06/07/2018
If were states here's how much area India's most-spoken languages would occupy
People are awake now.
शोषण मुक्त बाजार व्यवस्था बनाने में मदद कीजिये . हम सब उपभोक्ता है .उपभोक्ता के रूप में हमारे कई अधिकार है . इनमे मुख्य है सुरक्षा , सूचना , चयन , सुनवाई , क्षतिपूर्ति और उपभोक्ता क्षिक्षा . लेकिन बाजार की हालत बेहद ख़राब है . मिलावट , कालाबाजारी . कम नाप तोल , अनुचित व्यापारिक व्यहवार व अधिक मूल्य वसूली और भ्रामक विज्ञापनों के जरिये सब को ठगा जा रहा है . हम ठगे जाकर भी चुप रहते है यही ठगी बढाने क
06/07/2018
If were states here's how much area India's most-spoken languages would occupy
मैने कभी नही सुना कि अमेरिका में बोर्ड इग्जाम के रिजल्ट आ रहे हैं या यूके में लड़कीयो ने बाजी मार ली है या आस्ट्रेलिया में किसी छात्र के 99.5 % आऐ है।
मई-जून के महीने में हिंदुस्तान के हर घर में दस्तक देती है एक भय एक उत्तेजना, एक जिज्ञासा, एक मानसिक विकृति... हर माता-पिता, हर बोर्ड के इग्जाम मे बैठा बच्चा हर बीतते हुए पल को एक ओबसेसन एक डिप्रेशन एक इनसेक्योरीटी में काट रहा होता है .. कि क्या होगा ?
माता-पिता फ़सल की तरह बच्चो को पाल रहे है कि कब फ़सल पके कब उनकी अधूरी रह चुकी अकाँक्षाऐ पूरी होंगी, कब वे फ़सल काटेंगे।
हमारे पूंजीवादी इनवेस्टर्स को क्या प्रोडक्ट चाहिये इस हिसाब से शिक्षा और उसके उद्देश्य तय हो रहे हैं। एक परिवार सुख-चैन त्याग, दिन-रात खट के, सँघर्षो, घोर परीश्रम में गुज़र जाता है उस परीवार का अपना अस्तित्व और सुख चैन और मानवीय भावनाऐ इसलिये भेंट चढ जाती है क्योंकि टीसीएस को एक बेहतरीन सोफ्टवेयर डेवलेपर चाहिये.. या मेकेन्से को बेस्ट ब्रेन चाहिये.. या रिलायन्स को बेहतरीन गेम डिजाइननर चाहिये।
हमारी शिक्षा व्यवस्था व उसके आदर्श कहाँ रह गये ?
हमारे स्कूल देश के बेस्ट नागरिक नही देश के बेस्ट मजदूर बनाने में दिन रात एक करके जुटे हुए हैं.. और माता-पिता बच्चो को बच्चा नही, एक मेकेनिकल डीवाईस बनाने को प्रतिज्ञाबद्ध हैं।
बच्चो को जीने दो.. दुनिया खत्म नही होने जा रही... उन्हे बेस्ट इम्प्लोई नही बेस्ट सीटीजन बनाने में यकीन रखो दोस्तो ..
बचपन की भी खुद से कुछ अपेक्षाऐ होती हैं अपने निस्वार्थ स्वप्न होते हैं उनका हमारे लिये कोई अर्थ नही पर.. बच्चो के लिये वो जन्नत से कम नही .. प्लीज बच्चो की दुनिया मत उजाड़ो .. उन्हे मनोरोगी मत बनाओ ...
ये एक मानसिक रुग्णता ही तो है ..टोपर्स की खबरें.. उन्हे मिठाई खिलाते माता-पिता की फोटो .. क्या ये एक आम सामान्य स्तर के बच्चो को मानसिक हीनता की अनुभूती नही देंगे ??
अरे..टापर तो दो चार होंगे बाकी देश का बोझ तो 99% इन्ही फूल से कोमल सामान्य बच्चो ने ही उठाना है. उनकी मुस्कान मत छीनो .. देश से उसकी सृजनात्मक शक्ति मत छिनो ..
