30/05/2026
मैं हूँ उत्तर प्रदेश l चटपटे स्वाद की बात हो रही है तो इस श्रृंखला में फर्रुखाबाद की हींग वाली दालमोठ का नाम तो स्वत: ही जुड़ जाता है l तीखे स्वाद और हींग से भरी यह दालमोठ देश भर में पसंद की जाती है l लोगों में इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इसे एक जिला एक व्यंजन योजना में जगह मिली है l
फर्रुखाबाद की दालमोठ का इतिहास देश के उत्तरी हिस्सों की नमकीन संस्कृति से जुड़ा है l यह जिला मुगलकाल के दौरान व्यापार, संस्कृति और खानपान का प्रमुख केंद्र रहा है l दालमोठ के जन्म लेने के पीछे की कहानी यह है कि पुराने समय में यात्राएँ लम्बी लम्बी होती थीं l तब भोजन ऐसा होना चाहिये कि जो लम्बे समय तक खराब न हो l ऐसे में दाल, बेसन और मसालों से बनी सूखी नमकीन के बनने का सिलसिला शुरु हुआ l फर्रुखाबाद में स्थानीय हलवाइयों ने स्थानीय स्वाद को ध्यान में रखते हुए विशेष मसालों की कुरकुरी नमकीन बनाना शुरु किया l जिससे यहाँ की दालमोठ का स्वाद ही अलग निकला l यहाँ के दालमोठ की खासियत यह है कि इसमें बेहतरीन मसालों के साथ साथ असली हींग का तड़का लगाया जाता है जो इसे बाज़ार की अन्य नमकीनों से अलग करता है l इसमें भुनी हुई कुरकुरी दालों (मटर, मसूर), सेव, मूंगफली का संतुलित मिश्रण होता है l साथ ही इसमें सेम के बीज डाले जाते हैं जो इसे और स्वादिष्ट बनाते हैं l यह दालमोठ दो महीनों तक प्रयोग में लायी जा सकती है l यह जल्दी खराब नही होती है l 19वीं और 20वीं शताब्दी में जब मेरे शहरों के बीच व्यापार बढ़ा तो इस जिले की नमकीन भी आसपास के क्षेत्रों में मशहूर होने लगी l धीरे धीरे यह घरेलू नाश्ता घरों तक ही सीमित नहीं रह गया बल्कि स्थानीय उद्योग का हिस्सा बन गया l आज भी यहाँ कई परिवार ऐसे हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी दालमोठ बेचने और बनाने का काम करते आ रहे हैं l फर्रुखाबाद में अनेक ऐसी दुकानें हैं जो सिर्फ इसी नमकीन के लिये देश भर में जानी जाती हैं l फर्रुखाबाद की चटपटी नमकीन के बारे में बात करते हुए मेरे मुँह में पानी आने लगा है l
एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल होने के बाद यहाँ के नमकीन व्यवसाय में उन्नति के रास्ते खुलने के आसार बढ़ गये हैं l यहाँ की दालमोठ को क्षेत्रीय स्तर पर तो पहचान तो मिल गयी है पर अब इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिलेगी l साथ ही देश भर में यहाँ के दालमोठ की मांग बढ़ेगी l दालमोठ निर्माण का कारोबार बढ़ेगा तो यहाँ मसाला बनाने, दाल तलने, पैकेजिंग और अन्य कार्यों के लिये भी लोगों की आवश्यकता पड़ेगी l इसलिये यहाँ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे l बड़ी संख्या में महिलायें और छोटे परिवार इस उद्योग से जुड़ सकते हैं l बेहतर ब्रांडिंग और पैकजिंग के लिये सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण दिये जायेंगे l दाल, बेसन, मसाले और तेल की मात्रा बढ़ने से स्थानीय किसानों और व्यापारियों का मुनाफा बढ़ेगा l आपको बता दूँ कि भारतीय नमकीनों की विदेशों में बड़ी मांग है l यदि गुणवत्ता और पैकेजिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरी तो यह निर्यात का उत्पाद भी बन सकती है l
