04/09/2025
“आपकी सोच ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है।”
मध्यप्रदेश कांग्रेस सरकार 1993 से 2003
04/09/2025
“आपकी सोच ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है।”
03/09/2025
“हर सुबह एक नई शुरुआत है – मुस्कराइए और चल पड़िए।”
03/09/2025
मध्यप्रदेश राज्य के गठन की तारीख 1 नवंबर 1956 से 2003 तक मध्यप्रदेश के 13 राज्यपाल नियुक्त किये गए। जिसमें श्री हरिविनायक पाटसकर जी 1957 से 1965 तक सबसे लम्बे समय तक प्रदेश के राज्यपाल रहे।
02/09/2025
मध्यप्रदेश राज्य का गठन : भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के लिए अक्टूबर 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया। के. एम. पणिक्कर व हृदयनाथ कुंजरू आयोग के सदस्य थे। आयोग ने महाकौशल, मध्यभारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल का दौरा किया। इस तरह बड़े पैमाने पर नये राज्य के गठन के सम्बंध में प्रकारान्तर में जनमत संग्रह हो गया। महाकौशल का नेतृत्व मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल व महाकौशल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सेठ गोविंददास कर रहे थे। मध्यभारत के नेता मुख्यमंत्री तख्तमल जैन और मिश्रीलाल गंगवाल थे। वे मध्यभारत को पृथक राज्य बनाए रखने के पक्ष में थे और अधिकतम यह इच्छा रखते थे कि भोपाल राज्य का विलय मध्यभारत में कर दिया जाए। तथापि मध्यभारत के दो पूर्व मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी व गोपीकृष्ण विजयवर्गीय विशाल मध्यप्रदेश के गठन के पक्ष में थे।
भोपाल के मुख्यमंत्री डा. शंकरदयाल शर्मा नये मध्यप्रदेश के खिलाफ नहीं थे, उनकी रणनीति भोपाल को मध्यप्रदेश की राजधानी बनवाने पर केन्द्रित थी। विंध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शंभुनाथ शुक्ल और दूसरे बड़े नेता कप्तान अवधेश प्रताप सिंह थे। विंध्य अंचल में पृथक राज्य अथवा उत्तरप्रदेश में विलय की भावना थी। लेकिन अंततः उन्होंने नये मध्यप्रदेश का स्वरूप स्वीकार कर लिया। 10 अक्टूबर 1955 को राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट का प्रकाशन हुआ। 9 नवम्बर 1955 को कांग्रेस कार्यसमिति ने आयोग की रिपोर्ट पर सहमति की मोहर लगा दी। प्रस्तावित नये राज्यों के नक्शे जब प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के सामने रखे गए, तब मध्यप्रदेश का आकार-प्रकार देखते ही पंडितजी की त्वरित प्रतिक्रिया थी, "अरे! यह क्या अजूबा है। ऐसा लंबा-चौड़ा प्रदेश कैसे बन सकता है?" इस प्रतिक्रिया से मध्यभारत और विंध्य के उन नेताओं की बांछें खिल गई, जो विशाल मध्यप्रदेश का हिस्सा बनने के इच्छुक नहीं थे। परंतु विशाल मध्यप्रदेश के गठन के पक्षधर नेताओं की भी कमी नहीं थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि उपजाऊ धरती. प्रचुर खनिज भण्डार, विपुल वन सम्पदा और अपार जलराशि इत्यादि नैसर्गिक संसाधनों की दृष्टि से नये मध्यप्रदेश में भारत का विकसित और समृद्ध राज्य बनने की भरपूर संभावना है। अब समस्या पं. नेहरू को आश्वस्त करने की थी। लीलाधर जोशी ने अपने संस्मरण में इसकी रणनीति का खुलासा किया है। नियोजन और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ वी.के.आर.वी.