Prof Dr Manju Verma : समाज का आईना

Prof Dr  Manju Verma :   समाज का आईना

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समाज को जागरूक करना

08/03/2026

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं

कविता

बनो अपनी ही आवाज़

कहो सखी
कह भी दो अब
कब तक.....आख़िर कब तक
रहोगी मौन यूँ......
झुलस जाएगा
तेरा यह सब
जप तप
धरे रह जाएंगे तेरे
कुर्बानी के किस्से
कोई गाथा ना
लिखी जाएगी
आज हैं जो याद
कल सब भूल जाएंगे
कह दो......
बनो अपनी ही आवाज़

समेट लो शब्दों को
घर घर बन रहा
राजनीति का अखाड़ा है
करो बुलन्द स्वर अपना
जो ना कह सकी
तुम अपनी
व्यथा
अपनी पीड़ा
वो
दर्द सदा
अनकहा ही रह जाएगा
सौंप दो उसे
ढाल दो लफ़्ज़ों में
उठो बिना पंख
परवाज़ भरो
वर्ष दर वर्ष बीत रहा है
साहस जुटा कर
लो एक संकल्प
ना रहोगी मौन अब.....
बनो अपनी ही आवाज़.....

हो कर शिक्षित
सशक्त बनो
अपने दम पर
अपने बल पर
तुम नारी हो
पर
जीवन से नहीं हारी हो ......
उठो अपने दम पर
कमान सम्भालो
अपने बल पर
अर्जुन की तरह
निशाना साधो
एक नया इतिहास रचने को
तुम लम्बी उड़ान भरो
भूल कर अवसाद सारे
अवसर की तलाश करो
बनो अपनी ही आवाज़......!!!

प्रो. डॉ. मंजू वर्मा, रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़
यह कविता मेरे काव्य संग्रह " चिर विरहिणी " में संकलित की गई है I

24/01/2026

राष्ट्रीय बिटिया दिवस 24 -01-2026

बिटिया दिवस के उपलक्ष में एक कडवा सत्य जो मैंने भी देखा है शायद आप भी देख रहे होंगे l कहने से बिटिया दिवस के कोई मायने नहीं पहले बेटियों को बेटे के बराबर अधिकार दो फिर कहो : बेटी दिवस
वर्ना बड़े बड़े पोस्टर और लेख सब काग़ज़ी है l

समाज का आईना

क्या बेटी होना गुनाह है .....?

