18/08/2023
।। नमः शवभ्याम् ।।
हम यहाँ आपको आध्यात्म से जोड कर रखने क?
18/08/2023
।। नमः शवभ्याम् ।।
24/04/2021
कई बार हम लोगों को टीवी सीरियल में नारद मुनि को एक चाटुकार और चुगलीबाज की तरह प्रदर्शित करते हुए दिखाया गया है। जिन लोगों ने हमारे ग्रंथों को नहीं पढ़ा है उनके मन में नारद मुनि को लेकर गलत छवि बनना सम्भव है
परंतु क्या नारद मुनि सिर्फ इतने ही थे?
नारद मुनि ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है।
देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है - देवर्षीणाम्चनारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं।
श्रीमद्भागवत महापुराणका कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र (जिसे नारद-पाञ्चरात्र भी कहते हैं) का उपदेश दिया जिसमें सत्कर्मो के द्वारा भव-बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है।
महाभारत में नारदजी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है - देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के विद्वान, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानोंकी शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योगबलसे समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले,
देवताओं के उपदेशक, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण है।
सत्य सनातन धर्म की जय
🚩🚩
26/10/2019
आज हम आपके लिए शास्त्रों के अन्दर वर्णित चुनिन्दा ऐसे संकेत लेकर आये हैं, जो अगर आपको दिखें तो समझ लेना ज़िन्दगी में खुशी आने वाली है।
1. सफेद गाय। सनातन धर्मियों की गौ माता जिसे कुछ लोग केवल राजनैतिक मुद्दा ही समझते होंगे, उन्हें हम बता दें यह आर्थिक सुदृढ़ीकरण का भी प्रतीक है. अब अगली बार जब भी आपके खेत में गाय आ कर चरने लग जाये, तो समझ जाइएगा साक्षात लक्ष्मी जी ने संदेशा भेजा है।
2. नारियल को वैसे भी भारतीय सामाजिक परम्परा में शुभ माना जाता है. तो अब ये भी जान लो अगली बार जब भी कभी आपको सुबह उठते ही इस श्रीफल के दर्शन हों, तो समझ जाना अच्छी खबर आने वाली है।
3. यात्रा के दौरान मिलने वाले संकेत।जब कभी भी यात्रा करते समय आपको अपनी दायीं तरफ़ कोई बन्दर, कुत्ता, सांप दिखे तो, समझ जाना यह भी आपके पास आने वाले धन का संकेत आपको दे रहे हैं।
4. सुनहरा सांप। अगर रात को आपको सोते समय सपने में सफेद या सुनहरे रंग का सांप नज़र आये, तो यह भी खुलने वाली किस्मत का इशारा होता है।
5. हरियाली। सपने में हरे-भरे प्राकृतिक नजारे दिखना भी सुभ संकेत माना जाता है. हरियाली अगर पानी के किसी स्रोत के पास हो तो यह उससे भी अच्छा संकेत होता है।
6. दूध के बने उत्पाद। सुबह-सुबह उठते ही दही और दूध जैसे पदार्थ का दिखाई दे जाना भी आने वाली अच्छी किस्मत का संकेत होता है।
7. गन्ना। सुबह घर से अपने काम पर जाते वक्त या मॉर्निंग वॉक करते समय गन्ने का दिखाई दे जाना भी यह संकेत देता है कि आज आपको कही से पैसे मिलने वाले हैं।
8. लयबद्ध संगीत। सुबह उठते समय आपको अपने आसपास किसी मन्दिर से शंख, घंटियों या किसी मधुर भजन की आवाज़ सुनाई देना भी शास्त्रों में आने वाले अच्छे भाग्य का संकेत माना जाता है।
9. नव-विवाहिता का दिखाई दे जाना। आपको रास्ते में अगर सोलह श्रृंगार किये कोई नई-नई दुल्हन नज़र आ जाये तो इसे भी आने वाली अच्छी किस्मत का संकेत माना जाता है.
