04/09/2021
या तो वक्त बदलना सीखो
या फिर बदलों वक्त के साथ
मज़बूरियों को कोसों मत
हर हालात में जीना सीखो।
पहाड़ी@uttarakhand # Traveller # Rider # Reader # Mountain boy�@social reformer
04/09/2021
या तो वक्त बदलना सीखो
या फिर बदलों वक्त के साथ
मज़बूरियों को कोसों मत
हर हालात में जीना सीखो।
02/05/2020
उत्तराखंडवासियों जागो रे
अगर कोई पूछें, जों मेरे घर का पता
मैं कहुं, बादलों के पार, स्वर्ग का है जहाँ से रास्ता, देवो के देव, महादेव का है जहाँ से वास्ता, कर्म प्रधान है जो भूमि, महक वीर जवानों की आती है जहाँ, लहू बहता है देश के लिए जिसका, मैं भारत के उस भाग का निवासी हूँ, "उत्तराखण्ड" है नाम जिसका।
पहाड़ों की मिट्टी को याद करता हूँ खेत खलियान को याद करता हूँ, मैं कामयाबी की तलाश में शहर की चमक में कही खो गया, मेरा पहाड़ मुझसे छुटा दिल में कही सो गया, इस जिन्दगी की रफ्तार में मैं भागने लगा,इस शहर के धुंए भरी जिन्दगी को सुबह मानने लगा, आज याद करता हूँ वो पहाड़ों की चहकती दमकती सुबह, ठंड से ठिठुरती नदियों में बहती काफ्लों में पकती सुबह, यहाँ मैं रातों में आसमान को गौर से निहारता हूँ, चांद तारे ढूंडने की कोशिश में धुंए के बादलों से हारता हूँ, फिर आती है अपने गाँव अपने पहाड़ों की रातें, तारों से रौशन आसमान बूंद बूंद टपकती बरसातें, हर बार सोचता हूँ अपने गाँव वापस जाने की, हर बार कोशिश करता हूँ इस दिल को मनाने की, पर ये जिम्मेदारियां ये पैसे ये शहर मुझे जकड़ लेते हैं, पहाड़ों की विशाल जमीन से दूर इस 12 फीट के कमरे में पटक देते हैं, अब तो गाँव में बैठी बूढी माँ भी मेरी राह देख कर थकती है, बैंक में बढ़ते पैसे और बेटे से बढ़ती दूरी पर वो बिलखती है, लाचार सा मैं, उसको झूठे दिलासे देता हुआ बस फोन पे बात करता हूँ, शहर के 12 फीट के इस कमरे से मैं, गाँव के मकान को याद करता हूँ, याद आते तो होंगे, वो बांज, वो बुरांस, जिनको जंगल में, अकेला छोड़ आए हो, सुबकता होगा पुश्तैनी मकान, जो कभी घर था, तुम उसको धीमे-धीमे, मरता छोड़ आए हो, वो भड्डू की दाल, खुशबू मंडुए की रोटी की, भाषा-बोली भी भूले तुम, सब कुछ हार आए हो, झूठी खुशियों की खातिर, पहाड़ रोता छोड़ आए हो, क्या याद हैं तुमको वो, स्वर्णिम सुबहें और मस्त शामें, तुम कौड़ियों के भाव, खज़ाना बेच आए हो,वो अब भी खड़ा है, वहीं तुम्हारे इंतजार में, तुम जहां उसको, अकेला छोड़ आए हो, राजनीती के राजाओं से मैं, हर दिन हर पल लुट रहा हूँ, पवित्र मेरी प्रकृति फिर भी, कराह रहा हूँ दर्द पलायन से, अपनों की राहें ताक रहा हूँ, किसी तरह बस जी रहा हूं, लेकिन कब तक ये सोच रहा हूँ, मै उत्तराखण्ड बोल रहा हूँ, संस्कृति नाम की बात रही न, सब बन बैठे हैं मॉडर्न, बढूंगा कैसे आगे दुनिया में, मेरे शर्म करते है पहाड़ी, मै बस दूर से देख देख रहा हूँ, अपनों के हाल पर सोच रहा हूँ, मै उत्तराखण्ड बोल रहा हूँ, आ जाओ मेरे अपनों अब तो आ जाओ ।।
इस स्कैच के लिए हमारी सम्पूर्ण टीम दिल से श्री Raj Rawat जी स्कैच आर्टिस्ट का धन्यवाद करते है, जिन्होंने हमारी सोच को अपनी कला के माध्यम से इस चित्र में दर्शाया है।
जय उततराखंड जय भारत।
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Regards