हालाँकि चुनौतियाँ तो यहाँ भी हैं l अब युवा पीढ़ी का रूझान इस व्यवसाय के प्रति कम हुआ है l इस कारोबार में अभी मार्केटिंग का अभाव है l यह व्यवसाय सोशल मीडिया, ई कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म का फायदा नहीं उठा पा रहा है l छोटे कारोबारियों के लिये अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करना आसान नही है l छोटे व्यापारियों को कई बार ऋण सुविधाओं और प्रशिक्षण आदि के बारे में भी पूरी जानकारी नही रह्ती है l एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल होने से इस व्यवसाय में प्रगति होने और इसकी चुनौतियों का समाधान होने की असीम सम्भावनायें हैं l
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26/05/2026
मैं हूँ उत्तर प्रदेश l आम के लाजावाब स्वाद के बाद आज बात करते हैं गोरखपुर के चटपटे स्वाद वाले बाटी चोखा की l बाटी चोखा मिट्टी की सोंधी खुशबू में लिपटा देश का स्वाद है l एक जिला एक व्यंजन योजना में गोरखपुर के इस पारंपरिक व्यंजन को शामिल किया गया है l
यूं तो मेरे पड़ोसी राज्य बिहार का यह मशहूर व्यंजन है पर इसके तीखे और चटपटे जायके की वजह से इसे काफी पसंद करने लगे हैं, विशेषकर मेरे पूर्वांचल हिस्सों में l गोरखपुर और बलिया का बाटी-चोखा लोगों को बहुत पसंद आता है l बाटी-चोखा, भौरी चोखा, लिट्टी-चोखा ....कई नामों से जाना जाता है यह व्यंजन l सत्तू और मसालों का अनोखा मेल इस व्यंजन का आधार है l जब इस भरावन को आटे में भरकर धीमी आँच पर पकाया जाता है तो सोंधी महक में बनी यह लिट्टी और भी स्वादिष्ट हो जाती है l चटपटा चोखा और देशी घी के साथ इसका स्वाद लाजवाब हो जाता है l बाटी के प्रति लोगों का रूझान इस कदर बढ़ गया है कि अब इसे चोखा के बजाय मटन के साथ बेहद पसंद किया जाने लगा है l शहर के नामी दुकानों पर शाम होते ही बाटी और मटन खाने के लिये लोगों की लंबी कतारें लग जाती हैं l इस व्यंजन का स्वाद सिर्फ जीभ को ही तृप्त नही करता बल्कि अपनी मिट्टी और परम्परा से भी जुड़े होने का एह्सास दिलाता है l
इतिहासकारों की मानें तो लिट्टी चोखा की शुरुआत मूल रूप से बक्सर के इलाकों में मानी जाती है l इसकी उत्पति का काल मगध काल माना गया है l उस समय सैनिक युद्धकाल में इसे भोजन के रूप में अपने पास रखते थे l मुगलकाल में भी इसे पसंद किया जाता था l हालांकि यह बात अलग है कि मुग़लों को मांसाहार ज्यादा पसंद था इसलिये भरावन भी मांसाहार सामग्री ही होती थी l वर्ष 1857 के विद्रोह के वर्णन में भी बाटी चोखा का जिक्र मिलता है l
गोरखपुर के बाटी-चोखा को एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल किये जाने से इसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता बढ़ने की उम्मीदें बढ़ गयीं हैं l यह व्यंजन मेरे यहाँ तो हमेशा से काफी लोकप्रिय रहा है l अब पर्यटन, फूड डिलीवरी एप, हाई वे फूड कल्चर और क्षेत्रीय व्यंजनों की बढ़ती लोकप्रियता की वजह से बाटी चोखा की मांग हाल के दिनों में बढ़ रही है l गोरखपुर के बाटी चोखा को क्षेत्रीय ब्रांड के रूप में विकसित किये जाने की दिशा में काम किया जायेगा जैसे कि आगरा का पेठा, बनारस का पान आदि हैं l हाल के वर्षों में गोरखपुर एक धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है l यहाँ पर्यटकों की संख्या भी बढ़ रही है l इस कारण लिट्टी चोखा को यहाँ के स्थानीय व्यंजन के रूप में पहचान मिलने की पूरी संभावना है l आजकल लोग रेडी टू ईट फूड और क्षेत्रीय स्वाद वाले पैक्ड फूड पसंद कर रहे हैं l ऐसे में वैक्युम पैक्ड लिट्टी और इंस्टेंट चोखा मिक्स के रूप में इसका बाज़ार बन सकता है l बाटी में प्रयोग होने वाले सत्तु, आटा, मसाले, बैंगन, आलू आदि की खपत बढ़ने से स्थानीय किसानों की आय भी बढ़ेगी l