10. आपके घर में चमगादड़ द्वारा घर बनाना।
दुनिया में अधिकतर मान्यताओं के अनुसार आपके घर में किसी चमगादड़ का आना अशुभ संकेत माना जाता है. लेकिन हम आपको बता दें, वही चमगादड़ अगर आपके घर में रुककर अपना घर बना लें तो इसे एक शुभ संकेत माना जाता है।
11. शुभ दिन पर पैसे आना। हम सब की ज़िन्दगी में कोई न कोई लक्की डे या वीक होता है उस समय अगर आपको कहीं से धन की प्राप्ति हो जाये तो, इसका मतलब है अभी और धन आने वाला है।
12. पक्षियों का बीट करना। बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जिनके ऊपर उनकी ज़िन्दगी में किसी पक्षी ने बीट की हो और अगर की भी हो तो लोग झल्ला जाते हैं. पर आपको बता दें, यह भी एक शुभ संकेत माना जाता है।
13. मकड़ी का जाला। गुस्सा मत होइये हमें भी पता है, मकड़ी के जाले का घर में पाया जाना अशुभ माना जाता है. अब काम की बात यह है कि अगली बार अगर कोई जाला दिखाई दे और उसमें आपको अपने नाम का पहला अक्षर बना हुआ नज़र आये तो वह भी एक शुभ संकेत माना जाता है।
14. टूटते तारे का नज़र आना। इस संकेत को पूरी दुनिया में मान्यता प्राप्त है. पूर्वज कहते आए हैं टूटते तारे सो जो भी मांगो आपको आने वाले 30 दिन में सच हो जाता है.इसलिए सोच समझ कर मांगना।
15. गलती से उलटे कपड़े पहन लेना। जब भी हमें कहीं जाने की जल्दी होती है तो हम ज़ल्दबाजी में कपड़े उलटे पहन लेते हैं और जब देखते हैं तो अपने आप पर गुस्सा भी होते हैं. भविष्य में दोबारा अगर ऐसा आपके साथ हो तो समझ लेना मामला गुस्से का नहीं ख़ुश होने का है. उलटे कपड़े पहन लेना भी आने वाली समृद्धि का प्रतीक होता है।
16. सुभ चीजों का मिलना। आपको रास्तें में कहीं घोड़े की नाल, चार पत्तियों वाली घास या कोई सिक्का मिल जाये तो उसे सम्भालकर अपने पास रख लेना चाहिए. यह भी आने वाले भाग्य के निर्देशक होते हैं।
17. कुत्ते का घर पर रहने आना। कोई कुत्ता अगर आपके घर पर रहने के लिए छत की तलाश में आ जाये तो यह भी भविष्य में आने वाले धन का संकेत होता है।
18. गार्डन क्रिएचर्स का दिखना। बारिश के बाद अगर आपको अपने बगीचे में मेंढ़क, बीटल, टिड्डों का शोर सुनाई दें, तो यह भी एक अच्छा संकेत होता है. अगली बार इरिटेट होने की बजाय उस संगीत का आनंद लीजियेगा।
19. बारिश में सूरज का चमकना। ऐसा बहुत ही कम होता है जब आपको बारिश में भीगते समय सामने आसमान में चमकता सूरज दिखाई दे. यदि ऐसा कभी होता है तो समझ जाइये आप जल्द ही मालामाल होने वाले हैं।
20. हाथ में खुजली होना। इससे तो आप सभी वाकिफ ही होंगे. हमारे यहां हाथ में खुजली होने को आने वाले धन के संकेत के रूप में देखा जाता है।
21. कछुआ। कछुए को पूरी दुनिया में अच्छे भाग्य का प्रतीक माना जाता है. इसका किसी भी रूप में दिखाई दे जाना, कोई न कोई अच्छी खबर ज़रूर लाता है।
22. डॉलफिन। डॉलफिन को वैसे भी इन्सान का अच्छा दोस्त कहा जाता है. यह भी जान ही लो यह दोस्त सच में अच्छा होता है. डॉलफिन को भी आने वाले अच्छे भाग्य का प्रतीक माना जाता है।
23. सूअर। पिग्स को भी दुनिया भर में अच्छा भाग्य लाने वाला माना जाता है. अब आप समझ ही गये होंगे पिगी बैंक का राज़।
24. मोती। सभ्यताएं पानी के किनारे पनपी है. किसी समय तो आभूषण के रूप में इनका खूब उपयोग होता था. इन मोतियों को अच्छे भाग्य का प्रतीक भी माना जाता है।
25. झींगुर। नाम पढ़ते ही हंसी आई होगी ना, तो रुकिए मत! झींगुर का शोर सुनाई देना या इसका दिखाई दे जाना भी आप के बुरे दिनों के खत्म होने का संकेत होता है।
तो अब आपको पता चल गया है कि कौन से ऐसे संकेत है जिनके दिखाई दे जाने पर आपकी किस्मत बदल जाएगी. तो अगली बार जब भी ये दिखाई दें, तो आपके अच्छे दिन आये या नहीं, हमें कमेन्ट करके ज़रूर बताना. तब तक टाइम पास के लिए मेहनत करते रहिए, इस विश्वास के साथ कि देने वाला जब भी देगा छप्पर फाड़ कर देगा।
धर्म से जुड़ी अनोखी बातें
30/06/2018
10/07/2017
बहुत हो गया ध्यान न्यास भोले
अब पिनाक चढ़ाना होगा,
शुरू हो चुका कनखला यज्ञ पुनः
वीरभद्र तुझे आना होगा ।।🕉
नित्य होती कई सती सती यहाँ ,
शिव गण लाखों मरते देखे ,
लक्ष दक्ष यहाँ बकरे बनकर
शिव द्रोह खुलकर करते देखे ।।🕉
चीर फ़ाड़ दो उन कुत्तो को
भैरव नाच नचाना होगा ,
हे बर्फानी युद्ध सम्भालो,
भूतेश्वर बन आना होगा ।।...🕉
🕉
13/10/2016
(((गुरु भक्ति)))
बहुत सुन्दर कथा एक बार जरूर पढ़े.....