मुझे बेटी होने का या एक स्त्री होने का ज़रा भी अफसोस नहीं है.......ज़रा भी नहीं l बल्कि मुझे अपने आप पर गर्व है कि मैंने जो भी करने के लिए सोचा चाहे वो उच्च शिक्षा हो या किसी क्षेत्र मे प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला हो तो उसे हासिल करने के लिए मैने अपने परिश्रम का सौ फीसदी जरूर दिया है l आप यकीन मानिये कि अगर कल को मुझे सृष्टि के रचयिता की ओर से मान लीजिए दोबारा जन्म लेते समय यह विकल्प दिया जाए, " हे बालिके तुम इस जन्म में पुत्र या पुत्री दोनों में से जो चाहे बन सकती हो......"
तो मेरा ज़वाब होगा कि मैं फिर से पुत्री ही बनना चाहूँगी l क्योंकि एक बेटी या स्त्री होने के नाते मेरे अन्दर यह भावना कभी नहीं आई कि यह उद्देश्य मैं इस लिए नहीं पूरा कर सकती कि मैं एक स्त्री हूँ या अबला नारी हूँ या अर्थिक रूप से किसी पर निर्भर हूँ l हालांकि मुझे सृष्टि के रचयिता से एक गिला भी है l वो यह है कि उसने सृष्टि की रचना करते समय भेदभाव के बीज़ क्यों बोये l उसने समाज में पुरुष को उच्च स्तरीय रख कर स्त्री को पुरुष की अपेक्षा निम्न क्यों रखा है l एक ओर तो समाज मे परिवार बनाने के लिए तो पुरुष और स्त्री दोनों को पति पत्नी के रूप में बराबर का उतरदायित्व है l फिर स्त्री और पुरुष के अधिकारों में असमानता क्यों है l जब परिवार का उतरदायित्व दोनों का बराबर है तो अधिकार बराबर क्यों नहीं है l मेरे जेहन में ऐसे बहुत से प्रश्न है l
ओह ! मैं यह तो भूल ही गयी, कि यह असमानता नाम का बीज़ सृष्टि के रचयिता ने थोड़ा बोया है l यह तो समाज ने स्वयं तह किया है कि शरीर से बलशाली पुरुष, शारीरिक रूप में कोमल स्त्री की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली और अधिकृत होगा l क्यों .......ऐसा क्यों .....? धीरे-धीरे समाज के यह नियम पक्के होते गए कि माता- पिता की विरासत का हकदार केवल घर का बेटा ही होगा l घर की बेटी का कोई अधिकार नहीं होगा l शायद इस लिए कि वो ब्याह के बाद अपने पति के घर रहती है और ऐसे में जो भी उसको पिता की जायदाद से मिलेगा वो उसके पति के साथ बांटना होगा जो कि एक स्वभाविक सी बात है l जो भी सम्भावनाएं हो सकती है वो तो अपनी जगह हैं और बेटी का अधिकार अपनी जगह होना चाहिए l इस से भी बढ़ कर सबसे अहम प्रश्न तो यह है कि माता -पिता का बेटी के प्रति प्रेम कहाँ है l
एक फेमिनिस्ट हिस्टोरियन के नाते करीबन अट्ठतीस वर्षों तक मैंने पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में स्त्रियों की समस्याओं और समाधानों के बारे में स्वयं भी शोध किया है और दुसरों को भी कराया है और अपने विद्यार्थीयों को भी पढाया है l भारतीय कानून बेटी को बेटे के बराबर का दरजा देते हुए माता पिता की विरासत में बराबर मानता है l परन्तु बहुत कम बेटियों को अपने भाई के बराबर हिस्सा मिलता है l चाहे वो अपने हक के लिए जितना भी गिड़गिड़ाती रहें क्योंकि उन्हें ना ही माता पिता हक देना चाहते हैं ना ही उनके भाई जायदाद का हिस्सा देना चाहते है l यदि कोई बेटी अपने हक के लिए आवाज भी उठाती है तो उसके भाई भाभी सब मज़ाक बनाते है और उसके हक को दबाना चाहते हैं बजाय कि किसी भी स्तिथि का सौहार्दपूर्ण समाधान करने के स्थान पर उस स्तिथि से पूर्ण लाभान्वित हो रहे हैं l जो बहन भाई अपना बचपन साथ बिताते हैं एक दूसरे के प्रति निस्वार्थ प्रेम और स्नेह से रहते हैं वो विरासत की अनुचित तकसीम पर एक दूसरे के इतने खिलाफ हो जाते हैं कि सारे खूनी रिश्ते बेमानी हो जाते हैं l वर्षों के समबन्ध तार तार हो जाते हैं l ऐसा क्यों l क्या हमारे माता पिता की विरासत पर बेटियों का कोई हक नहीं है ? होना तो चाहिए यद्यपि बेटे के बराबर नहीं तो कुछ ना कुछ हिस्सा अवश्य होना चाहिए l परंतु कहाँ मिलता है ? मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि किसी को नहीं मिलता l जरूर मिलता होगा परंतु साधारणतया बहुत कम बेटियों को उनके माता-पिता की विरासत का हिस्सा मिलता है l तकरीबन बेटियों को भावुकता से भाई भाभी को माता-पिता के बाद मायके के नाम पर बने रहने का हवाला दे कर हिस्सा लेने से रोक दिया जाता है और बेटियाँ मान भी लेती हैं l जब कि मैंने बहुत सी बेटियों की माता-पिता के बाद ही भाई भाभी के साथ अनबन होती भी देखी है l माता पिता अपनी विरासत का अपने सामने सही विभाजन क्यो नहीं करते l
बेटी को इस लिए हक नहीं मिलता कि वो हिस्सा दामाद के रूप मे बेगाने बेटे को जाएगा l एक कहावत है :
जवाई जवां दी छां
ना कुत्ते नू छां
ना कां नू छां
अर्थात कि दामाद जवां के पौधे की तरह है जिसकी छाया नाम मात्र होती है तो उसकी छाया में बेटी के माता पिता कैसे कैसे रह सकते हैं l
और माता पिता जो जायदाद का हिस्सा बेटे को देते है वो भी तो घर की बहू के रूप में बेगानी बेटी के पास ही जाता है एक किस्म से .......उसका क्या ? लीजिए यहां मैं एक और पंजाबी कहावत कहना चाहूँगी :
धीयां धिरां पुत् सरीक
यानि कि बेटी अपने विवाह के बाद भी माता पिता के लिए सदैव उनकी ही रहती है और पुत्र विवाह के बाद बदल जाते हैं l इसका यह मतलब है कि आप अपनी आजीवन संचित विरासत को बहू के रूप में बेगानी बेटी को तो उसका सुख भोगने के लिए देने को तैयार है परंतु अपनी बेटी को नहीं देने को तैयार ऐसा क्यों ? यह कैसी मानसिकता है और बेटी के प्रति कितनी निष्ठुरता है l क्या यह बेटी के प्रति अन्याय नहीं है l मैने देखा है कई घर परिवारों में जन्म से ही बेटी को बेटे की अपेक्षा कम आंका जाता है....... ऐसा क्यों ?
मैंने कृषि प्रधान समाज की विरासत पर भी कई बार अपने अध्यापन के दौरान चर्चा की है, चूंकि मैं एक पत्राचार विभाग में प्रोफेसर थी तो जब भी कक्षा होती तो पंजाब के कई भागों से विद्यार्थी पत्राचार दुआरा आयोजित कक्षा में पढ़ने के लिए आते और इस तरह के विषयों पर भी चर्चा होती थी l
निसंदेह कृषि योग्य भूमि का विभाजन सरल नहीं है l इस का अंदाजा तो मुझे भी है l परंतु बेटी को देने के लिए उपज का कुछ ना कुछ हिस्सा वार्षिक रूप से दिया जाना चाहिए l ऐसी राय बहुत सी लड़कियों की थी जो पढ़ने के लिए आती थी l परंतु उन्हों ने कहा कि हमे कुछ नहीं मिलता है l