हर व्यव्साय की तरह इस काम में भी कई चुनौतियाँ हैं l स्वच्छता और गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतरना, आधुनिक पैकेजिंग की कमी, बड़े स्तर पर ब्राडिंग और मार्केटिंग का अभाव l उम्मीद करता हूँ कि इस योजना में शामिल होने के बाद बाटी चोखा के व्यव्साय का स्तर ऊंचा होगा और स्थानीय उद्यमियों व फूड स्टार्ट अप के साथ मिलकर गोरखपुर का बाटी चोखा एक बड़े क्षेत्रीय ब्रांड के रूप में उभरकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनायेगा l
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19/05/2026
मैं हूँ उत्तर प्रदेश l एक जिला एक व्यंजन योजना में मेरे जिलों के पारंपरिक स्वाद और व्यंजनों की बात हो और आम का जिक्र न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता है l यह आम बेहद खास है l इस योजना में मेरे यहाँ के आम के उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर नयी पहचान दिलाने के लिये शामिल किया गया है l
यूँ तो कई ऐसी नायाब चीजें हैं जो मेरी राजधानी लखनऊ को बेहद खास बनाती हैं l तहज़ीब , चिकनकारी, कबाब, बिरयानी आदि का ख्याल आते ही लखनऊ शहर की तस्वीर आँखों के सामने घूम जाती है l और आम का नाम भी इसमें शुमार है l मेरे मलिहाबाद के दशहरी आम को जी आई टैग मिल चुका है l एक जिला एक व्यंजन योजना मॆं आम से बने उत्पाद आम का अचार, आम पापड़, मैंगो जैम, मैंगो जूस, सूखा आम पावडर, मैंगो केंडी आदि शामिल हैं l मुझे इस बात का गर्व है कि पूरे देश में सबसे बड़ा आम उत्पादक राज्य मैं ही हूँ l लगभग 23 से 25 प्रतिशत तक आम की पैदावार मेरे ही जिलों में होती है l इसमें लखनऊ, सहारनपुर, सीतापुर, उन्नाव, वाराणसी, मलिहाबाद आदि प्रमुख केंद्र हैं l आम की प्रमुख किस्मों में दशहरी, चौसा, लँगड़ा, सफेदा प्रमुख हैं l आम की खेती में किसानों, बागवानों, मजदूरो, पैक़ेजिंग उद्योगों, परिवहन सेवाओं और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों में रोजगार मिलता है l
अब बात करते हैं आम के उत्पादों की l आम तो सभी को पसंद है l पर इसके अलावा इससे बनने वाले उत्पादों का भी एक बड़ा बाज़ार है l आम पापड़, आम का जूस, आम का पल्प, आम का जैम, आम का अचार, अमचूर सहित ढेरों उत्पाद हैं जो लोगों को पसंद आते हैं l अचार और अमचूर तो प्राय: हर घर की रसोईं का हिस्सा होते हैं l एक जिला एक व्यंजन योजना में आम के इन उत्पादों की ब्राडिंग पर काम किये जाने का प्रस्ताव है ताकि इन्हें विश्वस्तरीय पहचान दिलायी जा सके l सरकार लखनऊ में इकाई लगाने वाले उद्यमियों को 25 प्रतिशत सब्सिडी और ऋण की सहायता देने के लिये कटिबद्ध है l ऐसे केंद्रों की स्थापना पर भी विचार किया जा रहा है जहाँ आम के जूस, कैंडी, पल्प और अन्य उत्पाद बनाये जा सकें l सरकार ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म, मेलों, एक्सपो आदि के जरिये लखनऊ के इन आम के उत्पादों को विश्व भर के बड़े बाज़ारों में पहुँचाने का प्रयास करेगी l इस योजना के अंतर्गत आम के उत्पादों को बनाने और पैकेजिंग के लिये महिलाओं की आवश्यकता है l इस कारण महिलाओं को भी रोजगार मिलने का अवसर मिलेगा l आम बहुत ही जल्दी खराब होने वाला फल है l इसलिये कोल्ड स्टोरेज, वेयर हाऊस और परिवहन सुविधाओं का भी समुचित विकास किया जायेगा l आम के उत्पादों के निर्माण, पैकजिंग आदि के लिये किसानों, महिलाओं और स्वयं समूहों को प्रशिक्षण भी दिये जायेंगे l हालांकि इस व्यवसाय में भी कई चुनौतियां हमारे समक्ष हैं – मौसम परिवर्तन, जल संकट, भंडारण की कमी, ओलावृष्टि और बिचौलियों की वजह से किसानों को फसल का उचित लाभ ना मिलना l
