Rashtra हित

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Society For Change, Reform And Awareness of People- Rashtra हित

We want to empower all to understand and use their rights and thus make a difference in the growth of our nation.

Photos from Rajessh Kumar Singh's post 17/04/2022
14/04/2022

भारतीय संविधान के #वास्तुकार अम्बेडकर जी ने हमारे देश को और हमारे समाज को जो दिया है शायद हम उसकी तुलना नहीं कर सकते । जब डॉक्टर साहेब 1942 में #गवर्नरजनरल की कौंसिल में शामिल हुए तथा जब #श्रममंत्री का दायित्व संभाला तो उन्होंने इस अवसर का भरपूर उपयोग देश की उन्नति और प्रगति के लिए किया.

उन्होंने मजदूरों की दयनीय दशा देखते हुए उनके लिए काम के लिए 8 घंटे का समय तय करवाया, #महिला #मजदूरों के लिए #प्रसूतिअवकाश की व्यवस्था लागू की ।

देश में वर्षा के मौसम में आने वाली बाढ़ और गर्मी में सूखे की समस्या से निजात पाने तथा रोज़गार के लिए उद्योग लगवाने के लिए बहुउद्देशीय #नदीघाटी परियोजना का ड्राफ्ट स्वयं तैयार किया।

आधुनिक भारत में चल रही सभी नदी घाटी परियोजनाए बाबासाहब की #दूरदर्शिता का ही परिणाम है। यह बात शायद बहुत कम लोगो को पता होगी क्योंकि सामान्यतया बाबा साहेब का नाम आते ही लोग संविधान तक ही सिमट के रह जाते हैं ।

बाबासाहब ने संविधान को देश में #समता और स्वतंत्रता स्थापित करने का एक कानूनी माध्यम के रूप में स्थापित किया और इसके द्वारा देश से #छूआछूत #जातिवाद #लिंगभेद और #वर्गभेद सहित तमाम विषमताओं के खात्मा का सूत्रधार तो किया पर वे भली भांति जानते थे की कानून से सिर्फ किसी अपराध को नियंत्रित किया जा सकता है समाप्त नही।

आज हम जहाँ भी देखते हैं हर 15 किलो मीटर के बाद 1 या 2 मूर्ति तो नजर आ ही जाती है । बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर जी की लेकिन क्या सही मायने में यही उनके विचारों की अभिव्यक्ति है। वर्तमान का भारतीय जनतंत्र पूर्णरूपेण #जातीय #क्षेत्रीय एवं #सांप्रदायिक #जनतंत्र में बदल चुका है। जहाँ पर कुछ लोग अल्पकालिक स्वार्थ सिद्धि के लिए बाबा साहेब के नाम का प्रयोग करते हैं परन्तु मुख्य विचारधारा से वो कई कोसों दूर है ।
बाबा साहेब ने जाति-उन्मूलन की विचारधारा पर बल दिया था । जहाँ पर कोई धर्म अगर है तो वह मानव धर्म है परन्तु वर्तमान तथा भूतकाल पर अगर दृष्टी डाले तो हम पाते हैं कि वास्तविकता कुछ और ही है । जाति विहीन समाज कि कल्पना के विपरीत होकर वर्तमान समाज और भी निंदनीय होता जा रहा है ।

डॉक्टर भीम राव ने कहा था कि मै किसी समुदाय की प्रगति उस मापदंड से करता हूँ कि उस समुदाय की महिलाओं ने किस हद तक तथा कितनी प्रगति हासिल की है। जान के आश्चर्य होगा आज लोकसभा सहित सभी विधानसभा में महिलाओं का अनुपात इस विषय पर सोचने पर विवश करेगा। मैंने ये देखा है कि हर सत्र में इस विषय [५ ० फीसदी सीट लोकसभा तथा राज्य सभा में ] पर चर्चा तो अवश्य होती है। परन्तु हमारे राजनीतिज्ञ यह स्वीकार करने को बिलकुल भी तैयार नहीं है कि ५ ० % महिला प्रतिनिधि की संख्या हमारे संसद में सुनिश्चित हो जाये। जो लोग संसद की सीढ़ियों को प्रणाम कर संसद के अंदर दाखिल होते है असल वजहों से बाबा साहब अम्बेडकर उन्हें खटकते हैं। इसका मुख्य कारण राजनीतिज्ञों में दृढ इच्छासक्ति तथा कुशल नेतृत्व का अभाव है। हमारे #राजनीतिज्ञ इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि महिला वर्ग को ५ ० % आरक्षण सुनिश्चत हो सके |

डॉक्टर भीम राव ने आरक्षण कि व्यवस्था देश हित के लिए सोचा था और संविधान के अनुरूप देश में लागू भी हुआ परन्तु सत्ता के लोलुप राजनीतिज्ञों अपने को बहुजन नेता बन #बहुजन को लूटते वो सरीखे सत्ता के लालची राजनेताओं ने इसको सत्ताभोग का साधन बना लिया । सुधारों के नाम पर सार्वजानिक प्रतिष्ठान बंद होने लगे और जो बंद नहीं हुए उनका #विनिवेश कर दिया गया जो अब अपने उच्चतम शिखर पर है। इस प्रकार से सत्ता के लोलुप लोगो ने देश का बेडा गर्क कर दिया । यह प्रश्न है की जब हमारे पास #सार्वजानिक प्रतिष्ठान रहेंगे ही नहीं तब हम किस प्रकार से आरक्षण की सुविधा मुहैया कराएँगे यह एक यक्ष प्रश्न है जहाँ सभी निरूत्तर है

#आरक्षण नीति सही ढंग से लागू न होने के कारण दलित समाज का नुकसान भी हुआ है। डॉ. अंबेडकर की आशंका सही सिद्ध हुई। #विधानसभा तथा #लोकसभा में चुने हुए प्रतिनिधि #दलित मुक्ति के सवाल पर देश हित समाज हित को #तिलांजलि देकर नकारात्मक भूमिका में आ गए। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. अंबेडकर की जाति-उन्मूलन की #विचारधारा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता।