एक चोर ने राजा के महल में चोरी की। सिपाहियों को पता चला तो उन्होंने उसके पदचिह्नों का पीछा किया।
पीछा करते-करते वे नगर से बाहर आ गये। पास में एक गाँव था। उन्होंने चोर के पदचिह्न गाँव की ओर जाते देखे।
गाँव में जाकर उन्होंने देखा कि एक संत सत्संग कर रहे हैं और बहुत से लोग बैठकर सुन रहे हैं। चोर के पदचिह्न भी उसी ओर जा रहे थे।
सिपाहियों को संदेह हुआ कि चोर भी सत्संग में लोगों के बीच बैठा होगा। वे वहीं खड़े रह कर उसका इंतजार करने लगे।
सत्संग में संत कह रहे थे-जो मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान की शरण चला जाता है, भगवान उसके सम्पूर्ण पापों को माफ कर देते हैं।
गीता में भगवान ने कहा हैः
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।
सभी धर्मों के वेद भूला कर तू मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्ति दूँगा,शोक ना कर। मेरी भक्ति में खोजा |
वाल्मीकि रामायण में आता हैः
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।
जो एक बार भी मेरी शरण में आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कह कर रक्षा की याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ – यह मेरा व्रत है।
इसकी व्याख्या करते हुए संत श्री ने कहाः जो भगवान का हो गया, उसका मानों दूसरा जन्म हो गया।
अब वह पापी नहीं रहा, साधु हो गया।
अपिचेत्सुदाराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।
अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी मेरी शरण में आकर निस्वार्थः भक्ति करता है और मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिए।
कारण कि उसने बहुत अच्छी तरह से निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।
चोर वहीं बैठा सब सुन रहा था। अब उस पर सत्संग की बातों का असर पड़ने लगा।
उसने वहीं बैठे-बैठे यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अभी से मैं भगवान की शरण लेता हूँ, अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। मैं अब भगवान का हो गया।
सत्संग समाप्त हुआ। लोग उठकर बाहर जाने लगे।
बाहर राजा के सिपाही चोर की तलाश में थे। चोर बाहर निकला तो सिपाहियों ने उसके पदचिह्नों को पहचान लिया और उसको पकड़ के राजा के सामने पेश किया।
राजा ने चोर से पूछाः इस महल में तुम्हीं ने चोरी की है न ? सच-सच बताओ, तुमने चुराया धन कहाँ रखा है ?
चोर ने दृढ़ता पूर्वक कहाः "महाराज ! इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की।"
सिपाही बोलाः "महाराज ! यह झूठ बोलता है। हम इसके पदचिह्नों को पहचानते हैं। इसके पदचिह्न चोर के पदचिह्नों से मिलते हैं, इससे साफ सिद्ध होता है कि चोरी इसी ने की है।"
राजा ने चोर की परीक्षा लेने की आज्ञा दी, जिससे पता चले कि वह झूठा है या सच्चा।
चोर के हाथ पर पीपल के ढाई पत्ते रखकर उसको कच्चे सूत से बाँध दिया गया। फिर उसके ऊपर गर्म करके लाल किया हुआ लोहा रखा परंतु उसका हाथ जलना तो दूर रहा, सूत और पत्ते भी नहीं जले।
लोहा नीचे जमीन पर रखा तो वह जगह काली हो गयी।
राजा ने सोचा कि 'वास्तव में इसने चोरी नहीं की, यह निर्दोष है।'
अब राजा सिपाहियों पर बहुत नाराज हुआ कि "तुम लोगों ने एक निर्दोष साधु पुरुष पर चोरी का आरोप लगाया है। तुम लोगों को दण्ड दिया जायेगा।"
यह सुन कर चोर बोलाः "नहीं महाराज ! आप इनको दण्ड न दें। इनका कोई दोष नहीं है। चोरी मैंने ही की थी।"
राजा ने सोचा कि यह साधु पुरुष है, इसलिए सिपाहियों को दण्ड से बचाने के लिए चोरी का दोष अपने सिर पर ले रहा है।
राजा बोलाः तुम इन पर दया करके इनको बचाने के लिए ऐसा कह रहे हो पर मैं इन्हें दण्ड अवश्य दूँगा।
चोर बोलाः "महाराज ! मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, चोरी मैंने ही की थी। अगर आपको विश्वास न हो तो अपने आदमियों को मेरे पास भेजो।
मैंने चोरी का धन जंगल में जहाँ छिपा रखा है, वहाँ से लाकर दिखा दूँगा।"
राजा ने अपने आदमियों को चोर के साथ भेजा। चोर उनको वहाँ ले गया जहाँ उसने धन छिपा रखा था और वहाँ से धन लाकर राजा के सामने रख दिया।
यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।
राजा बोलाः अगर तुमने ही चोरी की थी तो परीक्षा करने पर तुम्हारा हाथ क्यों नहीं जला ?
तुम्हारा हाथ भी नहीं जला और तुमने चोरी का धन भी लाकर दे दिया, यह बात हमारी समझ में नहीं आ रही है। ठीक-ठीक बताओ, बात क्या है ?
