Political Training by Shahnawaz Chaudhary Bhartiya.

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We are trying to improve political scenarios of today ... This is a socio-political reform movement... A first of its kind revolution in India.. We believe until sincere, educated and talented people are not participating in mainstream politics there is no scope for development … We have created a platform to facilitate the same, enabling sincere and serious people to participate in mainstream leg

15/05/2026

राजनीति के हर व्यक्ति को जानने चाहिए ये कारण।

14/05/2026

राजनीति में सफलता पाने में कितना समय लगता है?

12/05/2026

Politics में Success का राज़ है? 🔥 🔥 🎤 🏛️

11/05/2026

यदि पैसा बहुत ज़रूरी है चुनाव जीतने के लिए तो पैसे वाले क्यों हार जाते हैं चुनाव?

10/05/2026

सभी पढ़ें, चुनाव हारने के बाद एक नेता का भावुक संदेश।

अमेरिका में सफल टेक्नोलॉजी करियर और रियल एस्टेट कारोबार छोड़कर राजनीति के लिए भारत लौटे नेता अनंतन अय्यासामी की भावुक पोस्ट सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हो रही है।

तमिलनाडु के तेनकासी जिले के रहने वाले अय्यासामी पहले इंटेल कंपनी में इंजीनियर थे, बाद में उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया और 2026 में विधानसभा का चुनाव भी लड़ा।

अनंतन अय्यासामी 2026 विधानसभा चुनाव में वासुदेवनल्लूर (एससी) सीट से उम्मीदवार बनें परन्तु उन्हें डीएमके के ई. राजा से करीबी मुक़ाबले में 6500 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

चुनाव हारने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट लिखी, जिस पर लोगों की काफी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

अय्यासामी ने लिखा कि पिछले चार वर्षों में उन्होंने गांवों में विकास कार्यों के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए और अपना पूरा समय लोगों की सेवा में लगाया, उनका सपना करीब एक लाख युवाओं को रोजगार से जोड़ने का था।

उन्होंने बताया कि बीते चार सालों में कई गांवों में बस स्टॉप बनवाए गए, तालाबों का जीर्णोद्धार कराया, छात्रों की पढ़ाई में मदद की और मेडिकल कैंप व करियर वर्कशॉप आयोजित कराई। उन्होंने कहा कि इसमें सिर्फ पैसा ही नहीं, बल्कि वह अनमोल और कभी न वापस आने वाला समय भी शामिल था जो परिवार के साथ बिताया जा सकता था।

अय्यासामी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि चुनाव के दौरान उसी गांव से जहां उन्होंने करोड़ों रुपये खर्च करके काम कराया ऐसे उम्मीदवार को चुना, जो पांच साल में मुश्किल से वहां दिखाई दिया। उन्होंने कहा, "आखिरकार, चुनाव के एक हफ्ते के पैसों ने चार साल की सच्ची सेवा को हरा दिया।"

उन्होंने बताया कि चार साल पहले उन्होंने अपनी 12 साल की बेटी से कहा था कि वह अमेरिका छोड़कर भारत लौट रहे हैं ताकि राजनीति और जनसेवा में काम कर सकें। हार के बाद उनकी बेटी ने वीडियो कॉल पर पूछा, "अप्पा, क्या अब आप मुझे बता सकते हैं कि राजनीति वास्तव में क्या होती है?"

अय्यासामी ने लिखा कि जीवन में पहली बार उनके पास अपनी बेटी के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

असल में यह केवल एक हारने वाले व्यक्ति की कहानी नहीं है बल्कि हर हारने वाले व्यक्ति की लगभग यही कहानी होती है। जब आप बिना राजनीति की बारीकियों को समझें, बिना राजनीति के दांव पेंच जाने राजनीति में उतरते हैं तो उसका यही अंजाम होता है।
जय हिन्द, जय भारत
शाहनवाज चौधरी भारतीय

