04/05/2024
मिट्टी का कार्य:-
लौट आती है वो तारीखे, मगर वो दिन लौट कर नहीं आते, हमारे टाइम पर जब स्कूल में पेपर हुआ करते थे उसके बाद मिट्टी का कार्य भी करवाया जाता था और हम लोग शौक से अच्छा बनाने का प्रयास करते थे। जब खुद से नही बनता था तो अगल-बगल अपने बडे भाई बहनो से बनवाते थे और बनवा कर छत के उपर सुखाने रख देते थे। जब सुबह उठ कर स्कूल जाना होता था तो, अपने मिट्टी से बने फलो को एक किसी कापी के गते पर रखकर सजाकर ले जाते थे, कभी कभी ऐसा भी होता था ले जाते समय रास्ते में टूट जाते थे, तो रोते थे की नम्बर नही मिलेंगे। कभी-कभी तो रस्सी झाडू यह चीजे भी लेके जाते थे। बहुत ही सुन्दर जीवन था आज उन पलो को खूब याद करते हैं और अपने बच्चों को सुनाते हैं।
आशा करता हूं किसी ना किसी को इस पोस्ट को देखकर अपने जीवन के वो पल याद आये होंगे। ☺️
08/09/2023
प्रतिलिपि प्रीमियम कहानी ★
दिल्ली टू बैंगलोर की फ्लाइट में घुस कर अपनी सीट के पास खड़े होकर ऑस्कर ने निगाहें घुमाई। तभी उसकी नज़र अपने सामने खड़ी एक स्त्री पर पड़ी तो वह चौक कर बुदबुदा उठा : "मधुरिमा तुम यहाँ......!" मधुरिमा पैंतीस साल की एक सुदर्शन महिला है। चेहरा भले ही महंगे कॉस्मेटिक्स से पुता हुआ है, फिर भी लगता है कि अभी भी अपने नाम की तरह मधुर है। वो किसी बुक को पढ़ने में व्यस्त थी। उसके साथ की सीट खाली थी। ऑस्कर ने अपने टिकट का नम्बर देखा उसके पीछे की सीट का नम्बर था वो मन मसोस कर रह गया। एक बार तो मन किया ......
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21/02/2021
😃 पहले भटूरे को फुलाने के लिये उसमें Eno डालिये .....
फिर भटूरे से फूले पेट को पिचकाने के लिये Eno पीजिये
जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य आप कभी नहीं समझ पायेंगे 🤔
😊😊😊
जिसने भी लिखा कमाल का लिखा---- पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें ।
पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था।
"पुस्तक के बीच पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"।
कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था।
हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था।
माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी, न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी। सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।
एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं, यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं।
स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था, दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है?
पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,
"पीटने वाला और पिटने
वाला दोनो खुश थे",
पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे, पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुआ।
हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था।
आज हम गिरते - सम्भलते, संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं।
*हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे ।*
कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे ।
अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं ।
हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए।
"एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे”...
😃😃😃😃
हमारे पिताजी के समय में दादाजी गाते थे
मेरा नाम करेगा रोशन
जग में मेरा राज दुलारा",
हमारे ज़माने में हमने गाया ....
पापा कहते है
बड़ा नाम करेगा,
अब हमारे बच्चे गा रहे हैं ....
बापू सेहत के लिए ..
तू तो हानिकारक है!
😂😂🤣😜
सही में हम कहाँ से कहाँ आ गए
👍👍👍👍😀😀
21/02/2021
😃 पहले भटूरे को फुलाने के लिये उसमें Eno डालिये .....
फिर भटूरे से फूले पेट को पिचकाने के लिये Eno पीजिये
जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य आप कभी नहीं समझ पायेंगे 🤔
😊😊😊
जिसने भी लिखा कमाल का लिखा---- पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें ।
पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था।
"पुस्तक के बीच पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"।
कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था।
हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था।
माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी, न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी। सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।
एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं, यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं।
स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था, दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है?
पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,
"पीटने वाला और पिटने
वाला दोनो खुश थे",
पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे, पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुआ।
हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था।
आज हम गिरते - सम्भलते, संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं।
*हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे ।*
कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे ।
अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं ।
हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए।
"एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे”...
😃😃😃😃
हमारे पिताजी के समय में दादाजी गाते थे
मेरा नाम करेगा रोशन
जग में मेरा राज दुलारा",
हमारे ज़माने में हमने गाया ....
पापा कहते है
बड़ा नाम करेगा,
अब हमारे बच्चे गा रहे हैं ....
बापू सेहत के लिए ..
तू तो हानिकारक है!
😂😂🤣😜
सही में हम कहाँ से कहाँ आ गए
👍👍👍👍😀😀
07/07/2020
वो ज़माना और था.......
दरवाजों पे ताला नहीं भरोसा लटकता था , खिड़कियों पे पर्दे भी आधे होते थे, ताकि रिश्ते अंदर आ सकें।
लोगों की आधी कटोरिया पड़ोसियों के घर आती जाती रहती थी।
पड़ोस के घर बेटी पीहर आती थी तो सारे मौहल्ले में रौनक होती थी , गेंहूँ साफ करना किटी पार्टी सा हुआ करता था ।
वो ज़माना और था......
जब छतों पर किसके पापड़ और आलू चिप्स सूख रहें है बताना मुश्किल था।
जब हर रोज़ दरवाजे पर लगा लेटर बॉक्स टटोला जाता था , डाकिये का अपने घर की तरफ रुख मन मे उत्सुकता भर देता था ।
वो ज़माना और था......