चोर बोलाः महाराज ! मैंने चोरी करने के बाद धन को जंगल में छिपा दिया और गाँव में चला गया।
वहाँ एक जगह सत्संग हो रहा था। मैं वहाँ जा कर लोगों के बीच बैठ गया।
सत्संग में मैंने सुना कि 'जो भगवान की शरण लेकर पुनः पाप न करने का निश्चय कर लेता है, उसको भगवान सब पापों से मुक्त कर देते हैं। उसका नया जन्म हो जाता है।
इस बात का मुझ पर असर पड़ा और मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा।
अब मैं भगवान का हो गया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। अब मैं भगवान का हो गया।
इसीलिए तब से मेरा नया जन्म हो गया।
इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की, इसलिए मेरा हाथ नहीं जला।
आपके महल में मैंने जो चोरी की थी, वह तो पिछले जन्म में की थी।
कैसा दिव्य प्रभाव है सत्संग का ! मात्र कुछ क्षण के सत्संग ने चोर का जीवन ही पलट दिया।
उसे सही समझ देकर पुण्यात्मा, धर्मात्मा बना दिया।
चोर सत्संग-वचनों में दृढ़ निष्ठा से कठोर परीक्षा में भी सफल हो गया और उसका जीवन बदल गया।
राजा उससे प्रभावित हुआ, प्रजा से भी वह सम्मानित हुआ और प्रभु के रास्ते चलकर प्रभु कृपा से उसने परम पद को भी पा लिया।
सत्संग पापी से पापी व्यक्ति को भी पुण्यात्मा बना देता है। जीवन में सत्संग नहीं होगा तो आदमी कुसंग जरूर करेगा।
कुसंगी व्यक्ति कुकर्म कर अपने को पतन के गर्त में गिरा देता है लेकिन सत्संग व्यक्ति को तार देता है, महान बना देता है। ऐसी महान ताकत है सत्संग में !
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07/10/2016
बहुत सुन्दर कथा
((((((((( चटोरे मदनमोहन )))))))))
सनातन गोस्वामी जी मथुरा में एक चौबे के घर मधुकरी के लिए जाया करते थे,
उस चौबे की स्त्री परमभक्त और मदन मोहन जी की उपासिका थी, उसके घर बाल भाव से मदन मोहन भगवान विराजते थे।
असल में सनातन जी उन्ही मदन मोहन जी के दर्शन हेतु प्रतिदिन मधुकरी के बहाने जाया करते थे।
मदन मोहन जी तो ग्वार ग्वाले ही ठहरे ये आचार विचार क्या जाने उस चौबे के लड़के के साथ ही एक पात्र में भोजन करते थे,
ये देख सनातन जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, ये मदनमोहन तो बड़े वचित्र है।
एक दिन इन्होने आग्रह करके मदन मोहन जी का उच्छिष्ठ (झूठा) अन्न मधुकरी में माँगा,
चौबे की स्त्री ने भी स्वीकार करके दे दिया, बस फिर क्या था, इन्हे उस माखन चोर की लपलपाती जीभ से लगे हुए अन्न का चश्का लग गया, ये नित्य उसी अन्न को लेने जाने लगे।
एक दिन मदन मोहन ने इन्हे स्वप्न में दर्शन देकर कहा, बाबा तुम रोज इतनी दूर से आते हो, और इस मथुरा शहर में भी हमे ऊब सी मालूम होवे हे
तुम उस चौबे से हमको मांग के ले आओ हमको भी तुम्हारे साथ जंगल में रहनो है।
ठीक उसी रात को चौबे को भी यही स्वप्न हुआ की हमको आप सनातन बाबा को दान कर दो।
दूसरे दिन सनातन जी गये उस चौबे के घर और कहने लगे मदन मोहन को अब जंगल में हमारे साथ रहना है, आपकी क्या इच्छा है ?