एक जिला एक व्यंजन योजना में आम के उत्पादों के शामिल होने से आम के व्यव्साय में नयी संभावनायें दिखने लगी हैं l उम्मीद करता हूँ कि अब मेरे यहाँ के आम के साथ साथ आम के उत्पादों का स्वाद पूरी दुनिया को पसंद आयेगा l
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16/05/2026
मैं हूँ उत्तर प्रदेश । कुछ समय के अंतराल के बाद मैं आप सबके बीच हूँ एक जिला एक व्यंजन श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए । आज बात करते हैं हाथरस की रबड़ी की ।
हाथरस की रबड़ी का बेमिसाल स्वाद हाथरस को स्वाद के शिखर पर ले जाता है । यहाँ की रबड़ी सिर्फ़ मेरे ही यहाँ नहीं बल्कि देश भर में अपने पारंपरिक स्वाद और बनाने के अनूठे तरीके के लिए जानी जाती है । इस रबड़ी की विशेष बात यह है कि यह सिर्फ़ भैंस के गाढ़े दूध से तैयार की जाती है । इसमें पैकेट के दूध या गाय के दूध का प्रयोग नहीं किया जाता है । इस गाढ़े दूध को पका कर गाढ़ी और लच्छेदार मलाई के साथ कम शक्कर वाली रबड़ी तैयार की जाती है । देर तक दूध पकने से इसमें सौंधापन आ जाता है ।
हाथरस की रबड़ी का इतिहास दशकों पुराना है । रबड़ी यहाँ की सिर्फ़ मिठाई ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी है । इसका इतिहास यहाँ की बगीची संस्कृति से जोड़ा जाता है अर्थात बागों में बैठना, भाँग के साथ दूध की बनी मिठाइयों का आनंद लेना । हाथरस में कुछ विशेष दुकानें हैं जो पिछले कई सालों से रबड़ी बनाने और बेचने का काम कर रही हैं । यहाँ हन्नो लाला की रबड़ी की दुकान बहुत प्रसिद्ध है ।
हाथरस में रबड़ी केवल एक मिठाई ही नहीं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, दुग्ध उद्योग और छोटे व्यापारियों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है । हाथरस और आसपास के ब्रज क्षेत्र में रबड़ी का उत्पादन पारंपरिक डेयरी व्यवसाय से जुड़ा हुआ है । रबड़ी बनाने के लिए बहुत ज़्यादा दूध की आवश्यकता होती है । जिसके कारण स्थानीय पशुपालकों और डेयरी किसानों की आय निर्धारित रहती है । भैंस और गाय पालन को प्रोत्साहन मिलता है । आपको बता दूँ कि ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन रोजगार और नकद आय का बड़ा स्रोत है । इससे ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलती है ।
हाथरस में रबड़ी का कारोबार मुख्य रूप से कुटीर एवं लघु उद्योग का रूप माना जाता है । इसमें हलवाई, छोटे डेरी प्रतिष्ठान और स्थानीय मिठाई उद्योग को बढ़ावा मिलता है । एक अन्य पहलू यह भी है कि रबड़ी का कारोबार सिर्फ दूध तक ही सीमित नहीं है । इसमें चीनी, मेवा, ईंधन, बर्तन, पैकेजिंग सामग्री, परिवहन जैसे व्यवसाय भी जुड़े हुए हैं । इन व्यवसायों से बहुत लोगों को रोज़गार मिलता है । इसलिए इससे मल्टीप्लायर इम्पेक्ट पैदा होता है अर्थात् एक उत्पाद कई अन्य क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियों को संचालित करता है । प्रतिदिन कई टन रबड़ी बनायी जाती है । त्योहारों, सावन, दीपावली, जन्माष्टमी में ब्रज क्षेत्र में रबड़ी की माँग बहुत बढ़ जाती है । अन्य जिलों में भी यहाँ से रबड़ी भेजी जाती है ।
