17/09/2026
*जिसने वर्षों तक वार्ड की गलियों को अपना घर समझा, लोगों के सुख-दुःख को अपना समझा… चुनाव आया तो पार्टी ने उसी के लिए दरवाज़ा बंद कर लिया*
बीकानेर के निकाय चुनाव ने सिर्फ प्रत्याशी नहीं चुने, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है।
जो कार्यकर्ता वर्षों से अपने वार्ड की हर समस्या में सबसे आगे रहा,
जो सड़क, पानी, सफाई से लेकर आम आदमी की हर छोटी-बड़ी परेशानी में साथ खड़ा रहा,
जिसने चुनाव के बिना भी जनता के बीच अपनी पहचान बनाई—
जब टिकट देने का समय आया, तो उसकी वर्षों की मेहनत पीछे छूट गई।
टिकट उन लोगों को मिली जो पार्टी के पुराने और बड़े चेहरे हैं। उनका राजनीतिक अनुभव और कद अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि क्या संगठन में जमीनी मेहनत और वार्ड के लोगों के बीच बनी स्वीकार्यता का भी उतना ही महत्व है?
यह किसी व्यक्ति के खिलाफ सवाल नहीं है।
सवाल उस सोच का है, जिसमें वर्षों तक जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता की मेहनत से ज्यादा उसका राजनीतिक कद महत्वपूर्ण हो जाता है।
टिकट किसी का अधिकार नहीं होती, लेकिन कार्यकर्ता की मेहनत और निष्ठा को बार-बार नजरअंदाज किया जाए तो संगठन के भीतर भरोसा जरूर कमजोर होता है।
क्योंकि बड़े नेता मंच पर पार्टी का चेहरा होते हैं,
लेकिन जमीनी कार्यकर्ता ही पार्टी का हाथ बनकर हर घर तक पहुंचता है।
और उस कार्यकर्ता के मन में एक दिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है—
“जब पार्टी को मेरी जरूरत थी, तब मैं हर मोर्चे पर खड़ा था… फिर जब मेरी बारी आई, तो मेरी मेहनत किस काम आई?”
चुनाव की तारीख कुछ महीनों में आती है,
लेकिन चुनाव की जमीन बनाने में कार्यकर्ता को वर्षों लगते हैं। ।। इन निकाय चुनावो में भी कई मेहनती और लायक कार्यकर्ताओं को निराश होना पड़ा, जिनमें वार्ड 8 से मनोज प्रजापत, उनकी जगह टिकट मिली पैराशूट उम्मीदवार भगवान सिंह मेड़तिया को, वार्ड 18 से संजय भाटी, जिनकी जगह टिकट मिला पैराशूट उम्मीदवार मकसूद अहमद को, वार्ड 50 से मुबारक हुसैन, ओर यहां टिकट मिला पैराशूट उम्मीदवार नवरत्न डागा को, ♥️