जय सनातन

जय सनातन

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'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त।
हिन्दू संस्कृति !

28/09/2022

चरण स्पर्श करने का वैज्ञानिक रहस्य जान जाओगे तो प्रतिदिन अपने बच्चों को यह सिखा दोंगे!!!!!!

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं॥

हैलो हाय कहने से आधुनिक और स्मार्ट होने का कितना ही गर्व महसूस होता हो आपको लेकिन प्रणाम में जैसी आश्वस्तता प्रतीत होती है वह अद्भुत अलौकिक है और लगता है कि भीतर ऊर्जा का उफान उठ रहा है जो भाव, बोध और मस्तिष्क में रहने वाले बुद्धि का अतिक्रमण करते हुए ऊपर ही ऊपर फैलता जा रहा है झुककर या हाथ मिलाकर अथवा गले लगकर किसी का अभिवादन करने से आपसी संबंध तो प्रगाढ़ हो सकते हैं तथा व्यक्ति के सभ्य सुसंस्कृत होने की छवि भी बनती है लेकिन झुककर अभिवादन करने का अलग ही महत्व है-

प्रणाम के लिए जब हम गुरुजनों के चरणों में झुकते हैं तो उनकी प्राण ऊर्जा से जुड़ जाते हैं और वह ऊर्जा प्रणाम करने वाले की चेतना को भी ऊपर उठाती है अगर निम्न स्तर के लोगों को प्रणाम किया जाए तो उससे हानि की संभावना ही ज्यादा रहती है क्योंकि उस स्थिति में प्राण प्रवाह उलटी दिशा में बहने लगता है- नमस्ते करने के लिए, दोनो हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है, आँखें बंद की जाती हैं, और सिर को झुकाया जाता है-

इस विधि का विस्तार करते हुए हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जा सकता है- जरूरी नहीं कि नमस्ते, नमस्कार या प्रणाम करते हुए ये शब्द बोले भी जाएं- नमस्कार या प्रणाम की भावमुद्रा का अर्थ ही उस भाव की अभिव्यक्ति है।

आपने देखा होगा जो वास्तव में उच्चकोटि का तपस्वी या साधक है अपने चरणों का स्पर्श क्यों नहीं करने देता है क्युकि उसकी संचरित प्राण-उर्जा कही आप में न समां जाए क्युकि साधक ने ये उर्जा अपने तप और साधना से अपने अंदर समाहित की है यदि वास्तविक श्रेष्ठ साधक या तपस्वी चाहे तो अपने शिष्य को सिर्फ एक ही पल में शक्तिपाद द्वारा अपने जैसा योग्य बना सकता है और अपने द्वारा प्राप्त की गई सभी सिद्धयो एक पल में दे सकता है –

अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा सदियों से रही है सनातन धर्म में अपने से बड़े के आदर के लिएचरण स्पर्श उत्तम माना गया है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर चरण स्पर्श के कई फायदे हैं

चरण छूने का मतलब है पूरी श्रद्धा के साथ किसी के आगे नतमस्तक होना-इससे विनम्रताआती है और मन को शांति मिलती है साथ ही चरण छूने वाला दूसरों को भी अपने आचरण से प्रभावित करने में कामयाब होता है-हर रोज बड़ों के अभि‍वादन से आयु, विद्या, यश और बल में बढ़ोतरी होती है-

माना जाता है कि पैर के अंगूठे से भी शक्ति का संचार होता है मनुष्य के पांव के अंगूठे में भी ऊर्जा प्रसारित करने की शक्ति होती है-

मान्यता है कि बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श नियमित तौर पर करने से कई प्रतिकूल ग्रहभी अनुकूल हो जाते हैं-

प्रणाम करने का एक फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है. इन्हीं कारणों से बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया है-

जब हम किसी आदरणीय व्यक्ति के चरण छूते हैं, तो आशीर्वाद के तौर पर उनका हाथ हमारे सिर के उपरी भाग को और हमारा हाथ उनके चरण को स्पर्श करता है ऐसी मान्यता है कि इससे उस पूजनीय व्यक्ति की पॉजिटिव एनर्जी आशीर्वाद के रूप में हमारे शरीर में प्रवेश करती है इससे हमारा आध्यात्मिक तथा मानसिक विकास होता है।