हाथरस में रबड़ी का व्यवसाय महिलाओं को भी रोज़गार देने में सहायक हो रहा है । रबड़ी बनाना, मेवा काटना, पैकिंग आदि में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । हाथरस की रबड़ी को जी आई टैग दिलवा कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए सरकार प्रयासरत है । हालांकि रबड़ी उद्योग के सामने कई चुनौतियां भी हैं - दूध की बढ़ती क़ीमत, शुद्धता की कसौटी, कोल्ड स्टोरेज की कमी, ब्रांडिंग और पैकजिंग की कमी । उम्मीद करता हूँ कि एक जिला एक व्यंजन योजना में शामिल होने के बाद रबड़ी उद्योग की चुनौतियों की ओर भी सरकार का ध्यान जाएगा । हाथरस की रबड़ी स्थानीय संस्कृति और स्वाद के साथ साथ ग्रामीण आय, डेरी अर्थव्यवस्था, लघु उद्योग, पर्यटन और रोज़गार उपलब्धता का अहम हिस्सा है । हाथरस की रबड़ी की मिठास सिर्फ़ ब्रज क्षेत्र को ही नहीं बल्कि पूरे देश के स्वाद को नई बुलंदियों तक ले जाएगी
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24/04/2026
मैं हूँ उत्तर प्रदेश l बनारस से निकल कर हम आ पहुंचे हैं मैनपुरी में, जहाँ की सोन पापड़ी का स्वाद पिछले कई सालों से लोगों को लुभा रहा है l यूँ तो सोन पापड़ी की तरफ से लोगों का ध्यान तो हटा ही रहता है लेकिन जब से मेरी सरकार ने एक जिला एक व्यंजन योजना की सूची में इसे शामिल कर लिया है तो फिर से सोन पापड़ी की चर्चा होने लगी है l
मैनपुरी की सुनहरी खस्ता और परतदार सोनपापड़ी मुंह में रखते ही घुल जाती है l इसे न सिर्फ मेरे ही जिलों में, बल्कि देश भर में पसंद किया जाता है l इसका इतिहास लगभग सवा सौ साल पुराना है l हालाँकि सोन पापड़ी की उत्पत्ति मेरे देश में नहीं हुई l यह फारस की मिठाई है l जहाँ इसे सोहन पपड़ी के नाम से जाना जाता था l समय बीतने के साथ वहां से आने वालों के साथ यह मिठाई भी हमारे देश में आ गयी l अपने कुरकुरे स्वाद और मिठास से इस मिठाई ने लोगों के दिलों में जगह बना ली l कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे पता चलता है कि अपने देश में इस मिठाई के बनने का चलन सबसे पहले महाराष्ट्र में शुरू हुआ l वहां से इस मिठाई का स्वाद राजस्थान, गुजरात, पंजाब आदि से होता हुआ मेरे शहरों तक पहुंचा l इस तरह से यह मिठाई पूरे देश भर में पसंद की जाने लगी l
सोन पापड़ी को अलग अलग नामों से जाना जाता है l सान पापरी, शोमपापरी, सोहन पापड़ी, पेतिना आदि इसके कई नाम हैं l त्योहारों के मौसम में इस मिठाई की मांग बढ़ जाती है l
इस मिठाई की परतें एकदम महीन होती हैं l यह मिठाई बेसन और मैदे से तैयार की जाती है l चाशनी और पिस्ता – इलायची के साथ इसके स्वाद को बेहतरीन बनाया जाता है l इसमें खरबूजे के बीज मिलकर इसके स्वाद को और बढ़ा देते हैं l स्वाद में शानदार यह मिठाई मेरे शहर मैनपुरी में बड़े चाव से बनायी जाती है l
मैनपुरी की सोन पापड़ी को अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक पहचान दिलाने के लिए सरकार की एक जिला एक व्यंजन योजना में कई महत्वपूर्ण कदमों पर विचार किया गया है l इसके अंतर्गत छोटे उद्यमियों और कारीगरों को कच्चा माल और कार्यशाला में सुधार प्रदान किया जायेगा l सस्ती दरों पर ऋण और सब्सिडी दिए जाने की व्यवस्था है l कारीगरों को आधुनिक तकनीक, पैकेजिंग और गुणवत्ता सुधार के लिए प्रशिक्षण दिया जायेगा l आकर्षक पैकिंग और ब्रांडिंग पर भी ध्यान दिया जायेगा l कारीगरों को देश और विदेश में होने वाले मेलों, स्टालों, प्रदर्शनियों में अपनी मिठाइयाँ प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा l
