27/08/2026
कैंची धाम आश्रम में गर्मियों के दिन थे। नैनीताल के एक जाने-माने प्रोफेसर महाराज जी के दर्शन के लिए पहली बार आए थे। वह स्वभाव से काफी तार्किक और संशयवादी (skeptical) थे। वह यह परखना चाहते थे कि लोग जिन्हें चमत्कारी संत कहते हैं, क्या उनमें सच में कोई सच्चाई है या यह सब केवल अंधविश्वास है।
उस दिन आश्रम में काफी भीड़ थी। दोपहर के समय महाराज जी अपनी कुटिया में आराम करने चले गए और बाहर पहरा लगा दिया गया कि कोई अंदर न जाए।
प्रोफेसर साहब बाहर बगीचे में एक कोने में जा बैठे। धूप तेज थी और उन्हें भूख-प्यास भी लग रही थी। उन्होंने मन ही मन सोचा:
"अगर यह सच में पहुंचे हुए संत हैं, तो इन्हें पता होना चाहिए कि बाहर कोई भूखा-प्यासा बैठा है। अगर यह मुझे अभी बुलाकर कुछ खाने को दें, तब तो मैं मानूँ कि इनमें कोई शक्ति है।"
इतना सोचकर उन्होंने अपनी जेब से एक संतरा निकाला जो वह रास्ते से खरीद कर लाए थे। प्रोफेसर साहब ने चुपके से, बिना किसी को दिखे, एक बड़े पेड़ के पीछे जाकर वह संतरा खा लिया और उसके छिलके मिट्टी में दबा दिए। उन्होंने सोचा—अब अगर बाबा जी अंतर्यामी हैं, तो बताएं कि मैंने क्या सोचा और क्या किया।
लगभग पंद्रह मिनट बाद कुटिया का दरवाजा खुला। महाराज जी बाहर आए और सीधे प्रोफेसर साहब की तरफ देखने लगे। उन्होंने एक सेवक को इशारा किया और कहा, "उस प्रोफेसर को यहाँ बुलाओ।"
प्रोफेसर साहब जैसे ही महाराज जी के तख्त के पास पहुंचे और झुकने लगे, बाबा जी जोर से हंसे और उनका कंधा थपथपाते हुए बोले:
"अरे प्रोफेसर! पहले तो मन में परीक्षा ले रहे थे कि बाबा भूखे को खाना खिलाएगा या नहीं... और फिर खुद ही पेड़ के पीछे छिपकर संतरा खा गए! मीठा था या खट्टा?"
यह सुनते ही प्रोफेसर सन्न रह गए। उन्हें समझ आ गया कि जिस बात का गवाह उस पेड़ के अलावा कोई नहीं था, वह महाराज जी की नजरों से छिपी नहीं थी। महाराज जी ने मुस्कुराते हुए उन्हें डांटने के बजाय तुरंत मालपुआ और पूड़ी का प्रसाद मँगवाकर पेट भर खिलाया।
स्रोत: Miracle of Love (संकलनकर्ता: राम दास)