वैज्ञानिक पक्ष : न्यूटन के नियम के अनुसार, दुनिया में सभी चीजें गुरुत्वाकर्षण के नियम से बंधी हैं साथ ही गुरुत्व भार सदैव आकर्षित करने वाले की तरफ जाता है हमारे शरीर पर भी यही नियम लागू होता है सिर को उत्तरी ध्रुव और पैरों को दक्षिणी ध्रुव माना गया है।

इसका मतलब यह हुआ कि गुरुत्व ऊर्जा या चुंबकीय ऊर्जा हमेशा उत्तरी ध्रुव से प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होकर अपना चक्र पूरा करती है- यानी शरीर में उत्तरी ध्रुव (सिर) से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव (पैरों) की ओर प्रवाहित होती है दक्षिणी ध्रुव पर यह ऊर्जा असीमित मात्रा में स्थिर हो जाती है- पैरों की ओर ऊर्जा का केंद्र बन जाता है-पैरों से हाथों द्वारा इस ऊर्जा के ग्रहण करने को ही हम ‘चरण स्पर्श’ कहते हैं

मानव शरीर पंच तत्वों से निर्मित है जो सजातीय तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है- मित्रता, स्नेह , ममता व प्रेम इसी आकर्षण की उपज है- यह आकर्षण या खिंचाव एक चुम्बकीय गुण है- प्रत्येक जीवधारी में एक ही समय में तीन वैज्ञानिक सिध्दांत एक साथ कार्य करते रहते हैं।

चुम्बकीय शक्ति,तात्विक गुण,वुद्युतीय उर्जा।

हम अगर चिन्तन मनन करे तो पाते है की प्रतिदिन हम अनेक लोगों से मिलते है , उनमें से कुछ को हम याद नहीं रखते और कुछ के साथ हमारा मित्रता का भाव प्रकट हो जाता है और उनसे ये लगाव,मित्रता या खिंचाव उस व्यक्ति विशेष में समाहित चुम्बकीय गुण के कारण होता है जो सजातीय गुण वाले व्यक्ति को अपनी और आकर्षित करता है –

आपके शरीर की उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पहुंचती है- श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर उर्जा में मौजूद नकारात्मक तत्व नष्ट हो जाता है- सकारात्मक उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति से आशीर्वाद के माध्यम से वापस मिल जाती है- इससे जिन उद्देश्यों को मन में रखकर आप बड़ों को प्रणाम करते हैं उस लक्ष्य को पाने का बल मिलता है-

पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है- यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है- पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है- पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं- पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम- झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है- दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है-

इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है- प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है- किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है- इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया-

प्रत्येक रोज़ प्रातकाल में और किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले हमें अपने घर के बड़े बुजर्गों के ,माता पिता के चरण स्पर्श अवश्य करने चाहिए ,इससे हमारे कार्य में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है , हमारा मनोबल बढ़ता है और सकारात्मक उर्जा मिलती है नकारात्मक शक्ति घटती है।

27/09/2022

संस्कृत से संस्क़ृति और संस्क़ृति से संस्कार
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"संस्कृत से संस्क़ृति और संस्क़ृति से संस्कार 'क्यो है यह देव भाषा ??

“यदि भारत को नष्ट करना है तो संस्कृत को नष्ट कर दो। भारत खुद ब खुद बेमौत मर जायेगा” ।

भारत की 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल संस्कृत बोलने वाले 14,135 लोग बचे हैं।

यदि यह पढकर आपके आंसू नहीं निकले तो आप भारत के हितैषी नहीं हो सकते। आपका यह लेख पढना बेकार है।

जैसा कि हम जानते हैं कि विश्व की समस्त भाषायों का जन्म कुल पांच मूल भाषाओं से हुआ है। भारत में दो मूल भाषायें संस्कृत और तमिल हैं। भाषा किसी भी संस्कृति का दर्पण होती है। सभ्यता - संस्क़ृति और संस्कार की परिचायक होती है। अत: भारतीय संस्क़ृति और दर्शन संस्कृत के बिना अधूरा है। वैसे विश्व में कुल 6809 भाषायें बोली जाती हैं जिनमें से नब्बे प्रतिशत भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या एक लाख से कम है। लगभग 200 भाषाओं को दस लाख के आसपास लोगों द्वारा बोला जाता है। आज की अन्धाधुन्ध आपाधापी में 357 भाषायें ऐसी हैं जिनको मात्र 50 लोग ही बोलते हैं। 46 ऐसी भाषायें है जिनको 5 से भी कम लोग प्रयोग करते हैं।


