिया को जीवन के सच को समझाया,
मानव जीवन में दुःख हैं क्यों थोड़े में हम को बतलाया।
गजेन्द्र सिंह
27/08/2017
मर्सी _फार _आल सोसायटी द्वारा उपचार के अधीन गाय माताओं को मदद की दरकार है।
Click here to claim your Sponsored Listing.
Location
Category
Telephone
Website
Address
National Highway , 24
Bareilly
243122