जैसे हमारे लिये नेपाल के माँ बाप मजदूर तैयार कर रहे हैं वैसे ही हम टाटा, रिलायंस, एल एंड टी, मारुति, मेकेन्से, देन्सू , etc के लिये मजदूर तैयार कर रहे हैं।
वे कुछ भी बन जाएं .. एमएनसी में सीईओ हो जाएं पर जो बचपन की रिक्तता हमने आरोपित कर दी है वो उन्हे जीवन भर खलेगी और मानवीय विकृतियों के रुप में फलेगी ... हमको बेस्ट सीईओ मिलेंगे जिनकी प्राथमिकता उनकी कंपनी होगी , देश और परिवार नहींं
साभार(Dr. Bharti Kaushik)
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Wow
#बिजली #तूफान में क्या करें
Math magic
Math logic
Good use of machines
किसी ने कहा "भारत माता की जय" नही बोलूंगा
मैं भी कहता हूँ बिल्कुल सही, मत बोल
क्यूंकि "गंदी जुबान से मंत्र नहीं बोला जाता" 👊👊
03/02/2018
दिल्ली के रघुबीर नगर में मुस्लिम परिवार ने हिंदू लड़के की चाक़ू मार कर हत्या की....क्योंकि उनकी बेटी का उस हिंदू लड़के से रिश्ता था
इलाक़े में तनाव, पुलिस बल तैनात
03/02/2018
अगर कोई पुरुष किसी महिला से शादी का वादा कर के शारीरिक संबंध बनता है और बाद मे शादी से इनकार कर देता है तो वो महिला बलात्कार का केस दर्ज करा सकती है ?
अगर कोई महिला किसी पुरुष से शादी का वादा कर के शारीरिक संबंध बनाती है और बाद मे शादी से इनकार कर देती है तो वो पुरुष कुछ न करे।
28/01/2018
पद्मावती के जौहर की आंच महसूस नहीं होती
पुराने वक्त से ही फिल्म के नायक/खलनायक को दमदार दिखाने के लिए एक 'कॉन्ट्रास्ट' पैदा किया जाता है। नायक अच्छे गुणों वाला और खलनायक बुरा। यदि किसी सुंदर कन्या का दिल जीतना है और सामने दो प्रतियोगी हैं तो निर्देशक दोनों के चरित्र में भारी बदलाव करेगा। चरित्र वर्णन( कैरेक्टराइजेशन) में इस बात का ध्यान रखेगा कि 'खलनायक' कहीं से भी 'नायक' से अधिक शक्तिशाली न दिखाई दे।
मामला बराबरी का हो सकता है लेकिन ऊपर-नीचे नहीं हो सकता। ताज़ा फिल्म 'पद्मावत' में निर्देशक संजय लीला भंसाली ने फिल्म के चरित्र संयोजन(कैरेक्टराइजेशन) में एक 'काइयाँपन' दिखाया है, जिसके कारण फिल्म के समग्र प्रभाव पर 'खिलजी प्रभाव' स्पष्ट दिखाई देता है।
संजय लीला भंसाली ने बहुत शातिरपन के साथ अपने चरित्र बुने हैं। ऐसी विक्षिप्तता के साथ कि पद्मावती और राजा रतन सिंह के किरदार खिलजी के किरदार के सामने बेचारे नज़र आते हैं। फिल्म में 'कैरेक्टर बिल्डिंग' बहुत अहम होती है। पद्मावत में सारा खेल इसी कैरेक्टर बिल्डिंग का है। उदाहरण के तौर पर दोनों की फिल्म में पहली एंट्री की बात कर ली जाए।
रतन सिंह परदे पर एक घायल व्यक्ति के रूप में आता है, जिसे गलती से पद्मावती ने तीर मार दिया है। उधर खिलजी एक पराक्रमी वीर के रूप में पेश किया जाता है। पहले सीन में ही मंगोल राजा का सिर उड़ा लाता है। इस सीन से खिलजी का किरदार रतन सिंह के किरदार पर भारी पड़ना शुरू हो जाता है। इसके बाद हर दृश्य में खिलजी की दरिंदगी और रतन सिंह का किरदार झुके कन्धों वाला, बोझिल किरदार। देखा आपने दमदार किरदार कैसे गढ़ दिया जाता है।