हमारी पीढ़ी के माता- पिता बहुत हद्द तक अपनी बेटियों के दुख सुख के प्रति फिर भी संवेदनशील दिखाई देते है l परंतु मेरे से पहले की पीढ़ी को मैंने देखा है उन्हें अपनी बेटियों के दुख दर्द से कोई सरोकार नहीं l वो अपनी बेटियों के दुख दर्द को उनका कर्म फल और भाग्य मान लेते है बस l
परंतु इसके विपरीत अपने बेटे की छोटी से छोटी समस्या में भी उनके साथ खड़े नज़र आते है ......देखा है मैने ......कहते हुए.......पुत्र कोई बात नहीं हम जिंदा है तुम चिंता ना करो......और फिर घर के सारे स्तोत्र बेटे पर न्यौछावर हो जाते हैं......करने भी चाहिए आखिर हम माता- पिता अपने बच्चों के लिए ही तो संचित करते हैं.......परंतु अपनी बेटी के लिए क्यों नहीं......? ऐसा क्यों है ....? उसको तो......उसके ही संघर्ष के लिए क्यों छोड़ा जाता है ? मुझे लगता है इस सब के पीछे कहीं ना कहीं हमारे तुम्हारे भाइयों का निजी स्वार्थ और हाथ भी है जो नहीं चाहते कि उनके घर की बेटी यानि कि बहन को कोई आर्थिक सहायता मिले l ऐसे भाई अपनी बेटी के लिए तो अवश्य ही संवेदनशील होंगे l परंतु बहनों के लिए नहीं होते l ऐसा क्यों......,मेरे मन में ऐसे कई प्रश्न हैं...... जिनका मै उत्तर ढूँढने का प्रयास कर रही हूँ......शायद मैं ऐसी स्तिथि से गुजर रही हूँ इस लिए......आप में से और भी मेरे जैसी कई संघर्षशील स्त्रियां होंगी जो मेरे साथ सहमत होंगी......और कई मेरे पुरुष भाई भी होंगे जो मेरे साथ सहमत नहीं होंगे.....उनसे मैं क्षमा चाहती हूँ क्योंकि......दर्द की भाषा को समझने के लिये हरेक के पास दिल नहीं होता........l
दूसरा पहलू है कि कानून के होते हुए भी हक नहीं मिलता l यहां मेरा एक और तर्क है कि जिस माता-पिता ने अपनी बेटी के लिए कुछ करना है उसे कानून की जरूरत नहीं है ना ही किसी तरह के बंधन की l वो जो भी करेंगे अपनी बेटी के प्यार में करेंगे l दामाद के साथ बेटे की तरह व्यवहार करने से वो भी जवां की छाया के स्थान पर बरगद की छाया बन सकता है l यह भी जरूरी नहीं कि बहू हर परीक्षा में खरी उतरे l
अब मैं यहाँ विरासत के अतिरिक्त कुछ और साझा करना चाहती हूं l जैसे कि माता- पिता अपनी बेटियों की वक्त बेवक्त मदद करने में भी कभी-कभी सामने नहीं आते,,,,,ऐसा क्यों ?

इस सन्दर्भ में मैं आप को एक सच पर आधारित उदाहरण देना चाहूँगी जिसे मैंने अपने सर्वेक्षण के दौरान सुना औरअनुभव किया है.......
चंडीगढ़ के निकट जी ਟੀ रोड पर स्थित कृत्रिम अंग लगाने का एक केंद्र है जिसे किसी सेना के वरिष्ठ अधिकारी ने सेवानिवृत्त होने के बाद खोला है l बहुत ही बेहतरीन और बेमिसाल केंद्र है मेरा उन फौजी भाई को सलाम है और मेरे पास उनकी इस निस्वार्थ प्रेम सेवा के लिए कोई शब्द ही नहीं है :
जो मै कहना चाहती हूँ वो 38-39 वर्ष पहले का है l पंजाब के किसी गाँव की लड़की का कहीं रिश्ता तह हुआ l कुछ समय बाद उस लड़की को पता चला कि लड़का तो शराब बहुत पीता है इसलिए उसने वहाँ शादी करने से मना कर दिया l परंतु परिवार ने समझा बुझा कर लड़की की यह कह कर शादी कर दी कि अविवाहित लड़के तो अक्सर नशा करते ही है , विवाह के बाद वो बदल जाएगा l परंतु वो लड़का विवाह के बाद नहीं बदला और परिणामस्वरूप लड़की मार पीट होने की वजह से अपने मायके आगयी l फिर घर वालों ने समाज और ना जाने क्या क्या दलील दी और उसे फिर अपने ससुराल भेज दिया l ऐसे दो तीन बार उस लड़की का मायके आना जाना हुआ l लड़की को समझ आगयी कि मेरी कोई मदद नहीं करेगा l उस ने तंग आकर अपने जीवन का अंत करने के लिए एक दिन सामने से आती गाड़ी के आगे मरने के लिए रेल्वे ट्रैक पर लेट गयी l भाग्यवश वो लड़की मां बनने वाली थी, जैसे ही गाड़ी उसके निकट आयी उसके भीतर पल रहीं नन्ही सी जान की आवाज ने उसे जीने के लिए एक मकसद दे दिया l और उस लड़की ने आत्महत्या करने के विचार को त्याग कर ट्रैक से उठने का प्रयास किया और बच भी गयी परंतु दुर्भाग्य से उसकी दोनों बाजू गाड़ी से काटी गयी l ऐसी स्तिथि मे उसने अपने बच्चे को जन्म दिया l इस लड़की ने इसी कृत्रिम अंगों के केंद्र से अपनी दोनों बाजू बनवायी l
मैने इस लड़की को देखा है l 38-39 वर्ष पहले एक दिन मुझे इस केंद्र में किसी के साथ जाने का अवसर मिला तो भावुकता वश मैने उन फौजी भाई की इस सेवा भाव के लिए जब प्रशंसा की तो उन्होंने मुझे कहा " मैडम वर्मा जी बाहर एक लड़की बैठी है आप पहले उसे देख के आओ फिर आप को कुछ बताता हूँ l"
जब मैंने उस लड़की को बाहर ठीक ठाक स्तिथि में देखा तो उन्हों ने मुझे उस लड़की की सारी दुख भरी व्यथा सुनाई l अब वो लड़की कृत्रिम बाहों के साथ हर काम कर सकती है जिसे देख कर बहुत अच्छा लगा था l परंतु उसकी व्यथा सुन कर मेरा मन व्यथित हो गया और मुझे समाज की इस सोच पर खेद महसूस हुआ कि हम समाज के डर से अपनी बेटियों के साथ खड़े होने की बजाय किस समाज को प्राथमिकता देने की बात करते है और क्यों.......?
आप में से बहुत से लोग मेरे तर्क से सहमत नहीं होंगे मै उनसे क्षमा चाहती हूँ l फिर भी कहूँगी कि लिंग समानता के लिए परिवार ही सब कुछ कर सकता है l परिवारों को मिला कर ही समाज बनते हैं l इस लिए अपनी बेटियों की खुशियों को नजरअंदाज नहीं करें l

यदि मेरे इस आलेख को पढ़ कर कोई मुझ से अपनी व्यथा को साझा करना चाहें तो मै उसकी व्यथा को समाज का आईना में शामिल कर सकती हूँ l उनका नाम और पता हर तरह से गुप्त रखा जाएगा l एक फेमिनिस्ट हिस्टोरियन के नाते मेरा मकसद तो समाज में जागरुकता लाना है l

जारी रहेगा यूँ ही यह सफ़र......
समाज का आईना बन कर.......
मेरे साथ जुड़े रहें......आओ अपनी सोच को बदलें.....समाज को बदलें.......

