21/09/2026
कल कोटरा का शिव मंदिर देखा . जिसने ना देखा हो उसे अवश्य ही देखना चाहिए . खरगापुर क्षेत्र में देरी और दूबदेई के बीच स्थित कोटरा इतिहास, स्थापत्य और प्रकृति का अनोखा संगम है। पुराने तालाब के किनारे बिखरे विशाल प्रस्तरखंड, अलंकृत स्तंभ और मंदिर के अवशेष आज भी इसके गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं।
यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है। स्थानीय पुरातात्विक अध्ययनों में इसे चंदेलकालीन शैव मठ या शिव मंदिर बताया गया है और चंदेल नरेश धंगदेव के काल से जोड़ा जाता है। विशाल ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित यह मंदिर बुंदेलखंड की विकसित धार्मिक स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मंदिर के प्रवेश द्वार पर मकरवाहिनी गंगा और कच्छपवाहिनी यमुना की प्रतिमाएँ अंकित हैं। इनके साथ शिव के द्वारपाल और परिचारक भी दिखाई देते हैं। द्वार के ऊपरी भाग का चैत्याकार अलंकरण, भीतर स्थित शिवलिंग और देवी पार्वती की प्रतिमा इस स्थल की कलात्मक समृद्धि को दर्शाते हैं। कभी यहाँ अनेक देव प्रतिमाओं और देवकुलिकाओं से युक्त एक विस्तृत शैव परिसर रहा होगा।
कोटरा की विशेषता केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। इसके साथ लगा प्राचीन चंदेलकालीन तालाब इस स्थल को और महत्वपूर्ण बनाता है। चंदेलकालीन बुंदेलखंड में मंदिर और जल संरचनाएँ धार्मिक जीवन, स्थापत्य और जल-संस्कृति का अभिन्न हिस्सा थीं। कोटरा में यह संबंध आज भी स्पष्ट दिखाई देता है.
आसपास के देरी, दूबदेई, अहार और अन्य क्षेत्रों में मिले मंदिरों व शैव मठों के अवशेषों को साथ देखें तो यह पूरा क्षेत्र चंदेलकालीन धार्मिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण परिदृश्य बनकर उभरता है।
दुर्भाग्य से मंदिर परिसर के में कचरा, गंदगी और मदिरापान के चिह्न दिखे . इतनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर के संरक्षण के लिए स्थानीय समाज की भागीदारी आवश्यक है। मैंने ग्रामवासियों विशेषतः गाँव के युवाओं से आग्रह किया कि वे आगे आकर स्वच्छता अभियान चलायें और भविष्य में मंदिर परिसर की पवित्रता बनाए रखने की जिम्मेदारी लें.
कोटरा केवल अतीत की निशानी नहीं, बल्कि टीकमगढ़ की पहचान और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी है। इसे स्वच्छ रखें, सँवारें और इसके इतिहास से अधिक से अधिक लोगों को परिचित कराएँ। झाँसी- खजुराहो हाईवे से करीब होने से यहाँ पर्यटन विकास की पर्याप्त संभावनाएं हैं .