राव से सम्पर्क किया गया, जिन्होंन तथ्यों का विश्लेषण कर नये मध्यप्रदेश की उज्ज्वल संभावनाओं-ECONOMIC VIABILITY OF MADHYA PRADESH पर एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र में आलेख लिखा। इसी विश्लेषण को आधार बनाकर नये मध्यप्रदेश के पक्षधर नेताओं ने दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन किया। इस तथ्य के निरूपण ने राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा प्रस्तावित मध्यप्रदेश के गठन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। आयोग ने नए प्रदेश की राजधानी के लिए जबलपुर की अनुशंसा की थी। परंतु मौलाना अबुल कलाम आजाद के समर्थन से भोपाल को राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया। 30 अप्रैल 1956 को राज्य पुनर्गठन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया। 11 सितम्बर को विधेयक पारित हुआ। एक नवम्बर 1956 को नया मध्यप्रदेश अस्तित्व में आ गया।
31 अक्टूबर 1956 की मध्यरात्रि को भोपाल के मिंटो हॉल में गरिमामय शपथ ग्रहण समारोह सम्पन्न हुआ। राज्य के प्रथम राज्यपाल डा. वी. पट्टाभि सीतारमैया को मुख्य न्यायाधीश श्री मोहम्मद हिदायतुल्ला ने पद की शपथ दिलाई। राज्यपाल की शपथ-विधि के बाद राज्यपाल ने नवगठित मध्यप्रदेश के प्रथम मंत्रिमंडल को शपथ दिलाई। मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल, तख्तमल जैन, शंभूनाथ शुक्ल, डा. शंकरदयाल शर्मा, मिश्रीलाल गंगवाल, भगवंतराव मण्डलोई, शंकरलाल तिवारी, वी. वी. द्रविड़, राजा नरेशचंद्र सिंह. मौलाना तरजी मशरिकी, गणेशराम अनंत एवं रानी पद्मावती देवी को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। नरसिंहराव दीक्षित. राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह, के. एल. गुमास्ता, सज्जनसिंह विश्नार, अब्दुल कादिर सिद्दीकी, मथुराप्रसाद दुबे, जगमोहन दास. सवाई सिंह सिसोदिया, दशरथ जैन, श्यामसुंदर नारायण मुशरान तथा शिवभानु सोलंकी को उपमंत्री बनाया गया।
एक नवंबर 1956 को अस्तित्व में आई मध्यप्रदेश की एकीकृत विधानसभा के सदस्य वही थे, जो 1952 के पहले आमचुनाव में मध्यप्रांत, मध्यभारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्य की विधानसभाओं के लिए चुने गए थे। 16 अक्टूबर 1956 को मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में इन चारों विधानसभाओं के कांग्रेस विधायकों की संयुक्त बैठक कुंजीलाल दुबे की अध्यक्षता में हुई, कांग्रेस के कुल 274 विधायकों में से 212 सदस्य इस बैठक में उपस्थित थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव श्रीमन्नारायण पर्यवेक्षक के रूप में आए थे। वरिष्ठतम नेता पं. रविशंकर शुक्ल को सर्वसम्मति से नेता चुना गया और वे पुनर्गठित मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने, अन्य तीन घटक राज्यों के मुख्यमंत्री नये मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में सम्मिलित किये गए।
संदर्भ : श्री विजयदत्त श्रीधर जी की किताब "शह और मात"
Indian National Congress - Madhya Pradesh Digvijaya Singh
02/09/2025
मानव कल्याण, देश हित और शिक्षित समाज, राजनीति की प्राथमिकता होनी चाहिए।
01/09/2025
किताबें इसलिए पढ़ो ताकि तुम,
लोगों से बहस नहीं, तर्क कर सको...।
01/09/2025
1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य की स्थापना हुई। हम दिग्विजय सरकार की उपलब्धियों को बताने से पहले आपको मध्यप्रदेश का संक्षिप्त इतिहास और 1956 से 1993 तक के राजनैतिक घटनाक्रमों को संक्षेप में बताने का प्रयास करेंगे।
Indian National Congress - Madhya Pradesh Digvijaya Singh
01/09/2025
हम इस फेसबुक पेज के माध्यम से मध्यप्रदेश की जनकल्याण कारी दिग्विजय सिंह सरकार की नीतियों और विकासोन्मुखी कार्यक्रमों के बारे में जानकारी देंगे।