( c) प्रो.( डॉ.) मंजू वर्मा रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़

09/01/2026

परोपकारी में पन्ना 17 पर प्रकशित
अप्रैल 1961
यह महर्षि दयानन्द की उत्तराधिकारिनी परोपकारीनी सभा का मुख्य पत्र था

09/01/2026

जनवरी 1961 के आर्याव्रत में प्रकाशित जीवाजीराव काटन मिल का एक विज्ञापन जो मर्यादा के दायरे में है l यह देख कर बहुत अच्छा लगा l

24/01/2025

बिटिया दिवस 24 -01-2025

बिटिया दिवस के उपलक्ष में एक कडवा सत्य जो मैंने भी देखा है शायद आप भी देख रहे होंगे l कहने से बिटिया दिवस के कोई मायने नहीं पहले बेटियों को बेटे के बराबर अधिकार दो फिर कहो : बेटी दिवस
वर्ना बड़े बड़े पोस्टर और लेख सब काग़ज़ी है l

समाज का आईना

क्या बेटी होना गुनाह है .....?

मुझे बेटी होने का या एक स्त्री होने का ज़रा भी अफसोस नहीं है.......ज़रा भी नहीं l बल्कि मुझे अपने आप पर गर्व है कि मैंने जो भी करने के लिए सोचा चाहे वो उच्च शिक्षा हो या किसी क्षेत्र मे प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला हो तो उसे हासिल करने के लिए मैने अपने परिश्रम का सौ फीसदी जरूर दिया है l आप यकीन मानिये कि अगर कल को मुझे सृष्टि के रचयिता की ओर से मान लीजिए दोबारा जन्म लेते समय यह विकल्प दिया जाए, " हे बालिके तुम इस जन्म में पुत्र या पुत्री दोनों में से जो चाहे बन सकती हो......"
तो मेरा ज़वाब होगा कि मैं फिर से पुत्री ही बनना चाहूँगी l क्योंकि एक बेटी या स्त्री होने के नाते मेरे अन्दर यह भावना कभी नहीं आई कि यह उद्देश्य मैं इस लिए नहीं पूरा कर सकती कि मैं एक स्त्री हूँ या अबला नारी हूँ या अर्थिक रूप से किसी पर निर्भर हूँ l हालांकि मुझे सृष्टि के रचयिता से एक गिला भी है l वो यह है कि उसने सृष्टि की रचना करते समय भेदभाव के बीज़ क्यों बोये l उसने समाज में पुरुष को उच्च स्तरीय रख कर स्त्री को पुरुष की अपेक्षा निम्न क्यों रखा है l एक ओर तो समाज मे परिवार बनाने के लिए तो पुरुष और स्त्री दोनों को पति पत्नी के रूप में बराबर का उतरदायित्व है l फिर स्त्री और पुरुष के अधिकारों में असमानता क्यों है l जब परिवार का उतरदायित्व दोनों का बराबर है तो अधिकार बराबर क्यों नहीं है l मेरे जेहन में ऐसे बहुत से प्रश्न है l
ओह ! मैं यह तो भूल ही गयी, कि यह असमानता नाम का बीज़ सृष्टि के रचयिता ने थोड़ा बोया है l यह तो समाज ने स्वयं तह किया है कि शरीर से बलशाली पुरुष, शारीरिक रूप में कोमल स्त्री की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली और अधिकृत होगा l क्यों .......ऐसा क्यों .....? धीरे-धीरे समाज के यह नियम पक्के होते गए कि माता- पिता की विरासत का हकदार केवल घर का बेटा ही होगा l घर की बेटी का कोई अधिकार नहीं होगा l शायद इस लिए कि वो ब्याह के बाद अपने पति के घर रहती है और ऐसे में जो भी उसको पिता की जायदाद से मिलेगा वो उसके पति के साथ बांटना होगा जो कि एक स्वभाविक सी बात है l जो भी सम्भावनाएं हो सकती है वो तो अपनी जगह हैं और बेटी का अधिकार अपनी जगह होना चाहिए l इस से भी बढ़ कर सबसे अहम प्रश्न तो यह है कि माता -पिता का बेटी के प्रति प्रेम कहाँ है l
एक फेमिनिस्ट हिस्टोरियन के नाते करीबन अट्ठतीस वर्षों तक मैंने पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में स्त्रियों की समस्याओं और समाधानों के बारे में स्वयं भी शोध किया है और दुसरों को भी कराया है और अपने विद्यार्थीयों को भी पढाया है l भारतीय कानून बेटी को बेटे के बराबर का दरजा देते हुए माता पिता की विरासत में बराबर मानता है l परन्तु बहुत कम बेटियों को अपने भाई के बराबर हिस्सा मिलता है l चाहे वो अपने हक के लिए जितना भी गिड़गिड़ाती रहें क्योंकि उन्हें ना ही माता पिता हक देना चाहते हैं ना ही उनके भाई जायदाद का हिस्सा देना चाहते है l यदि कोई बेटी अपने हक के लिए आवाज भी उठाती है तो उसके भाई भाभी सब मज़ाक बनाते है और उसके हक को दबाना चाहते हैं बजाय कि किसी भी स्तिथि का सौहार्दपूर्ण समाधान करने के स्थान पर उस स्तिथि से पूर्ण लाभान्वित हो रहे हैं l जो बहन भाई अपना बचपन साथ बिताते हैं एक दूसरे के प्रति निस्वार्थ प्रेम और स्नेह से रहते हैं वो विरासत की अनुचित तकसीम पर एक दूसरे के इतने खिलाफ हो जाते हैं कि सारे खूनी रिश्ते बेमानी हो जाते हैं l वर्षों के समबन्ध तार तार हो जाते हैं l ऐसा क्यों l क्या हमारे माता पिता की विरासत पर बेटियों का कोई हक नहीं है ? होना तो चाहिए यद्यपि बेटे के बराबर नहीं तो कुछ ना कुछ हिस्सा अवश्य होना चाहिए l परंतु कहाँ मिलता है ? मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि किसी को नहीं मिलता l जरूर मिलता होगा परंतु साधारणतया बहुत कम बेटियों को उनके माता-पिता की विरासत का हिस्सा मिलता है l तकरीबन बेटियों को भावुकता से भाई भाभी को माता-पिता के बाद मायके के नाम पर बने रहने का हवाला दे कर हिस्सा लेने से रोक दिया जाता है और बेटियाँ मान भी लेती हैं l जब कि मैंने बहुत सी बेटियों की माता-पिता के बाद ही भाई भाभी के साथ अनबन होती भी देखी है l माता पिता अपनी विरासत का अपने सामने सही विभाजन क्यो नहीं करते l
बेटी को इस लिए हक नहीं मिलता कि वो हिस्सा दामाद के रूप मे बेगाने बेटे को जाएगा l एक कहावत है :
जवाई जवां दी छां
ना कुत्ते नू छां
ना कां नू छां
अर्थात कि दामाद जवां के पौधे की तरह है जिसकी छाया नाम मात्र होती है तो उसकी छाया में बेटी के माता पिता कैसे कैसे रह सकते हैं l
और माता पिता जो जायदाद का हिस्सा बेटे को देते है वो भी तो घर की बहू के रूप में बेगानी बेटी के पास ही जाता है एक किस्म से .......उसका क्या ? लीजिए यहां मैं एक और पंजाबी कहावत कहना चाहूँगी :
धीयां धिरां पुत् सरीक
यानि कि बेटी अपने विवाह के बाद भी माता पिता के लिए सदैव उनकी ही रहती है और पुत्र विवाह के बाद बदल जाते हैं l इसका यह मतलब है कि आप अपनी आजीवन संचित विरासत को बहू के रूप में बेगानी बेटी को तो उसका सुख भोगने के लिए देने को तैयार है परंतु अपनी बेटी को नहीं देने को तैयार ऐसा क्यों ? यह कैसी मानसिकता है और बेटी के प्रति कितनी निष्ठुरता है l क्या यह बेटी के प्रति अन्याय नहीं है l मैने देखा है कई घर परिवारों में जन्म से ही बेटी को बेटे की अपेक्षा कम आंका जाता है....... ऐसा क्यों ?
मैंने कृषि प्रधान समाज की विरासत पर भी कई बार अपने अध्यापन के दौरान चर्चा की है, चूंकि मैं एक पत्राचार विभाग में प्रोफेसर थी तो जब भी कक्षा होती तो पंजाब के कई भागों से विद्यार्थी पत्राचार दुआरा आयोजित कक्षा में पढ़ने के लिए आते और इस तरह के विषयों पर भी चर्चा होती थी l
निसंदेह कृषि योग्य भूमि का विभाजन सरल नहीं है l इस का अंदाजा तो मुझे भी है l परंतु बेटी को देने के लिए उपज का कुछ ना कुछ हिस्सा वार्षिक रूप से दिया जाना चाहिए l ऐसी राय बहुत सी लड़कियों की थी जो पढ़ने के लिए आती थी l परंतु उन्हों ने कहा कि हमे कुछ नहीं मिलता है l