ऐसा जनतंत्र #राष्ट्रीयएकता के लिए वास्तविक खतरा है। डॉ. अंबेडकर की उक्ति- #जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं, आज भी #विचारणीय है #युगपुरुष पूर्व #प्रधानमंत्री #चंद्रशेखर जी ने कई बार अपने वक्तबयों में इस बात का उल्लेख किया है कि केवल हर गाँव के बाहर मूर्ति लगा देना ही काफी नही बाबा साहब के विचारों को आचरण में उतारना उससे ज्यादा जरूरी है और यही सच्ची श्रद्धांजलि भी है ।
जय हिन्द जय भारत




Samajwadi Janata Party Chandrashekhar Uttar Pradesh State चंद्रशेखर के लोग

17/02/2022
Photos from Rashtra हित's post 02/02/2022

-सामाजिक तथा धार्मिक सद्भाव विगाडने वालों पर कडी कार्रवाई हो।
- गांधी को समझने हेतू युवा वर्ग से उनके विचारों का अध्ययन करने की अपील।
-बापू सहित देश के सभी स्वतंत्रता सेनानियों को मौन रखकर दी गई श्रद्धांजलि।
-सद्भाव हेतू जिलाध्यक्ष प्रो आनंद किशोर ने रखा उपवास।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के74वें वलिदान दिवस पर बापू की संस्था जिला सर्वोदय मंडल,सीतामढी के तत्वावधान में सर्वोदय,खादी तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शुवह 9बजे गांधी चौक पर बापू की मूर्ति पर माल्यार्पण तथा पुष्पांजलि अर्पित किया तथा दिन के 11बजे दो मिनट का मौन रखा।सर्वोदय मंडल के जिलाध्यक्ष डा आनन्द किशोर ने सामाजिक तथा धार्मिक सद्भाव हेतू वलिदान दिवस पर दिनभर का उपवास किया।
जिला सर्वोदय मंडल के तत्वावधान में दिन के एक बजे से गांधी मैदान सीतामढी में"सामाजिक तथा धार्मिक सद्भाव पर संकट"विषय पर परिचर्चा सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष डा आनन्द किशोर की अध्यक्षता में आयोजित की गई।मंच संचालन सर्वोदयी नेता आलोक कुमार सिंह ने की।
मौके पर जिले के प्रमुख शिक्षाविद,किसान मजदूर,नवजवान,राजनीतिक दलों के नेता परिचर्चा मे शामिल हुए।
विषय प्रवेश कराते हुए प्रो आनन्द किशोर ने कहा कि जहां बापू के विचारों की विश्वव्यापकता बढी है वहीं देश मे कुछ सिरफिरे गांधी को पढने समझने के वजाए उनकी आलोचना तथा सामाजिक तथा धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने मे लगे हुए है।गांधीजनो,सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को विद्वेष फैलाने वालों,साबरमती आश्रम सहित सभी गांधी स्मृति तथा धरोहरों को कब्जा करने वालों के खिलाफ खड़े होने तथा गांधी विचार को जन-जन मे फैलाने की जरूरत है।
गांधीवादी चिंतक रामप्रमोद मिश्र ने कहा तीन गोली मारकर सोंचा गया कि गांधी मर गये परन्तु गांधी विश्व में फैल गयेऔर दुनिया के शांतिदूत बन गये।
दुनिया के राष्ट्रप्रमुख,नोवेल पुरस्कार प्राप्त विद्वानो ने बापू के मार्ग को अपनाया।
वरिष्ठ जदयू नेता ठाकुर धर्मेंद्र सिंह ने कहा बापू के विचार को जन-जन मे पहुचाने के साथ उनके रचनात्मक कार्यक्रमो को बढाने की जरूरत है।
ऐटक नेता केदार शर्मा ने विचार व्यक्त करते हुए कहा संयुक्त राष्ट्र संघ ने बापू के जन्मदिन को विश्व शांति दिवस घोषित कर दिया।पूरे दुनिया में गांधी सोसाइटीज तथा शोध बढें है।गूगल पर देश तथा विदेश में गांधी की खोज बढी है।गांधी से हीं पूरी दुनिया में किसी भारतीय नेता की पहचान है।
माकपा के जिला सचिव प्रो दिगम्बर ठाकुर ने विचार व्यक्त करते हुए कहा किआज देश को तोडने वाली शक्ति को गांधीवादी तथा समाजवादी अस्त्र से मुकाबला करने की जरूरत है।
युवा कांग्रेस नेता शम्स सहनवाज ने कहा कि आज बापू के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के संकल्प लेने का दिन है।
डा शशिरंजन ने कहा किआज उदारवादियों के खिलाफ कट्टरपंथियो की साजिश को नाकाम करने की जरूरत है।
परिचर्चा के अंत में बापू सहित देश के सभी स्वतंत्रता सेनानियों को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित किया गया।वरिष्ठ माकपा नेता राजकिशोर राय, साहित्यकार विमल कुमार परिमल,ट्रेड यूनियन लीडर दिनेशचन्द्र द्विवेदी,वरिष्ठ राजद नेता मनोज कुमार,माकपा नेता विश्वनाथ बुन्देला,जेपीसेनानी शिवशंकर यादव,संयुक्त किसान मोर्चा के अध्यक्ष जलंधर यदुबंशी,शशिधर शर्मा,आप नेता मंसूर अहमद खां,भिखारी शर्मा,लालबाबू मिश्र,अल्पसंख्यक मोर्चा नेता मो मुर्तजा,संजीव कुमार झा,यूथ फेडरेशन के मो गयासुद्दीन,शिक्षक नेता विजय कुमार शुक्ला,इरशाद अहमद,माकपा नेता सुरेश बैठा,स्वराज इंडिया के जिलाध्यक्ष संजय कुमार,अशोक कुमार,रामबाबू सिंह,मृत्युंजय कुमार,ओमप्रकाश,विनय कुमार सहित अन्य नेताओ ने परिचर्चा में अपना विचार रखा तथा गांधी विचारों को बढाने का संकल्प व्यक्त किया।धन्यवाद ज्ञापन करते हुएआलोक कुमार सिंह ने कहा कि विद्वान वक्ताओ के विचारों तथा सुझावों के आलोक में सर्वोदय मंडल आगे कार्यक्रम बनायेगी।