कुछ प्रेमयुक्त रोष से चौबे की पत्नी ने कहा इसकी तो आदत ही ऐसी हे। जो भला अपनी सगी माँ का न हुआ तो मेरा क्या होगा।
और ठाकुर जी की आज्ञा जान अश्रुविमोचन करते हुए थमा दिया मदन मोहन जी को सनातनजी को।
अब मदन मोहन को लेके ये बाबा जंगल में यमुना किनारे आये और सूर्यघाट के समीप एक सुरम्य टीले पे फूस की झोपडी बना के मदन मोहन को स्थापित कर पूजा करने लगे।
सनातन जी घर घर से चुटकी चुटकी आटा मांग के लाते और उसी की बिना नमक की बाटिया बना के मदन मोहन को भोग लगाते।
एक दिन मदन मोहन जी ने मुँह बिगाड़ के कहा ओ बाबा ये रोज रोज बिना नमक की बाटी हमारे गले से नीचे नहीं उतरती, थोड़ा नमक भी मांग के लाया करो ना।
सनातन जी ने झुँझलाकर कहा - यह इल्लत मुझसे न लगाओ, खानी हो तो ऐसी ही खाओ वरना अपने घर का रास्ता पकड़ो ।
मदन मोहन ने हस के कहा - एक कंकड़ी नमक के लिये कौन मना करेगा, और ये जिद करने लगे।
दूसरे दिन ये आटे के साथ थोड़ा नमक भी मांग के लाने लगे।
चटोरे मदन मोहन को तो माखन मिश्री की चट पड़ी थी,
एक दिन बड़ी दीनता से बाबा से बोले- बाबा ये रूखे टिक्कड तो रोज रोज खावे ही न जाये, थोड़ा माखन या घी भी कही से लाया करो तो अच्छा रहेगा।
अब तो सनातन जी मदन मोहन को खरी-खोटी सुनाने लगे, उन्होंने कहा - देखो जी मेरे पास तो यही सूखे टिक्कड है,
तुम्हे घी और माखन मिश्री की चट थी तो कही धनी सेठ के वहां जाते, ये भिखारी के वहां क्या करने आये हो,
तुम्हारे गले से उतरे चाहे न उतरे, में तो घी-बुरा माँगने बिल्कुल नही जाने वाला, थोड़े यमुना जी के जल के साथ सटक लिया करो ना। मिट्टी भी तो सटक लिया करते थे।
बेचारे मदन मोहन जी अपना मुँह बनाए चुप हो गये, उस लंगोटि बन्ध साधु से और कह भी क्या सकते थे।
दूसरे दिन सनातन जी ने देखा कोई बड़ा धनिक व्यापारी उनके समीप आ रहा हे,
आते ही उसके सनातन जी को दण्डवत प्रणाम किया और करुण स्वर में कहने लगा -
महात्मा जी मेरा जहाज बीच यमुना जी में अटक गया है, ऐसा आशीर्वाद दीजिये की वो निकल जाये,
सनातन जी ने कहा भाई में कुछ नही जानता, इस झोपडी में जो बैठा है न उससे जाके कहो,
व्यापारी ने झोपड़े में जा के मदन मोहन जी से प्रार्थना की, बस फिर क्या था इनकी कृपा से जहाज उसी समय निकल गया,
उसी समय उस व्यापारी ने हजारो रूपए लगा के बड़ी उदारता के साथ मदन मोहन जी का वही भव्य मंदिर बनवा दिया, और भगवान की सेवा के लिए बहुत सारे सेवक, रसोइये और नोकर चाकर रखवा दिये।
वह मंदिर वृंदावन में आज भी विध्यमान है...
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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02/09/2016
(कृपया यह पेज खोल के देखे आपको बहुत अच्छा लगेगा)
एक दिन बालकृष्ण ने फल वाली पर भी कृपा की है। भगवान ने देखा की उसके द्वार पर कोई फलवाली फल बेच रही है। और आवाज लगते हुए जा रही है कोई फल ले लो री! कोई फल ले लो री।
भगवान जी ने जैसे ही सुना तो दौड़े दौड़े गए और बोले मैया-मैया मुझे ये फल) दे दे। मैया बोली की ठीक है लाला मैं दे दूंगी पर बदले में कुछ अनाज लेके आ जा।
कन्हैया कहते है ठीक है मैया।
भगवान अंदर गए है और अपने दोनों हाथो की मुट्ठी में अनाज भर कर लाते है। और दौड़े दौड़े नन्द भवन के अंदर से आते है। लेकिन रस्ते में सारा अनाज गिराते भी जा रहे है। जब तक मैया की पास पहुंचे केवल 2- 4 दाने ही बचे हैं।
फल बेचने वाली बोली की लाला क्या लेके आयो है ?
कृष्णा ने कहा मैया तेरे लिए बहुत सारा अनाज लेके आया हूँ। दोनों मुट्ठी में अनाज है मेरे।
मैया बोली अच्छा लाला दिखा मेरे को।
ज्यों ही कृष्ण ने अंजुली खोली तो केवल 2-4 दाने ही बचे थे। फल वाली बोली की लाला तू तो कहवे है की बहुत सारा आनाज लायो है। ये देख थोड़ा सा है।
भगवान बोले वहां से लेके बहुत सारा चला था पर रस्ते में सब गिर गयो मैया। मेरे छोटे छोटे हाथ है तो अंजुली के बीच से गिर गयो मैया।
भगवान की मीठी मीठी बाते सुनकर फल वाली मुस्कराने लगी और भगवान से 2-4 दाने ले लिए और उनको टोकरी में रख लिया। और बदले में मैया ने भगवान को सारे फल दे दिए। और मैया अब ये कहना भूल गई कोई फल ले लो री कोई फल ले लो री
मैया आवाज लगा रही है कोई श्याम ले लो री! कोई श्याम ले लो री।
जब वह फल वाली घर पहुचती है तो क्या देखती है जिस टोकरी में उसने अनाज के 2-4 दाने रखे थे। अनाज के दानों जगह वो टोकरी हीरे और मोतियों से भर गई थी। इस प्रकार भगवन ने फल वाली पर कृपा की है
भगवान कहते है तुम मुझे थोड़ा बहुत भी दोगे मैं तुम्हे बदले में हजार गुना वापिस करूँगा। वैसे मुझे किसी का कुछ लेने की जरुरत नहीं है। मैं भाव देखता हूँ। और उस भाव के बदले मैं सब कुछ अपने भक्त को दे देता हूँ।
बोलिए कृष्ण कन्हैया की जय !! krishan kanhaiya ki jai
01/09/2016
🌻 श्रीराम जी की कृपा ! 🌻
यह पेज खोल कर यह कथा जरूर पढ़े...