हमारी पीढ़ी के माता- पिता बहुत हद्द तक अपनी बेटियों के दुख सुख के प्रति फिर भी संवेदनशील दिखाई देते है l परंतु मेरे से पहले की पीढ़ी को मैंने देखा है उन्हें अपनी बेटियों के दुख दर्द से कोई सरोकार नहीं l वो अपनी बेटियों के दुख दर्द को उनका कर्म फल और भाग्य मान लेते है बस l
परंतु इसके विपरीत अपने बेटे की छोटी से छोटी समस्या में भी उनके साथ खड़े नज़र आते है ......देखा है मैने ......कहते हुए.......पुत्र कोई बात नहीं हम जिंदा है तुम चिंता ना करो......और फिर घर के सारे स्तोत्र बेटे पर न्यौछावर हो जाते हैं......करने भी चाहिए आखिर हम माता- पिता अपने बच्चों के लिए ही तो संचित करते हैं.......परंतु अपनी बेटी के लिए क्यों नहीं......? ऐसा क्यों है ....? उसको तो......उसके ही संघर्ष के लिए क्यों छोड़ा जाता है ? मुझे लगता है इस सब के पीछे कहीं ना कहीं हमारे तुम्हारे भाइयों का निजी स्वार्थ और हाथ भी है जो नहीं चाहते कि उनके घर की बेटी यानि कि बहन को कोई आर्थिक सहायता मिले l ऐसे भाई अपनी बेटी के लिए तो अवश्य ही संवेदनशील होंगे l परंतु बहनों के लिए नहीं होते l ऐसा क्यों......,मेरे मन में ऐसे कई प्रश्न हैं...... जिनका मै उत्तर ढूँढने का प्रयास कर रही हूँ......शायद मैं ऐसी स्तिथि से गुजर रही हूँ इस लिए......आप में से और भी मेरे जैसी कई संघर्षशील स्त्रियां होंगी जो मेरे साथ सहमत होंगी......और कई मेरे पुरुष भाई भी होंगे जो मेरे साथ सहमत नहीं होंगे.....उनसे मैं क्षमा चाहती हूँ क्योंकि......दर्द की भाषा को समझने के लिये हरेक के पास दिल नहीं होता........l
दूसरा पहलू है कि कानून के होते हुए भी हक नहीं मिलता l यहां मेरा एक और तर्क है कि जिस माता-पिता ने अपनी बेटी के लिए कुछ करना है उसे कानून की जरूरत नहीं है ना ही किसी तरह के बंधन की l वो जो भी करेंगे अपनी बेटी के प्यार में करेंगे l दामाद के साथ बेटे की तरह व्यवहार करने से वो भी जवां की छाया के स्थान पर बरगद की छाया बन सकता है l यह भी जरूरी नहीं कि बहू हर परीक्षा में खरी उतरे l
अब मैं यहाँ विरासत के अतिरिक्त कुछ और साझा करना चाहती हूं l जैसे कि माता- पिता अपनी बेटियों की वक्त बेवक्त मदद करने में भी कभी-कभी सामने नहीं आते,,,,,ऐसा क्यों ?