10/05/2026

राजनीति में असफल होना बुरा नहीं है, बुरा है प्रयास ही न करना।

अगर आप राजनीति में प्रयास करते हैं और असफल भी हो जाते हैं तो भी आप बधाई के पात्र हैं क्योंकि ज़्यादातर लोग तो कोशिश ही नहीं करते हैं। वैसे भी यही हम प्रयास करेंगे तो दो नतीजे आ सकते हैं, या तो काम होगा या काम नहीं होगा। परन्तु हम प्रयास ही नहीं करते हैं तो केवल एक ही नतीजा आएगा कि काम नहीं होगा। हर बार, बार-बार यही बात सच है।

राजनीति एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ हर व्यक्ति सपने तो देखता है, लेकिन उन सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष करने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। जो लोग मैदान में उतरते हैं, जनता के बीच जाते हैं, आलोचना सहते हैं, चुनाव लड़ते हैं और भले ही वे हार का सामना करते हैं तो भी वे उन लोगों से बहुत बेहतर हैं जो केवल बदलाव लाने के बारे में बोलते तो हैं, पर केवल बोलते ही हैं, कुछ करने का प्रयास नहीं करते।

वैसे भी राजनीति में असफलता कोई राजनीति का कोई अंत नहीं होती है कि यदि असफल हो गए तो कभी सफल नहीं हो सकते। बल्कि ज़्यादातर लोग जो राजनीति में सफल होते हैं उन्हें सफलता एक बार में नहीं मिलती, वे भी बहुत बार असफल हुए होते हैं बस यह ध्यान रखना है कि असफलता के बाद रूकना नहीं है।
मान लिजिए कि किसी चुनाव में आपको केवल 100-200 लोगों ने ही वोट दिया और आप चुनाव हार गए, तो इसमें उन लोगों का क्या है दोष जिन्होंने आपको वोट दिया? कमीं आपकी रही की आप लोगों को यह विश्वास नहीं दिला पाए कि वे आपको अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनें।
अब यदि आप हार के बाद घर बैठ जाते हैं तो फिर वे लोग तो सच में ठगा से महसूस करेंगे जिन्होंने आपको वोट दिया होगा।

आपकी चुनावों हार केवल एक संकेत होता है कि अभी आपकी यात्रा समाप्त नहीं हुई है अंबा यात्रा बाकी है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े नेता कई बार हारने के बाद ही मजबूत बने। चुनाव हारना, आलोचना झेलना, लोगों और परिवार की बातें सुनना यही आपकी राजनीति की असली परीक्षा है।

असल में जो लेग केवल जीत की उम्मीद या स्वार्थ से राजनीति में आते हैं वे पहला झटका लगते ही टूट जाते हैं। लेकिन जो लोग संघर्ष को अपना धर्म मानता है, जिनके अंदर जीत के लिए जुनून और कुछ कर गुज़रने का जज़्बा होता है वे हर हार को अपनी अगली जीत की तैयारी बना देते हैं।

आज के समय में राजनीति आसान नहीं है। सोशल मीडिया का दबाव, विरोधियों के हमले, जनता की अपेक्षाएँ, संगठन की चुनौतियाँ, आर्थिक बोझ, इन सबके कारण व्यक्ति की हर दिन एक नई परीक्षा होती है।

ऐसे में बहुत लोग राजनीति में आने से, चुनाव लड़ने से भी डरते हैं कि अगर हार गए तो लोग मज़ाक उड़ाएँगे, सम्मान कम हो जाएगा या भविष्य खत्म हो जाएगा, परन्तु सच यह है कि राजनीति में वही लोग इतिहास बनाते हैं जो हारने का साहस रखते हैं। वैसे भी जब जीत निश्चित हो तो कायर भी लड़ लेते हैं परन्तु जब पता हो कि हार निश्चित है और तब भी मैदान में डटे रहें तब सच में माना जाएगा कि आप एक साहसी व्यक्ति हैं।

एक साधारण परिवार की व्यक्ति जब पहली बार पोस्टर लगाता है, जनता के बीच जाता है, भाषण देता है, अपनी बात रखता है या चुनाव लड़ने की घोषणा करता है, वह तभी हजारों लोगों से आगे निकल जाता है, क्योंकि अधिकांश लोग केवल चर्चा करते हैं, आलोचना करते हैं, लेकिन मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं करते।