ऐसे ही भारत में 179 भाषायें और 544 बोलियां है। भाषा वह होती है जिसका व्याकरण होता है। जिनका व्याकरण नहीं होता है उनको बोली कहा जाता है।
हिन्दी और अंग्रेजी के अतिरिक्त भारतीय संविधान 21 अन्य भाषाओं को मान्यता प्रदान कर संवैधानिक भाषा मानता है अर्थात इन भाषाओं में संसद में प्रश्न किये जा सकते हैं।


संस्कृत भाषा को देवभाषा भाषा कहा जाता है और इसकी लिपि को देवनागरी। भारतीय दर्शन और शास्त्रों के अनुसार संस्कृत का जन्म देवों के मुख से हुआ है जो वास्तव में एक प्रतीक ही है और बताता है कि इसका जन्म वाहिक नही अपितु आंतरिक ज्ञान से हुआ है। जब हमारे मनीषियों ने शरीर के विभिन्न ऊर्जा केंद्रो अथवा चक्रों पर ध्यान लगाया तो उनको जो ध्वनियां सुनाई दी उसे लिपिबद्ध्य किया गया। जिससे संस्कृत भाषा का जन्म हुआ अत: आधुनिक विज्ञान कहता है कि कम्प्यूटर प्रोगामिंग के लिये संस्कृत सम्पूर्ण भाषा है। यानि यह एक शुद्द गणात्मक और गणितिय व्याकरण से परिपूर्ण भाषा है। योग दर्शन के अनुसार मनुष्य के शरीर में मुख्य रूप से सात मुख्य चक्र होते है।

चक्र, एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ 'पहिया' या 'घूमना' है। भारतीय पारंपरिक औषधि विज्ञान के अनुसार, चक्र की अवधारणा का संबंध पहिए-से चक्कर से हैं, माना जाता है इसका अस्तित्व आकाशीय सतह में मनुष्य का दोगुना होता है। कहते हैं कि चक्र शक्ति केंद्र या ऊर्जा की कुंडली है। मनुष्य की कुंडलनी शक्ति जिसे बंक नाल सहित कई नाम दिये गये हैं। साधारण मनुष्य में यह कुंडलनी शक्ति योनी और गुदा के मध्य अपनी पूंछ को मुख में कर डेढ चक्र करके सोई रहती हैं जो योगियों में जागकर सुषुम्ना नाडी जो हमारी रज्जू के मध्य स्थिर होती है, में प्रवेश करती है। साधनरत होने यह मूलाधार से उठ कर विभिन्न चक्रों को भेदकर, विभिन्न प्रकार के अनुभव कराती हुई ऊपर चढती जाती है। यही शिवलिंग के रहस्य और उस पर लिपटी सर्पिणी की भी व्याख्या करती है।
सात सामान्य प्राथमिक चक्र इस प्रकार बताये गए हैं:

1. मूलाधार चक्र : बेस या रूट चक्र (मेरूदंड की अंतिम हड्डी *कोक्सीक्स*) भूमि प्रधान चक्र (जहां कुंडलनी शक्ति सोई रहती है)। य्ह स्थान गुदा और योनि के बीच में एक कंद के रूप में होता है। यहां वं, शं; षं; सं; लं वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है। लं बीच में होता है। अत: ॐ लं लम्बोदराय नम: जाप कर इसको उद्देलित किया जा सकता है। जहां मां काली का वास है जो मां दुर्गा का रूप है और कुंडलनी शक्ति है। देखें दुर्गा सप्तशती की आरती (मूलाधार निवासनी यह पर सिद्दी प्रदे) और सिद्धी कुंजिका स्रोत्र जहां विभिन्न बीज मंत्र दिय हैं। अं कं चं टं तं यं वं शं हं, ठां, ठी ठूं इत्यादि बीज वर्ण।

2. स्वाधिष्ठान चक्र : यह चक्र नाभि के नीचे योनी के कुछ ऊपर होता है। त्रिक चक्र (अंडाशय/पुरःस्थ ग्रंथि), जल तत्व की प्रधानता। बं, भं, मं, थं, रं, लं, वं वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है। हां बम बम महादेव बोला जा सकता है। क्योकि बं बीच में होता है। इस मंत्र को सिद्ध करने से आप जल पर नियंत्रण कर सकते हैं।