इस सन्दर्भ में मैं आप को एक सच पर आधारित उदाहरण देना चाहूँगी जिसे मैंने अपने सर्वेक्षण के दौरान सुना औरअनुभव किया है.......
चंडीगढ़ के निकट जी ਟੀ रोड पर स्थित कृत्रिम अंग लगाने का एक केंद्र है जिसे किसी सेना के वरिष्ठ अधिकारी ने सेवानिवृत्त होने के बाद खोला है l बहुत ही बेहतरीन और बेमिसाल केंद्र है मेरा उन फौजी भाई को सलाम है और मेरे पास उनकी इस निस्वार्थ प्रेम सेवा के लिए कोई शब्द ही नहीं है :
जो मै कहना चाहती हूँ वो 38-39 वर्ष पहले का है l पंजाब के किसी गाँव की लड़की का कहीं रिश्ता तह हुआ l कुछ समय बाद उस लड़की को पता चला कि लड़का तो शराब बहुत पीता है इसलिए उसने वहाँ शादी करने से मना कर दिया l परंतु परिवार ने समझा बुझा कर लड़की की यह कह कर शादी कर दी कि अविवाहित लड़के तो अक्सर नशा करते ही है , विवाह के बाद वो बदल जाएगा l परंतु वो लड़का विवाह के बाद नहीं बदला और परिणामस्वरूप लड़की मार पीट होने की वजह से अपने मायके आगयी l फिर घर वालों ने समाज और ना जाने क्या क्या दलील दी और उसे फिर अपने ससुराल भेज दिया l ऐसे दो तीन बार उस लड़की का मायके आना जाना हुआ l लड़की को समझ आगयी कि मेरी कोई मदद नहीं करेगा l उस ने तंग आकर अपने जीवन का अंत करने के लिए एक दिन सामने से आती गाड़ी के आगे मरने के लिए रेल्वे ट्रैक पर लेट गयी l भाग्यवश वो लड़की मां बनने वाली थी, जैसे ही गाड़ी उसके निकट आयी उसके भीतर पल रहीं नन्ही सी जान की आवाज ने उसे जीने के लिए एक मकसद दे दिया l और उस लड़की ने आत्महत्या करने के विचार को त्याग कर ट्रैक से उठने का प्रयास किया और बच भी गयी परंतु दुर्भाग्य से उसकी दोनों बाजू गाड़ी से काटी गयी l ऐसी स्तिथि मे उसने अपने बच्चे को जन्म दिया l इस लड़की ने इसी कृत्रिम अंगों के केंद्र से अपनी दोनों बाजू बनवायी l
मैने इस लड़की को देखा है l 38-39 वर्ष पहले एक दिन मुझे इस केंद्र में किसी के साथ जाने का अवसर मिला तो भावुकता वश मैने उन फौजी भाई की इस सेवा भाव के लिए जब प्रशंसा की तो उन्होंने मुझे कहा " मैडम वर्मा जी बाहर एक लड़की बैठी है आप पहले उसे देख के आओ फिर आप को कुछ बताता हूँ l"
जब मैंने उस लड़की को बाहर ठीक ठाक स्तिथि में देखा तो उन्हों ने मुझे उस लड़की की सारी दुख भरी व्यथा सुनाई l अब वो लड़की कृत्रिम बाहों के साथ हर काम कर सकती है जिसे देख कर बहुत अच्छा लगा था l परंतु उसकी व्यथा सुन कर मेरा मन व्यथित हो गया और मुझे समाज की इस सोच पर खेद महसूस हुआ कि हम समाज के डर से अपनी बेटियों के साथ खड़े होने की बजाय किस समाज को प्राथमिकता देने की बात करते है और क्यों.......?
आप में से बहुत से लोग मेरे तर्क से सहमत नहीं होंगे मै उनसे क्षमा चाहती हूँ l फिर भी कहूँगी कि लिंग समानता के लिए परिवार ही सब कुछ कर सकता है l परिवारों को मिला कर ही समाज बनते हैं l इस लिए अपनी बेटियों की खुशियों को नजरअंदाज नहीं करें l

यदि मेरे इस आलेख को पढ़ कर कोई मुझ से अपनी व्यथा को साझा करना चाहें तो मै उसकी व्यथा को समाज का आईना में शामिल कर सकती हूँ l उनका नाम और पता हर तरह से गुप्त रखा जाएगा l एक फेमिनिस्ट हिस्टोरियन के नाते मेरा मकसद तो समाज में जागरुकता लाना है l

जारी रहेगा यूँ ही यह सफ़र......
समाज का आईना बन कर.......
मेरे साथ जुड़े रहें......आओ अपनी सोच को बदलें.....समाज को बदलें.......

प्रो.( डॉ.) मंजू वर्मा ( रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ ) (c)

Photos from Prof Dr  Manju Verma :   समाज का आईना 's post 14/09/2024

राज सर आई.पी.एस.