जब भगवान श्रीराम अपने धाम को चले उस समय उनके साथ अयोध्या के सभी पशु - पक्षी, पेड़- पोधे मनुष्य भी उनके साथ चल पड़े।
उन मनुष्यो में श्री सीता जी की निंदा करने वाला धोबी भी साथ में था ,
भगवान ने उस धोबी का हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और उनको अपने साथ लिए चल रहे थे।
जिस - जिस ने भगवान को जाते देखा वे सब भगवान के साथ चल पड़े कहते है की वहां के पर्वत भी उनके साथ चल पड़े।
सभी पशु पक्षी पेड़ पोधे पर्वत और मनुष्यों ने जब साकेत धाम में प्रवेश होना चाहा तब साकेत का द्वार खुल गया ......
पर जैसे ही उस निंदनीय धोबी ने प्रवेश करना चाहा तो द्वार बंद हो गया।
साकेत द्वार ने भगवान से कहा महाराज ! आप भले ही इनका हाथ पकड़ ले पर ये जगत जननी माता श्री सीता जी की निंदा कर चुका है
इसलिए ये इतना बड़ा पापी है की मेरे द्वार से साकेत में प्रवेश नही कर सकता।
जिस समय भगवान सब को लेकर साकेत जा रहे थे उस समय सभी देवी - देवता आकाश मार्ग से देख रहे थे , की माता जी की निंदा करने वाले पापी धोबी को भगवान कहा भेजते है।
भगवान ने द्वार बन्द होते ही इधर - उधर देखा तो ब्रह्मा जी ने सोचा की कही भगवान इस पापी को मेरे ब्रह्म लोक में न भेज दे ,
वे हाथ हिला - हिला कर कहने लगे , महाराज ! इस पापी के लिए मेरे ब्रह्म लोक में कोई स्थान नही है।
इंद्र ने सोचा की कही मेरे इन्द्र लोक में न भेज दे , इंद्र भी घबराये , वे भी हाथ हिला - हिला कर कहने लगे , महाराज ! इस पापी को मेरे इन्द्र लोक में भी कोई जगह नही है।
ध्रुव जी ने सोचा की कही इस पापी को मेरे ध्रुव लोक में भेज दिया तो इसका पाप इतना बड़ा है की....
इसके पाप के बोझ से मेरा ध्रुव लोक गिर कर नीचे आ जायेगा ऐसा विचार कर ध्रुव जी भी हाथ हिला - हिला कर कहने लगे
महाराज ! आप इस पापी को मेरे पास भी मत भेजिएगा।
जिन - जिन देवताओं का एक अपना अलग से लोक बना हुआ था उन सभी देवताओं ने उस निंदनीय पापी धोबी को अपने लोक मे रखने से मना कर दिया।
भगवान खड़े - खड़े मुस्कुराते हुए सब का चेहरा देख रहे है पर कुछ बोलते नही |
उस देवताओ की भीड़ में यमराज भी खड़े थे , यमराज ने सोचा की ये किसी लोक में जाने का अधिकारी नही है अब इस पापी को भगवान कही मेरे यहाँ न भेज दे .....
और माता की निंदा करने वाले को में अपनी यमपुरी में नई रख सकता वे घबराकर उतावली वाणी से बोले ,
महाराज ! महाराज ! ये इतना बड़ा पापी है की इसके लिए मेरी यमपुरी में भी कोई जगह नही है।
उस समय धोबी को घबराहट होने लगी की मेरी दुर्बुद्धी ने इतना निंदनीय कर्म करवा दिया की यमराज भी मुझे नही रख सकते !
भगवान ने धोबी की घबराहट देख कर धोबी की और संकेत से कहा तुम घबराओ मत ! मैं अभी तुम्हारे लिए एक नए साकेत का निर्माण करता हूँ ,
तब भगवान ने उस धोबी के लिए एक अलग साकेत धाम बनाया।
यहाँ एक चोपाई आती है !
सिय निँदक अघ ओघ नसाए ।
लोक बिसोक बनाइ बसाए ।।
ऐसा अनुभव होता है की आज भी वो धोबी अकेला ही उस साकेत में पड़ा है जहा न कोई देवी देवता है न भगवान ,
न वो किसी को देख सकता है और न उसको कोई देख सकते है।
तात्पर्य यह है की भगवान अथवा किसी भी देवी देवता की निंदा करने वालो के लिए कही कोई स्थान नही है।
🕉🌹🌹🕉
01/09/2016
(((( भाव के भूखे है मेरे कान्हा..!! ))))
कृष्ण भगवान का एक बहुत बड़ा भक्त है लेकिन वो बेहद गरीब है !!