3. मणिपूर, सौर स्नायुजाल चक्र (नाभि क्षेत्र)
जहां डं, ढं, णं, तं, दं, धं, नं, पं, यं, फं, रं वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है। यहां अग्नि तत्व रं माध्य में है। अत: ॐ रं रामाय नम: या रं रमाय नम: जाप किया जा सकता है। यहां तक वाहिक अग्नि का बीज मंत्र ॐ रं वहिर्चैतन्याय नम: है । जो करने से आप अग्नि पर काबू कर सकते हैं।

4. अनाहत यानी ह्रदय चक्र (ह्रदय क्षेत्र)। अन आहत यानी बिना चोट की आवाज। वायु तत्व जहां कं, खं, ग, घं, ड़ं, चं, छं, जं, झं, त्रं, टं, ठं, यं वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है। यहां यम है। अतं इसका मंत्र ॐ यं यामाय नम: हो सकता है। इसको सिद्ध करने पर आप निराहार जी सकते हैं।

5. विशुद् / कंठ चक्र (कंठ और गर्दन क्षेत्र)। यहां हं है यानि आकाश तत्व अब यहां तक हमारे शरीर के पांचो तत्व पूरे हो गये। क्योकि इसके आगे की यात्रा शरीर के बाह्र और भीतर दोनो तर्फ है। जहां अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ज्ञ, लृ; ए, ऐ, ओ, अं; अः ह वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है।यहां पर ॐ हं हनुमंतये नम: मंत्र जप किया जा सकता है। यह आपको आकाशिय शक्तियां देता है।

6. आज्ञा, ललाट या ध्यान या तृतीय नेत्र । जहां स्त्रियां बिन्दी लगाती हैं। जहां हं, क्षं, ॐ वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है। यहां ॐ बीच में हैं। अत: ॐ का जाप लाभकारी होता है।

7. सहस्रार, शीर्ष चक्र (सिर का शिखर; एक नवजात शिशु के सिर का 'मुलायम स्थान (तालू)। जहां दल के वर्णों की अनाहत ध्वनि गूंजायमान रहती है।

मानव शरीर की रचना ही इस पूर्ण सृष्टि में अद्भुत मानी गई है क्योंकि इसी योनी में मन द्वारा धारण किया गया सृष्टि कल्याण का संकल्प पूर्ण हो पाता है| मानव शरीर में सात चक्रों का समावेश होता है| इन चक्रों द्वारा मानव शरीर ५६ प्रकार की ध्वनियों का उच्चारण कर पाता है|

संस्कृत भाषा की व्याकरण को पाणिनि व्याकरण द्वारा समझा जा सकता है। माना यह जाता है कि महेश्वर के डमरू से यह 14 सूत्र निकले थे। वैसे पाणिनि का संस्कृत व्याकरण चार भागों में है।
· माहेश्वर सूत्र - स्वर शास्त्र
· अष्टाध्यायी या सूत्रपाठ - शब्द विश्लेषण
· धातुपाठ - धातुमूल (क्रिया के मूल रूप)
· गणपाठ

पतञ्जलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर अपनी टिप्पणी लिखी जिसे महाभाष्य का नाम दिया गया। महा+भाष्य यानि समीक्षा, टिप्पणी, विवेचना, आलोचना।

पाणिनि के सूत्रों की शैली अत्यंत संक्षिप्त है। वे सूत्रयुग में ही हुए थे। श्रौत सूत्र, धर्म सूत्र, गृहस्थसूत्र, प्रातिशाख्य सूत्र भी इसी शैली में है किंतु पाणिनि के सूत्रों में जो निखार है वह अन्यत्र नहीं है। इसीलिये पाणिनि के सूत्रों को प्रतिष्णात सूत्र कहा गया है। पाणिनि ने वर्ण या वर्णमाला को 14 प्रत्याहार सूत्रों में बाँटा और उन्हें विशेष क्रम देकर 42 प्रत्याहार सूत्र बनाए। पाणिनि की सबसे बड़ी विशेषता यही है जिससे वे थोड़े स्थान में अधिक सामग्री भर सके। यदि अष्टाध्यायी के अक्षरों को गिना जाय तो उसके 3995 सूत्र एक सहस्र श्लोक के बराबर होते हैं। पाणिनि ने संक्षिप्त ग्रंथरचना की और भी कई युक्तियाँ निकालीं जैसे अधिकार और अनुवृत्ति अर्थात् सूत्र के एक या कई शब्दों को आगे के सूत्रों में ले जाना जिससे उन्हें दोहराना न पड़े। अर्थ करने की कुछ परिभाषाएँ भी उन्होंने बनाई। एक बड़ी विचित्र युक्ति उन्होंने असिद्ध सूत्रों की निकाली। अर्थात् बाद का सूत्र अपने से पहले के सूत्र के कार्य को ओझल कर दे। पाणिनि का यह असिद्ध नियम उनकी ऐसी तंत्र युक्ति थी जो संसार के अन्य किसी ग्रंथ में नही पाई जाती।