Samajwadi Janata Party (Chandra Shekhar) - Samajwadi Janata Party (Chandrashekhar) 15/01/2022

आज समाजवादी जनता पार्टी (चंद्रशेखर) के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय कमल मोरारका जी की पुण्यतिथि है।
#कमलमोरारका जी आत्म विश्ववास से भरे हुए विचारों और इरादों के पक्के और #समाजवाद तथा समाजवादी साथियों के प्रति समर्पित थे । ऐसे महान पुरुष को हम सभी शत-शत नमन करते है।

Samajwadi Janata Party (Chandra Shekhar) - Samajwadi Janata Party (Chandrashekhar) He said that there will always be a need for public cooperation and support to organize and strengthen the party in a new way.I as the president of the party and all the members of the party have to pave a new path and provide the right direction for the bright future of Indian politics with the res...

About Lok Nayak Jayaprakash Narayan – JP – राष्ट्रहित सर्वोपरि 03/01/2022

Jayaprakash Narayan (October 11’ 1902- October 8’ 1979) was a great freedom fighter, socialist and a political leader of India. Jayaprakash Narayan is popularly known as JP among indians. As a freedom fighter, he got chance to work with Mahatma Gandhi in many movements conducted by Mahatma Gandhi. He played an important role in the ‘Quit India’ movement and gained a far more respect and fame for this. He was arrested and sent to jail many times. As a socialist, he devoted a big part of his life to help the poor, the laborers, the downtrodden and the needy. For the social works he did for the upliftment of the poor, he was posthumously awarded with “Bharat Ratana” the prestigious award of India. As a political leader, he is remembered for his spearheading the opposition to Indira Gandhi during 1970s.

Jayaprakash Narayan was born on October 11’ 1902 in the village of Sitabdiara in Saran District of Bihar, India. He was the fourth child of Harsu Dayal and Phul Rani Devi. At the age of 9, he left his village to get enrolled in 7th class in the collegiate school at Patna. He was keen observer from his childhood. In writing also, he showed his observing power in his essay “The Present State of Hindi in Bihar”. This essay “The Present State of Hindi in Bihar” won a best essay award for him and gave him good reputation. Apart from that, he excelled in school and won a District merit scholarship in Patna College. In 1918, he completed school and went to abroad for his higher education.

He got his higher education from the universities in the United States. He studied Political Science, Sociology and Economics at the Universities of Berkeley lowa, Wisconsin and Ohio State. He was highly impressed by the Marsixm and ideas of M.N Roy during his studies at the University of Wisconsin at Madison.

While returning to India, he got chance to meet revolutionaries like Rajani Palme Dutt in London on his way back to India. Afterwards, he joined the Indian National Congress in 1929 on receiving an invitation from Jawaharlal Nehru. Mahatma Gandhi turned to be the mentor and guide of Jayaprakash Narayan. He was impressed by the ideology of Mahatma Gandhi and so, he participated in many activities and movement began by Mahatma Gandhi. For their revolutionary activities and participation, he was tortured by the British forces and sent to jail several times during the independence war.

Jayprakash Narayan played a crucial role in the ‘Quit India Movement’ and got a lot of fame and respect for this herculean task. He got married to a freedom fighter named Prabhavati Devi who followed Kasturba Gandhi and resided at the Sabarmati Ashram while JP was studying in abroad.

When he was put behind the bars in 1932 because of their participation in the Civil Disobedience movement, he got chance to meet Ram Manohar Lohia, Minoo Masani, Ashok Mehta, Yusuf Desai and other national leaders. When he returned from jail, the Congress Socialist Party was set up. During the ‘Quit India Movement’ in 1942, JP was again at the helm of the agitation. Finally India got independence, and Jayprakash Narayan was one of the freedom fighters who were alive to breathe in the environment free from the slavery of British Government.

After the death of Gandhiji, Jayaprakash Narayan and Acharya Narendra Dev created the first opposition Socialist Party.

At the age of 76, he took his last breath in October 8’ 1979. As a freedom fighter, socialist and political leader, he was conferred posthumously with India’s highest civilian Award ‘Bharat Ratna’ for his valuable contribution done for freedom of India, upliftment of the poor, the backwards and the downtrodden.

He desired to complete PhD from the universities of United States, but his mother’s poor health and financial issues caused him to give up his dream of securing a PhD.

About Lok Nayak Jayaprakash Narayan – JP – राष्ट्रहित सर्वोपरि Jayaprakash Narayan Jayaprakash Narayan (October 11’ 1902- October 8’ 1979) was a great freedom fighter, socialist and a political leader of India. Jayaprakash Narayan is popularly known as JP among indians. As a freedom fighter, he got chance to work with Mahatma Gandhi in many movements conduc...

समाजवाद की कुछ परिभाषाएं, महात्मा गांधी का समाजवाद और उनकी विचारधारा – राष्ट्रहित सर्वोपरि 03/01/2022

समाजवाद का अर्थ शोषण से रहित समता मूलक समाज और राज्य की स्थापना करना हैं. भारत समेत अनेक लोकतांत्रिक देशों ने समाजवादी लक्ष्यों को सांविधानिक मान्यता प्रदान की हैं.