एक दिन उसने अपने शहर के सब से बड़े गोविन्द गोधाम की महिमा सुनी और उसका वहाँ जाने को मन उत्सुक हो गया !!!
कुछ दिन बाद जन्माष्टमी आने वाली थी उसने सोचा मै प्रभु के साथ जन्माष्टमी गोविन्द गोधाम में मनाऊँगा !!!
गोंविंद गोधाम उसके घर से बहुत दूर था! जन्माष्टमी वाले दिन वो सुबह ही घर से चल पड़ा !
उसके मन में कृष्ण भगवान को देखने का उत्साह और मन में भगवान के भजन गाता जा रहा था !
रास्ते में जगह जगह लंगर और पानी की सेवा हो रही थी वो यह देखकर बहुत आनंदित हुआ की वाह प्रभु आपकी लीला ! मैने तो सिर्फ सुना ही था की आप गरीबो पर बड़ी दया करते हो आज अपनी आँखों से देख भी लिया !
सब गरीब और भिखारी और आम लोग एक ही जगह से लंगर प्रशाद पाकर कितने खुश है !!
भक्त ऑटो में बैठा ही देख रहा था उसने सबके देने पर भी कुछ नही लिया और सोचा पहले प्रभु के दर्शन करूँगा फिर कुछ खाऊँगा ! क्योंकि आज तो वहाँ ग़रीबो के लिये बहुत प्रशाद का इंतेज़ाम किया होगा !!!
रास्ते में उसने भगवान के लिए थोड़े से अमरुद का प्रशाद लिया और बड़े आनंद में था भगवान के दर्शन को लेकर !!!
भक्त इतनी कड़ी धूप में भगवान के घर पहुँच गया और मंदिर की इतनी प्यारी सजावट देखकर भावविभोर हो गया !!!
भक्त ने फिर मंदिर के अंदर जाने का किसी से रास्ता पूछा ! किसी ने उसे रास्ता बता दिया और कहा यह जो लाईने लगी हुई है आप भी उस लाइन में लग जाओ !!!
वो भक्त भी लाईन में लग गया वहाँ बहुत ही भीड़ थी पर एक और लाइन उसके साथ ही थी पर वो एकदम खाली थी !
भक्त को बड़ी हैरानी हुई की यहाँ इतनी भीड़ और यहाँ तो बारी ही नही आ रही और वो लाइन से लोग जल्दी जल्दी दर्शन करने जा रहे है !!!
उस भक्त से रहा न गया उसने अपने साथ वाले भक्त से पूछा की भैया यहाँ इतनी भीड़ और वो लाइन इतनी खाली क्यों है और वहाँ सब जल्दी जल्दी दर्शन के लिए कैसे जा रहे है वो तो हमारे से काफी बाद में आए है !!!
उस दूसरे भक्त ने कहा भाई यह VIP लाइन है जिसमे शहर के अमीर लोग है !!!
भक्त की सुनते ही आँखे खुली रह गई उसने मन में सोचा भगवान के दर पे क्या अमीर क्या गरीब यहाँ तो सब समान होते है !!!
कितनी देर भूखे प्यासे रहकर उस भक्त की बारी दरबार में आ ही गई और भगवान को वो दूर से देख रहा था और उनकी छवि को देखकर बहुत आनंदित हो रहा था !
वो देख रहा था की भगवान को तो सब लोग यहाँ छप्पन भोग चढ़ा रहे है और वो अपने थोड़े से अमरुद सब से छुपा रहा था !!!
जब दर्शन की बारी आई तो सेवादारो ने उसे ठीक से दर्शन भी नही करने दिए और जल्दी चलो जल्दी चलो कहने लगे ! उसकी आँखे भर आई और उसने चुपके से अपने वो अमरुद वहाँ रख दिए और दरबार से बाहर चला गया !!!
दरबार के बाहर ही लंगर प्रशाद लिखा हुआ था ! भक्त को बहुत भूख लगी थी सोचा अब प्रशाद ग्रहण कर लू !!!
जेसे ही वो लंगर हाल के गेट पर पहुँचा तो 2 दरबान खड़े थे वहाँ उन्होंने उस भक्त को रोका और कहा पहले VIP पास दिखाओ फिर अंदर जा सकोगे !!!
भक्त ने कहाँ यह VIP पास क्या होता है मेरे पास तो नही है ! उस दरबान ने कहा की यहाँ जो अमीर लोग दान करते है उनको पास मिलता है और लंगर सिर्फ वो ही यहाँ खा सकते है !!!
भक्त की आँखों में इतने आँसू आ गए और वो फूट फूट कर रोने लगा और भगवान से नाराज़ हो गया और अपने घर वापिस जाने लगा !!!
रास्ते में वो भगवान से मन में बातें करता रहा और उसने कहा प्रभु आप भी अमीरों की तरफ हो गए आप भी बदल गए प्रभु मुझे आप से तो यह आशा न थी और सोचते सोचते सारे रास्ते रोता रहा !!!