अब आप समझ गये होंगे कि संस्कृत क्यों देव भाषा कही गई हैं। शरीर के चक्रों मे अनाहत ध्वनियों को जब आकृतिक रूप यानि लिपिबद्ध किया गया तो संस्कृत भाषा का जन्म हुआ। यानि यह भाषा सदैव आपके भीतर समाहित रहती है। वह बात अलग है कि इसको कोई बिरला ही जान पाता है। और उनकी संख्या नगण्य है शून्य नहीं। इन चक्रों के विभिन्न रंग भी हैं जो इन्द्र धनुषी है और जिनको आधुनिक विज्ञान प्राकृतिक रंग (VIBGYOR) कहता है। यह रंग इसी क्रम से चक्रों में विद्यमान रहता है।

संस्कृति का सन्धि विच्छेद (सं + अस् + कृत) करने पर हम जान सकते है कि सं यानि साथ संग और सदैव, अस् यानि हमारे और कृति यानि कार्य शैली और कर्म। अर्थात जो कर्म और कार्यशैली आपको परिलक्षित कर समाजिक निर्माण करे वह संस्कृति। यहां पर एक बात स्पष्ट है कि “सर्वे भवंतु सुखिन:” वाक्य सिर्फ और सिर्फ देव संस्कृति याने संस्कृत में हो सकती है और कहीं नहीं। इसी लिये जहां संस्कृत नहीं वहां क्रूरता देखी जा सकती है। आधुनिक युग में क्रूर बगदादी इसका उदाहरण है। लेकिन दुखद यह है कि भारतवर्ष के कुछ राज्यों में राजनीतिक रूप से संस्कृत को यानि भारतीय धरोहर और आत्मा को नष्ट करने का कुचक्र भी चल रहा है जो भारतीयता को नष्ट करने का षडयंत्र प्रतीत होता है।

संस्कार का सन्धि विच्छेद (सं + अस् + कार) करने पर हम जान सकते है कि सं यानि साथ संग और सदैव, अस् यानि हमारे और कार यानि आकार। मतलब आपके साथ रहने वाले कर्मों और कार्य का आकार या आयाम हुआ संस्कार।
कुल मिलाकर यदि आप देखें तो पायें देवभाषा संस्कृत से उच्च मानवीय संस्कृति और उस से ही पडनेवाले उच्च मानवीय संस्कार। अब आप प्रश्न उठा सकते हैं कि फिर भारतीय इतिहास धर्म भेदभाव से क्यों भरा है। तो इसका उत्तर है कि बुद्ध जन्म के समय प्राकृत भाषा और पाली भाषायें जन्मी और संस्कृत का प्रचलन कम हुआ। साथ ही में सदी आरम्भ में सालार बिन जंग जो खैबर दर्रे से प्रविष्ट हुआ और आक्रांता बन अपने साथ कबिलाई संस्कृति और भाषा लाया। फिर आये मुगल और अंगेज जो संस्कृत यानि भारतीय संस्कृति यानि मूल संस्कारों का दमन करने में लग गये। अत: भारतीयता की सुगन्ध मरने लगी और मनमाना व्यवहार, दुराचार तथा अनाचार होने लगा जो काला इतिहास बन गया।

अंत में आप सुदीर्घ पाठकों से निवेदन है कि संस्कृत को नया सिरे से जीवित होने में सहयोग दें आपके अन्दर संस्कृति और संस्कार अपने आप आने लगेंगे। यह मेरा पूर्ण विश्वास है और साथ में दावा भी। हम रचना के माध्यम से यह निरंतर प्रयास करेगी कि भारतीयता की आत्मा यानि संस्कृत, संस्कृति और संस्कार कभी क्षीण न हो। मेरा तो यह मानना है कि संस्कृत के लोप होने से भारतीयता और हिंदू दर्शन दोनों मर जायेगें। शायद इसीलिये इसको नष्ट करने का प्रयास समय समय पर होता रहा है।

Photos from जय सनातन's post 27/09/2022

क्यूं कहते हैं कि " #काशी_जमीन_पर_नहीं_है, वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है!" क्योंकि काशी एक यंत्र है एक असाधारण यंत्र!!