समाजवाद प्रजातंत्र और समाजवाद इन दो विचारधाराओं और व्यवस्थाओं का समन्वय हैं. प्रजातांत्रिक मार्ग को अपनाकर ऐसे समाजवाद की स्थापना. जो स्थापना के बाद भी लोकतांत्रिक मार्ग को अपनाकर ही अपने समस्त कार्य करे उसे ही समाजवाद कहते हैं.

अतः यह विचारधारा लोकतंत्र और समाजवाद दोनों को बनाए रखना चाहती हैं. राजनीतिक क्षेत्र में इसकी आस्था मानवीय स्वतंत्रता पर आधारित उदारवादी दर्शन में हैं. लेकिन राज्य के कार्यक्षेत्र के प्रसंग में लोक कल्याणकारी राज्य के मार्ग को प्रशस्त करता हैं

समाजवाद की कुछ परिभाषाएं

पंडित जवाहरलाल नेहरू के अनुसार – राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण तथा जन सहमति के तरीकों से न कि बल द्वारा स्थापित की जाने वाली न्यायपूर्ण व्यवस्था ही लोकतांत्रिक समाजवाद हैं.

डॉ राम मनोहर लाल लोहिया के अनुसार —समाजवाद ने साम्यवाद के आर्थिक लक्ष्य (उत्पादन के साधनों पर समाज का स्वामित्व, बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा योजनाबद्ध आर्थिक विकास) तथा पूंजीवाद के सामान्य लक्ष्यों (राष्ट्रीय स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानव अधिकार) को अपना लिया हैं. प्रजातंत्रिक समाजवाद का लक्ष्य दोनों में सामजस्य स्थापित करना हैं

न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर के अनुसार– प्रजातंत्रिक समाजवाद लोक कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने की व्यवस्था हैं. इसका आधार उदारवादी सामाजिक दर्शन हैं. इसकी मुख्य भावना यह है कि व्यक्ति को सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करना चाहिए.

महात्मा गांधी का समाजवाद और उनकी विचारधारा
महात्मा गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत इस विचारधारा पर आधारित था कि अमीरों, कारखाने के मालिकों और जमींदारों को अपनी संपत्ति नहीं छोड़नी होगी, इसके बजाय, उन्हें सिखाया जाएगा कि जो धन उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक से अधिक है, वे हैं केवल उस अतिरिक्त धन के ट्रस्टी। और उस अतिरिक्त दौलत का मालिक कौन होगा? गोपाल। (हिंदू भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार के नामों में से एक।) उन्होंने कहा कि सारी भूमि भगवान की है।

गांधी ईशा उपनिषद (एक हिंदू शास्त्र) अपरि ग्रह, गैर-कब्जे के सिद्धांत से प्रेरित थे। उन्होंने कहा कि अगर कोई इतनी संपत्ति जमा कर लेता है जिसकी उसे जरूरत भी नहीं है, तो वह चोरी करने के समान होगा। चोरी होगी।

प्रसिद्ध उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा और अजीम प्रेमजी, भारत के सबसे बड़े परोपकारी, गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत से प्रेरित थे।

स्वामी विवेकानंद – गांधी से पहले भी कहा जाता है कि खुद को समाजवादी कहने वाले पहले भारतीय स्वामी विवेकानंद थे। उनकी विचारधारा भी काफी हद तक यूटोपियन समाजवाद से प्रेरित थी। लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल भारतीय संदर्भ में किया।कुछ लोग उनकी विचारधारा को आध्यात्मिक समाजवाद कहते हैं। जो यूटोपियन समाजवाद के समान है। इस विचारधारा के विपरीत क्रांतिकारी समाजवाद की विचारधारा है।ये लोग क्रांतिकारी समाजवाद में विश्वास करते थे। उनका मानना ​​था कि समाजवाद नैतिक मूल्यों का विषय नहीं है। यह लोगों को न्याय दिलाने की बात है। और अगर यह न्याय अहिंसा से हासिल नहीं हो सकता तो लोगों को इसके लिए लड़ना चाहिए।

भगत सिंह का समाजवाद
भगत सिंह का मानना ​​था कि लाभ का एक हिस्सा प्राप्त करना एक श्रमिक का अधिकार है। समाजवाद क्या है. आपको लग सकता है कि यह विचारधारा साम्यवाद के समान है। क्योंकि एक समय में लोग साम्यवाद और समाजवाद शब्दों का परस्पर प्रयोग करते थे।

कार्ल मार्क्स का सपना
कार्ल मार्क्स ने साम्यवाद का सपना देखा था। एक राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज, जहां हर कोई सद्भाव से रहता था। इतना अधिशेष उत्पादन करने के लिए अग्रणी, कि हर किसी को अपनी जरूरत के अनुसार सब कुछ मिल जाएगा।

जब कोई निजी संपत्ति खरीदने के लिए नहीं होगी, तो लोग अधिक से क्या करेंगे? कुछ लोगों ने कहा कि दुनिया में हर कोई स्वार्थी है, इतना लालची है, तो साम्यवाद कैसे संभव हो सकता है? ऐसा नहीं है कि कार्ल मार्क्स स्वर्ण युग में रहे। कार्ल मार्क्स ने भी नहीं सोचा था कि प्रत्येक व्यक्ति संत है। बल्कि, कार्ल मार्क्स ने यूटोपियन समाजवाद का विरोध किया क्योंकि लोग इतने सीधे नहीं हैं। इसलिए उनका मानना ​​था कि क्रांति की जरूरत है। उनका मानना ​​था कि समाज में प्रभुत्वशाली वर्ग की विचारधारा उस समाज के आम लोगों की विचारधारा बन जाती है।