मेरा और राज सर का मिलना किसी परिचय का मोहताज नहीं था...यह तो दिल का दिल से अनुबंधन था जो किसी चिर परिचित रिश्ते की डोर से बँधा था...पता नहीं कब से तलाश थी एक-दूजे की....जो वक्त और मुलाकात की जगह की मोहताज थी....शायद इतिहास विभाग का गलियारा और पंजाब विश्वविद्यालय का खूबसूरत परिसर जो हमारे रूहानी प्रेम का साक्ष्य बना I विश्वविद्यालय के परिसर में पता नहीं हमारे जैसे कितने ही प्रेम प्रसंगों की डोर में बंधे होंगे.....कुछ आकर्षण बन कर रह गये, कुछ वक्त के रोह में बह गए, कुछ वक्त की मार को सह गये और कुछ मुकम्मल हो कर रह गए.....कुछ मुकम्मल हो कर भी हमारे जैसे बेरहम हाथों से ढह गए ....
क्यों और कैसे ढह गया हमारे प्रेम का आशियाना .....जानने के लिए पढ़े....

" राज सर आई.पी.एस. "

लेखिका : प्रो.( डॉ.) मंजू वर्मा, रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़

15/06/2024

समाज का आईना
पर्दे की कुरीति


पर्दे की कुरीति के विषय मे एक बार पंचाल पंडिता के एक लेख को किसी अन्य हिन्दी के मासिक पत्र ने " पर्दे की छी छा लेदर " के अंतर्गत एक ऐसी घटना का उल्लेख किया जिसे पढ़ कर बहुत आश्चर्य भी हुआ और हँसी भी आई। उस से भी ज्यादा मुझे अपने भारतीय परिवारों और समाज की सोच, विचारधारा और मानसिकता के स्तर की जानकारी मिली। एक फेमिनिस्ट हिस्टोरियन के नाते मैंने सोचा कि मैं इस पोस्ट के माध्यम से अपने पाठकों से भी इस सत्य पर आधारित घटना को आप सब से साझा करूं। लीजिए प्रस्तुत है पर्दे की वज़ह से होने वाली दुर्गति या फजीहत ;
बात अंग्रेजों के जमाने की है यानि कि मेरी परदादी और दादी माँ के समय की। जब पर्दा प्रथा बहुत जोर पर थी। पंचाल पंडिता के अनुसार ---
एक बार जबलपुर में दो कन्याओं का विवाह हुआ जिनमें से एक कन्या धनपात्र क्षत्रिय की थी और दूसरी कन्या ब्राह्मण वंश की थी। एक की बारात कानपुर से आई और दूसरी कन्या की लखनऊ से आई। विवाह होने के पश्चात दोनों बारातें एक ही रेल और एक ही गाड़ी में रवाना हुईं। उन दिनों प्रयाग में गाड़ी बदलनी पड़ती थी। एक रेल्वे लाइन कानपुर और दूसरी रेल्वे लाइन लखनऊ जाती थी। उतरते हुए गड़बड़ हो जाया करती थी। यहाँ भी हो गयी जो बहुत ही बेवजह परेशान करने वाली थी। चूँकि नयी ब्याही कन्याओं ने पर्दा कर रखा था इसलिए अदला बदली स्वाभाविक थी। हुआ यह कि क्षत्रियों की कन्या ब्राह्मणों की बारात के पीछे-पीछे हो ली और ब्राह्मणों की बेटी क्षत्रियों की बारात के साथ हो ली।
जब दोनों कन्याएं अपने अपने ससुराल पहुंची तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। क्षत्रीय कन्या अपने मन मे विचारती थी कि मैं तो सुना करती थी कि मेरे ससुराल के बड़े धनपात्र हैं। घर में घोड़े और गाएँ हैं परन्तु यहाँ तो देखने को बकरी भी नहीं है । और दूसरी तरफ ब्राह्मण कन्या को भी आश्चर्य हुआ था क्योंकि उसने सुना था कि उसके ससुराल का घर छोटा सा है परन्तु यह तो बड़ा खुला मकान है और यहां तो घोड़े और गाएँ भी बँधी हैं ।
दो तीन दिन के बाद जब उन कन्याओं के भाई अपनी अपनी बहनो को लेने के लिए आए तब पता चला कि प्रयाग के रेल्वे स्टेशन पर गाड़ी बदलने के समय कन्याएँ बदल गईं थीं। इस तरह की सारी खराबियां पर्दे की कुरीति के कारण उत्पन्न होती रहीं हैं।


जारी रहेगा समीक्षा का वो हर दौर........यह प्रसंग फर्रुखाबाद के 1911 के अखबार भारत सुदशा प्रवर्तक की सत्य घटना पर आधारित है
मेरे साथ जुड़े रहें,,,,,,,,,,
मेरे पेज: समाज का आईना के साथ

प्रो ( डॉ) मंजू वर्मा , रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ (c)

07/05/2024

वर्ष 1895 के प्रसंग में --- बेमेल- विवाह

सधर्म प्रचारक नाम के समाचार पत्र से ज्ञात हुआ है कि बड़ौदा राज्य में एक अवदीच्य ब्राह्मण ने लोभ वश अपनी पुत्री का विवाह एक सत्तर बरस के बूढ़े से रुपया लेकर कर दिया था l लड़की के जवान होने पर बुढ़ऊ परलोक सिधार गया स्त्री ने 2-4 बरस बाद दूसरा विवाह कर लिया l पीछे बिरादरी वालों ने 500 रुपये दंड लेकर उसे जाति में मिला लिया I
एक और ऐसा बे मेल विवाह का प्रसंग हमें प्रयाग समाचार से मिला है l जिस से पता चला कि मद्रास में एक हिन्दू की लड़की का विवाह रुपये लेकर बूढ़े से ठहरा दिया ऐन विवाह के समय लड़की ने उसको पति अस्वीकार कर सभा मण्डप से भाग गई और अपनी माँ से जाकर कहा कि मैं मर जाऊँगी इस बुढ़वा के साथ ब्याह ना करुँगी l पीछे पंचायत ने भी कहा कि बूढ़े मियां अपने घर लौट जाएं l