मानव शरीर में जैसे नाभी का स्थान है, वैसे ही पृथ्वी पर वाराणसी का स्थान है.. शिव ने साक्षात धारण कर रखा है इसे! शरीर के प्रत्येक अंग का संबंध नाभी से जुड़ा है और पृथ्वी के समस्त स्थान का संबंध भी वाराणसी से जुड़ा है।
धरती पर यह एकमात्र ऐसा यंत्र है !!

काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है,
इस यंत्र का निर्माण एक ऐसे विशाल और भव्य मानव शरीर को बनाने के लिए किया गया, जिसमें भौतिकता को अपने साथ लेकर चलने की मजबूरी न हो, और जो सारी आध्यात्मिक प्रक्रिया को अपने आप में समा ले।

आपके अपने भीतर ११४ चक्रों में से ११२ आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल १०८ चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं।

इसमें एक खास तरीके से मंथन हो रहा है। यह घड़ा यानी मानव शरीर इसी मंथन से निकल कर आया है, इसलिए मानव शरीर सौरमंडल से जुड़ा हुआ है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चल रहा है।

सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। आपके अपने भीतर 114 चक्रों में से 112 आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल 108 चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं।

अगर आप इन 108 चक्रों को विकसित कर लेंगे, तो बाकी के चार चक्र अपने आप ही विकसित हो जाएंगे। हम उन चक्रों पर काम नहीं करते। शरीर के 108 चक्रों को सक्रिय बनाने के लिए 108 तरह की योग प्रणालियां हैं।

पूरे काशी यानी बनारस शहर की रचना इसी तरह की गई थी। यह पांच तत्वों से बना है, और आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि शिव के योगी और भूतेश्वर होने से, उनका विशेष अंक पांच है। इसलिए इस स्थान की परिधि पांच कोश है। इसी तरह से उन्होंने सकेंद्रित कई सतहें बनाईं।

यह आपको काशी की मूलभूत ज्यामिति बनावट दिखाता है। गंगा के किनारे यह शुरू होता है, और ये सकेंद्रित वृत परिक्रमा की व्याख्या दिखा रहे हैं। सबसे बाहरी परिक्रमा की माप 168 मील है। यह शहर इसी तरह बना है और विश्वनाथ मंदिर इसी का एक छोटा सा रूप है। असली मंदिर की बनावट ऐसी ही है। यह बेहद जटिल है। इसका मूल रूप तो अब रहा ही नहीं।

वाराणसी को मानव शरीर की तरह बनाया गया था। यहां 72 हजार शक्ति स्थलों यानी मंदिरों का निर्माण किया गया।

एक इंसान के शरीर में नाड़िय़ों की संख्या भी इतनी ही होती है। इसलिए उन लोगों ने मंदिर बनाये, और आस-पास काफी सारे कोने बनाये - जिससे कि वे सब जुड़कर 72,000 हो जाएं। यहां 468 मंदिर बने, क्योंकि चंद्र कैलेंडर के अनुसार साल में 13 महीने होते हैं, 13 महीने और 9 ग्रह, 4 दिशाएं - इस तरह से तेरह, नौ और चार के गुणनफल के बराबर 468 मंदिर बनाए गए। तो यह नाडिय़ों की संख्या के बराबर है।

यह पूरी प्रक्रिया एक विशाल मानव शरीर के निर्माण की तरह थी। इस विशाल मानव शरीर का निर्माण ब्रह्मांड से संपर्क करने के लिए किया गया था। इस शहर के निर्माण की पूरी प्रक्रिया ऐसी है, मानो एक विशाल इंसानी शरीर एक वृहत ब्रह्मांडीय शरीर के संपर्क में आ रहा हो।

काशी बनावट की दृष्टि से सूक्ष्म और व्यापक जगत के मिलन का एक शानदार प्रदर्शन है। कुल मिलाकर, एक शहर के रूप में एक यंत्र की रचना की गई है।

रोशनी का एक दुर्ग बनाने के लिए, और ब्रह्मांड की संरचना से संपर्क के लिए, यहां एक सूक्ष्म ब्रह्मांड की रचना की गई।
ब्रह्मांड और इस काशी रूपी सूक्ष्म ब्रह्मांड इन दोनों चीजों को आपस में जोड़ने के लिए 468 मंदिरों की स्थापना की गई।

मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं, और 54 शक्ति या देवी के हैं। अगर मानव शरीर को भी हम देंखें, तो उसमें आधा हिस्सा पिंगला है और आधा हिस्सा इड़ा। दायां भाग पुरुष का है और बायां भाग नारी का। यही वजह है कि शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी दर्शाया जाता है - आधा हिस्सा नारी का और आधा पुरुष का। आपके स्थूल शरीर का 72% हिस्सा पानी है, 12% पृथ्वी है, 6%वायु है और 4%अग्नि। बाकी का 6% आकाश है। सभी योगिक प्रक्रियाओं का जन्म एक खास विज्ञान से हुआ है, जिसे भूत शुद्धि कहते हैं। इसका अर्थ है अपने भीतर मौजूद तत्वों को शुद्ध करना। अगर आप अपने मूल तत्वों पर कुछ अधिकार हासिल कर लें, तो अचानक से आपके साथ अद्भुत चीजें घटित होने लगेंगी।

यहां एक के बाद एक 468 मंदिरों में सप्तऋषि पूजा हुआ करती थी और इससे इतनी जबर्दस्त ऊर्जा पैदा होती थी कि हर कोई इस जगह आने की इच्छा रखता था। यह जगह सिर्फ आध्यात्मिकता का ही नहीं, बल्कि संगीत, कला और शिल्प के अलावा व्यापार और शिक्षा का केंद्र भी बना। इस देश के महानतम ज्ञानी काशी के हैं। शहर ने देश को कई प्रखर बुद्धि और ज्ञान के धनी लोग दिए हैं।अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, 'पश्चिमी और आधुनिक विज्ञान भारतीय गणित के आधार के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता था।’

यह गणित बनारस से ही आया। इस गणित का आधार यहां है।
जिस तरीके से इस शहर रूपी यंत्र का निर्माण किया गया, वह बहुत सटीक था। ज्यामितीय बनावट और गणित की दृष्टि से यह अपने आप में इतना संपूर्ण है, कि हर व्यक्ति इस शहर में आना चाहता था। क्योंकि यह शहर अपने अन्दर अद्भुत ऊर्जा पैदा करता था। इसीलिए, आज भी यह कहा जाता है कि "काशी जमीन पर नहीं है। वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है।

03/04/2021

भारतीय संस्कार की आदर्श प्रतिमूर्ति,कुशल प्रशासक एवं रणनीतिकार जिनकी मानवीयता की मिसाल दी जाती है,भारत के ऐसे महान योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.. इनकी शौर्य गाथा हर युग में युवाओं को देश के मान,सम्मान एवं स्वाभिमान की रक्षा हेतु प्रेरित करती रहेगी..

09/01/2021

राधे राधे जय श्री राधे!🙏

30/11/2020

समस्त देशवासियों को
श्री गुरु नानक देव जी के 551वें प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

गुरु नानक जी के आदर्श और सिद्धांतवादी विचार हमें सदैव धर्म और राष्ट्रहित के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करते रहेंगे। ऐसे महान विभूतियों से और उनके बताए रास्ते पर चलकर ही आज भी मानवता जिंदा है।

28/11/2020

ये बाते कड़वी है
पर पर सच्ची हैं"
हिन्दू" शब्द की खोज ......

'हिन्दू' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन,
संस्कृत शब्द है!
अगर संस्कृत के इस शब्द का विच्छेद करें तो पायेंगे ....

हीन+दू = हीन भावना + से दूर
अर्थात जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, मुक्त रहे, वो हिन्दू है !

हमें बार-बार, हमेशा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दू शब्द मुगलों ने हमें दिया, जो "सिंधु" से "हिन्दू" हुआ l

हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !
जानिए, कहाँ से आया हिन्दू शब्द, और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?

भारत में बहुत से लोग हिन्दू हैं, एवं वे हिन्दू धर्म का पालन करते हैं l

अधिकतर लोग "सनातन धर्म" को हिन्दू धर्म मानते हैं।

कुछ लोग यह कहते हैं कि हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है!