जब रिश्तेदारों का आना,
घर को त्योहार सा कर जाता था , मौहल्ले के सारे बच्चे हर शाम हमारे घर ॐ जय जगदीश हरे गाते .....और फिर हम उनके घर णमोकार मंत्र गाते ।
जब बच्चे के हर जन्मदिन पर महिलाएं बधाईयाँ गाती थीं....और बच्चा गले मे फूलों की माला लटकाए अपने को शहंशाह समझता था।
जब भुआ और मामा जाते समय जबरन हमारे हाथों में पैसे पकड़ाते थे...और बड़े आपस मे मना करने और देने की बहस में एक दूसरे को अपनी सौगन्ध दिया करते थे।
वो जमाना और था
जब घर के बुजुर्ग बाऊजी और अम्मा की अनुमति के बिना घर में पत्ता नहीं हिलता था।
वो ज़माना और था ......
कि जब शादियों में स्कूल के लिए खरीदे काले नए चमचमाते जूते पहनना किसी शान से कम नहीं हुआ करता था , जब छुट्टियों में हिल स्टेशन नहीं मामा के घर जाया करते थे....और अगले साल तक के लिए यादों का पिटारा भर के लाते थे।
कि जब स्कूलों में शिक्षक हमारे गुण नहीं हमारी कमियां बताया करते थे।
वो ज़माना और था......
कि जब शादी के निमंत्रण के साथ पीले चावल आया करते थे , दिनों तक रोज़ नायन गीतों का बुलावा देने आया करती थी।
बिना हाथ धोये मटकी छूने की इज़ाज़त नहीं थी।
वो ज़माना और था......
गर्मियों की शामों को छतों पर छिड़काव करना जरूरी था , सर्दियों की गुनगुनी धूप में स्वेटर बुने जाते थे और हर सलाई पर नया किस्सा सुनाया जाता था।
रात में नाख़ून काटना मना था.....जब संध्या समय झाड़ू लगाना बुरा था ।
वो ज़माना और था........
बच्चे की आँख में काजल और माथे पे नज़र का टीका जरूरी था , रातों को दादी नानी की कहानी हुआ करती थी , कजिन नहीं सभी भाई बहन हुआ करते थे ।
वो ज़माना और था......
जब डीजे नहीं , ढोलक पर थाप लगा करती थी.. गले सुरीले होना जरूरी नहीं था, दिल खोल कर बन्ने बन्नी गाये जाते थे , शादी में एक दिन का महिला संगीत नहीं होता था आठ दस दिन तक गीत गाये जाते थे।
वो ज़माना और था......
कि जब कड़ी धूप में 10 पैसे का बर्फ का पानी.... गिलास के गिलास पी जाते थे मगर गला खराब नहीं होता था,
जब पंगत में बैठे हुए रायते का दौना तुरंत पी जाते..... ज्यों ही रायते वाले भैया को आते देखते थे।
जब बिना AC रेल का लंबा सफर पूड़ी, आलू और अचार के साथ बेहद सुहाना लगता था।
वो ज़माना और था.......
जब सबके घर अपने लगते थे......बिना घंटी बजाए बेतकल्लुफी से किसी भी पड़ौसी के घर घुस जाया करते थे , किसी भी छत पर अमचूर के लिए सूखते कैरी के टुकड़े उठा कर मुँह में रख लिया करते थे , अपने यहाँ जब पसंद की सब्ज़ी ना बनी हो तो पडौस के घर कटोरी थामे पहुँच जाते थे।
वो ज़माना और था.....
जब पेड़ों की शाखें हमारा बोझ उठाने को बैचेन हुआ करती थी , एक लकड़ी से पहिये को लंबी दूरी तक संतुलित करना विजयी मुस्कान देता था , गिल्ली डंडा, चंगा पो, सतोलिया और कंचे दोस्ती के पुल हुआ करते थे।
वो ज़माना और था.....
हम डॉक्टर को दिखाने कम जाते थे डॉक्टर हमारे घर आते थे....डॉक्टर साहब का बैग उठाकर उन्हें छोड़ कर आना तहज़ीब हुआ करती थी ।
सबसे पसंदीदा विषय उद्योग हुआ करता था....भगवान की तस्वीर चमक से सजाते थे।
इमली और कैरी खट्टी नहीं मीठी लगा करती थी।
वो ज़माना और था.....
जब बड़े भाई बहनों के छोटे हुए कपड़े ख़ज़ाने से लगते थे , लू भरी दोपहरी में नंगे पाँव गालियां नापा करते थे।
कुल्फी वाले की घंटी पर मीलों की दौड़ मंज़ूर थी ।
वो ज़माना और था......
जब मोबाइल नहीं धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता और कादम्बिनी के साथ दिन फिसलते जाते थे , TV नहीं प्रेमचंद के उपन्यास हमें कहानियाँ सुनाते थे।
जब पुराने कपड़ों के बदले चमकते बर्तन लिए जाते थे।
वो ज़माना और था.......
स्वेटर की गर्माहट बाज़ार से नहीं खरीदी जाती थी।
मुल्तानी मिट्टी से बालों को रेशमी बनाया जाता था
वो ज़माना और था......
कि जब चौपड़ पत्थर के फर्श पे उकेरी जाती थी , पीतल के बर्तनों में दाल उबाली जाती थी , चटनी सिल पर पीसी जाती थी।
वो ज़माना और था.....
वो ज़माना वाकई कुछ और था।