माँ की कोख से लेकर
माँ के आँचल तक
आखिर में माँ गंगा
में ही जाना है मुझे
सीमा रंगा इन्द्रा
#गंगा #माँगंगा #काशीविश्वनाथ🔱🚩🙏 #हरहरगंगे #शिवशक्ति👣💞
सीमा रंगा इन्द्रा -शब्दों का जादू
सीमा रंगा इन्द्रा
🎓🎓डॉ भीम राव अम्बेडकर जी
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27/05/2026
नव सरोकार फाऊंडेशन द्वारा पद्मश्री पंडित गोपाल प्रसाद व्यास जी की 21वीं पुण्यतिथि पर कविता सम्मेलन में आप सभी का स्वागत है
18/05/2026
प्रकृति भक्त फाउण्डेशन द्वारा प्रतिभाशाली बच्चों को द्वारका दिल्ली मैक्स अस्पताल में सम्मानित किया गया
प्रात जगाता शिशु वसंत को नव गुलाब दे-दे ताली;
तितली बनी देव की कविता वन-वन उड़ती मतवाली।
सुंदरता को जगी देखकर जी करता मैं भी कुछ गाऊँ;
मैं भी आज प्रकृति-पूजन में निज कविता के दीप जलाऊँ।
ठोकर मार भाग्य को फोड़ें, जड़ जीवन तजकर उड़ जाऊँ;
उतरी कभी न भू पर जो छवि, जग को उसका रूप दिखाऊँ।
स्वप्न-बीच जो कुछ सुंदर हो, उसे सत्य में व्याप्त करूँ,
और सत्य-तनु के कुत्सित मल का अस्तित्व समाप्त करूँ।
क़लम उठी कविता लिखने को, अंत:स्तल में ज्वार उठा रे!
सहसा नाम पकड़ कायर का पश्चिम-पवन पुकार उठा रे!
देखा, शून्य कुँवर का गढ़ है, झाँसी की वह शान नहीं है।
दुर्गादास-प्रताप बली का प्यारा राजस्थान नहीं है।
जलती नहीं चिता जौहर की, मुट्ठी में बलिदान नहीं है।
टेढ़ी मूँछ लिए रण-वन फिरना अब तो आसान नहीं है।
समय माँगता मूल्य मुक्ति का, देगा कौन मांस की बोटी?
पर्वत पर आर्दश मिलेगा, खाएँ चलो घास की रोटी।
चढ़े अश्व पर सेंक रहे रोटी नीचे कर भालों को,
खोज रहा मेवाड़ आज फिर उन अल्हड़ मतवालों को।
बात-बात पर बजीं किरीचें, जूझ मरे क्षत्रिय खेतों में;
जौहर की जलती चिनगारी अब भी चमक रही रेतों में।
जाग-जाग ओ धार, बता दे, कण-कण चमक रहा क्यों तेरा?
बता रंचभर ठौर कहाँ वह, जिस पर शोणित बहा न मेरा?
पी-पी ख़ून आग बढ़ती थी, सदियों जली होम की ज्वाला।
हँस-हँस चढ़े सीस साकल-से, बलिदानों का हुआ उजाला।
सुंदरियों को सौंप अग्नि पर, निकले समय-पुकारों पर।
बाल, वृद्ध औ' तरुण विहँसते खेल गए तलवारों पर।
हाँ, वसंत की सरस घड़ी है, जी करता, मैं भी कुछ गाऊँ;
कवि हूँ, आज प्रकृति-पूजन में, निज कविता के दीप जलाऊँ।
क्या गाऊँ? सतलज रोती है, हाय! खिली बेलियाँ किनारे।
भूल गए ऋतुपति, बहते हैं, यहाँ रुधिर के दिव्य पनारे।
बहनें चीख़ रहीं रावी-तट, बिलख रहे बच्चे बेचारे,
फूल-फूल से पूछ रहे हैं—'कब लौटेंगे पिता हमारे?'
उफ़, वसंत या मदन-बाण है? वन-वन रूप-ज्वार आया है।
सिहर रही वसुधा रह-रहकर, यौवन में उभार आया है।
कसक रही सुंदरी—'आज मधु-ऋतु में मेरे कंत कहाँ?'
#रामधारी_सिंह_दिनकर
#प्रकृतिभक्तफाउण्डेशन
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16/05/2026
ुझको_दे_दो_वरदान।
ें_सबको_लूँ_पहचान।।
बात मीठी करते भरपूर
रहूँ कैसे मैं उनसे दूर?
नहीं बिखरे मेरी मुस्कान
ईश मुझको दे दो वरदान।।
रंग में भंग डाले संसार
पकड़ लूँ ऐसे यहां सियार
जगत का कर जाऊँ उत्थान
ईश मुझको दे दो वरदान।।
नदी के जैसी बहती धार
राह से चलूँ मिटाती खार
सदा रखूँ मै बड़ों का मान
ईश मुझको दे दो वरदान।।
नेक रखना मेरा व्यवहार
लगाऊँ पेड़ मैं छायादार
नहीं हो मुझको जी अभिमान
ईश मुझको दे दो वरदान।।
बांटती चलूँ सभी से प्यार
दिलों से मिटा सकूँ तकरार
हाथ सिर पर रख दो भगवान
ईश मुझको दे दो वरदान।।
सीमा रंगा इन्द्रा©®
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#उसे_ही_नसीहतें_दे_रहो_हो
#ये_हवा_ये_दौर_ये_लोग,
#ये_हवाबाजी
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07/05/2026
सपन होगा मेरा साकार।
करूंँगी मैं सोलह श्रृंगार।।
मिलूँगी सजना से मैं आज,
खोल दूंँगी दिल के सब राज
आज होगा मेरा उद्धार
सपन होगा मेरा साकार।।
तार आया था उनका रात
लिखा था मिट जाएंगे घात
भोर होते होगा दीदार
सपन होगा मेरा साकार।।
खुशी में जागे मेरे नैन
मिला था अंतस को जी चैन
करूँगी कल उनका सत्कार
सपन होगा मेरा साकार।।
नाचता मेरे मन का मोर
शांत दीवारों में था शोर
सजन खुश थी मैं पाकर तार
सपन होगा मेरा साकार।।
करूँगी ढेरों उनसे बात
मिटेंगे सारे अब आघात
आँख होगी जब उनसे चार
सपन होगा मेरा साकार।।
मनगढ़ंत था मन का उल्लास
सपन टूटा औ टूटी आस
कभी तो मुझे मिलेगा प्यार
करूँगी सोलह मैं श्रृंगार।।
सपन मेरा होगा साकार।
करूँगी मैं सोलह श्रृंगार।।
सीमा रंगा इन्द्रा©®
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