भौतिक परिस्थितियों के आधार पर, लोगों के विचारों को आकार दिया जाता है। इसलिए अगर स्वार्थी, लालची, महत्वाकांक्षी पूंजीवादी लोग सत्ता में हैं तो मौजूदा संस्कृति के कारण, आम लोग भी स्वार्थ, लालच, आक्रामक प्रतिस्पर्धा को कुछ स्वाभाविक समझेंगे। इसलिए, उनकी राय में, साम्यवाद को सीधे पेश नहीं किया जा सकता है। इसके लिए एक मध्यवर्ती चरण की आवश्यकता होगी। कार्ल मार्क्स ने इस मध्यवर्ती अवस्था को समाजवाद कहा।

साम्यवाद प्रत्येक के लिए उसकी आवश्यकताओं के अनुसार था और समाजवाद की परिभाषा प्रत्येक के लिए उसके योगदान के अनुसार बन गई, समाजवाद क्या है. पूंजीवादी समाज की तुलना में जहां उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों का नियंत्रण होता है और कारखाने का अधिकांश पैसा और मुनाफा पूंजीपतियों के हाथों में चला जाता है।

उत्पादन के साधन श्रमिकों के हाथों में देने का एक तरीका राष्ट्रीयकरण हो सकता है। केंद्र सरकार की कंपनियां हैं। सरकारी कंपनियां। सभी को रोजगार देना। या राज्य सरकार की कंपनियां भी। या शायद इससे भी अधिक विकेंद्रीकृत तरीका यह हो सकता है कि ग्राम पंचायतों (परिषदों) को उत्पादन के साधन दिए जाएं। यह दर्शन काफी हद तक गांधीवादी दर्शन से मिलता-जुलता है। क्योंकि गांधी अक्सर आत्मनिर्भर गांवों की बात करते थे। गांधी की आर्थिक व्यवस्था का आधार सर्वोदय, सबकी प्रगति थी। सब एक साथ आगे बढ़ रहे हैं।

साथियों, समाजवाद में यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उत्पादन के साधन राष्ट्रीय या स्थानीय सरकार या पंचायतों के हाथ में हो, उत्पादन के साधन सीधे श्रमिकों को दिए जा सकते हैं। यह तब हो सकता है जब कार्यकर्ता एक सहकारी बनाते हैं। इसे सहकारी समाजवाद के नाम से जाना जाता है। इसका एक बहुत ही लोकप्रिय उदाहरण कंपनी अमूल है।

अमूल का कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं है। इसके बजाय, 3.6 मिलियन किसान अमूल के मालिक हैं। और कंपनी का सारा लाभ, इन किसानों के बीच साझा किया जाता है।

इसका एक और उदाहरण है लिज्जत पापड़। यह 45,000 श्रमिकों के स्वामित्व में है। इससे जुड़ा एक और आम तौर पर समाजवाद की विचारधारा में सुना जाने वाला शब्द है एमएसएमई। मध्यम, लघु, सूक्ष्म उद्यम। छोले कुलचे बेचने वाले एक फूड स्टॉल में मालिक भी मजदूर है। इसलिए यह समाजवाद है। वह एक दिन में अपने स्टॉल में कितना काम करता है, उसके आधार पर वह उस दिन कमाता है। यह बड़ी कंपनियों के विपरीत है।

एक कंपनी की वृद्धि के साथ, उस कंपनी में श्रमिकों का लाभ हिस्सा कम होता रहता है। जो काम करता है वह कमाता है। यह निस्संदेह सामाजिक न्याय का मामला है, लेकिन इसके अलावा एमएसएमई के दो प्रमुख फायदे हैं।

समाजवाद के लाभ
सबसे पहले, एक अर्थव्यवस्था पिरामिड के आकार की नहीं होती है। इसके बजाय, यह बहुत विकेंद्रीकृत हो जाता है। और एक विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था अक्सर बहुत मंदी-सबूत होती है।

दूसरा फायदा रोजगार है। ज़रा सोचिए, अगर कोई बड़ी कंपनी ₹1 बिलियन कमाती है, तो वह कितने लोगों को रोजगार देती है? और इसकी तुलना अमूल जैसी सहकारी कंपनी से करें, अगर यह ₹1 बिलियन कमाती है, तो यह कितने लोगों को रोजगार देगी? या कई छोटे उद्यम, यदि सामूहिक रूप से ₹1 बिलियन कमाते हैं, तो उन कंपनियों में कितने लोगों को रोजगार मिलेगा? 2020 की इस रिपोर्ट को देखिए। तथाकथित असंगठित क्षेत्र।

सूक्ष्म उद्यम, देश के सकल घरेलू उत्पाद में उनका योगदान तथाकथित संगठित क्षेत्र के योगदान के बराबर है। लेकिन अगर हम रोजगार की बात करें तो 90% लोग वास्तव में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। इतना ही राजस्व देते हुए 9 गुना अधिक रोजगार। संक्षेप में, आप मूल रूप से कह सकते हैं कि पूंजीवाद में बड़ी संख्या में बड़े उद्यम हैं। जबकि समाजवाद में बड़ी संख्या में छोटे उद्यम हैं।

पंडित नेहरू की विचारधारा
इसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी विचारधारा आती है। एक विचारधारा जिसे फैबियन समाजवाद नाम दिया गया है। यह एक समाजवादी विचारधारा है जो हिंसा में भी विश्वास नहीं करती थी। उनका मानना ​​था कि समाजवाद अंतिम लक्ष्य नहीं है।

इसके बजाय, यह एक स्थिर प्रगति है। एक सुधारवादी प्रगति जिसमें समय लगता है। उनका मानना ​​था कि एक आम आदमी भी उद्यमी वर्ग का हिस्सा बन सकता है। समाजवाद क्या है. वह निजी कंपनियां, पूरी तरह से बंद नहीं होनी चाहिए। उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल का समर्थन किया। उन्होंने निजी कंपनियों को रहने दिया। लेकिन उन पर कुछ नियम थोप दिए।