स्तोत्र ( मासिक पत्र फर्रुखाबाद से )

24/04/2024

इतिहास के पन्नों में : सन्न 1906 के विशेष सन्दर्भ में

हमारे देश में बाल विवाह तो होते ही रहे हैं l परंतु कुछ अभिभावक रुपये-पैसे की लालच में अपनी बेटी का विवाह अधेड़ उम्र के पुरुष से भी करते थे I 60 वर्ष का बूढ़ा और 15 वर्ष की कन्या से विवाह कर उसकी मिट्टी पलीत करता है l और कहीं पर भरे पूरे घर का पांच वर्ष का वर है और 14-15 वर्ष की माता समान स्त्री की गोद का खिलौना बना रहा है l ऐसे ही विवाहों को अनमेल विवाह कहा जाता था l यह तथ्य अविश्वसनीय हो सकता है जो मैं कहने जा रही हूँ कि एक वर्ष की कन्या का विवाह भी होता रहा है l
परन्तु विगत मर्दम शुमारी के विश्लेषण से जो आंकड़े सामने आए हैं उन्हें तो नहीं झुठलाया जा सकता I इसके अनुसार एक साल से कम आयु की विधवा कन्याओं की संख्या 859 है l यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि यह गिनती 1901 की है l तात्पर्य यह है कि जो 1906 तक अधिक भी हो सकती है l
एक साल तक -- 859
एक से चार साल तक -- 11707
पांच से दस साल तक-- 227367
और 15 वर्ष से ऊपर की 30 लाख के लगभग थीं I
सब मिला कर दो करोड़ अट्ठावन लाख इक्यावनवे हज़ार नौ सौ छत्तीस विधवा थीं I

शेष

23/04/2024

यह प्रसंग 1906 का है l बंबई प्रांत के किसी किसी तालुके में कोई कोई हिन्दू अपनी कन्या का विवाह किसी देवता से कर देते थे और वह कन्या स्वतंत्रत हो जाती थी l डॉक्टर भंडारकर ने इस कुरीति को दण्ड संग्रह के विरुद्ध बता कर बम्बई के गवर्नर को मेमोरियल भेजा ताकि सरकार इस कुरीति पर ध्यान से विचार करे I

भारत सुदशा प्रवर्तक 1906 के सौजन्य से

23/03/2024

23 मार्च 2024
क्या हम शिक्षक .....आचार्य हैं.....?

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने राष्ट्र के उद्धार के लिए सूत्र बताते हुए कहा कि " ब्रह्मचर्य का नाश होने से भारतवर्ष का नाश हुआ है और ब्रह्मचर्य का उद्धार करने से ही फिर देश का उद्धार होगा l "

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने जीवन के आखिरी वर्ष राजपुताना में व्यतीत किए I उक्त शब्द उन्होंने तब कहे जब वह 1 881 में चित्तौड़ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले में अपने शिष्यों के साथ थे l लार्ड रिपन ने चित्तौड़ में एक दरबार का आयोजन किया था जिस में सारे राजस्थान के राजा- महाराजा इकट्ठे हुए थे l इसी अवसर पर महर्षि दयानंद को भी निमंत्रित किया गया था I उस समय वह उदयपुर रियासत के अतिथि थे l
वहाँ वीर क्षत्रियों की संतानों को मांस -मदिरा, अफीम तथा विषय वासना में फंसे देख ऋषि की अंतर्वेदना आँखों में आंसू बन और जिह्वा पर यह शब्द आए I
पंडित रघुवीर सिंह जी शास्त्री वेदवाचस्पति ने जब नवम्बर 1958 में " देशोद्धार का सूत्र " नाम का आलेख आर्य नाम के समाचार पत्र में प्रकाशित करवाया तो उस लेख में स्वामी जी के विचारों का भी जिक्र किया l
स्वामी जी के विचारों में भारतीय राष्ट्र तथा समाज के उद्धार की रूपरेखा स्पष्ठ झलकती है I वे एक सिद्धहस्त चिकित्सक की तरह समाज की नाड़ी पर हाथ रख कर यह जान गए कि समाज रूपी शरीर कैसे रूढ़िवादी विचारों से जर्जर और अंधविश्वास से कलुषित है l उन्हें यह समझने में देर ना लगी कि नैतिकता का पतन ही समाज के ह्रास का कारण है l और इस का मूल रोग ब्रह्मचर्य का नाश है और ब्रह्मचर्य के उद्धार से ही देश का उद्धार हो सकता है l
राष्ट्र निर्माण के लिए संतानों के चरित्र का निर्माण भी आवश्यक है जिसके लिए उन्होंने अध्यापक को सिद्ध हस्त शिल्पी मान कर अपनी विचारधारा दी I उस युग में अध्यापन कराने वाले को आचार्य कहा जाता था जिसके बहुत से कर्तव्य होते थे I केवल भूगोल, गणित, इतिहास, विज्ञान, साहित्य और धर्मशास्त्र आदि विषयों को पढ़ाने वाले गुरु को आचार्य नहीं कहा जाता था अपितु आचार्य उसे कहते थे जो " आचारंग्राहयति " होता भाव जो आचार का ग्रहण कराए I जो शिक्षा के विषयों के साथ साथ पग पग पर अपने शिष्यों को सदाचार का क्रियात्मक प्रशिक्षण दे जो स्वंय सदाचारी हो I ऐसे आचार्यों के निर्देशन में शिक्षा के साथ साथ शिष्यों के चरित्र का निर्माण भी किया जा सकता है जो कि राष्ट्र निर्माण के लिए अति आवश्यक है l

शेष फिर.......

प्रो. (डॉ. ) मंजू वर्मा , रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ (c)

22/03/2024

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