हम सभी ने बहुत बार ऐसा देखा है कि चुनाव हारने वाला नेता जनता के दिल जीत लेता है, जबकि चुनाव जीतने वाला नेता इतिहास में खो कर रह जाता है। हार व्यक्ति को विनम्र बनाती है, उसकी गलतियों का एहसास कराती है और उसे जनता की वास्तविक समस्याओं के और करीब ले जाती है।

यदि कोई युवा राजनीति में आना चाहता है, तो उसे सबसे पहले असफलता से दोस्ती करनी होगी, उसे यह समझना होगा कि राजनीति कोई शॉर्टकट नहीं, बल्कि धैर्य, संघर्ष और विश्वास की लंबी यात्रा है, हर हार के बाद खुद को फिर से खड़ा करना ही असली लीडरशिप है।

सवाल यह नहीं है कि आप गिरते कितनी बार हैं या राजनीति में असफल कितनी बार होते हैं बल्कि सवाल यह है कि उस गिरने के बाद आप गिरनी जल्दी उठकर फिर से लड़ने को तैयार हो जाते हैं, अगली तैयारी कितनी जल्दी शुरू कर देते हैं।

इसलिए अगर आप राजनीति में असफल होते हैं, तो निराश मत होइए बल्कि खुद को शाबाशी और बधाई दीजिए कि आपने वह साहस दिखाया जो अधिकांश लोग कभी नहीं दिखा पाते। जिस काम को लेग सोचने से भी डरते हैं वह काम आप करके आए हैं, आपने वह किया है जो इतिहास में दर्ज हो चुका है। बस अब अपनी असफलताओं से सीखों और आगे बढ़ो, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।
जय हिन्द, जय भारत।
शाहनवाज चौधरी भारतीय

10/05/2026

Happy Mothers Day to Everyone.

Photos from Political Training by Shahnawaz Chaudhary Bhartiya.'s post 09/05/2026

राजनीति के क़िस्से 4:- ताकत एक वोट की।

तमिलनाडू में एमके स्टालिन की सरकार में मंत्री जो TVK पार्टी के उम्मीदवार से सिर्फ 1 वोट से चुनाव हार गए वे भारत के इतिहास में तीसरे ऐसे उम्मीदवार हैं जो एक वोट से हारे हैं। इससे पहले भारत की राजनीति के इतिहास में सिर्फ 2 विधानसभा उम्मीदवार ऐसे थे जो एक वोट से चुनाव हारे. थे।

नम्बर:-1

2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में (JD(S)) के उम्मीदवार ए. आर. कृष्णमूर्ति केवल एक वोट से चुनाव हार गए थे। उन्हें कांग्रेस के आर. ध्रुवनारायण ने हराया।
बाद में आर. कृष्णमूर्ति ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी।

नम्बर :-2

2008 में नाथद्वार से कांग्रेस के सीपी जोशी 1 वोट से चुनाव हार गए थे उन्हें बीजेपी के कल्याण सिंह चौहान ने हराया था।सबसे आश्चर्य की बात इस हार में ये थी कि उनकी पत्नी ही वोट नहीं डाल पाई थीं।

नम्बर:-3

2026 में तमिलनाडू के हाल ही में हुए चुनाव में TVK पार्टी से श्रीनिवास सेतुपति ने तिरुपत्तूर सीट से चुनाव लड़ते हुए DMK के मंत्री और 2006 से लगातार 4 बार के विधायक के.आर. पेरियाकरुप्पन को एक वोट से हराया है।

जय हिन्द, जय भारत
शाहनवाज चौधरी भारतीय

08/05/2026

🔥⏰ राजनीति में सफलता का सबसे बड़ा राज़: सही समय की पहचान 🏛️

सिर्फ अच्छी रणनीति और मेहनत काफी नहीं होती ❌
अगर आपको सही समय की पहचान नहीं है,
तो सफलता हाथ से निकल सकती है ⚠️

👉 राजनीति में हर अवसर हर किसी के लिए नहीं होता
👉 असली खिलाड़ी वही है जो अपने मौके को पहचान ले 🧠♟️

🔥 सही समय पर सही कदम
आपको आगे बढ़ाता है
🔥 और गलत समय पर लिया गया फैसला
आपको पीछे धकेल सकता है ❌