निस्संदेह सरकार का यह प्रयास सोन पापड़ी मिठाई के बेहतर भविष्य की रूपरेखा तय करेगा l सोन पापड़ी न सिर्फ अपनी मिठास और स्वाद बरकरार रखेगी, साथ ही मैनपुरी जिले की आर्थिक परिदृश्य को भी निखारेगी l
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18/04/2026
मैं हूँ उत्तर प्रदेश l यूँ तो वाराणसी की हर बात निराली है l चाहे सुबह हो या यहाँ के घाट, सूर्योदय हो या नौका विहार, गंगा आरती हो या फिर यहाँ का पान और मिठाई l मिठाई का जिक्र आते ही यहाँ की लौंगलता का स्वाद स्वत: ही मुंह में घुल जाता है l चाशनी में डूबी यह खास मिठाई है जो यहाँ के पर्यटकों को बहुत पसंद आती है l बनारस में आप कहीं भी चले जाइये, समोसा-कचौड़ी के साथ यह मिठाई जरूर मिल जायेगी l
यूँ तो मेरे कई शहरों और जिलों में यह मिठाई बनायी जाती है पर वाराणसी में बनने वाली इस मिठाई का स्वाद ही बिल्कुल अलग है l यहाँ इसे बनाने का तरीका भी बेहद खास है l यहाँ पर लौंगलता को धीमी आंच पर देर तक पकाया जाता है l खोया और खड़ी लौंग इस मिठाई की विशेषता हैं l पकने के बाद इसे गरम चाशनी में डाल दिया जाता है l गरम चाशनी में पड़ते ही लौंग का रंग लाल हो जाता है l खोया को मैदे में लपेटकर यह मिठाई बनायी जाती है l इलायची का स्वाद और खुश्बू मिठाई की गुणवत्ता को और बढ़ा देते हैं l चूंकि इसमें मैदे के अंदर खोया की भरावन को लौंग के साथ सीलबंद किया जाता है इसलिये इसे लौंगलता का नाम दिया गया l
आपको बता दें कि इस मिठाई को लगभग पांच सौ साल पहले बनाया गया था l यह बंगाली मिठाई लवंग लतिका का ही एक रूप है l यह मिठाई भी बनारस में काफी लोकप्रिय रही है l मेरे जिलों के अलावा यह मिठाई बिहार और बंगाल में बनायी जाती है l यह मिठाई वाराणसी की मिठाई परंपरा का बेहतरीन उदाहरण है l इस मिठाई की लोकप्रियता को देखते हुए इसे जी आई टैग दिये जाने की प्रक्रिया में रखा गया है l प्रधानमंत्री सहित अनेक गणमान्य लोगों ने लौंगलता क स्वाद चखने के बाद इसे जी आई टैग दिये जाने की बात कही है l
एक जिला एक व्यंजन योजना की सूची में लौंगलता का नाम शामिल है l अत: मुझे इस बात की तसल्ली है कि लौंगलता मिठाई का लाजवाब स्वाद अब देश से निकल कर अंतरराष्ट्रीय पटल पर बनारस की विशिष्ट पहचान बनकर उभरेगा l बनारसी पान की तरह ही बनारस की लौंगलता एक मज़बूत ब्रांड बनेगी l ई-कॉमर्स और पैकेजिंग में सुधार होने पर यह मिठाई बनारस तक ही सीमित नहीं रहेगी बल्कि देश भर में और विदेशों में लगने वाले बड़े- बड़े मेलों, एक्सपो, हाट आदि में भी बिकने लगेगी l सबसे प्रभावशाली लाभ तो स्थानीय हलवाइयोँ को मिलेगा l उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी l लेकिन इन सकरात्मक बद्लाव के लिये यह आवश्यक है कि लौंगलता की गुणवत्ता से कोई समझौता ना किया जाये l लौंगलता का लाजवाब स्वाद ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है l इसलिये इस पारंपरिक स्वाद को बरकरार रखते हुए इस मिठाई की धमक को विश्व स्तर पर ले जाना है l
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