भक्त घर पर पहुँच कर रोता रोता सो गया !!!
भक्त को भगवान् ने नींद में दर्शन दिए और भक्त से कहा तुम नाराज़ मत होओ मेरे प्यारे भक्त !!!
भगवान ने कहा अमीर लोग तो सिर्फ मेरी मूर्ति के दर्शन करते है ! अपने साक्षात् दर्शन तो मै तुम जैसे गरीबो और भक्तों को देता हूँ ...
और मुझे छप्पन भोग से कुछ भी लेंना देंना नही है मै तो भक्त के भाव खाता हूँ और उनके आँसू पी लेता हूँ और यह देख मै तेरे भाव से चढ़ाए हुए अमरुद खा रहा हूँ !!!
भक्त का सारा संदेह दूर हुआ और वो भगवान के साक्षात् दर्शन पाकर गदगद हो गया और उसका गोविन्द गोदाम जाना सफल हुआ और भगवान को खुद उसके घर चल कर आना पड़ा !!!
भगवान भाव के भूखे है बिन भाव के उनके आगे चढ़ाए छप्पन भोग भी फीके है !!!
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((( जय जय श्री राधे )))
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31/08/2016
(आखिर कैसे हुआ था भीष्म पितामह का जन्म)
भीष्म पितामह के पिता का नाम राजा शांतनु था। एक बार शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगातट पर जा पहुंचे। उन्होंने वहां एक परम सुंदर स्त्री देखी। उसके रूप को देखकर शांतनु उस पर मोहित हो गए। शांतनु ने उसका परिचय पूछते हुए उसे अपनी पत्नी बनने को कहा। उस स्त्री ने इसकी स्वीकृति दे दी, लेकिन एक शर्त रखी कि आप कभी भी मुझे किसी भी काम के लिए रोकेंगे नहीं अन्यथा उसी पल मैं आपको छोड़कर चली जाऊंगी। शांतनु ने यह शर्त स्वीकार कर ली तथा उस स्त्री से विवाह कर लिया।
इस प्रकार दोनों का जीवन सुखपूर्वक बीतने लगा। समय बीतने पर शांतनु के यहां सात पुत्रों ने जन्म लिया, लेकिन सभी पुत्रों को उस स्त्री ने गंगा नदी में डाल दिया। शांतनु यह देखकर भी कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि उन्हें डर था कि यदि मैंने इससे इसका कारण पूछा तो यह मुझे छोड़कर चली जाएगी। आठवां पुत्र होने पर जब वह स्त्री उसे भी गंगा में डालने लगी तो शांतनु ने उसे रोका और पूछा कि वह यह क्यों कर रही है?
उस स्त्री ने बताया कि मैं देवनदी गंगा हूं तथा जिन पुत्रों को मैंने नदी में डाला था वे सभी वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था। उन्हें मुक्त करने लिए ही मैंने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। आपने शर्त न मानते हुए मुझे रोका। इसलिए मैं अब जा रही हूं। ऐसा कहकर गंगा शांतनु के आठवें पुत्र को लेकर अपने साथ चली गई।
गंगा जब शांतनु के आठवे पुत्र को साथ लेकर चली गई तो राजा शांतनु बहुत उदास रहने लगे। इस तरह थोड़ा और समय बीता। शांतनु एक दिन गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे। वहां उन्होंने देखा कि गंगा में बहुत थोड़ा जल रह गया है और वह भी प्रवाहित नहीं हो रहा है। इस रहस्य का पता लगाने जब शांतनु आगे गए तो उन्होंने देखा कि एक सुंदर व दिव्य युवक अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है और उसने अपने बाणों के प्रभाव से गंगा की धारा रोक दी है।
यह दृश्य देखकर शांतनु को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां शांतनु की पत्नी गंगा प्रकट हुई और उन्होंने बताया कि यह युवक आपका आठवां पुत्र है। इसका नाम देवव्रत है। इसने वसिष्ठ ऋषि से वेदों का अध्ययन किया है तथा परशुरामजी से इसने समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की कला सीखी है। देवव्रत का परिचय देकर गंगा उसे शांतनु को सौंपकर चली गई। शांतनु देवव्रत को लेकर अपनी राजधानी में लेकर आए तथा शीघ्र ही उसे युवराज बना दिया।
30/08/2016
*श्रीपद्मनाभ पुरुषोत्तम वासुदेव वैकुण्ठ माधव जनार्दन चक्रपाणे ।*
*श्रीवत्सचिह्न शरणागतपारिजात श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ।।*
हे पद्मनाथ ! हे पुरुषोत्तम ! हे वासुदेव ! वैकुण्ठ के प्रभु ! माधव ! जनार्दन ! चक्रपाणि ! जिसकी छाती पर श्रीवत्स (जहाँ श्री रहती है ) का चिन्ह है । जो स्वर्गीय पैद पडिज़ात हैं, क्युकि अपने कमलों में शरण लेने वालों की सभी कहा पूरा करते हैं। आप को नमस्कार ! हे वेंकटचल के प्रभु, यह भोर आपको समर्पित हो।
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