याद रखिए—
राजनीति में Timing ही सब कुछ बदल सकती है 🏆

👉 अपने समय को पहचानिए,
मौके को पकड़िए,
और पूरी ताकत से आगे बढ़िए 🚀

🏛️ ⏰ ♟️ 🧠 🎯 🚀

08/05/2026

राजनीति के क़िस्से-3

27 नवंबर 2020 की बात है। एक खबर आई कि पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री और दीदी के 'खास सिपहसालार' सुवेंदु अधिकारी ने इस्तीफा दे दिया है।

विधानसभा चुनाव महज 5 महीने दूर थे। सुवेंदु का जाना किसी बड़े किले के ढहने जैसा था। आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू हुई। रूठे हुए 'नंदीग्राम के शेर' को मनाने के लिए बिसात बिछाई गई।

1 दिसंबर की सर्द रात। कोलकाता के एक कमरे में 4 दिग्गज जुटे। बागी सुवेंदु अधिकारी, ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी, टीएमसी सांसद सौगत रॉय और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर। घंटों माथापच्ची हुई।

अगली सुबह सौगत रॉय ने ऐलान किया कि सब ठीक है। सुवेंदु कहीं नहीं जा रहे, वो हमारे साथ हैं। लगा कि तूफान टल गया।

कुछ ही दिन बीते थे कि सुवेंदु के एक वॉट्सऐप मैसेज ने फिर सियासी धमाका कर दिया। सौगत रॉय को भेजे मैसेज में उन्होंने लिखा कि “मेरी टीस अभी भी बरकरार है। आपने बिना समाधान निकाले ही सब कुछ मुझ पर थोप दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुझे अपनी बात कहनी थी, लेकिन आपने पहले ही घोषणा करके मेरा मौका छीन लिया। अब साथ चलना मुमकिन नहीं। मुझे माफ कर दें।’

इधर मेदिनीपुर में सुवेंदु के दफ्तर से ममता दीदी के पोस्टर नदारद हो रहे थे और दीवारों पर भगवा रंग चढ़ने लगा था। 17 दिसंबर को उन्होंने आधिकारिक तौर पर टीएमसी को 'राम-राम' कह दिया।

अगले ही दिन दिल्ली से 'जेड' श्रेणी की सुरक्षा का फरमान आया, तो समझ में आ गया कि अब सुवेंदु की मंजिल का पता बदल चुका है।

19 दिसंबर 2020 का वो दिन, मेदिनीपुर का मैदान जनसैलाब से अटा पड़ा था। गृहमंत्री अमित शाह ने सुवेंदु के गले में बीजेपी का गमछा डाला। दोनों ने मिलकर झंडा लहराया। सुवेंदु ने झुककर शाह के पैर छुए और बंगाल फतह के लिए बीजेपी के सारथी बन गए।

3 सीटों वाली बीजेपी 2021 के चुनाव में 77 सीटों तक पहुंची और इस बार 2026 में 207 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। अब ऑब्जर्वर बनकर बंगाल पहुंचे अमित शाह ने सुवेंदु को ही मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर दिया।

08/05/2026

मरने के डर से बोलना बंद करने वाले भी एक दिन मर ही जाते हैं

इतिहास गवाह है कि दुनिया में बदलाव हमेशा उन लोगों ने किया है जिन्होंने डर के बावजूद सच बोलने का साहस किया। जो लोग अन्याय, झूठ और अत्याचार के सामने चुप रहे, वे शायद कुछ समय के लिए अपने आपको सुरक्षित समझते रहे होंगे, लेकिन अंत में वे भी मारे ही गए। असल में सवाल यह नहीं है कि “मरना है या नहीं”, सवाल यह है कि “जीना कैसे है?” मेरा मानना है कि कायर और डरपोक की सौ साल की ज़िन्दगी से बेहतर होती है शेर की तरह दिलेर की एक दिन की ज़िन्दगी।

असर में व्यक्ति का मरने के डर से बोलना बंद कर देना उसके आत्मसम्मान को धीरे-धीरे खत्म कर देना है। जब कोई व्यक्ति सच जानते हुए भी चुप रहता है तब केवल उसकी आवाज़ नहीं मरती, उसके भीतर का साहस, उसका आत्मविश्वास और उसका ज़मीर भी मर जाता है।

