प्रणव पारे "पद्म प्रबोधिनी"
तमसो मा ज्योतिर्गमय
20/10/2020
शुभ प्रभात
05/07/2020
सभी गुरुजनों को प्रणाम
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥
भावार्थ:-ज्ञानमय, नित्य, शंकर रूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥3॥
यहां भी अखिल ब्रम्हाण्ड के स्वामी शिव जी ही बताए जा रहे है यद्यपि उनके स्वामी नारायण है
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥2॥
भावार्थ:-श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥2॥
तुलसी दास जी द्वारा रचित श्री रामचरित मानस के बाल कांड का प्रारंभिक श्लोक है
आदि देव महादेव और पार्वती जी की कृपा के बिना सिद्ध जन भी, जो सिद्ध है वो भी स्वयं के अंदर स्थित ईश्वर को नही देख सकते है।सनातन धर्म मे भगवान शिव की महिमा अपरंपार है, ज्योतिषीय मान्यताओं में भी अखिल ब्रम्हाण्ड की सौर मंडल में व्याप्त बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्रों में शिव और पार्वती के उपस्थित होने का प्रमाण इस दोहे से मिल जाता है।
षड दर्शनों में से एक सांख्य दर्शन भी "जब प्रकृति और पुरुष की बात करता है तब वह वस्तुतः शिव पार्वती की ही बात करता है। तीन गुण सतोगुण,तमोगुण और रजोगुण भी कहीं न कही शिवपार्वती के संतुलन की बात करते है। भगवान शिव में तीनों गुणों का समावेश है। वो भस्म रमाते है, शमशान में रहते है, और भूत पिशाच रुद्र उनके गण है और उमा पार्वती जैसी शक्तियां उनका वरण करती है। नंदी पुरुषार्थ का प्रतीक है।सर्प उनके क्रोध को बताता है जो स्वयं राहु केतु का प्रतिनिधित्व करता है, चंद्रमा उनके मस्तष्क पर अपनी जलीय प्रकृति के साथ गंगा जी को धारण करने का संकेत देता है, उनके पुत्र कार्तिकेय युद्ध के देव स्वयम मंगल है।तो गणेश बुध का प्रतीक भी है, पूरा शिव परिवार ही ब्रम्हाण्ड के समस्त तत्व और चरा चर राशियों का प्रतिनिधि है सत्य है उनके बिना तो स्वयं के अंदर स्थित ईश्वर को कैसे देख सकता है।
28/04/2020
तथागत उवाच
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