हमारे "वेदों" और "पुराणों" में हिन्दू शब्द का उल्लेख मिलता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है!
"ऋग्वेद" के "बृहस्पति अग्यम" में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-

“हिमलयं समारभ्य
यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं
हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।
अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं!
केवल "वेद" ही नहीं, बल्कि "शैव" ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं:-
"हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।”
अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं!
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक "कल्पद्रुम" में भी दोहराया गया है :
"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”
अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।
"पारिजात हरण" में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-
”हिनस्ति तपसा पापां
दैहिकां दुष्टं ।
हेतिभिः श्त्रुवर्गं च
स हिन्दुर्भिधियते।”
अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का, और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है !
"माधव दिग्विजय" में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-
“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य
पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।
गौभक्तो भारत:
गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।"
अर्थात : वो जो "ओंकार" को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, गौपालक रहे, तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है!
केवल इतना ही नहीं, हमारे
"ऋग्वेद" (८:२:४१) में
हिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने ४६,००० गौमाता दान में दी थी! और "ऋग्वेद मंडल" में भी उनका वर्णन मिलता है l
"ऋग्वेद'' में एक ऋषि का उल्लेख मिलता है, जिनका नाम "सैन्धव" था, जो मध्यकाल में आगे चलकर “हैन्दव/हिन्दव” नाम से प्रचलित हुए!
जिसका बाद में अपभ्रंश होकर हिन्दू बन गया।

औरो को भी बतायें।

19/11/2020

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।। ऊँ सूर्याय नमः ।।
लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के उपलक्ष्य में मैं सपरिवार अस्ताचलगामी व उदीयमान परमतेज भगवान भास्कर से याचना करता हूँ कि इस मंगलमय, सुहावन व अतिउर्जायुक्त त्योहार पर आप और आपके परिवार के साथ साथ आपके इष्ट मित्रों पर ब्रह्मांड के उर्जा स्रोत भगवान दिनकर की सदैव कृपा दृष्टि और आशीर्वाद बनी रहे। आप पर छठ मैया की कृपा मात्र से धन- धान्य, सुख- शांति,समृद्धि, आनन्द, यश-कृति,मान-सम्मान, आरोग्य, सौहार्द की अमृत-किरणों की वर्षा अनवरत होती रहे।
💐🙏🏻🌹
सूर्योपासना के महापर्व की हार्दिक शुभकामनायें। 💐🙏🏻🌹

॥॥जय हो छठ मैया॥॥

Photos from जय सनातन's post 17/11/2020

मीनाक्षी अम्मान मंदिर, तमिलनाडु !

इस स्थान पर मूल मंदिर 3000 साल से अधिक पुराना है, मंदिर के प्रत्येक कोने को जटिल नक्काशियाँ से डिजाइन किया गया है।

मंदिर के ऊपरी आधे भाग को खूबसूरत रंगों से भरा गया है । मंदिर के अंदर, लगभग एक हजार स्तम्भ हैं जिनमें कुछ संगीतमय स्तंभ हैं,

बीच में एक पानी का तालाब है जिसमें सुंदर 'कमल के फूल' खिलते हैं। मंदिर के चारों ओर नटराज, नंदी बैल और देवताओं की हजारों प्रतिमाएं हैं।

जहाँ आधुनिक युग में करोड़ों खर्च करने के बाद बनी जल संग्रहण प्रणाली कुछ वर्षों बाद काम करना बंद कर देती है वहीं इस मंदिर में हजारों साल पहले बनी जल संग्रहण प्रणाली आज भी सुचारू रूप से कार्य कर रही है ।

इस मंदिर में चतुराई से स्तंभ की डिजाइन में निर्मित पाइप की संरचनाएँ आज भी मंदिर की छतों से बारिश की पानी को भूमिगत चैनलों तक ले जाते हैं ।

प्राचीनता और वैभव के आधार पर जिस मंदिर को आश्चर्यों की लिस्ट में पहले स्थान पर होना चाहिए था उसे हम भारत के लोग ही नहीं जानते ।

Photos from जय सनातन's post 14/11/2020

शुभम करोति कल्याणम,
अरोग्यम धन संपदा,
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते !

आपको सपरिवार दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं🙏

Photos from जय सनातन's post 14/11/2020

अयोध्या नगरी में दीवाली।
अयोध्या में 5.51 लाख दीप जलाकर बना विश्व रिकॉर्ड।
भगवान श्रीराम के आगमन को सज धज कर तैयार रघुनंदन की नगरी !!
जय सियाराम 🙏

Photos from जय सनातन's post 13/11/2020

पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखने वाले यथार्थवादी राजनीतिज्ञ एवं सिक्ख साम्राज्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा 'शेर-ए पंजाब' महाराजा रणजीत सिंह जी की जयंती पर सादर नमन🙏

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