कहते हैं न कि कुछ लोगों का शरीर मर जाता है परन्तु आत्मा भटकती रहती है, परन्तु जो अन्याय और अत्याचार देखते हुए भी चुप रह जाते हैं वे वे लोग हैं जिनका केवल शरीर भटक रहा है, उनकी आत्मा मर चुकी है।

आज समाज में बहुत से लोग सही को सही और गलत को गलत कहने से डर रहे हैं, देश के व्यापारी क़र्ज़ के कारण बर्बाद हो रहे हैं, पढ़े लिखें लोग बेरोजगार बैठे हैं, गाँव की महिलाओं को क़र्ज़े के कारण गलत काम करने पर मजबूर किया जा रहा है, परिवार के परिवार सरकार की गलत नितियों के कारण क़र्ज़े की दलदल में फँसकर आत्महत्या कर रहे हैं और आप चुप बैठे हैं। किसी को कुछ को नौकरी जाने का डर है, कोई समाज क्या कहेगा इस डर से चुप है, कोई सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से चुप है।

लेकिन याद रखिए, अन्याय की सबसे बड़ी ताकत अत्याचारी नहीं होता, बल्कि अच्छे लोगों की खामोशी होती है, जब अच्छे लोग डरकर बैठ जाते हैं, तब गलत लोग और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं।

वैसे भी सच बोलना, सही को सही और गलत को गलत बोलना कभी भी आसान नहीं होता है। इसके लिए साहस चाहिए, त्याग चाहिए और कई बार अकेले चलने की ताकत भी चाहिए, परन्तु यह भी सच है कि इतिहास में सम्मान भी उन्हीं लोगों को मिला जिन्होंने कठिन रास्ता चुना।

अगर भगत सिंह अंग्रेजों के डर से चुप हो जाते, अगर महात्मा गांधी अन्याय के सामने झुक जाते, अगर बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज़ न उठाते, यदि मान्यवर कांशीराम जी डर से काम न करते तो शायद आज भारत का इतिहास बिल्कुल अलग होता।

इन महान लोगों ने यह समझ लिया था कि डरकर जीने से बेहतर है साहस के साथ संघर्ष करते हुए मर जाना। वैसे भी ज़िन्दा वही है जिसका ज़मीर ज़िन्दा है, जिसकी अंतरात्मा ज़िन्दा है, केवल सांस लेने वाले को ज़िन्दा नहीं कहा जा सकता।

हर युग में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सच बोलने वालों को पागल, बागी या मुसीबत पैदा करने वाला कहते हैं, लेकिन समय गुजरने के बाद वही लोग समाज के लिए उदाहरण बनते हैं। वैसे भी सच की आवाज़ को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है परन्तु उसे हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता।

जो लोग आज डर के कारण चुप हैं, उन्हें यह समझना होगा कि खामोशी कभी सुरक्षा की गारंटी नहीं होती, गलत के सामने चुप रहना, कहीं न कहीं उस गलत को ताकत देना है। अगर आपकी आवाज़ किसी कमजोर के लिए न्याय बन सकती है, किसी पीड़ित को हिम्मत दे सकती है, किसी समाज को जागरूक कर सकती है, तो ऐसी जगह पर आपका चुप रहना भी एक अपराध ही है।

इसलिए बोलिए, सच के साथ खड़े रहिए, डर लगे तो भी अपनी आत्मा की आवाज़ मत दबाइए। क्योंकि मरना तो एक दिन सबको है, लेकिन इतिहास केवल उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने डर के बावजूद सच बोलने का साहस किया। भले ही हम सफल न हो पाए, भले ही हम हार जाए परन्तु हमसे यह संतोष कौन छीनेगा कि हमने सच को सच कहा था, हम में गलत को गलत कहने की हिम्मत थी।

वैसे भी यदि आप इतना भी नहीं कर सकते, आपने गलत को गलत कहने की हिम्मत खो दी है तो माफ कीजिए आप ज़िन्दा नहीं है, आप कब के मर चुके हैं बस आपका अंतिम संस्कार होना बाकी है।

जय हिन्द, जय भारत
शाहनवाज चौधरी भारतीय

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