ताकि, एकाधिकार न बने। और असमानता नहीं बढ़ती। इसके अतिरिक्त, हमारे पास सरकारी कंपनियां भी होंगी। हमारे पास पीएसयू नामक राज्य कंपनियां होंगी। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ। उनकी सरकार के दौरान ओएनजीसी, हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी इकाइयां शुरू की गईं।

इनके अलावा, विशाल बांध और सिंचाई परियोजनाएँ इसरो और डीआरडीओ जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान, एनएसएसओ जैसे लोकतांत्रिक संस्थान और फिल्म और टेलीविजन संस्थान जैसे सीएजी सांस्कृतिक संस्थान, आईआईटी, आईआईएम और एम्स नेहरू जैसे शैक्षणिक संस्थानों ने इन सभी को नियंत्रण में स्थापित किया। सरकार के। दूसरी ओर, कुछ देश ऐसे भी थे जो कृषि को भी सामूहिक बनाने के लिए समाजवाद का उपयोग कर रहे थे। जैसे फिदेल कास्त्रो द्वारा रूस, चीन और क्यूबा में।

जबकि नेहरू का मानना ​​था कि सब्सिडी और कृषि अनुसंधान के माध्यम से छोटे किसानों की मदद की जानी चाहिए। नेहरू के बाद देश के अगले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे।

जिनकी विचारधारा काफी हद तक नेहरू से मिलती जुलती थी। वह निजी क्षेत्र की भूमिका को स्वीकार करने में भी विश्वास करते थे, लेकिन समाजवाद के उद्देश्य को बनाए रखते थे।

अपने कार्यकाल में उन्होंने श्वेत क्रांति की शुरुआत की। उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना की। और अमूल सहकारिता का प्रचार भी किया।

उस समय की बात करें तो पड़ोसी देश पाकिस्तान में सार्वजनिक क्षेत्र की उतनी आर्थिक वृद्धि नहीं देखी जा सकती थी क्योंकि वहां अयूब खान ने अर्थव्यवस्था का निजीकरण करना शुरू कर दिया था।

दुर्भाग्य से, इससे कुछ उद्योगपतियों का अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण हो गया। पाकिस्तान में लगभग ४० बड़े औद्योगिक समूहों ने पूरे देश की ४२% औद्योगिक संपत्ति को नियंत्रित किया।

पाकिस्तान के योजना आयोग के मुख्य अर्थशास्त्री महबूबुल हक ने 1968 में खुले तौर पर दावा किया कि देश की संपत्ति केवल 22 औद्योगिक परिवारों के हाथों में है।

एक बार फिर भारत पर फोकस शास्त्री के बाद, दुर्भाग्य से, इंदिरा गांधी की समाजवादी विचारधाराओं ने निजी क्षेत्र को पूरी तरह से खत्म कर दिया।

न तो वह सार्वजनिक क्षेत्र की दक्षता में वृद्धि कर सकी, बल्कि भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई और सार्वजनिक क्षेत्र में लालफीताशाही अधिक प्रमुख हो गई, जिससे देश के विकास में गिरावट आई।

बाद में देश को अंततः उदार बनाना पड़ा। और समाजवाद का अर्थ थोड़ा बदल गया। यह ‘कल्याणकारी राज्य’ में बदल गया। यहां वह बिंदु आता है जहां हमें समाजवाद और पूंजीवाद के बीच कुछ ओवरलैप देखने को मिलता है।

कीन्स एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। मैंने उनके बारे में पिछले ‘बेसिक्स’ वीडियो में बात की थी। उन्होंने ऐतिहासिक रूप से पूंजीवाद को बदल दिया जब उन्होंने कहा कि कंपनियों को एकाधिकार को रोकने और असमानता को कम करने के लिए विनियमित करने की आवश्यकता है।

पूंजीवाद की ओर झुकाव रखने वाले कुछ अत्यंत दक्षिणपंथी लोगों का मानना ​​है कि कीन्स समाजवादी थे। कीन्स समाजवादी थे या पूंजीवादी, इस पर बहुत बहस होती है।

चीन का समाजवाद
लेकिन चीन में, देंग शियाओपिंग ने दुनिया को इस बहस से भस्म होने दिया, जबकि उन्होंने कीन्स के संदेश को अपनाया। उन्होंने माओत्से तुंग की मौजूदा प्रथाओं को छोड़ दिया और अर्थव्यवस्था को न केवल निजी व्यवसायों के लिए बल्कि विदेशी कंपनियों के लिए भी खोल दिया।

लेकिन एडम स्मिथ के पूंजीवाद के साथ नहीं। जहां कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं है। इसके बजाय केनेसियन मॉडल के साथ। समाजवाद क्या है.

समाजवाद का सर्वश्रेष्ठ संस्करण
जिसे उन्होंने ‘चीनी विशेषताओं वाला समाजवाद’ कहा। इस समय, सरकारी खर्च बहुत बड़ा था। और सरकार ने पूंजीवाद के आयोजक की भूमिका निभाई। इसके परिणामस्वरूप चीन में तेजी से आर्थिक विकास हुआ। जिसका परिणाम आज भी देखने को मिल रहा है।

केनेसियन मॉडल के दाईं ओर एक कदम, हम कल्याणकारी राज्य की विचारधारा प्राप्त करेंगे। इसे ‘दयालु पूंजीवाद’ या ‘नॉर्डिक पूंजीवाद’ कहा जा सकता है। कुछ लोग इसे समाजवादी मानते हैं। आज, इसका उत्कृष्ट उदाहरण नॉर्डिक देश हैं।

डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देश। उनके पास कर की उच्च दरें हैं। पूंजीवाद पर प्रतिबंध नहीं है और लोगों को निजी कंपनियां शुरू करने की इजाजत है, यहां प्रगति हो रही है और ‘पैसा बन जाता है पैसा’ यहां पकड़ में आता है, कि पैसे वाले लोग अधिक पैसा कमा सकते हैं,

लेकिन सरकार उच्च कर दरों की कोशिश करती है ताकि वे पैसा ले सकें वहां से और कल्याणकारी योजनाओं में निवेश करें, ताकि गरीबों की मदद की जा सके। इतनी उच्च गुणवत्ता वाली मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, उस पैसे से देश में सभी को दी जा सकती है

ताकि हर नागरिक को एक ही शुरुआत मिल सके। इस कारण से, मानव विकास, खुशी और सच्ची प्रगति और विकास के मामले में नॉर्डिक देश वास्तव में सफल रहे हैं।

लेकिन मैं यह नहीं कहूंगा कि वे 100% सफल रहे हैं, क्योंकि उनमें भी कुछ पहलुओं की कमी है। पर्यावरणीय क्षति के पहलू की तरह, पूंजीवाद का एक ऐसा हिस्सा है जिसका मुकाबला किसी भी देश ने नहीं किया है।

तो भारत के लिए कौन सा समाधान अपनाया जाना चाहिए? भारत जैसे देश के लिए कौन सी आर्थिक प्रणाली सबसे उपयुक्त होगी?

मजदूरों की एक हिरावल पार्टी, पूंजीपतियों के शासन को खत्म कर देगी और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण कर लेगी। किस वस्तु का उत्पादन होगा और कितनी मात्रा में आर्थिक नियोजन समाज की आवश्यकताओं पर आधारित होगा।

व्यावहारिक कार्यान्वयन
सब काम करेंगे। और कमाई काम के आधार पर होगी। अधिक काम अधिक कमाई के बराबर होता है और इसके विपरीत। उनकी राय में, यह सभी गला घोंटने वाली प्रतियोगिताओं को समाप्त कर देगा। और लोग भूखे मरने से नहीं डरेंगे।

बीमारी के कारण मरने का। नि:शुल्क शिक्षा होगी। सभी को मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी। इस सब में, पूंजीवादी वर्ग द्वारा प्रचारित स्वार्थी और लालची मानसिकता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी, उनके अनुसार। उनका मानना ​​था कि ऐसा करने से लोगों में नैतिकता आएगी।

और इसके बाद राज्य का पतन होगा। यानी सब कुछ सुव्यवस्थित हो जाएगा। सरकार का विचार धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा और साम्यवाद का साझा मॉडल तब संभव होगा।

कार्ल मार्क्स के इस सिद्धांत के आधार पर सोवियत संघ जैसे देशों में समाजवाद का मध्यवर्ती चरण शुरू किया गया था। सोवियत संघ। लेकिन उनका साम्यवाद नहीं आया। यहां, उन्होंने एक महत्वपूर्ण गलत अनुमान लगाया था।

भगत सिंह ने कहा था कि अर्थात समाज मजदूरों की मेहनत पर टिका है। खेतों में फसल उगाता मजदूर। कपड़ा बुनता मजदूर। तेल, लोहा, कोयला और हीरे का खनन करने वाले श्रमिक। फैक्ट्रियों में टीवी और रेफ्रिजरेटर बनाने वाले सभी मजदूर। मजदूर सब कुछ पैदा करते हैं। यह सब करने वाला मजदूर सबसे गरीब है। वह भूख से मर रहा है, उसके बच्चे झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे हैं। क्यों? भगत सिंह ने सवाल किया।उन्होंने कहा कि क्रांति का उद्देश्य समाजवादी गणराज्य बनाना है एक समाजवादी देश मे श्रमिक उत्पादन के साधनो को नियंत्रित करेंगे और मुनाफा मजदूरों को जाएगा सच्चे अर्थों मे प्रत्येक को उसके योगदान के अनुसार की पूर्ति के लिए अग्रणी होगा।

समाजवाद की कुछ परिभाषाएं, महात्मा गांधी का समाजवाद और उनकी विचारधारा – राष्ट्रहित सर्वोपरि समाजवाद का अर्थ शोषण से रहित समता मूलक समाज और राज्य की स्थापना करना हैं. भारत समेत अनेक लोकतांत्रिक देशों ने समाज.....

भारत में समाजवाद क्या है इसको समझने के लिए भारत को समझना होगा – राष्ट्रहित सर्वोपरि 03/01/2022

समाजवाद सिर्फ एक शब्द ही नहीं है जो सिर्फ देश के लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए बना है। समाजवादी एक सोच है,एक विचारधारा है जो देश में रह रहे हर वर्ग ,हर समुदाय ,हर तबके, हर जाति,हर धर्म के लोगों के मन से हर प्रकार के भेदभाव को मिटाते हुआ उन्हे एक ध्वज के नीचे खड़ा करती है। #समाजवादीविचारधारा की नज़रों से देखा जाये तो किसी भी धर्म,वर्ग,जाति या समुदाय आदि से बढ़कर भी एक चीज़ है जिसे हम मानवता कहते है। अमीर हो चाहे गरीब,समाजवाद हर इंसान को इंसान की नज़रों से देखने की प्रेरणा देता है और आगे भी देता ही रहेगा । क्योंकि यदि हमे बनाने वाले ने हमे बनाते वक़्त कोई फ़र्क़ नहीं किया तो हम क्यों करें। समाजवाद एक ऐसे समाज की परिकल्पना करता है जो सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक भेद को मिटाते हुए समत और स्वतंत्रता के आधार पर एक वर्णविहीन समाज की स्थापना करता है