जिस भी दृश्य में खिलजी को दिखाया गया, उनमे विशेष श्रम किया गया है। लाइट्स के बेहतरीन प्रयोग रणवीर सिंह पर किये गए। सारे सशक्त दृश्य उसके ही खाते में गए। शाहिद कपूर के किरदार को संवारा नहीं गया, स्पष्ट दिखाई देता है जब वह राजपुताना शान के संवाद बेहद सपाट अंदाज में बोलते हैं। आखिरी की छोटी सी लड़ाई छोड़ दे तो एक राजपूत का शौर्य कहीं दिखाया नहीं गया या काइयेपन से छुपा लिया गया। शाहिद के किरदार को जानबूझकर कमज़ोर किया गया ताकि रणवीर सिंह के किरदार की क्रूरता अंडरलाइन हो। और ये तभी हो सकता था जब आप एक कद्दावर अभिनेता के सामने 'खरगोश' चुन लेते हैं।
जब पद्मावती का किरदार निभा रही दीपिका पादुकोण जंगल में हिरण का शिकार करते समय तीर को अनगढ़ अंदाज से थामती है तो समझ आ जाता है कि ये किरदार महज खानापूर्ति के लिए रखा गया था। उनके चेहरे पर सपाट भाव देखकर निराशा होती है। क्या उनके किरदार को भी जानबूझकर दबाया गया है। उनके चेहरे पर कहीं भी राजपूताना तेज़ और शौर्य के दर्शन नहीं होते हैं। इस फिल्म में केवल और केवल खिलजी व मलिक गफूर के किरदारों पर मेहनत की गई है। दीपिका जैसी अभिनेत्री का एक भी सशक्त दृश्य न होना मेरी बात की पुष्टि करता है।
इतिहास और रिसर्च का इस फिल्म से कोई लेनादेना नहीं है। यदि राजा रतन सिंह को खिलजी की पत्नी छुड़ा देती है तो साफ़ समझ आता है कि आप गोरा-बादल समेत राजपूताना शौर्य को अपमानित कर रहे हो। फिल्म के अंत में एक आत्मघाती लड़ाई में राजपूतों का मरण दिखाया गया है, एक बेवकूफाना लड़ाई। राजा रतन सिंह खालिस उर्दू के संवाद बोलता है, जलालुद्दीन खिलजी की सेवा में अरबी नृत्य होता है, राजकुमारी जंगल में गाउन पहनकर हिरण मारने जाती है। ये सड़ा हुआ शोध राम जाने किसने किया होगा।
फिल्म देखना एक कला है। कुछ साल पहले तक भारत में फिल्म देखने का एक पाठ्यक्रम होता था 'फिल्म आस्वाद पाठ्यक्रम'। अफ़सोस कि वह अब बंद हो चुका है। एक बात ईमानदारी से कहूं तो भारत में 'प्रशिक्षित दर्शकों' का अभाव है। भारतीय दर्शक चकाचौंध और धांसू संवादों में बह जाते हैं। 'जो रेत की नाव बनाकर समुन्दर से दांव लगाए, वो राजपूत' सुनकर तालियां बजा लेते हैं लेकिन ये नहीं देख पाते कि न आवाज में उतार-चढ़ाव था, न शौर्य की भावना।
फिल्म औसत से भी कम दर्जे की है, जिसमे खिलजी के पात्र को दिखाने के लिए कहानी का सहारा लिया गया है। विरोध न होता तो तीन दिन भी नहीं टिक पाती। निर्देशन के लिहाज से ये फिल्म उनकी वाहियात फिल्म 'गुज़ारिश' से भी निचले स्तर की है। इसका मतलब ये भी नहीं कि इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए था।
भंसाली ने चालाकी से विरोध को घूमर गीत तक सीमित रखकर अपना खेल खेल दिया। रतन सिंह और पद्मावती के किरदार को कमज़ोर कर खिलजीनामा पेश करने का षड्यंत्र सफल कर दिया। इसका एक ही प्रमाण है कि जब आप फिल्म देखकर बाहर निकलते हैं तो दिमाग में केवल 'खिलजी' का वहशीपन भरा होता है। आपको पद्मावती के जौहर की आंच महसूस नहीं होती लेकिन खिलजी की क्रूरता महसूस होती है। यहीं तो गेम था भंसाली का, जिसमे वह पूर्णतया सफल रहा है।
साभार- - -