समाजवाद का एकमात्र लक्ष्य साम्यवाद है। जिसके बाद समाज को संपूर्ण संपन्न स्थिति में किसी #राजनीतिक नियंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती। समाज खुद-ब-खुद स्वशासित बन जाता है। यदि आप सोच रहें है कि हमारी पार्टी से जुड़ने के बाद ही आप एक सच्चे समाजवादी बन सकते है तो आप कहीं न कहीं गलत है,आपको बता दें कि कोई भी व्यक्ति कहीं भी अगर निस्वार्थ भाव से समाज के हित और अन्याय के खिलाफ बिना डरे अपनी आवाज़ उठाता है तो वह एक सच्चा समाजवादी कहलाता है।

समाजवाद का सीधा वार समाज पर बोझ की तरह बढ़ रही कुरीतियों और उसकी जड़ों पर है, जैसे #पूँजीवाद, #वंशवाद #जातिवाद आदि। समाजवाद और उससे जुड़े लोगों का मानना है कि समाज की हर वो रीत जो देश में उंच-नींच की भावना को ज़रा सा भी बढ़ावा देती है तो वह एक कुरीति है जिसका हम सभी को मिलकर विरोध करना चाहिए ताकि देश के हर नागरिक को सामान दृष्टि से ही हर वो ओहदा,न्याय और नाम मिले जिसके वो काबिल है। समाजवाद मनुष्य को मनुष्य के गुणों से पहचाने जाने की बात पर बल देता है नाकि उसके जात,धर्म व् पैसे से। समाजवाद की नज़रों इस देश का हर नागरिक एक सामान न्याय,विकास और अधिकार के योग्य है फिर चाहे वो अमीर हो गरीब हो,ब्राह्मण हो हरिजन हो,शहरी हो या #आदिवासी। विश्व के इस सबसे बड़े #लोकताँत्रिक देश में सभी एक सामान है।

राष्ट-पिता #महात्मागाँधी हमारे भारत वर्ष के प्रथम प्रमुख समाजवादी नेता थे। जिन्होंने सत्य और अहिंसा जैसे अस्त्रों से अंग्रेजी हुक़ूमत को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। उन्होंने उस वक़्त भेदभावों से परे देश की जनता को एकजुट करके अपने समाजवादी होने का परिचय दिया और जनता को हुक़ूमत के ज़ुल्मो से मुक्त किया। उन्ही की सोच के साथ चलते हुए #लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण ने भी इस समाज पर हो रहे हुक़ूमत के ज़ुल्मों का बहिष्कार किया। उन्होंने सन 1970 में देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गाँधी के विरुद्ध “सम्पूर्ण क्रांति” नामक आन्दोलन चलाया। यह क्रांति आम आदमी के हित के लिए हुक़ूमत को उखाड़ने के लिए लायी गयी थी। लोकनायक नें कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल है— राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है। इस क्रांति के अंगारे ऐसे भड़के कि हुक़ूमत पाँव उखड़ गए थे।

इन्ही समाजवाद नायकों के विचारों पर चलते हुए देश के नौवें प्रधानमंत्री स्व.श्री ने 5 नवम्बर सन 1990 को #समाजवादीजनतापार्टी की नीव रखी जिसका मक़सद सीधा और स्पष्ट था- शोषित वर्गों के लोगों की आवाज़ बनना ,देश में हो रहे अन्याय के प्रति मिलकर आवाज़ उठाना ताकि समाज में फैली असमानता की जड़ों को उखाड़ फेंका जाए। और जनता को उनके हक़ से वंचित न रखा जाए। उन्होंने लोक सभा की निर्वाचन करते हुए ८ बार उत्तर प्रदेश के बलिया क्षेत्र से चुनाव जीता था। चंद्रशेखर जी का मानना था कि दूसरों के लिए किया गया वही कार्य रंग लाता है जिसमे अपना स्वार्थ कहीं न छिपा हो। ऐसे नेक विचारों की शिक्षा उन्हे अपने गुरु आचार्य नरेन्द्र देव जी से मिली थी।

आचार्य नरेन्द्र देव जी के अनुसार एक आदर्श समाज वही है जहाँ अमीर – गरीब में कोई भेद न हो ,जहाँ प्रजानन सुखी और समृद्ध रहे। लेकिन जब तक समाज में #पूंजीवादियों,और अन्य कुरीतियों का दबदबा बना रहेगा तब तक ऐसे समाज की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। आचार्य जी का कथन है कि आज मानव को अपने निर्वाह के लिए रोटी,कपड़ा,निवास-स्थान, शांति और स्वतंत्रता वांछनीय है ,जिनकी उपलब्धि सिर्फ एक सच्चे समाजवाद की स्थापना के द्वारा ही की जा सकती है। उनके लिए “मानवता ही समाजवाद का आधार था” आचार्य जी के अनुसार #समाजवाद जितना आर्थिक बल देता है ,उतना ही वह व्यक्तिगत स्वातंत्र्य के विकास पर भी बल देता है। उन्होंने अपने भारतीय समाज को एक नयी दिशा दी। जिसने चंद्रशेखर जैसे सपूत शिष्य के हाथों समाजवादी जनता पार्टी का निर्माण करवाया।

व्यक्ति का पूर्ण विकास समाजवादी समाज में ही हो सकता है इसमें कोई दो राय नहीं है। क्योंकि समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। आज भले ही #आचार्यनरेन्द्रदेव जी और #चंद्रशेखरजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके विचार ,उनकी पार्टी और उनकी सोच पर चलने वाले पार्टी के नेता हमारे बीच है जो समय समय पर जनता के साथ मिलकर उनपर हो रहे अन्याय के खिलाफ हमेशा आवाज़ उठाते है और उठाते रहेंगें।

भारत में समाजवाद क्या है इसको समझने के लिए भारत को समझना होगा – राष्ट्रहित सर्वोपरि समाजवाद सिर्फ एक शब्द ही नहीं है जो सिर्फ देश के लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए बना है। समाजवादी एक सोच है,एक...

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